ब्रजभूषण सिंह गौतम अनुराग लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
ब्रजभूषण सिंह गौतम अनुराग लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 13 फ़रवरी 2022

वाट्स एप पर संचालित समूह साहित्यिक मुरादाबाद की ओर से मुरादाबाद के साहित्यिक आलोक स्तम्भ की तेरहवीं कड़ी के अंतर्गत स्मृतिशेष ब्रजभूषण सिंह गौतम के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर तीन दिवसीय ऑनलाइन कार्यक्रम का आयोजन

 







मुरादाबाद के प्रख्यात साहित्यकार स्मृतिशेष  ब्रजभूषण सिंह गौतम 'अनुराग' के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर वाट्स एप पर संचालित समूह 'साहित्यिक मुरादाबाद' की ओर से 10 -11 व 12 फरवरी 2022 को तीन दिवसीय ऑनलाइन आयोजन किया गया। चर्चा में शामिल साहित्यकारों ने कहा कि ब्रजभूषण सिंह गौतम 'अनुराग' प्रकृति के अद्भुत चितेरे होने के साथ-साथ मानवीय सरोकारों के कवि थे। उनका सम्पूर्ण साहित्य पाठकों से सीधा संवाद करता हुआ सामाजिक विसंगतियों को भी उजागर करता है।

     

मुरादाबाद के साहित्यिक आलोक स्तम्भ की तेरहवीं कड़ी के तहत आयोजित इस कार्यक्रम में संयोजक वरिष्ठ साहित्यकार एवं पत्रकार डॉ मनोज रस्तोगी ने कहा कि 30 जून 1933 को जन्मे ब्रजभूषण सिंह गौतम 'अनुराग' की प्रथम काव्य कृति 'आंसू' वर्ष 1951 में प्रकाशित हुई। उसके बाद  लोक महाकाव्य 'दर्पण मेरे गांव का',महाकाव्य 'चांदनी', ग़ज़ल संग्रह 'धूप आती नहीं', गीत संग्रह 'सोनजुही की गंध', 'अपने अपने सूरज ', 'सांसों की समाधि', कहानी संग्रह 'एक टुकड़ा आसमान', नवगीत संग्रह 'चंदन वन सँवरे' प्रकाशित हुआ।  वर्ष 2018 में (उनके निधन के उपरांत)  काव्य कृति 'सुख से तो परिचय न हुआ'  का प्रकाशन हुआ। इसके अतिरिक्त वर्ष 2009 में डॉ महेश दिवाकर एवं डॉ हर महेंद्र सिंह बेदी के संपादन में अमृत महोत्सव अभिनंदन ग्रंथ तथा वर्ष 2013 में मधुकर अस्थाना के संपादन व अशोक विश्नोई व जितेंद्र जौहर के संयुक्त संपादन में अभिनंदन ग्रंथ 'आंगन से आकाश तक' प्रकाशित हो चुके हैं।आप की कृतियों पर तीन लघु शोध प्रबंध तथा एक शोध प्रबंध भी हो चुका है । वर्ष 2007-08 में गुरु नानक देव विश्वविद्यालय अमृतसर में एम फिल हिंदी चतुर्थ सेमेस्टर की छात्रा रितिका ने डॉ महेंद्र सिंह बेदी के निर्देशन में 'कवि बृजभूषण सिंह गौतम अनुराग कृत दर्पण मेरा गांव का महाकाव्य का लोक सांस्कृतिक अध्ययन शीर्षक से लघु शोध प्रबंध पूर्ण किया। वर्ष 2008-09 में इसी विश्वविद्यालय की छात्रा हरप्रीत कौर ने भी डॉ बेदी के निर्देशन में 'चांदनी महाकाव्य का सांस्कृतिक अध्ययन ' शीर्षक से लघु शोध प्रबंध पूर्ण किया। वर्ष 2012-13 में इसी विश्वविद्यालय की छात्रा सविता कुमारी ने  डॉ सुनीता शर्मा के निर्देशन में 'सांसों की समाधि - काव्य एवं भाषागत वैशिष्ट्य' शीर्षक से लघु शोध प्रबंध पूर्ण किया। वर्ष 2021 में पानीपत की  ऋतु चौधरी को 'महाकवि अनुराग गौतम का जीवन, साहित्य, साधना,  संवेदना और शिल्प उपलब्धि एवं मूल्यांकन ' शीर्षक पर डॉ महेश दिवाकर के निर्देशन में शोध कार्य पूर्ण करने पर श्री वेंकटेश्वर विश्वविद्यालय गजरौला(अमरोहा) द्वारा शोध उपाधि प्रदान की गई। 

