गुरुवार, 11 जून 2026

मुरादाबाद की साहित्यिक संस्था हिन्दी साहित्य संगम की ओर से सात जून 2026 को आयोजित 'साहित्य संपर्क' का लोकार्पण समारोह और काव्य गोष्ठी

मुरादाबाद की साहित्यिक संस्था हिन्दी साहित्य संगम के तत्वावधान में जितेंद्र कुमार जौली द्वारा प्रकाशित मुरादाबाद साहित्यकार दूरभाष निर्देशिका 'साहित्य सम्पर्क' का लोकार्पण समारोह एवं काव्य गोष्ठी का आयोजन आकांक्षा विद्यापीठ इण्टर कॉलेज, मुरादाबाद में रविवार सात जून 2026 को सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम का शुभारंभ माँ शारदे की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन एवं सरस्वती वन्दना के साथ हुआ। सरस्वती वन्दना राजीव प्रखर द्वारा प्रस्तुत की गई।

      कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार ओंकार सिंह ‘ओंकार’ ने कहा- 

राम कृष्ण शंकर जी रहते, अपने स्वच्छ विचारों में। 

सत्यपथ पर चलना सिखलाते, वे हमको अंधियारों में।। 

 मुख्य अतिथि के रूप में डॉ महेश दिवाकर ने कहा...

कवि न सुधरे प्यार से दुष्ट आचरण तात।

अपराधी को दीजिए दण्डों की सौगात।।

 विशिष्ट अतिथि डॉ. चिरंजीलाल ‘चंचल’ ने सुनाया-

करें कोशिश भले जुगनु, सितारे हो नहीं सकते। 

सहारा ढूंढने वाले, सहारे हो नहीं सकते।।

   कार्यक्रम का संचालन करते हुए संस्था के महासचिव जितेन्द्र कुमार जौली ने हास्य कविता प्रस्तुत करते हुए सुनाया- 

इस कदर बेकरारी छायी कमबख्त। 

कल रात हमें नींद न आई कमबख्त।। 

हाल क्या थे आपसे क्या बताएं हम, 

रात शौचालय में बितायी कमबख्त।। 

रामवीर सिंह वीर ने कहा- 

उद्वेलित हो श्री कृष्ण प्रश्न मुझसे पूछते इतना बता। 

आज मानव खोजता फिरता है क्यों सुख का पता।। 

नकुल त्यागी ने कहा-

बड़ों की सीख सेवा से सज संवार यह जाएगी।

 स्वार्थ लालच क्रोध से उबलकर वह जाएगी।। 

रिश्ते रखो संभाल के जो मिले सौभाग्य से, 

जिंदगी है चाय नहीं जो फिर से बन जाएगी।

 डॉ मनोज रस्तोगी ने  कहा- 

महकी आकाश में, चांदनी की गंध। 

अधरों की देहरी,  लांघ आए छंद। 

गंगाजल से छलके, नेह के पिटारे, 

उड़ रही रेत , गंगा किनारे । 

योगेन्द्र वर्मा 'व्योम' ने सुनाया-

कथनी तो कुछ और पर, करनी है कुछ और। 

इस युग का सिरमौर है, दुहरेपन का दौर।।

 चलो करें कुछ कोशिशें, मिलकर ऐसी मित्र। 

आने वाला कल बने, उजला और पवित्र।।

 राजीव 'प्रखर' ने सुनाया- 

क्या तीरथ की कामना, कैसी धन की आस। 

बैठी हो जब प्रेम से, अम्मा मेरे पास।। 

मन की ऑंखें खोल कर, देख सके तो देख। 

कोई है जो रच रहा, कर्मों के अभिलेख।।

 प्रशान्त मिश्र ने कहा-

अपनों का आना, सिर्फ हवा का "झोंका है.. 

