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सोमवार, 6 अप्रैल 2026

मुरादाबाद की साहित्यिक संस्था हिन्दी साहित्य संगम के तत्वावधान में पांच अप्रैल 2026 को काव्यगोष्ठी का आयोजन

मुरादाबाद की साहित्यिक संस्था हिन्दी साहित्य संगम के तत्वावधान में रविवार पांच अप्रैल 2026 को आकांक्षा विद्यापीठ इण्टर कॉलेज, मुरादाबाद में काव्यगोष्ठी का आयोजन किया गया।

 रवि चतुर्वेदी द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना से आरम्भ कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार ओंकार सिंह ‘ओंकार’ ने अपनी रचना में लोकजीवन का चित्रण प्रस्तुत किया...

“एक सपेरा अपनी धुन में रहता है तल्लीन,

 वह नागों को नित्य पकड़ता, बजा-बजाकर बीन।”

 मुख्य अतिथि के रूप में डॉ. महेश दिवाकर ने  वीर रस की रचना सुनाते हुए कहा— 

“उठो! कमर कसकर उठो, लो हाथों में तलवार,

 चूको मत, मारो सखे! मिलें जहाँ गद्दार।”

 विशिष्ट अतिथि के रूप में डॉ. मनोज रस्तोगी ने युद्ध की विभीषिका का मार्मिक चित्रण करते हुए कहा— 

“उड़ रही गंध ताजे खून की,

 बरसा रहा ज़हर मानसून भी, 

घुटता है दम 

अब विस्फोटों के बीच।”

 कार्यक्रम का संचालन करते हुए संस्था के महासचिव जितेन्द्र कुमार जौली ने हास्य-व्यंग्य के माध्यम से वर्तमान युवा पीढ़ी की स्थिति पर कटाक्ष करते हुए कहा— 

“क्या हो गया है नौजवानों को, 

सबके दिमाग सड़ रहे हैं, 

फिल्मों का ही असर है शायद, 

ये कुत्ते भी बिगड़ रहे हैं।”

नकुल त्यागी ने आत्ममंथन पर आधारित पंक्तियाँ प्रस्तुत कीं— 

“अगर मैं अपने आप से प्यार कर लेता, 

एक झटके में ही दरिया पार कर लेता।”

डॉ. कृष्णकुमार ‘नाज़’ ने समाज की संवेदनहीनता को उजागर करते हुए कहा— 

“दीन-हीनता निर्धनता का हाथ चूमकर समझाती है,

 नन्हीं दूब हमेशा सबके पैरों से रौंदी जाती है।”

योगेन्द्र वर्मा ‘व्योम’ ने युद्ध और मानवता पर गहन विचार व्यक्त करते हुए कहा— 

“मानवता की देह ही होती लहूलुहान, 

‘युद्ध’ समस्या का कभी होते नहीं निदान।”

रवि चतुर्वेदी ने वीर रस से ओतप्रोत देशभक्ति की रचना प्रस्तुत कर श्रोताओं में उत्साह भर दिया— 

“कर्ज ये मातृभूमि का कदापि चुक नहीं सकता, 

तिरंगा देश का अपना कभी भी झुक नहीं सकता।”

कमल कुमार शर्मा ने जीवन को शतरंज की बिसात से जोड़ते हुए कहा— 

“दोस्तों और दुश्मनों की चालों के शतरंज में, 

बादशाह की जिद के आगे मात खाती ज़िंदगी।”

प्रशांत मिश्र ने मानवीय संवेदनाओं पर आधारित पंक्तियाँ प्रस्तुत कीं— 

“भूखे हो अहम् के, तो अपनों से रोटियाँ छीन लो,

 छिनी रोटी हाथ से जीवन गुजर जाए, ये ज़रूरी तो नहीं।”