   

वरिष्ठ साहित्यकार डॉ महेश दिवाकर ने उनकी अप्रकाशित रचनाओं के प्रकाशन की दिशा में प्रयास करने पर बल दिया। उन्होंने कहा कि  हरी दूब का दर्द, फूल चांदनी के, गुनगुनाते चीड़ वन, कच्ची धूप खिली, सम्बन्धों के हरसिंगार,  चीखों के जंगल, नदिया भर आंसू, एक नदी भीतर से उछली,  हरसिंगार खिलेगा,  मनुहार, कवि क्रंदन, पक्षी, वेदना, पद्मावती, जिंदगी, अनुराग दोहावली तथा मुक्तक संग्रह उनकी अप्रकाशित कृतियां हैं । 

   

 वरिष्ठ साहित्यकार ओंकार सिंह ओंकार ने कहा कि  स्मृतिशेष ब्रजभूषण सिंह गौतम 'अनुराग' की ग़ज़लों में ग़ज़लों की प्रवृति का निर्वाह बखूबी हुआ है। गज़लों में परिपक्व खुशगवारी तथा गहरा रूहानी एहसास है। उनमें वैयक्तित अनुभूतियाँ हैं। उनमें मिलन का उल्लास, मनुहार, विछोह, राष्ट्रीयता, जनपक्षधरता सभी बिन्दु दिखते हैं।  उन्होंने श्रंगार, प्राकृतिक सौन्दर्य तथा विभिन्न सामाजिक विषयों पर बहुत ही अच्छे तथा प्रेरणा दायक शेर कहे हैं। उन्होंने समाज की हर तरह की पीड़ाओं और विसंगतियों को अपनी शायरी का विषय बनाया है। उन्होंने लोगों के दिलों में देश भक्ति का जज्वा पैदा करने तथा साम्प्रदायिक सौहार्द बनाने और देश से गरीबी मिटाकर नवनिर्माण करने के लिए प्रेरणादायक शेर भी लिखे हैं। 

     

प्रख्यात शायर मंसूर उस्मानी ने कहा स्मृतिशेष श्री अनुराग  गीत के साथ साथ ग़ज़ल के भी सिद्ध कवि  थे, उनकी यादों और रचना धर्मिता को सलाम, मनोज जी को धन्यवाद कि वक़्त की गर्द में धुंधलाये  हीरे उनके प्रयास से चमक रहे हैं

     

रामपुर के साहित्यकार रवि प्रकाश ने कहा कि उनके काव्य संग्रह 'आंसू' में जहाँ एक ओर वेदना की छटपटाहट है ,वहीं दूसरी ओर एक जीवन-दर्शन भी प्रकट होता है और बताता है कि  यह संसार क्षणभंगुर है तथा यहां शरीर की नश्वरता एक कटु सत्य है। संग्रह में आपका एक गीत इसी दार्शनिक चेतना का वाहक है । वास्तव में तो गीता में जिस शरीर की नश्वरता और आत्मा की अमरता का गान किया गया है, वह आपके इस गीत से भलीभांति स्पष्ट हो रही है। 

     

