शुक्रवार, 30 अप्रैल 2021

मुरादाबाद मंडल के जनपद रामपुर निवासी साहित्यकार शिव कुमार चंदन का गीत ---बन्द निज आवास में, व्यवधान ऐसा छा रहा


सुखद  हों परिवेश जग के , गीत  चंदन  गा  रहा 

बन्द  निज  आवास  में, व्यवधान ऐसा  छा  रहा


कौन जाने समय की गति स्थायी कुछ है ही नहीं

परिस्थितियाँ  युगों  से,  संताप  सहती   ही  रहीं 

प्रारब्ध जागे कर्म के,जीवन में है सुख ,दुख सहा

सुखद हों परिवेश  जग  के, गीत  चंदन गा  रहा 


गति -प्रगति अवरूद्ध होती, है कहीं थमती कहाँ 

नित्य परिवर्तन है पल-पल,सम्वेदना जगती यहाँ

भक्ति साधन,साध्य-साधक का सदा ही कर गहा

सुखद  हों  परिवेश जग  के  गीत  चंदन गा रहा 


सृष्टि  के  प्राणी  यहाँ  अनभिज्ञ  हो कर मौन  हैं

प्राण  संरक्षक प्रकृति के ,सर्वज्ञ हे प्रभु  कौन  हैं

लाकडाऊन  में फंसा  हर व्यक्ति  है  घबरा  रहा

सुखद  हों  परिवेश जग में ,गीत  चंदन गा  रहा 


व्यवस्था  पारम्परिक  सब  उत्सवों  पर  रोक  है 

शान्त  हैं  सब  राज पथ  सर्वत्र  प्रभु आलोक है 

मधुर कलरव पंछियों का ,आनंद से  सहला रहा 

सुखद  हों  परिवेश  जग में,  गीत चंदन गा रहा 

✍️ शिव कुमार चंदन

सीआरपीएफ बाउण्ड्री , निकट- पानी की बड़ी टंकी  ज्वालानगर,   रामपुर ( उत्तर प्रदेश ) मोबाइल फोन नम्बर 6397338850    



मुरादाबाद के साहित्यकार ( वर्तमान में गाज़ियाबाद निवासी) स्मृतिशेष डॉ कुंअर बेचैन का गीत ----बेटियाँ- पावन-ऋचाएँ हैं बात जो दिल की, कभी खुलकर नहीं कहतीं...... यह गीत उन्होंने 11 अप्रैल 1987 को लिखा था ।

                         


 बेटियाँ-

शीतल हवाएँ हैं

जो पिता के घर

 बहुत दिन तक नहीं रहती

ये तरल जल की परातें हैं

लाज़ की उज़ली कनातें हैं

है पिता का घर हृदय-जैसा

ये हृदय की स्वच्छ बातें हैं

बेटियाँ-

पावन-ऋचाएँ हैं

बात जो मन की, 

कभी खुलकर नहीं कहतीं

हैं तरलता प्रीति- पारे की

और दृढता ध्रुव-सितारे की

कुछ दिनों इस पार हैं लेकिन

नाव हैं ये उस किनारे की

बेटियाँ-

ऐसी घटाएँ हैं

जो छलकती हैं, 

नदी बनकर नहीं बहतीं

✍️ डॉ कुंअर बेचैन

मुरादाबाद के साहित्यकार (वर्तमान में गाजियाबाद निवासी) स्मृतिशेष डॉ कुंअर बेचैन का सन 1975 में लिखा गीत ---- जिसे बनाया वृद्ध पिता के श्रमजल ने, दादी की हँसुली ने माँ की पायल ने, उस कच्चे घर की सच्ची दीवारों पर, मेरी टाई टँगने से कतराती है !


जिसे बनाया वृद्ध पिता के श्रमजल ने 

दादी की हँसुली ने माँ की पायल ने 

उस कच्चे घर की सच्ची दीवारों पर

मेरी टाई टँगने से कतराती है !


माँ को और पिता को यह कच्चा घर भी

एक बड़ी अनुभूति, मुझे केवल घटना

यह अन्तर ही सम्बंधों की गलियों में

ला देता है कोई निर्मम दुर्घटना

जिन्हें रँगा जलते दीपक के काजल ने

बूढ़ी गागर से छलके गंगाजल ने

उन दीवारों पर टँगने से पहले ही 

पत्नी के कर से साड़ी गिर जाती है !