 महासचिव जितेन्द्र कुमार जौली ने आभार व्यक्त किया। 

























सोमवार, 19 जनवरी 2026

मुरादाबाद के साहित्यकार रामदत्त द्विवेदी का देहावसान






मुरादाबाद के वयोवृद्ध साहित्यकार एवं साहित्यिक संस्था हिन्दी साहित्य संगम के अध्यक्ष रामदत्त द्विवेदी का रविवार 18 जनवरी 2026 की सुबह देहावसान हो गया। वह 90 वर्ष के थे और पिछले कुछ समय से अस्वस्थ थे। अपने पीछे वह दो पुत्रों और एक पुत्री का भरा पूरा परिवार रोता बिलखता छोड़ गए। उनका अंतिम संस्कार लोकोशेड स्थित मोक्ष धाम में किया गया।

     साहित्यिक मुरादाबाद के संस्थापक अध्यक्ष डॉ मनोज रस्तोगी ने बताया कि 30 जून 1937 को रामपुर की तहसील शाहबाद में पंडित गोपाल दत्त द्विवेदी एवं कैलाशो देवी के सुपुत्र के रूप में जन्में रामदत्त द्विवेदी आजीवन हिन्दी साहित्य के प्रति समर्पित भाव से सक्रिय रहे। उनकी दो काव्य-कृतियां 'हम अंधेरों को मिटायें' और 'खुद को बदलना होगा' प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्हें साहित्यिक मुरादाबाद की ओर से  राजेन्द्र मोहन शर्मा श्रृंग' स्मृति सम्मान, आदर्श कला संगम द्वारा माहेश्वर तिवारी सम्मान, कला भारती द्वारा कला श्री तथा सरस्वती परिवार द्वारा काव्य भूषण सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है।

     उनकी अंतिम यात्रा रविवार को उनके मिलन विहार स्थित आवास से प्रारम्भ हुई। लोकोशेड स्थित मोक्षधाम में उनके पार्थिव शरीर को उनके सुपुत्र प्रतीत कुमार शर्मा  ने मुखाग्नि दी। महानगर के साहित्यकारों ओंकार सिंह, रघुराज सिंह निश्छल, डॉ महेश दिवाकर, अशोक विद्रोही,  वीरेंद्र सिंह बृजवासी, राम सिंह निशंक, राजीव प्रखर, दुष्यन्त बाबा, जितेंद्र सिंह जौली, मनोज व्यास,  मयंक शर्मा, अनुराग मेहता, मनोज मनु, अमर सक्सेना, नकुल त्यागी, डॉ कृष्ण कुमार नाज, उदय अस्त, समीर तिवारी, संजीव आकांक्षी समेत अनेक गणमान्य नागरिकों ने उन्हें अश्रुपूरित नेत्रों से अंतिम विदाई दी। 

    महानगर की साहित्यिक संस्थाओं मुरादाबाद लिटरेरी क्लब, साहित्यपीडिया, राष्ट्रभाषा हिन्दी प्रचार समिति, हस्ताक्षर, अंतरा, हरसिंगार, कला भारती, उर्दू सहित्य शोध केंद्र, विजयश्री वेलफेयर सोसाइटी, अल्फाज अपने, साहित्यिक मुरादाबाद, हिन्दी साहित्य संगम, संस्कार भारती, जैमिनी साहित्य फाउंडेशन, अखिल भारतीय साहित्य कला मंच, काव्य धारा, गुंजन प्रकाशन आदि ने उनके देहावसान पर शोक व्यक्त किया है । 











रविवार, 14 सितंबर 2025

मुरादाबाद की साहित्यिक संस्था हिन्दी साहित्य संगम द्वारा हिन्दी दिवस की पूर्व संध्या पर 13 सितम्बर 2025 को आयोजित सम्मान समारोह में श्रीकृष्ण शुक्ल को हिन्दी साहित्य गौरव सम्मान से किया गया सम्मानित

 


मुरादाबाद की साहित्यिक संस्था हिन्दी साहित्य संगम द्वारा हिन्दी दिवस की पूर्व संध्या पर शनिवार 13 सितम्बर 2025 को सम्मान समारोह आयोजित किया गया जिसमें मुरादाबाद के वरिष्ठ रचनाकार श्रीकृष्ण शुक्ल को संस्था की ओर से 'हिन्दी साहित्य गौरव सम्मान' से सम्मानित किया गया। सम्मान स्वरूप श्री शुक्ल को अंगवस्त्र, मानपत्र, प्रतीक चिह्न एवं श्रीफल प्रदान किए गए।प्रदत्त मानपत्र का वाचन योगेन्द्र वर्मा व्योम ने किया।

