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बुधवार, 4 मार्च 2026

मुरादाबाद के साहित्यकार योगेन्द्र वर्मा व्योम का नवगीत... फागुन का आलाप


गुझिया इठलाकर बल खाकर

पिचकारी से बोली

चल आजा

हम खेलें होली


गूँज रहा मस्ती की धुन पर

फागुन का आलाप

लेकिन तू कोने में छिपकर

बैठी है चुपचाप

बुला रही है उम्मीदों की

रंग-बिरंगी टोली


धीरज रख फिर से आएगा

वही पुराना दौर

फूटेगा जब आमों पर फिर

निश्छलता का बौर

यहाँ-वहाँ सब ओर करेगा

टेसू हँसी-ठिठोली


तुझमें रंग भरे जीवन के

मुझमें भरी मिठास

चल मिलकर वापस लाते हैं

रिश्तों में उल्लास

अपनेपन के गाढ़े रँग से

रचें नई रंगोली


✍️योगेन्द्र वर्मा 'व्योम'

 मुरादाबाद 244001

उत्तर प्रदेश, भारत

सोमवार, 4 अगस्त 2025

मुरादाबाद के साहित्यकार योगेन्द्र वर्मा व्योम का आलेख- सादगी के साथ ताज़गी के बड़े शायर : ज़मीर दरवेश


    माता शाकुम्भरी देवी के सिद्धपीठ स्थल और लकड़ी की नक्काशी के लिए दुनिया भर में मशहूर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के शहर सहारनपुर में मरहूम अमीरउद्दीन एवं श्रीमती लतीफन बेगम के आँगन में 8 दिसम्बर, 1943 को जन्में ज़मीरउद्दीन को अदबी दुनिया में उस्ताद शायर ज़मीर ‘दरवेश’ के नाम से जाना जाता है। सरल और सहज दरवेश साहब की शायरी भी बेहद सादगी लेकिन ताज़गी भरी है। उनकी शायरी से होकर गुजरना मतलब ज़िन्दगी की बारीकियों से रूबरू होना और उन्हें महसूस करना है। उनकी ग़ज़ल का शेर देखिए-

 'मैं घर का कोई मसअला दफ़्तर नहीं लाता, 

अन्दर की उदासी कभी बाहर नहीं लाता, 

तन पर वही कपड़ों की कमी, धूप की किल्लत,

 मेरे लिए कुछ और दिसम्बर नहीं लाता।'

          मण्डल रेल प्रबंधक कार्यालय मुरादाबाद में दूरभाष अधीक्षक के पद से वर्ष 2003 में सेवानिवृत्त हुए दरवेश साहब की शायरी के विभिन्न चित्र मिलते हैं, कभी वह अपनी समसामयिक विसंगतियों को अपनी शायरी का मौज़ू बनाते हैं तो कभी फलसफ़े उनके शे’रों की अहमियत को ऊचाईयों तक ले जाते हैं। उनका एक शे'र देखिए-

 'आदमी को इतना ख़ुदमुख़्तार होना चाहिए,

 खुलके हँसना चाहिए, जी भरके रोना चाहिए।'

सेवानिवृत्ति उपरान्त पूर्णतः साहित्य सृजन को समर्पित दरवेश जी की ग़ज़लें फ़ारसी की इज़ाफ़त वाली उर्दू के मुकाबले आज की आम बोलचाल की भाषा को तरजीह देती हैं। उनके अश्’आर मन-मस्तिष्क पर अपनी आहट से ऐसी अमिट छाप छोड़ जाते हैं जिनकी अनुगूँज काफी समय तक मन को झकझोरती रहती है। साधारण सी बात भी वह असाधारण रूप में कह देते हैं- 

'घर के दरवाज़े हैं छोटे और तेरा क़द बड़ा, 

इतना इतराके न चल चौखट में सर लग जायेगा।'