जब से युग की चकाचौंध के कुहरे ने

छीनी है आँगन से नित्य दिया-बाती

तब से लिपे आँगनों से, दीवारों से 

बन्द नाक को सोधी गंध नहीं आती

जिसे चिना था घुटनों तक की दलदल ने 

सने-पुते-झीने ममता के आँचल ने

पुस्तक के पन्नों में पिची हुई राखी

उस घर को घर कहने में शरमाती है !


साड़ी-टाई बदलें या ये घर बदलें 

प्रश्नचिह्न नित और बड़ा होता जाता

कारण केवल यही, दिखावों से जुड़ हम

तोड़ रहे अनुभूति, भावना से नाता

जिन्हें दिया संगीत द्वार की साँकल ने 

खाँसी के ठनके, चूड़ी की हलचल ने 

उन संकेतों वाले भावुक घूंघट पर 

दरवाजे की 'कॉल बेल' हँस जाती है !

✍️ डॉ कुंअर बेचैन


मुरादाबाद के साहित्यकार (वर्तमान में गाजियाबाद निवासी) स्मृतिशेष डॉ कुंअर बेचैन का गीत ----बदरी ! बाबुल के अँगना जइयो ..... यह गीत उन्होंने जुलाई 1978 में लिखा था ।

 


बदरी !

बाबुल के अँगना जइयो

जइयो, बरसियो, कहियो,

कहियो कि हम हैं तोरी, बिटिया की अँखियाँ


काँटे-बिंधी है

मोरे मन की मछरिया

मरुथल की हिरनी है गयी

सारी उमरिया

बिजुरी !

मैया के अँगना जइयो 

जइयो, बरसियो, कहियो

कहियो कि हम हैं तोरी बिटिया की सखियाँ |


अब के बरस राखी

भेज न पाई

सूनी रहेगी

मोरे वीर की कलाई

पुरवा

भैया के अँगना जइयो 

छू -छू कलाई कहियो

कहियो कि हम हैं तोरी बहना की रखियाँ।


✍️ डॉ कुंअर बेचैन

गुरुवार, 29 अप्रैल 2021

मुरादाबाद के साहित्यकार (वर्तमान में गाजियाबाद निवासी) स्मृति शेष डॉ कुंअर बेचैन की प्रथम काव्य कृति - पिन बहुत सारे । इस कृति का प्रकाशन अगस्त 1972 में हुआ था । इसे प्रकाशित किया था स्वयं प्रकाशन गाजियाबाद ने । इस कृति में उनके 65 नवगीत संगृहीत हैं


 

क्लिक कीजिये और पढ़िये पूरी कृति

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::::::::प्रस्तुति:::::::

डॉ मनोज रस्तोगी

8,जीलाल स्ट्रीट

मुरादाबाद 244001

उत्तर प्रदेश, भारत

मोबाइल फोन नम्बर 9456687822

मुरादाबाद मंडल के जनपद अमरोहा निवासी साहित्यकार मरगूब अमरोही की रचना ----- कोरोना तुम कमाल हो, चुनावी कद्रदान हो ......


 

बुधवार, 28 अप्रैल 2021

मुरादाबाद की साहित्यकार डॉ रीता सिंह की रचना ----- पड़ी कोरोना की मार मैया कर दो बेड़ा पार हुई जनता अब लाचार मैया कर दो बेड़ा पार ।


पड़ी कोरोना की मार मैया कर दो बेड़ा पार

हुई जनता अब लाचार मैया कर दो बेड़ा पार ।


घर-घर असुर बन खड़ा कोरोना करता है मनमानी 

कोई अस्त्र नहीं हाथ किसी के मुश्किल जान बचानी

अछूत हुए सभी रिश्ते नाते चली हवा बेगानी

छूटे कैसे इससे जान मैया कर दो बेड़ा पार ।

पड़ी कोरोना की मार मैया.......