चिता पर छोड़ आते समय कितनों ने रोका है। 

अशोक कुमार बाबा ने सुनाया- 

जो नैनों में दीप जलादे, जो धड़कन दिल की बढ़ा दे। 

जो सारी रात जगा दे, वो क्या है मेरे यार,

 वो है प्यार -प्यार-प्यार।।

इस अवसर पर रघुराज सिंह निश्चल, अशोक विद्रोही, विवेक निर्मल,  मंगू सिंह, योगेंद्र पाल सिंह विश्नोई आदि ने भी अपनी रचनाएं प्रस्तुत की। संस्था के महासचिव जितेंद्र कुमार जौली द्वारा आभार व्यक्त किया गया।  












































सोमवार, 6 अप्रैल 2026

मुरादाबाद की साहित्यिक संस्था हिन्दी साहित्य संगम के तत्वावधान में पांच अप्रैल 2026 को काव्यगोष्ठी का आयोजन

मुरादाबाद की साहित्यिक संस्था हिन्दी साहित्य संगम के तत्वावधान में रविवार पांच अप्रैल 2026 को आकांक्षा विद्यापीठ इण्टर कॉलेज, मुरादाबाद में काव्यगोष्ठी का आयोजन किया गया।

 रवि चतुर्वेदी द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना से आरम्भ कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार ओंकार सिंह ‘ओंकार’ ने अपनी रचना में लोकजीवन का चित्रण प्रस्तुत किया...

“एक सपेरा अपनी धुन में रहता है तल्लीन,

 वह नागों को नित्य पकड़ता, बजा-बजाकर बीन।”

 मुख्य अतिथि के रूप में डॉ. महेश दिवाकर ने  वीर रस की रचना सुनाते हुए कहा— 

“उठो! कमर कसकर उठो, लो हाथों में तलवार,

 चूको मत, मारो सखे! मिलें जहाँ गद्दार।”

 विशिष्ट अतिथि के रूप में डॉ. मनोज रस्तोगी ने युद्ध की विभीषिका का मार्मिक चित्रण करते हुए कहा— 

“उड़ रही गंध ताजे खून की,

 बरसा रहा ज़हर मानसून भी, 

घुटता है दम 

अब विस्फोटों के बीच।”

 कार्यक्रम का संचालन करते हुए संस्था के महासचिव जितेन्द्र कुमार जौली ने हास्य-व्यंग्य के माध्यम से वर्तमान युवा पीढ़ी की स्थिति पर कटाक्ष करते हुए कहा— 

“क्या हो गया है नौजवानों को, 

सबके दिमाग सड़ रहे हैं, 

फिल्मों का ही असर है शायद, 

ये कुत्ते भी बिगड़ रहे हैं।”

नकुल त्यागी ने आत्ममंथन पर आधारित पंक्तियाँ प्रस्तुत कीं— 

“अगर मैं अपने आप से प्यार कर लेता, 

एक झटके में ही दरिया पार कर लेता।”

डॉ. कृष्णकुमार ‘नाज़’ ने समाज की संवेदनहीनता को उजागर करते हुए कहा— 

“दीन-हीनता निर्धनता का हाथ चूमकर समझाती है,

 नन्हीं दूब हमेशा सबके पैरों से रौंदी जाती है।”

योगेन्द्र वर्मा ‘व्योम’ ने युद्ध और मानवता पर गहन विचार व्यक्त करते हुए कहा— 

“मानवता की देह ही होती लहूलुहान, 

‘युद्ध’ समस्या का कभी होते नहीं निदान।”

रवि चतुर्वेदी ने वीर रस से ओतप्रोत देशभक्ति की रचना प्रस्तुत कर श्रोताओं में उत्साह भर दिया— 

“कर्ज ये मातृभूमि का कदापि चुक नहीं सकता, 

तिरंगा देश का अपना कभी भी झुक नहीं सकता।”

कमल कुमार शर्मा ने जीवन को शतरंज की बिसात से जोड़ते हुए कहा— 

“दोस्तों और दुश्मनों की चालों के शतरंज में, 

बादशाह की जिद के आगे मात खाती ज़िंदगी।”

प्रशांत मिश्र ने मानवीय संवेदनाओं पर आधारित पंक्तियाँ प्रस्तुत कीं— 

“भूखे हो अहम् के, तो अपनों से रोटियाँ छीन लो,

 छिनी रोटी हाथ से जीवन गुजर जाए, ये ज़रूरी तो नहीं।”

 महासचिव जितेन्द्र कुमार जौली ने आभार व्यक्त किया।