वरिष्ठ साहित्यकार अशोक विश्नोई ने कहा कि स्मृति शेष ब्रजभूषण सिंह गौतम " अनुराग "  एक उच्चकोटि के रचनाकार थे । उनके गीत,गज़ल, नवगीत मानस पटल पर एक अमिट छाप छोड़ हैं।गौतम जी अपने जीवन काल में जितना लिखा वह वास्तव में एक मील का पत्थर है ।" दर्पण मेरी गाँव का" व  " चांदनी " महाकाव्य रचकर उन्होंने यह प्रमाणित कर दिया कि उनका फ़लक कितना बड़ा है।यही कारण है कि उनका स्थान विश्व कवि की श्रेणी में आता है।

       

वरिष्ठ कवयित्री डॉ प्रेमवती उपाध्याय ने कहा स्मृति शेष गौतम अद्भुत विलक्षण प्रतिभा , अदृश्य साधना के धनी ,दिखने में कठोर ,कोमल अंतःकरण वाले साधक थे।जब उन्होंने श्रंगार पर लिखा  तो दर्पण मेरे गाँव का ,महाकाव्य में वर्णित काव्य सौष्ठव की पराकाष्ठा का स्वरूप परिलक्षित होता है ।वह भी ग्रामीण परिवेश की सादगी सुकोमलता के आदर्शों से ओतप्रोत नारी सौंदर्य का मर्यादित  भावों से पूर्ण प्रेम और  श्रंगार का चित्रांकन घनाक्षरी छंद में , जो कठिन साध्य है ।चाँदनी महाकाव्य लिखा तो ऐसा कि लगता है स्वम् चाँदनी बनकर सम्पूर्ण संसार क्या समस्त ब्रह्मांड का भृमण करने में अद्भुत क्षमता प्रतिभा का परम पुरुषार्थ का परिणाम का सुरस ही परोस दिया पाठकों को । मेंरी दोंनो पुस्तकों काब्य संग्रह  ,की भूमिका उन्होंने लिखी है ,भाग्य भाग्यवश में उनके  अनुसार कुछ कर नही पाई । गौतम जी एक नेक आदर्श चरित्रवान  पुरुष थे । वे एक सरल सफल साहित्यकार थे  श्रेष्ठ आचरण के  भावप्रधान महामानव थे ।

     

वरिष्ठ साहित्यकार अशोक विद्रोही ने कहा कि महाकवि ब्रजभूषण सिंह गौतम अनुराग के लोक काव्य 'दर्पण मेरे गांव का'  में  मजदूर ,किसान सर्वहारा वर्ग की अंतर पीड़ाओं उनसे जुड़ी विवशताओं  का विशद वर्णन है तो महाकाव्य 'चांदनी'  पूर्ण रूप से अध्यात्म पर आधारित है। जीवन में आए उतार-चढ़ाव उनके हृदय से निकली गीतों की अविरल धारा गजलों के रूप में भी प्रतिबिंबित होती हैं।  

   

वरिष्ठ साहित्यकार श्री कृष्ण शुक्ल ने कहा कि वे अग्रिम पंक्ति के राष्ट्रीय कवि थे । उन्होंने गद्य तथा पद्य दोनों में ही समान अधिकार से लेखनी चलायी हैI  कविता उनके मस्तिष्क में सहज ही प्रस्फुटित होती थीI उन्होंने एक ही दिन में पंद्रह गीतों की रचना भी की थीI उनके गीतों में वेदना भी है, छटपटाहट भी है, जीवन दर्शन भी है और आध्यात्मिकता भी हैI श्री अनुराग के संपूर्ण सृजन में इस जीवन दर्शन, तथा आध्यात्मिकता के दर्शन होते हैं, श्रंगार, प्रेम, वियोग तथा सामाजिक विषमताओं पर भी उनकी लेखनी खूब चली हैI

     