गांव नगर मचा हाहाकार है बिगड़ी आज कहानी

बाल - वृद्ध सब डरे - डरे हैं कुछ कहते नहीं जुबानी 

विद्या मंदिर बंद हुए हैं अब कैसे सीख सिखानी

आकर खड़े तुम्हारे द्वार मैया कर दो बेड़ा पार ।

पड़ी कोरोना की मार मैया.......


जड़ी बूटी और औषधि सारी मानो हुई पुरानी 

दवा कोई न असर दिखाये फिरा है सभी पर पानी

सांस सांस को तरसाने की कोरोना ने ठानी

दिखे न कोई उपाय मैया कर दो बेड़ा पार 

पड़ी कोरोना की मार मैया ........

✍️ डाॅ रीता सिंह, मुरादाबाद

मुरादाबाद मंडल के हसनपुर (जनपद अमरोहा ) के साहित्यकार मुजाहिद चौधरी की रचना ---- मत सांसों का व्यापार करो .....


 

मुरादाबाद के साहित्यकार अशोक विद्रोही की रचना --- मैं विद्यालय जाऊं कैसे


कोरोना के नये दौर में , 

             मैं विद्यालय जाऊं कैसे?

बाहर घूम रहा कोरोना,

            घर के बाहर आऊं कैसे?


कभी सुनी न और न देखी,

           ऐसी नयी कहानी लिख दी।

ब्रह्मा जी ने कभी रची न,

          ऐसी अजब निशानी रच दी।।

मास्क लगा सबके ही मुख पर,

         अपना मुख दिखलाऊं कैसे ?

बाहर घूम रहा कोरोना,

            घर के बाहर आऊं कैसे??


हवा विषैली हो जाये तो,

             हम  तुम  सांसें कैसे लेंगे .?

कटे वृक्ष धरती से कितने,

            प्राण वायु फिर कैसे देंगे ?

घायल होती हरियाली में,

             पर्यावरण  बचाऊं  कैसे?

बाहर घूम रहा कोरोना,

            घर के बाहर आऊं कैसे??


बन्द हुए हैं विद्यालय सब,

       किंतु फीस फिर भी बढ़ती हैं।

लाक डाउन के नये दौर में,

      ओनलाइन क्लासें चलतीं हैं।।

दोस्त सभी अब छूट चुके हैं,

       फिर से दोस्त बनाऊं कैसे ?

बाहर घूम रहा कोरोना,

            घर के बाहर आऊं कैसे ?


कर के दया प्रभु परमेश्वर,

        चमत्कार अब तो दिखला दो।

 महामारी से त्रस्त हुए सब,

           हे प्रभु इस को दूर भगा दो।।

 छोड़ तुम्हारे चरणों को मैं ,

           द्वार दूसरा पाऊं कैसे ?

बाहर घूम रहा कोरोना,

            घर के बाहर आऊं कैसे ?


✍️ अशोक विद्रोही 

412, प्रकाश नगर, मुरादाबाद

मोबाइल फोन 82 188 25 541

मुरादाबाद मंडल के चन्दौसी (जनपद सम्भल) के साहित्यकार रमेश अधीर का गीत -----कोरोना ने कहर ढाया, चारों ओर अंधेरा छाया .....


 

मंगलवार, 27 अप्रैल 2021

मुरादाबाद के साहित्यकार (वर्तमान में मुंबई निवासी ) प्रदीप गुप्ता की रचना -----एक कविता करोना के नाम


नहीं भरोसा बचा सुहाने सपनों पर 

जो कुछ दिन पहले दिखलाए थे 

इससे बेहतर यही रहेगा प्यारे बंधु 

माज़ी ही मेरा मुझको वापस कर दो 


धर्मप्राण भक्तों से है करबद्ध निवेदन 

बहुत हो गयीं दीन धरम की चर्चाएँ 

छोड़ो अब मस्जिद और मंदिर के मसले 

यही समय है दुखियारों की पीड़ा हर लो 


कैसा मंज़र ! जूझ रहा है देश इस समय 

अनदेखे से घातक एक विषाणु से 

जो भी सीमित संसाधन हैं अपने बस में 

जिसे ज़रूरत है उस की  झोली में भर दो 


नहीं दिखायी देते हैं वो कठिन समय  में

जिन्हें बिठाया था तुमने पलकों पर अपनी 

शब्दहीन छिप कर बैठे हैं कहीं  सुरक्षित 

कायनात देखेगी उनसे तुम इतना ही कह दो 


अर्जुन बन जाओ अपना गांडीव सम्भालो 

ठोस कदम ही लेने होंगे सबकी ख़ातिर 

संकट के पल में खुद को मज़बूत बनाओ 

रहो सुरक्षित घर से बीमारी को धक्का दे दो.  