             इतिहास विषय में परास्नातक दरवेश साहब ने पिछले लगभग साठ वर्षों से साहित्य सृजन में रत रहकर ख़ूबसूरत ग़ज़लें तो कही ही हैं, बाल साहित्य के क्षेत्र में भी बहुत काम किया है।  उनकी अब तक 22 पुस्तकें प्रकाशित होकर चर्चित हो चुकी हैं जिनमें 'अंकुर'(ग़ज़ल संग्रह), 'जो दिल पे गुज़रती है'(ग़ज़ल संग्रह), 'अलअतश'(ग़ज़ल संग्रह), 'हाशिया'(ग़ज़ल संग्रह), ‘क़लम काग़ज़ के बोसे’(नात संग्रह) के साथ-साथ उर्दू में बाल कविताओं के संग्रहों में 'अबलू बबलू की नज़्में', 'खेल-खिलौनों जैसी नज़्में', 'प्यारी-प्यारी नज़्में', 'प्यारे नबी जी', 'तराना ए नौनिहालाने मिल्लत', 'गुंचा नज़्मों का', 'शाही चीलों के जज़ीरे पर', 'आदमज़ात परीलोक में' आदि चर्चित रही हैं तथा उनकी कुछ बाल कविताएँ महाराष्ट्र में पाठ्यक्रम में भी शामिल हैं। उनकी तीन कृतियों की पांडुलिपियाँ प्रकाशनाधीन हैं।

           दैनिक जागरण मुरादाबाद की ओर से 2019 में सम्मानित होने के साथ-साथ साहित्यिक संस्था ‘अक्षरा’ से 2013 में समग्र साहित्यिक साधना के लिए ‘देवराज वर्मा उत्कृष्ट साहित्य सृजन सम्मान’ व संस्था 'हरसिंगार' की ओर से 'माहेश्वर तिवारी गज़ल साधक सम्मान' व साहित्यिक संस्था 'हम्दो नात फाउंडेशन' व 'हस्ताक्षर' से सम्मानित होने वाले ज़मीर दरवेश साहब के ग़ज़ल संग्रह 'हाशिया' और नात संग्रह ‘क़लम काग़ज़ के बोसे’ के लिए बिहार उर्दू अकादमी द्वारा दरवेश जी को पुरस्कृत किया जा चुका है। दरवेश जी पर समूचे मुरादाबाद को गर्व है। 


✍️ योगेन्द्र वर्मा ‘व्योम’

ए.एल.-49, उमा मेडिकल के पीछे,दीनदयाल नगर-।, काँठ रोड, मुरादाबाद , उत्तर प्रदेश, भारत  चलभाष- 9412805981

मंगलवार, 13 मई 2025

मुरादाबाद के साहित्यकार योगेन्द्र वर्मा व्योम की कविता...कुत्ते की दुम हो...


अठहत्तर साल हो गये लगभग 

हमारे तुम्हारे बीच हुए बँटवारे को

लेकिन तुम आज भी वैसे ही हो

जैसे पहले थे

झूठे, उद्दण्ड, हिंसक, धूर्त, शातिर

ईर्ष्यालु, नकारात्मक,धर्मांध

इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी

नहीं आया कोई भी बदलाव

तुम्हारे भीतर

नहीं की तुमने कोई तरक्की

नहीं ला पाये तुम अपने भीतर

इंसानियत

सिर्फ लकीर के ही नहीं

हकीकत में भी

फकीर ही रहे तुम

अनगिनत बार

केवल ज़ख़्म ही दिए हैं तुमने

और हमने

सहन करने के साथ-साथ

मुँहतोड़ जबाब भी दिया है तुम्हें

हर बार की तरह इस बार भी

लेकिन तुम हो कि

नाम ही नहीं लेते हो सुधरने का

और प्रयास भी नहीं करते हो

अपने भीतर पल-पल पलती

नफ़रत को ख़त्म करने का

ज़माना कहाँ से कहाँ पहुँच गया, पर

जहाँ से चले थे

खड़े अब भी वहीं तुम हो 

दरअसल

सच तो यह है कि

कभी सीधी न होने वाली

कुत्ते की दुम हो


✍️योगेन्द्र वर्मा 'व्योम'

मुरादाबाद 244001

उत्तर प्रदेश, भारत


रविवार, 27 अप्रैल 2025

मुरादाबाद के साहित्यकार योगेन्द्र वर्मा व्योम के पहलगाम में आतंकवादी हमले पर बारह दोहे

 


1.