चर्चित नवगीतकार योगेंद्र वर्मा व्योम ने कहा बहुमुखी प्रतिभा और बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी अनुरागजी द्वारा भिन्न-भिन्न विषयों, परिस्थितियों और परिवेशों पर सहस्त्राधिक गीत रचे हैं ।उनके भीतर गीत जन्म नहीं लेते थे वरन् गीत फूटते थे। वह गीतों को जीते थे, गीतों को ओढ़ते थे, गीतों को बिछाते थे, गीतों को आत्मसात करते थे। बल्कि यों कहें तो अधिक उचित होगा कि आज भी उनके गीत उजली रात में बिखरती उस चाँदनी की तरह से हैं जो निर्मल, निश्छल और शीतल तो है ही साथ ही मद्धम-मद्धम प्रकाश फैलाते हुए श्रोताओं को, पाठकों को मंत्रमुग्ध कर रही है।  उनके गीत आत्मसात करते हुए श्रोताओं से, पाठकों से सीधा संवाद करते हैं। उनके गीत ज़मीन से जुड़कर तो बात करते ही हैं, साथ ही वर्तमान में विसंगतियों पर मर्यादित रूप से तीखा कटाक्ष भी करते हैं। 

   

मुम्बई के साहित्यकार प्रदीप गुप्ता ने कहा कि जब मैं किशोर अवस्था में था  तो जिस भी वाद विवाद प्रतियोगिताओं में जाता वहां स्टार डिबेटर ब्रज भूषण गौतम जी हुआ करते थे । उनकी भाषण शैली बड़ी आकर्षक थी , प्रतियोगी और श्रोता उन्हें मंत्र मुग्ध हो कर सुनते थे . एक रोचक बात यह भी थी कि अपनी  इसी हाबी के कारण लम्बे समय तक कालेज में विभिन्न विषयों में पढ़ते रहे . कवि के रूप में भी उन्होंने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई ।

   

दिल्ली की साहित्यकार डॉ इंदिरा रानी ने कहा कि स्मृति शेष आदरणीय श्री गौतम जी के विषय में पटल पर विद्वानों के  उल्लेखनीय विचार पढ़े। मुझे अनेक प्रसंग याद आ गये. प्रदीप गुप्ता जी ने उन्हें स्टार डिबेटर कहा जो सर्वथा उचित है।अनेक बार मैंने भी वाद विवाद गौतम प्रतियोगिताओं में उनके साथ प्रतिभाग किया। उनका धाराप्रवाह वक्तव्य बहुत प्रभावशाली होता था। 

     

रामपुर के साहित्यकार शिव कुमार चंदन ने कहा कि ब्रजभूषण सिंह गौतम जी के सानिध्य का आँशिक अवसर रामपुर मे आयोजित साहित्यिक आयोजन मे ही हुआ । उनके सरस सुमधुर काव्य पाठ से मेरा मन अधिक  प्रभावित हो गया , प्रकृति के सौन्दर्य में रची बसी काव्य पाठ की अद्भुत प्रस्तुति बासंती  ऋतु की मनोहारी छटा का चित्रण ,मंत्र मुग्ध कर गया ।उनका बहुआयामी   काव्य सृजन साहित्यक धरोहर  अनुपम एवं अविस्मरणीय है 

 

 कवयित्री डॉ शोभना कौशिक ने कहा कि  स्मृति शेष श्री भूषण सिंह गौतम अनुराग साहित्य के एक ऐसे दैदीप्यमान सितारे हैं जिनकी रचनाओं से साहित्यिक जगत सदैव आलोकित रहेगा। यह कहना अतिश्योक्ति न होगी कि वे अपनी रचनाओं के गागर में सागर भरने की कला के महारथी थे उनके सहित्य में छायावाद से लेकर हर युग की काव्य परंपरा के दर्शन होते हैं। 

   