✍️ प्रदीप गुप्ता

B-1006 Mantri Serene

Mantri Park, Film City Road , Mumbai 400065

मुरादाबाद की साहित्यकार मीनाक्षी ठाकुर की कविता .......अच्छे दिन


एक बार फिर

दुनिया के सबसे बड़े

प्रजातांत्रिक देश में

चुनाव बड़े ही शांतिपूर्ण ढंग से

सम्पन्न हो रहे हैं।

बिल्कुल मरघट सी शांति .....!!

सड़कों पर पसरा सन्नाटा

मृत्यु का अट्टहास!

डरते लोगों को और डराया जायेगा

मरने पर ही तो मरहम लगाया जायेगा।

फक्क पड़े चेहरे...!!

बोझिल कदम

तपते बदन...

चुनाव पेटियों के साथ

जा रहे हैं अपने गंतव्य को..

शायद ये उनका अंतिम गंतव्य हो।

कोई और विकल्प बचा ही कहाँ है?

जान और माल दोनो के बीच

अपनी जान दाँव पर लगा दी है।

रोजी रही ,तभी तो  रोटी  भी मिलेगी।

क्योंकि राजनीति का गंतव्य भी 

तो यही है।

मौत के आगोश में सिमटकर

अच्छे दिन और भी खूबसूरत लगने लगेंगे।

✍️ मीनाक्षी ठाकुर

मिलन विहार, मुरादाबाद 



मुरादाबाद की साहित्यकार हेमा तिवारी भट्ट की कविता ---गुनगुनाती जिंदगी


जितना मैंने पढ़ा,

जितना मैंने सुना,

डर फैलता गया,

आँखों के कोने कोने में,....

मुझे साक्षात दिखने लगी 

पड़ोस में रहने आयी मौत.....

उसके नाखून भयानक थे,

हर पल मंडराने लगे 

उसके नाखून 

मेरे सिर पर......। 

मौत के लक्षण 

उतर आये 

मेरे शरीर में।

प्राणवायु सूखने लगी....

और मैं जुट गयी इंसान होने के नाते

अपनी जान बचाने की होड़ में...

इसी होड़ा होड़ी के दरमियान 

मैंने अचानक ध्यान दिया....

बेजुबानों पर.......

हमारा पालतू 'जैरी' निडर था 

और मस्त भी....

छत पर आने वाली चिड़िया भी 

दहशत में नहीं दिखी....

दाना लेने आयी गिल्लू भी 

बेफिक्र थी....

उसने देखा मुझे मुड़कर 

बार बार हमेशा की तरह....

जितना मैंने देखा...….

अपने आस पास....

ज़िन्दगी गुनगुनाती मिली....

चढ़ते सूरज की किरणों में,

सरसराते पत्तों में

मम्मी जी की आरती में।

दूध वाले,अखबार वाले,

सब्जी वाले,कूड़े वाले,

और ये गली में खेलते बच्चे,

सब ही तो ज़िन्दगी से भरे हुए थे।

अब नहीं दिख रही थी

मुझे मौत पड़ोसन सी...

और अब वे नाखून भी 

गायब हो रहे हैं यकायक....

क्योंकि मैंने बंद कर दिया है

आभासी पढ़ना और सुनना

मैं अब पास पड़ोस का 

सच देखने लगी हूँ...

जानने लगी हूँ.... 

मौत तो एक चारपाई है

जब कोई थक जाता है,

उस पर जाकर लेट जाता है।

लेकिन ज़िन्दगी मेहमान है,

उसे होंसलों के सोफे पर बैठाना होगा,

उम्मीद की मीठी चाय पिलानी होगी।

मेहमान का स्वागत सत्कार करना होगा,

क्योंकि 'अतिथि देवो भव' के 

संस्कार है हमारे...

