सोमवार, 10 जून 2024

मुरादाबाद के साहित्यकार स्मृतिशेष पं ज्वाला प्रसाद मिश्र की दुर्लभ कृति ... घरूका क्षत्रिय वंशावली । यह कृति वर्ष 1911 में लक्ष्मी नारायण यंत्रालय मुरादाबाद से प्रकाशित हुई थी। हमें इस कृति की पीडीएफ दिल्ली निवासी श्री राधे श्याम सिंह जी ने उपलब्ध कराई है ।


 क्लिक कीजिए और पढ़िए पूरी कृति 

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डॉ मनोज रस्तोगी

संस्थापक

साहित्यिक मुरादाबाद शोधालय

8, जीलाल स्ट्रीट

मुरादाबाद 244001

उत्तर प्रदेश, भारत

मोबाइल फोन नंबर 9456687822

सोमवार, 3 जून 2024

मुरादाबाद की साहित्यिक संस्था हिन्दी साहित्य संगम के तत्वावधान में रविवार दो जून को काव्य-गोष्ठी का आयोजन

मुरादाबाद की साहित्यिक संस्था हिन्दी साहित्य संगम द्वारा आकांक्षा इण्टर कॉलेज, मिलन विहार में एक काव्य-गोष्ठी का आयोजन किया गया। मनोज मनु द्वारा प्रस्तुत माॅं शारदे की वंदना से आरंभ हुए कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए ओंकार सिंह ओंकार ने कहा......

सुख रहता कभी धन के समन्दर में नहीं है। 

बिन प्यार के सुख चैन किसी घर में नहीं है। 

मुख्य अतिथि रघुराज सिंह निश्चल ने सामाजिक परिस्थितियों का चित्र खींचा - 

देख रही है जनता सारी। 

एक अकेला सब पर भारी।

 विशिष्ट अतिथि के रूप में पदम सिंह बेचैन कर उद्गार थे - 

तन की सुधि भूल हिय लरजे, 

मन को कछु और सुहाता नहीं। 

कार्यक्रम  के संचालक राजीव प्रखर ने कहा -

बन जाये बन्धन ममता का, ऐसी मनभावन डोरी हो। 

सद्भक्ति सुधारस से पूरित, निर्मल-निश्छल कर-जोरी हो। 

जागो-जागो हे मनमोहन, विनती है कर दो आज कृपा। 

पापातुर इस कलियुग में भी, माखन की पावन चोरी हो। 

रामदत्त द्विवेदी की अभिव्यक्ति थी - 

तुम अपने आप पर इतरा रहे हो। 

कृपा प्रभु जी की क्यों बिसरा रहे हो। 

के. पी. सिंह सरल ने रिश्तों की संवेदना को साकार किया - 

समझ न पाये आज तक, बन्धन की यह गांठ। 

किसी को दे दुशवारियां, किसी के घर में ठाठ।। 

 नकुल त्यागी ने सामाजिक परिस्थितियों का चित्र खींचते हुए कहा - 

भाग भाग कर भागता, भगने को मजबूर। 

रोटी बस दो जून की फिर भी कितनी दूर। 

योगेन्द्र वर्मा व्योम का कहना था - 

पिछला सब कुछ भूल जा, मत कर गीली कोर। 

क़दम बढ़ा फिर जोश से, नई सुबह की ओर।। 

आँखों से बहने लगी, मूक-बधिर सी धार। 

जब यादों की चिट्ठियांँ, पहुँचीं मन के द्वार।। 

कवि मनोज मनु ने माॅं गंगा के प्रति अपनी आस्था व्यक्त की - 

त्रिभुवन तारिणी तरल तरंगे, हर-हर गङ्गे.. हर हर गङ्गे.. 

पाप विनाशिनी शुभ्र विहंगे.. हर-हर गङ्गे -हर-हर गङ्गे। 

बालकवि  अनंत मनु ने रामचरितमानस की चौपाइयां प्रस्तुत कीं। राजीव प्रखर द्वारा आभार-अभिव्यक्ति के साथ कार्यक्रम समापन पर पहुॅंचा।

























सोमवार, 20 मई 2024

मुरादाबाद की संस्था कला भारती की ओर से आयोजित काव्य गोष्ठी में रविवार 19 मई 2024 को वरिष्ठ गीतकार वीरेन्द्र 'ब्रजवासी' को कलाश्री सम्मान

 