कवयित्री हेमा तिवारी भट्ट ने कहा हिंदी साहित्य संगम और राष्ट्र भाषा हिन्दी प्रचार समिति की गोष्ठियों में मैंने श्री गौतम जी के बारे में कई बार सुना था और तभी उन्हें जानने और मिलने की उत्सुकता हुई थी।यह मेरा दुर्भाग्य ही रहा कि मैंने उनके बारे में सुना तो बहुत पर उनसे कभी साक्षात मिलना नहीं हो पाया और इससे पहले कि उनसे मिलने का अवसर मिलता वह इस असार संसार को छोड़कर हम सब को विदा कह कर चले गए।परंतु उनके जाने के बाद उनकी कृति "सुख से तो परिचय न हुआ" के लोकार्पण समारोह में उनके परिवार,उनकी कृतियों,उनके व्यक्तित्व के बारे में विस्तार से जानने सुनने का अवसर मिला।उनकी कृति "सुख से तो परिचय न हुआ" को पढ़ने का अवसर भी मिला और उनके प्रति अपने उद्गार व्यक्त करने का भी।श्री गौतम जी के बारे में जितना पढ़ती जाती हूंँ उतना ही कौतूहल बढ़ता जाता है।उनकी लेखनी प्रचुरता से फलित हुई,उनका शब्दकोश अचंभित करता है,उनकी दृष्टि सूक्ष्म अवलोकन में सक्षम है,वह जीवन रूपी किताब के गम्भीर विश्लेषक व उत्साही पाठक रहे हैं,लेखन की उनकी समर्पणयुक्त अभिरुचि अनुकरणीय थी,वे विद्वान और प्रतिभा संपन्न रचनाकार थे जो लेखन को प्रतिस्पर्धा के स्तर तक ले जा सकते थे और विजेता होने का जज्बा रखते थे।उन्होंने लगभग हर छंद और हर विधा में अपने कौशल को सिद्ध किया है। 

युवा साहित्यकार राजीव प्रखर  ने कहा कि प्रकृति में निहित तत्वों को अत्यंत सुंदरता, कुशलता व सहज रूप से बिम्बों के रूप में प्रस्तुत कर देना ब्रजभूषण गौतम के रचनाकर्म की मुख्य विशेषता रही।  उनकी रचनाओं में अल्हड़पन व शरारत की सुंदर  जुगलबंदी के साथ पूर्ण गाम्भीर्य का सुंदर संगम भी स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है, चाहे वह सोने-सी बिखरी घरद्वारे धूप हो, वासंती मौसम से अठखेलियाँ करते मलयज के गीत, पीर छिपाकर प्रियतम तक पहुँचने की जिजीविषा, प्रेयसी का प्रकृति मिश्रित मनभावन स्वरूप चित्रण अथवा अन्य रचनाएँ, सभी कुछ एक मधुर व प्रवाहमयी सुर-लय-ताल के साथ हृदय को झंकृत कर देता है। 

     

जकार्ता (इंडोनेशिया) की साहित्यकार वैशाली रस्तोगी ने कहा ब्रजभूषण सिंह गौतम "अनुराग" जी के साहित्य  में प्रकृति के मनोरम रूपों का दर्शन होता है बहिन वह अपनी रचनाओं में बर्तमान सामाजिक विसंगतियों को भी उकेरते हैं । उनका साहित्य युगों - युगों तक याद किया जाएगा। 

   

साहित्यकार डॉ अवनीश सिंह चौहान ने कहा कि साहित्यिक मुरादाबाद की ओर से स्मृतिशेष साहित्यकार अनुराग जी की रचनाधर्मिता पर केंद्रित इस महत्वपूर्ण आयोजन के लिए साधुवाद। सभी साहित्यकारों के आलेख सराहनीय रहे। अनुराग जी की पावन स्मृतियों को नमन।

   

कुरकावली (जनपद सम्भल) के वरिष्ठ साहित्यकार त्यागी अशोक कृष्णम ने कहा मुरादाबाद के दिवंगत साहित्यकारों पर साहित्यिक मुरादाबाद द्वारा आयोजन किया जाना एक ऐतिहासिक कार्य है । इसकी जितनी सराहना की जाए कम है।