तब तक मौत की खटिया 

खड़ी करनी ही होगी,

क्यों न शुरुआत हम सब 

अपने दिमाग के दालान से करें....

✍️ हेमा तिवारी भट्ट, मुरादाबाद

मुरादाबाद मंडल के जनपद बिजनौर निवासी साहित्यकार डॉ अजय जनमेजय की तीन ग़ज़लें........




 

वाट्स एप पर संचालित समूह "साहित्यिक मुरादाबाद" में प्रत्येक रविवार को वाट्स एप कवि सम्मेलन एवं मुशायरे का आयोजन किया जाता है । इस आयोजन में समूह में शामिल साहित्यकार अपनी हस्तलिपि में चित्र सहित अपनी रचना प्रस्तुत करते हैं । रविवार 25 अप्रैल 2021 को आयोजित 250 वें आयोजन में शामिल साहित्यकारों डॉ पूनम बंसल, चंद्रकला भागीरथी, प्रीति चौधरी, अशोक विद्रोही, सन्तोष कुमार शुक्ल, राजीव प्रखर, मरगूब अमरोही, विवेक आहूजा, रेखा रानी और मनीषा वर्मा की रचनाएं उन्हीं की हस्तलिपि में .....




 











सोमवार, 26 अप्रैल 2021

शनिवार, 24 अप्रैल 2021

मुरादाबाद मंडल के जनपद रामपुर निवासी साहित्यकार रवि प्रकाश की कहानी ---- पहल


कॉलोनी के वाट्स एप ग्रुप पर एक मैसेज आता है। मैसेज भेजने वाली महिला का नाम ताराबाई है । वह लिखती हैं- "मैंने ऑक्सीजन का एक सिलेंडर पिछले एक सप्ताह से खरीद कर रखा हुआ है । सोचा था अगर जरूरत पड़ेगी तो घर पर रखा हुआ यह सिलेंडर काम में आ जाएगा। लेकिन अब सोचती हूं कि मैं तो स्वस्थ हूं लेकिन बहुत से अस्वस्थ लोगों को इस सिलेंडर की जरूरत होगी ।अतः जहां से यह सिलेंडर मैंने लिया है ,वहीं पर इसे वापस लौटाने जा रही हूं । इससे मुझे बहुत हल्का महसूस होगा तथा मौजूदा समय में देश के लिए यह मेरा छोटा - सा योगदान हो जाएगा।"

       मैसेज पढ़कर कॉलोनी में सभी के घरों में एक हलचल - सी होने लगी । काफी लोगों ने अपने - अपने घरों पर ताराबाई की तरह ही ऑक्सीजन के सिलेंडर स्टॉक में इसलिए रख रखे थे ताकि जरूरत पड़े तो काम आ जाएँ । रोजाना खबरें आ रही थीं कि ऑक्सीजन की कमी चल रही है। भयंकर मारामारी है। लेकिन अब ताराबाई के मैसेज में सबको सोचने पर विवश कर दिया ।

         थोड़ी देर बाद कॉलोनी के एक घर से ताराबाई ऑक्सीजन के सिलेंडर को जमीन पर हाथ से आगे बढ़ाते हुए सबको दिखाई दीं। वह अकेली आगे बढ़ती जा रही थीं। उनका लक्ष्य कॉलोनी के गेट तक पहुंचना था ,जहां से उन्हें एक ई -रिक्शा अथवा ऑटो पकड़ कर अपनी मंजिल तक पहुंचना था । लेकिन इससे पहले कि ताराबाई कॉलोनी के गेट पर पहुंचें, उनके पीछे कॉलोनी की दो और महिलाएं भी ऑक्सीजन के सिलेंडर हाथ से घुमाते हुए आगे बढ़ने लगीं। फिर तो धीरे-धीरे 10 - 12 स्त्री पुरुष अपने-अपने घरों से सिलेंडर निकालकर ताराबाई का अनुसरण करते हुए दिखाई पड़ने लगे । 