    दुष्यंत बाबा द्वारा प्रस्तुत माॅं शारदे की वंदना से आरंभ हुए कार्यक्रम की अध्यक्षता रामदत्त द्विवेदी ने की। मुख्य अतिथि राजीव सक्सेना एवं विशिष्ट अतिथि के रूप में डॉ. चन्द्रभान सिंह उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन जितेन्द्र जौली द्वारा किया गया।

सम्मानित रचनाकार श्रीयुत श्रीकृष्ण शुक्ल के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर आधारित आलेख का  वाचन करते हुए राजीव 'प्रखर' ने कहा कि पुरुषोत्तम शरण शुक्ल एवं सरला देवी शुक्ल के कुल दीपक के रूप में 30 अगस्त 1953 को मुरादाबाद में जन्में श्री कृष्ण शुक्ल ने अपने उत्कृष्ट रचनाकर्म एवं साहित्यिक अवदान से मुरादाबाद को गौरवान्वित किया है। बचपन से ही परिवार एवं परिवेश से मिले संस्कारों ने आपको संस्कृति एवं साहित्य की ओर आकर्षित किया। आपका गद्य-लेखन कार्य छात्र जीवन से ही आरम्भ हो गया था । आपकी गिनती निसंदेह आध्यात्म एवं शिष्ट व्यंग्य के श्रेष्ठ रचनाकारों में की जा सकती है। व्यक्तिगत रूप से मेरा आदरणीय शुक्ल जी से परिचय लगभग 10 वर्ष पूर्व डॉ. मनोज रस्तोगी द्वारा स्थापित एवं संचालित प्रतिष्ठित साहित्यिक समूह 'साहित्यिक मुरादाबाद' के माध्यम से हुआ।

       समारोह में रचना पाठ करते हुए श्रीकृष्ण शुक्ल ने कहा - 

सोच जरा क्या खोया तूने, सोच जरा क्या पाया। धन वैभव के ही चक्कर में, जीवन व्यर्थ गंवाया। अंतिम पल भी यह धन तेरे किंचित काम न आया।"

कार्यक्रम में वर्तमान में हिन्दी की स्थिति को लेकर विचार मंथन भी हुआ हुआ। वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. महेश 'दिवाकर' का कहना था कि आज हिन्दी की स्थिति पिछले वर्षों में निश्चित रूप से बेहतर हुई है तथा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी के उत्थान हेतु सतत प्रयास जारी हैं। आशा की जाती है कि हिन्दी शीघ्र ही राष्ट्रभाषा घोषित होकर संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा अनुसूची में स्थान बनायेगी।"

     ओंकार सिंह ओंकार के अनुसार "हिन्दी दिवस की पूर्व संध्या पर श्रीकृष्ण शुक्ल जी का सम्मान अत्यंत हर्ष का विषय है, जो आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करेगा।" 

    योगेन्द्र वर्मा व्योम के अनुसार -"श्री शुक्ल जी का सम्मान हर उस व्यक्ति का सम्मान है जो संस्था के संस्थापक एवं हिन्दी के प्रति समर्पित रहे  स्मृति शेष राजेन्द्र मोहन शर्मा 'श्रृंग' जी के पदचिन्हों पर चलता है एवं उनके द्वारा स्थापित साहित्यिक मूल्यों में आस्था रखता है।"

कार्यक्रम में राजीव 'प्रखर', हरि प्रकाश शर्मा, दुष्यंत बाबा, नकुल त्यागी, योगेन्द्र वर्मा व्योम, कमल शर्मा, समीर तिवारी, डॉ महेश 'दिवाकर', डॉ. मनोज रस्तोगी, डॉ. कृष्ण कुमार नाज़, रघुराज सिंह निश्चल, ओंकार सिंह ओंकार, आवरण अग्रवाल, रवि चतुर्वेदी, विवेक निर्मल आदि साहित्यकारों ने भी श्रीकृष्ण शुक्ल के व्यक्तित्व और कृतित्व पर विचार व्यक्त किये। नकुल त्यागी ने आभार अभिव्यक्त किया।