सन सैंतालिस में हुआ, भारत जब आज़ाद ।

उसी समय से चल रहा, यह कश्मीर विवाद।।

2.

हर दिन आतंकवाद से, त्रस्त रहा कश्मीर । 

सहन न अब कर पा रहा, अपने मन की पीर।।

3.

कब से सीमा पर खड़ीं, सेनाएं तैनात ।

खत्म नहीं अब भी हुआ, घाटी में उत्पात ।।

4.

निर्दोषों के खून से, हुई धरा भी लाल ।

भारत मां इस हाल पर, करती बहुत मलाल ।। 

5.

पहलगाम ने देश को, दिया यही संदेश ।

अबकी जड़ से खत्म हो, आतंकवादी क्लेश ।।

6.

बनना अब बिल्कुल नहीं, हमें शांति का दूत।

बातों से ना मानते, हैं लातों के भूत ।।

7.

लोहे से लोहा कटे, काट सके ना फूल ।

चुभे पैर में शूल तो, उसे निकाले शूल ।।

8.

पढ़ लो तुम इतिहास को, हो यदि नहीं यकीन । 

दुष्ट साथ हो दुष्टता, नीति यही प्राचीन ।।

9.

गोली खाकर बर्फ में, सोये वीर जवान ।

व्यर्थ न जाना चाहिए, वीरों का बलिदान ।।

10.

दृढ़ता से हो फैसला, असमंजसता छोड़ । 

अबकी पाकिस्तान को, दो जबाब मुँहतोड़ ।।

11.

ये ही है जन भावना, ये ही हैं उदगार ।

यादगार यह युद्ध हो, अबकी अंतिम बार ।।

12.