          ताराबाई एक ऑटो में बैठ कर जब जाने के लिए तैयार हुईं, तो उनके साथ 10- 12 लोग और भी थे । इकट्ठे सब लोग ऑटोकर के चले । जहां से ऑक्सीजन का सिलेंडर लिया था ,वहां पहुंचकर सबने देखा कि 20-  25 लोगों की भीड़ लगी थी । सब ऑक्सीजन के लिए चिंतित थे । जैसे ही ताराबाई ने सब के ऑक्सीजन के सिलेंडर  बाहर निकाले तो भीड़ में हलचल मच गई। लोग दौड़कर ताराबाई के पास आए ।

      "क्या यह खाली सिलेंडर हैं ? "- पहुंचते ही प्रश्न शुरू हो गए

"नहीं इन सब में ऑक्सीजन भरी हुई है ।

हमें इसकी जरूरत इस समय नहीं है । जब जरूरत होगी तब ले लेंगे । हम लोग इन्हें वापस लौटाने आए हैं।"

   "अरे ! हमें तो बहुत सख्त जरूरत है । आप देवता बनकर हमारे लिए आए हैं । हमें सिलेंडर दे दीजिए ! "-यह शब्द किसी एक के नहीं थे। पूरी भीड़ अब सिलेंडरों के आसपास गिड़गिड़ाते हुए मानों दया की भीख मांग रही हो । चटपट 10 - 12 सिलेंडर लोग लेकर चले गए । इसी बीच पीछे से दस-बीस सिलेंडर और आ गये। वह भी कालोनी के लोगों के ही थे। धीरे-धीरे सारी भीड़ को ऑक्सीजन के सिलेंडर मिल गए । कमी खत्म हो गई । अब पीछे से जब 20 - 25 सिलेंडर और आए तब उनको लेने वाला कोई नहीं था । वह भंडार में जमा करा दिए गए । भंडार के बाहर जो तख्ती लटकी हुई थी और जिस पर लिखा था " *ऑक्सीजन का स्टॉक खत्म हो गया है* ", वह हटा ली गई। 

       भंडार के गेट पर  पुलिस के दो सिपाही थे । उनमें से एक कहने लगा " अब किस बात की सुरक्षा ? अब तो गैस खूब आसानी से मिल रही है । "

       दूसरे सिपाही ने इत्मीनान से मोबाइल खोलकर समाचार देखना शुरू किया । फिर कहने लगा "अभी भी लोगों के दिमाग में ऑक्सीजन की कमी तो है। " 

✍️  रवि प्रकाश , बाजार सर्राफा, रामपुर (उत्तर प्रदेश) , मोबाइल 99976 15451

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2021

मुरादाबाद के साहित्यकार स्मृतिशेष बहोरन सिंह वर्मा प्रवासी की कृति ---मंगला । यह कृति वर्ष 1999 में अशोक विश्नोई ने सागर तरंग प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की थी । इस कृति में उनके 57 भक्तिपद संगृहीत हैं। इसकी भूमिका लिखी है -- उमेश पाल वर्णवाल 'पुष्पेंद्र' ने ।


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डॉ मनोज रस्तोगी

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मुरादाबाद 244001

उत्तर प्रदेश, भारत

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मुरादाबाद के साहित्यकार विवेक आहूजा की लघुकथा --अबकी तुम्हारी बारी है

  


मंच पर सोहराब सिंह की विधायकी के इलेक्शन का भाषण चल रहा था । इस बार सोहराब  सिंह के कारनामों के कारण उसकी स्थिति अच्छी नहीं थी , जनसभा में अपेक्षा के अनुरूप भीड़ भी नहीं थी । सोहराब  सिंह का खासम खास एलची  उनके पास आया और बोला जनसभा में लोग आपको बहुत गाली दे रहे हैं और कह रहे हैं सोहराब  सिंह तो बहुत भ्रष्ट है, चोर है पैसा खाता है आदि  आदि.......यह  सुन सोहराब  सिंह चुप रहा और यकायक मंच पर भाषण देने के लिए खड़ा हो गया ।  