 

सम्भल के युवा साहित्यकार अतुल कुमार शर्मा ने कहा यह एक श्रमसाध्य कार्य है। साहित्यिक मुरादाबाद नई पीढ़ी के रचनाकारों को अपनी साहित्यिक विरासत से जोड़ने का उल्लेखनीय कार्य कर रहा है।

अंत में स्मृतिशेष ब्रजभूषण सिंह गौतम अनुराग की पत्नी राजदुलारी गौतम एवं सुपुत्र मनोज गौतम ने आभार व्यक्त करते हुए कहा कि तीन दिन तक चले इस आयोजन में आप सभी सम्मानित साहित्यकारों का कोटि कोटि धन्यवाद। हम डॉ मनोज रस्तोगी के विशेष रूप से आभारी हैं कि वे इतनी मेहनत से साहित्यिक मुरादाबाद के माध्यम से इस यात्रा को आगे बढ़ा रहे हैं ।

::::::: प्रस्तुति::::::

डॉ मनोज रस्तोगी

8,जीलाल स्ट्रीट

मुरादाबाद 244001

उत्तर प्रदेश, भारत

मोबाइल फोन नम्बर 9456687822

सोमवार, 31 जनवरी 2022

मुरादाबाद के साहित्यकार स्मृतिशेष ब्रजभूषण सिंह गौतम अनुराग की प्रथम काव्यकृति - 'आंसू' । यह कृति वर्ष 1951 में प्रकाशित हुई थी । इस कृति में उनके 21 गीत हैं जो उन्होंने अपने प्रिय मित्र तुलाराम के असमय काल कवलित हो जाने पर लिखे। कृति की भूमिका उनके गुरु बांके लाल शर्मा ने लिखी है । हमें यह दुर्लभ कृति उनकी पत्नी राजदुलारी गौतम एवं सुपुत्र मनोज गौतम ने उपलब्ध कराई है ।


 क्लिक कीजिए और पढ़िए पूरी कृति

👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇

https://documentcloud.adobe.com/link/track?uri=urn:aaid:scds:US:2f4ff648-e311-3b2b-a7cf-e7a4e5459f2a

::::::::प्रस्तुति:::::::

डॉ मनोज रस्तोगी

8, जीलाल स्ट्रीट

मुरादाबाद 244001

उत्तर प्रदेश, भारत

मोबाइल फोन नम्बर 9456687822

गुरुवार, 27 जनवरी 2022

मुरादाबाद के साहित्यकार स्मृतिशेष ब्रजभूषण सिंह गौतम अनुराग के छह गीत । ये गीत हमने लिए हैं उनके गीत संग्रह 'सोनजुही की गंध' से। उनका यह संग्रह वर्ष 2010 में पार्थ प्रकाशन द्वारा प्रकाशित हुआ था। इस संग्रह में उनके 99 गीत हैं । इस संग्रह की भूमिका लिखी है प्रख्यात गीतकार किशन सरोज ने ।

 


(1)

पंछी कब तक दुख झेलोगे!

भव- सागर की प्रखर ज्वाल से, 

जल जलकर खेलोगे!


जर्जर तरनि जलधि अति गहरा, 

तेरी साँस-साँस पर पहरा, 

निज क्षमता तोलोगे!


पलछिन अणु-अणु से टकरायें, 

धरा-गगन कम्पित भय खायें, 

जय कैसे बोलोगे!


भ्रम से भरी कुटिल माया से, 

जलनशील शीतल छाया से, 

तुम कब तक खेलोगे!


इस परिव्याप्त नियति-शासन में

द्वन्द्व भरे मन के आँगन में, 

रथ कैसे ठेलोगे!


करुण विभव सारी संसृति का, 

मधुर वासना-बिम्व-प्रगति का, 

क्या रहस्य खोलोगे!