करो युद्ध प्रारंभ ! हो, विजयी हिंदुस्तान । 

नक्शे पर दीखे नहीं, पापी पाकिस्तान ।।


✍️ योगेन्द्र वर्मा व्योम

मुरादाबाद 244001

उत्तर प्रदेश, भारत

बुधवार, 16 अप्रैल 2025

मुरादाबाद के साहित्यकार स्मृतिशेष माहेश्वर तिवारी की प्रथम पुण्यतिथि पर आनंद कुमार सुमन के प्रधान संपादन तथा किशोर श्रीवास्तव के संपादन में देहरादून से प्रकाशित मासिक पत्रिका सरस्वती सुमन का अप्रैल अंक माहेश्वर तिवारी स्मृति अंक के रूप में प्रकाशित हुआ है। इस अंक के अतिथि संपादक योगेंद्र वर्मा व्योम हैं । इस महत्वपूर्ण और दस्तावेजी अंक में है माहेश्वर तिवारी जी का विस्तृत परिचय, उनके बीस नवगीत, चौबीस दोहे, आठ ग़ज़लें और एक कहानी । उनसे यश मालवीय द्वारा लिया गया साक्षात्कार। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर देश के 51 साहित्यकारों... अवध बिहारी श्रीवास्तव, अशोक अंजुम, डॉ. अजय अनुपम, अनामिका सिंह, असीम सक्सेना, ओम निश्चल, डॉ. ओमप्रकाश सिंह, ओम धीरज, कमलेश भट्ट कमल, डॉ. कृष्ण कुमार नाज़, डॉ. कीर्ति काले, किरण बजाज, गुलाब सिंह, गणेश गम्भीर,जय चक्रवर्ती, ज़िया ज़मीर, जगदीश पंकज, दयानंद पांडेय, डॉ. नितिन सेठी, भावना तिवारी, मधुकर अष्ठाना, डॉ. मक्खन मुरादाबादी, मंसूर उस्मानी, डॉ. महेश दिवाकर, मंदीप कौर, मनोज जैन मधुर, डॉ. मधु शुक्ला, डॉ. मनोज रस्तोगी, योगेन्द्र दत्त शर्मा, डॉ. राजेन्द्र गौतम, रघुवीर शर्मा, डॉ. रामसनेही लाल यायावर, रामदत्त द्विवेदी, डॉ. ऋचा पाठक, राजीव सक्सेना, राजीव प्रखर, रामजन्म पाठक, डॉ. राहुल अवस्थी, राहुल शिवाय, प्रो. वशिष्ठ अनूप, विजय बहादुर सिंह, डॉ. विनय भदौरिया, विनोद श्रीवास्तव, वीरेन्द्र आस्तिक, शचीन्द्र भटनागर, डॉ. शिवओम अम्बर, शिवानन्द सिंह सहयोगी, संध्या सिंह, डॉ. सुभाष वसिष्ठ,डॉ. सोनरूपा विशाल और हेमा तिवारी भट्ट के महत्वपूर्ण आलेख। सत्रह साहित्यकारों डॉ. ओमप्रकाश सिंह, अक्षय पांडेय, मीनाक्षी ठाकुर, जयकृष्ण राय तुषार, विनयविक्रम सिंह, शिवानंद सिंह सहयोगी, डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र, रघुवीर शर्मा, डॉ. अजय अनुपम, ओम निश्चल, मधूसूदन साहा, विजय सिंह, जयप्रकाश श्रीवास्तव मुकुट सक्सेना, डॉ. जे.पी. बघेल, रमेश प्रसून, यश मालवीय द्वारा लिखित श्रद्धांजलि गीत।परिवारजनों बालसुंदरी तिवारी (पत्नी), समीर तिवारी (सुपुत्र), आशा तिवारी (पुत्रवधु), भाषा तिवारी (सुपौत्री), अक्षरा तिवारी (सुपौत्री) के श्रद्धांजलि आलेख साथ में उनके देहावसान पर आयोजित श्रद्धांजलि सभाएँ तथा उनके देहावसान के पश्चात प्रकाशित ग़ज़ल संग्रह धूप पर कुहरा बुना है की योगेंद्र वर्मा व्योम द्वारा की गई समीक्षा ....

 

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मुरादाबाद के साहित्यकार स्मृतिशेष माहेश्वर तिवारी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर केंद्रित आलेख । यह प्रकाशित हुआ है अमृत विचार मुरादाबाद संस्करण के 16 अप्रैल 2025 के अंक में

 



रविवार, 13 अप्रैल 2025

मुरादाबाद के साहित्यकार योगेन्द्र वर्मा व्योम का संस्मरणात्मक आलेख .... ठहाके भी गूंजते थे दादा माहेश्वर तिवारी के



  'धूप में जब भी जले हैं पांव, घर की याद आई...' नवगीत दादा माहेश्वर तिवारी की लेखनी से शायद तब सृजित हुआ होगा जब दूर दराज़ इलाकों में आयोजित कवि सम्मेलनों और साहित्यिक आयोजनों में उन्हें कई-कई दिन घर से बाहर रहना पड़ा होगा, यह अलग बात है कि उनके इस नवगीत को तब 1970 के दशक में आपातकाल के परिणामस्वरूप आम जनमानस की पीड़ा की अति संवेदनशील अभिव्यक्ति कहा गया। दादा पास बैठना-बतियाना, मतलब साहित्य के एक युग से बतियाना होता था। उनके पास साहित्यकारों के, कविसम्मेलनों के, साहित्यिक आयोजनों के इतने संस्मरण थे कि जब भी बातचीत होती थी तो समय कब गुजर जाता था, पता ही नहीं चलता था। इसके साथ-साथ वह अपनी विशेष वाकशैली से उन किस्सों, घटनाओं और संस्मरणों को और अधिक रोचक बना देते थे।