महानगर मुरादाबाद के वरिष्ठ गीतकार वीरेन्द्र सिंह 'ब्रजवासी' को उनकी साहित्यिक साधना के लिए कला भारती साहित्य समागम, मुरादाबाद की ओर से रविवार 19 मई 2024 को आयोजित समारोह में कलाश्री सम्मान से अलंकृत किया गया। उपरोक्त सामान-समारोह एवं काव्य-गोष्ठी का आयोजन मिलन विहार स्थित आकांक्षा इंटर कॉलेज में हुआ। राजीव प्रखर द्वारा प्रस्तुत माॅं सरस्वती की वंदना से आरंभ हुए कार्यक्रम की अध्यक्षता बाबा संजीव आकांक्षी ने की। मुख्य अतिथि डॉ. प्रेमवती उपाध्याय एवं विशिष्ट अतिथियों के रूप में डॉ. बृजपाल सिंह यादव एवं रामदत्त द्विवेदी मंचासीन हुए। कार्यक्रम का संचालन आवरण अग्रवाल श्रेष्ठ ने किया। 

    सम्मान स्वरूप वीरेन्द्र 'ब्रजवासी' को अंग-वस्त्र, मानपत्र एवं प्रतीक चिह्न अर्पित किए गए। उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर आधारित आलेख का वाचन राजीव प्रखर एवं अर्पित मान-पत्र का वाचन योगेन्द्र वर्मा व्योम द्वारा किया गया। 

      सम्मानित साहित्यकार वीरेन्द्र 'ब्रजवासी' की साहित्यिक यात्रा पर अपने विचार रखते हुए कार्यक्रम अध्यक्ष बाबा संजीव आकांक्षी ने कहा - "श्री ब्रजवासी सामाजिक जीवन से जुड़े हुए एक ऐसे संवेदनशील रचनाकार हैं जिनकी रचनाएं काव्य से जुड़े प्रत्येक  पाठक अथवा श्रोता के हृदय को गहराई तक स्पर्श कर जाती हैं।" 

 श्री ब्रजवासी की रचनाधर्मिता पर विशिष्ट अतिथि डाॅ. प्रेमवती उपाध्याय का कहना था - "अपनी पावन भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति से जुड़े रहकर, समाज के प्रत्येक वर्ग तक अपनी गहरी पैठ बनाना श्री ब्रजवासी जी के रचनाकर्म की विशेषता रही है।" 

विशिष्ट अतिथि डॉ. बृजपाल सिंह यादव ने कहा - "उनका रचनाकर्म जहाॅं एक ओर ब्रज की महान परम्परा के दर्शन कराता है वहीं दैनिक जीवन से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण मुद्दों पर भी उनकी पैनी दृष्टि रहती है। वह समस्याओं की बात ही नहीं करते अपितु उनके यथासंभव हल भी प्रस्तुत करते हैं।"            उपरोक्त सम्मान समारोह में वीरेन्द्र 'ब्रजवासी' के सम्मान में एक काव्य-गोष्ठी का भी आयोजन हुआ। काव्य-पाठ करते हुए सम्मानित साहित्यकार वीरेन्द्र ब्रजवासी ने कहा - 

माॅं का दिल कितना होता है, 

चिड़िया के जितना होता है। 

खुशियों में जितना खुश होता, 

दुख में उतना ही रोता है। 

भूख-प्यास को माॅं बच्चे की, 

किलकारी से पढ़ लेती है। 

ऑंचल से ढक कर बच्चे का, 

उदर दूध से भर देती है। 

काला टीका लगा नज़र की, 

चिंता से डरना होता है।"

 इसके अतिरिक्त अन्य उपस्थित रचनाकारों दुष्यंत बाबा, राजीव प्रखर, आवरण अग्रवाल श्रेष्ठ, योगेन्द्र वर्मा व्योम, डॉ. मनोज रस्तोगी, मनोज मनु, ओंकार सिंह ओंकार, नकुल त्यागी, योगेन्द्र पाल सिंह विश्नोई, रमेश गुप्त, अभिनव चौहान, रामदत्त द्विवेदी, डॉ. प्रेमवती उपाध्याय, बाबा संजीव आकांक्षी, रघुराज सिंह निश्चल आदि ने भी विभिन्न सामाजिक मुद्दों को अपनी-अपनी  रचनाओं के माध्यम से उठाया। मनोज मनु द्वारा आभार-अभिव्यक्ति के साथ कार्यक्रम समापन पर पहुॅंचा।