(2)

गाँव को छोड़कर अब नगर की, भीड़ में हम कहीं खो गये हैं, कागजी फूल से हो गये हैं। 


आपसी स्वस्थ रिश्ते पुराने, बालकों के खिलौने हुए हैं,

छू रहे जो कभी थे गगन को, आदमी आज बौने हुए हैं,

पत्थरों के नगर काँच के घर, हम बना चैन से सो रहे हैं।


अनमनी-सी, ठगी-सी, बुझी-सी, मौन अधरों हँसी पल रही है, खोजते-खोजते खो गये हम, आदमीयत नहीं मिल रही है, 

एक हारी-थकी जिन्दगी का, बोझ बरबस सभी ढो रहे हैं।


जिन्दगी, जिन्दगी अब नहीं है, साँस हर एक हतभागिनी है,

मांग में फूल बनकर सजी जो, हाय! विधवा हुई चाँदनी है, 

रास्ते रास्तों से झगड़कर, अब स्वतः ही अलग हो रहे हैं।


आदमी आदमी से विमुख है, और भयभीत परछाइयाँ हैं, डंक-सा मारतीं हर किसी की, देह में मीत अंगड़ाइयाँ हैं, 

रिस रहे जो उरों में हमारे, घाव पर घाव हम धो रहे हैं।


तरु दुमों की हुई आज छोटी, घास से भव्य ऊँचाइयाँ हैं,

 प्राण का दीप कम्पन भरा है, चल रहीं मौत की आँधियाँ हैं, 

 पाँव में शूल अपने चुभोकर, बीज दुख के यहाँ बो रहे हैं।


(3)

ओ सुरसरि की धार विमल तुम, धीरे-धीरे बहना, 

दुर्लभ बहुत हो गया मन को, मन ही से कुछ कहना।


जिधर देखते उधर बह रहीं, हैं मुँह जोर हवायें, 

पगली-पगली भटकी-भटकी, हैं खामोश दिशायें, 

तुम घर की दीवार, न होकर ऐसे वैसे ढहना ।


थे जो भी जाने-पहचाने, सभी हुए अनजाने, 

शूलों की क्या कहें, फूल भी ठाढ़े सीना ताने, 

हर कोई सीमा लांघे, तुम सीमा ही में रहना


चाहे हो कितनी भी पीड़ा, कितनी भी मजबूरी, 

सुलभ न हो पाये प्राणों को, प्राणों की कस्तूरी, 

अन्तर्मन की व्यथा-कथा मत, भूल किसी से कहना।


चोट पंखुरी की कुछ ऐसी, पीर हुई कसकीली, 

मलय गंध से डाल भाँवरें, आँख हुई हर गीली,

 अपनों का हर वार विहँस कर, हो जैसे भी सहना


गंध न बिखरे जिसमें, ऐसी कोई भोर नहीं है, 

मधुर प्यार वह सिंधु कि, जिसका कोई छोर नहीं है, 

दृढ़ता की पतवार संभाले, पाल तानकर बहना।


(4)