            एक बार उन्होंने सुल्तानपुर (उ.प्र.) के राजकीय इंटर कॉलेज में कविसम्मेलन का संस्मरण सुनाया था। कविसम्मेलन के संयोजक कथाकार स्व. गंगाप्रसाद मिश्र थे। कविसम्मेलन में देर से पहुँचने के कारण वह जिन कपड़ों में थे उन्हीं में सीधे मंच पर पहुँच गए। मंच पर पहुँचते ही उन्हें काव्यपाठ करना पड़ा। कविसम्मेलन में उन्होंने अपना याद वाला गीत पढ़ा- 'याद तुम्हारी जैसे कोई कंचन कलश भरे / जैसे कोई किरन अकेली पर्वत पार करे...'। गीत पढ़कर मंच से उठकर चाय पीने के लिए आये, चाय पी ही रहे थे तभी एक वयोवृद्ध सज्जन उनके पास आए और ऐसा सवाल कर बैठे कि उनकी आयु और प्रश्न सुनकर तिवारी जी चौंक गए। उन सज्जन ने बड़ी गंभीरता से कहा- 'तिवारीजी, एक बात बताईए कि यह घटना कहाँ की है और यह किरन कौन है? क्या वह आपके साथ नहीं थी उस पहाड़ पर...?' जैसे-तैसे उन्हें टाला और जब कवि मित्रों से उसकी चर्चा की तो सभी ठहाका मारकर हँस पड़े। यह सुनकर उन्हें भी हँसी आ गई और इस ठहाके के साथ ही उठना ठीक लगा।

            इसी गीत को लेकर उन्होंने एक और रोचक संस्मरण सुनाया था। शायद 1980 के दशक की बात है कि वाराणसी में एक कवि सम्मेलन में वह गये थे, कविसम्मेलन की अध्यक्षता उस समय के शीर्ष गीतकार भवानी प्रसाद मिश्र कर रहे थे। तिवारी जी ने वहाँ 'डायरी में उंगलियों के फूल से / लिख गया है नाम कोई भूल से...' और 'डबडबाई है नदी की आंख / बादल आ गए हैं...' सुनाए, किन्तु तभी अध्यक्षता कर रहे भवानी दादा वोले- 'माहेश्वर, वो याद वाला गीत और सुनाओ'। दरअसल, भवानी प्रसाद मिश्र को यह गीत बहुत प्रिय था। तिवारी जी ने अपने सुरीले अंदाज में सुनाया- 'याद तुम्हारी जैसे कोई कंचन कलश भरे / जैसे कोई किरन अकेली पर्वत पार करे...'। कवि सम्मेलन समाप्त हो जाने के बाद भवानी दादा ने कहा- 'माहेश्वर कल को मेरे साथ इलाहाबाद (अब प्रयागराज) चलना, गांधी जयंती पर कविसम्मेलन है।' इलाहाबाद पहुंचकर भवानी दादा से तिवारी जी बोले- 'दादा, लेकिन मेरे पास गांधीजी के संदर्भ में गीत नहीं है, फिर मैं क्या सुनाऊंगा'। भवानी दादा बोले- 'वो याद वाला गीत सुनाओ'। तिवारी जी ने फिर से उसी अंदाज में सुनाया- 'याद तुम्हारी जैसे कोई कंचन कलश भरे...।' देर रात समाप्त हुए कविसम्मेलन के बाद पत्रकारों ने भवानी दादा से पूछा- 'आपने गांधी जयंती पर आयोजित कविसम्मेलन में प्रेम गीत- याद तुम्हारी जैसे कोई कंचन कलश भरे... कैसे पढ़वा दिया?' भवानी प्रसाद मिश्र बोले- 'गांधीजी की याद भी कंचन कलश भरवा सकती है।' 