सूर्य की रोशनी में घने, देखने को कुहासे रहे,

प्यार की फागुनी रात में, मन सभी के उदासे रहे।


रात के स्वप्न में तो यहाँ, उड़ रहीं रेशमी तितलियाँ, 

आदमीयत रहे इसलिए, सज रहीं सैकड़ों बर्दियाँ, 

पर सुबह आइना देखकर, साफ चेहरे रुआंसे रहे।


आज सड़ती हुई लाश पर, जल रही हैं अगरबत्तियाँ, 

द्वार-आँगन खड़ी हो रहीं, सिर्फ अलगाव की भित्तियां, 

आदमी का लहू चूसकर, आदमी हैं पियासे रहे।


अब मनुज की त्वचा में छिपे, भेड़िये दोगले हो गये,

 पुस्तकों के नियम उपनियम, हाय! सब खोखले हो गये, 

 विष दिया चन्दनी साँस को, हाथ में पर बताशे रहे।


आज हर रोज है हो रहा, आस्था की सिया का हरण, 

छप रहे पावनी भूमि पर, दानवों के घिनौने चरण, 

आदमी की भली नस्ल को, आदमी हैं भुला से रहे।


स्नेह की क्यारियों में खिले, चन्द रिश्ते अमलतास से, 

नेह के ही सहज रस बिना, मर रहे भूख से प्यास से, 

भूल से जो बनीं दूरियाँ, भूल से हम बढ़ाते रहे।


(5)

आज हो गये इस दुनिया में कैसे-कैसे लोग,

 बने भेड़िए जगह-जगह पर, घूम रहे हैं लोग।


हर मन की खुशियाँ हथियाकर, सत्ता पर आसीन, 

जन-सेवा का तिलक लगाये, पाप कर्म में लीन, 

चोरी कर सीनाजोरी से, घूम रहे हैं लोग।


पंख तितलियों के मधुपों के, नोंच-नोंच दिन रात, 

करें जुगनुओं की हत्यायें, लगा लगा कर घात, 

गर्म लहू से होंठ रंगाये, घूम रहे हैं लोग।


लूट रहे अनब्याही तुलसी, सुबह दुपहरी शाम, 

भूल गये सब नाते-रिश्ते, हैं चर्चित बदनाम, 

मानवता की चिता जलाते, घूम रहे हैं लोग।


साँस-साँस पर पहरे बिठला, प्राण-प्राण पर डर, 

खेत-खेत खलिहान जलाकर, मिटा मिटाकर घर, 

आँख दिखाते खुले खजाने, घूम रहे हैं लोग।


चूल्हे-चकिया दादी माँ के, बना बना ग़मगीन, 

मिट्टी वाले तोड़ खिलौने, बच्चों के रंगीन, 

सूरज को गालियां सुनाते, घूम रहे हैं लोग।


(6)

सरसिज-सी पलकों पर उतरी बुझी-बुझी सी शाम, 

अधरों पर लिख गया कसकता एक दर्द का नाम


खिला गोलियां आज नींद की, हम बच्चे बहलाते, 

बाँझ कामनाओं से, फल की इच्छा कर दुखियाते,

ढूँढ रहे हैं भरी सिसकियों में हम सुख अंजाम, 

लगा हुआ है आज सोच को अपने पूर्ण विराम।


भरी जेठ की दुपहरिया की, जलन हमारी रोटी, 

डूबी हुई दर्द में है, तकदीर हमारी खोटी, 

नभ से धरती तक सूनापन भरा हुआ गुमनाम, 

बीत रही है धीरे-धीरे अपनी उमर तमाम


घूम रहे हैं प्रेत हर जगह, सुन्दर कपड़ों वाले, 

फूल तोड़ती जूही के, पाँवों पहनाकर ताले, 

आज हो रही है दुनियां में मानवता बदनाम, 

ठहर रहा है निर्मम पतझर घर-घर आठों याम


ले हाथों तूफान प्यार का, जब तक हम न उठेंगें, 

हँसी चमेली की चम्पा की, हरगिज पा न सकेंगे, 

लाना है इस वसुन्धरा पर जगमग भोर ललाम, 

भरना है फूलों-सी खुशियों से जन-जन के धाम।


सुमनों के रंगों से आओ, मनहर चित्र बनायें, 

ईर्ष्या वाले घाव प्रीति के, मरहम से दुलरायें, 

सूनेपन में दे स्वर लहरी गीतों की अविराम, 

यमुना तट पर बजे बाँसुरी नाचें राधे श्याम।


:::::::प्रस्तुति:::::::

डॉ मनोज रस्तोगी

8,जीलाल स्ट्रीट

मुरादाबाद 244001

उत्तर प्रदेश, भारत

मोबाइल फोन नम्बर 9456687822