            दादा माहेश्वर तिवारी जी के गीत जितने लोकप्रिय और प्रसिद्ध थे, उससे भी अधिक उनके ठहाके चर्चित रहते थे। उनसे जब भी कोई मिलता था, बातचीत के दौरान उनके ठहाकों की उन्मुक्तता में डूबे बिना नहीं रहता था। इन ठहाकों की गूँज तब और बढ़ जाती थी जब तिवारी जी के साथ इलाहाबाद (अब प्रयागराज) के कवि कैलाश गौतम और होशंगाबाद (म.प्र.) के कवि विनोद निगम होते थे। एक बार दादा तिवारी जी ने बताया था कि बात 1983 की है, जब डा. शम्भूनाथ सिंह के संपादन में 'नवगीत दशक-1' आया था, तय हुआ कि इसका लोकार्पण तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी के हाथों होगा। प्रधानमंत्री कार्यालय से स्वीकृति मिल जाने के बाद लोकार्पण की तिथि को निर्धारित समय पर डा. शम्भूनाथ सिंह, देवेंद्र शर्मा इन्द्र, नचिकेता, उमाकांत मालवीय, माहेश्वर तिवारी, उमाशंकर तिवारी, कैलाश गौतम, नईम, श्रीकृष्ण तिवारी, विनोद निगम सहित लगभग 20 नवगीतकार प्रधानमंत्री आवास के प्रतीक्षा कक्ष में बैठकर इंतजार कर रहे थे, प्रोटोकॉल के तहत कक्ष के भीतर एक गहरी चुप्पी पसरी हुई थी, तभी शम्भूनाथ सिंह तिवारी जी गीत गुनगुनाते हुए बोले- 'यह तुम्हारा मौन रहना, कुछ न कहना सालता है...', तुरंत बाद ही सुरक्षा बल के जवान धड़धड़ाते हुए प्रतीक्षा कक्ष में आ गए। सभी कुछ सामान्य देखकर वे वापस चले गए, उनके जाते ही कैलाश गौतम, विनोद निगम और तिवारी जी ठहाके मारकर हँसने लगे।

              ऐसा ही एक और किस्सा दादा तिवारी जी ने सुनाया था, जब बुद्धिनाथ मिश्र और कैलाश गौतम के साथ वह एक कवि सम्मेलन से रात 2 बजे वापस लौट रहे थे और सड़क पर बस का इंतजार कर रहे थे। चारों ओर सुनसान सड़क पर सन्नाटा पसरा हुआ था। तीनों ही लोग कविसम्मेलन में अन्य कवियों के कवितापाठ पर टिप्पणी करते हुए ठहाके मारकर हँस रहे थे, तभी वहाँ पुलिस की गश्ती जीप आ गई। पूछा- 'आप लोग कौन हैं और कहाँ जाएंगे? दादा तिवारी जी बोले- 'हम कवि लोग हैं, जहाँ ले जाना चाहो वहीं चले जाएंगे' और बहुत जोर से ठहाका लगा कर हंसने लगे। पुलिस के लोग बोले- 'चलो, ये सब पिए हुए हैं।' यह सुनकर तीनों ही ठहाके मारकर जोर जोर से हंसने लगे।

     इसी प्रकार वर्ष 2019 में पावस गोष्ठी में आमंत्रण देने के लिए दादा तिवारी जी ने कवि राजीव प्रखर को फोन किया, मैं भी उस समय वहां उपस्थित था। दादा फोन पर बोले- 'राजीव प्रखर बोल रहे हैं?' उधर से आवाज आई- 'जी, राजीव प्रखर बोल रहा हूं, लेकिन आप कौन बोल रहे हैं?' दादा बोले- 'मैं माहेश्वर तिवारी का पड़ोसी बोल रहा हूं' इतना सुनते ही मैं और दादा ठहाका मारकर हंसने लगे। ऐसे अनगिनत किस्से, प्रसंग और संस्मरण हैं जो आज भी किसी चलचित्र की तरह जीवंत हैं यादों में। 

✍️योगेन्द्र वर्मा 'व्योम'