       सोहराब  सिंह ने कहा ..............आप लोगों ने जो मुझे तीन बार विधायक बनाया है , मैं इसका शुक्रगुजार हूं । सोहराब सिंह ने आगे कहा.......  पहली बार मैं जब विधायक बना तो मेरी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी लिहाजा पहली बार की विधायकी में मैंने खूब धन कमाया ताकि मैं आगे भी इलेक्शन लड़ सकूं और मुझे पैसे की कोई कमी ना रहे । दूसरी बार जब मैं विधायक बना तो मेरे रिश्तेदार जो मेरे बिल्कुल करीबी थे उनको मैंने खूब पैसा कमाया ताकि रिश्तेदारी में वह मुझे कोई उलाहना ना दे सके तीसरी बार जब मैं विधायक बना तो मैंने अपने कार्यकर्ताओं को जो मेरे साथ दिन रात एक कर के लगे रहते हैं उनको खूब धन कमवाया  ताकि वह मेरे किसी भी इलेक्शन में कोई कोताही ना बरतें । यह मेरा चौथा इलेक्शन है इस इलेक्शन में मैंने यह विचार किया है की जनता जनार्दन "अबकी तुम्हारी बारी है" इस बार मैं विधायक बनके पूर्ण रूप से जनता को समर्पित रहूंगा । लिहाजा आप स्वयं फैसला करें कि आपको क्या करना है। 

 आज इलेक्शन के परिणाम के पश्चात सोहराब  सिंह अपने मुख्य ऐलची के साथ शपथ ग्रहण समारोह में जाने की तैयारी कर रहे हैं ।

✍ विवेक आहूजा, बिलारी , जिला मुरादाबाद

मुरादाबाद मंडल के गजरौला (जनपद अमरोहा) की साहित्यकार रेखा रानी की लघुकथा ---सफल चुनाव


   "साहब! मेरी कोरोना जांच रिपोर्ट पॉजिटिव आई है। मेरी ड्यूटी काट दीजिए प्लीज़..... सर! मेरी तबीयत ज्यादा खराब है। मैं ड्यूटी नहीं कर पाऊंगा । एक मतदान अधिकारी गिड़गिड़ाते हुए... लगभग रोते हुए बोला ।"

   चले आते हैं बहाना बनाकर ....यदि सब तुम्हारी तरह निकम्मे हो गए तो चुनाव कौन कराएगा?  एफआईआर दर्ज कर दी जाएगी आपकी...... फटकार लगाते हुए.... चुनाव अधिकारी चिल्लाए।.….

    बेचारा लड़खड़ाए कदमों से.. चुनाव सामग्री प्राप्त कर पार्टी के साथ बस की ओर  चल दिया। पार्टी के सभी कार्मिक सहमे हुए से... एक बस में पांच पोलिंग पार्टियां ।  दो गज दूरी मास्क ज़रूरी का उपहास उड़ाते हुए अपने पोलिंग बूथ पर पहुंच रही थीं।

     पूरी रात तपे बदन से कार्य करता रहा,  पूरी पार्टी भी कोरोना भूल उसके साथ लगी रही। सुबह हुई.... मतदान हुआ,  शाम को पेटियां सील करते करते लगभग लड़खड़ाने लगा था, बेचारा.. ..।

     सेक्टर मजिस्ट्रेट के द्वारा सफ़ल मतदान संपन्न होने की घोषणा। इधर मतदान अधिकारी की सांसें भी शून्य में विलीन हो.... लोकतन्त्र की खोखली नीतियों का तमाशा देख रही थीं।

✍️ रेखा रानी, विजयनगर गजरौला, जनपद अमरोहा।

     

मुरादाबाद के साहित्यकार अशोक विद्रोही की कहानी ----- मेरे अपने


 ..............."एक महीना हो गया इस आदमी को.... जब से मरा कोरोना फैला है ....किसी की फिक्र है इसे.... ? "

"... न मेरी......! न बच्चों की !सुबह 6:00 बजे निकल जाता है! और रात को 11:00 बजे पहुंचता है वापस घर।

..... घर में ! क्या सामान है ......  क्या नहीं ? राशन महीने में एक बार ही लाता है!..... फिर बीच में दो बार सब्जी..... बस हो गया ! मेरा तो मन भर गया इस आदमी से.!.... आखिर  मेरा भी तो मन है.....कि ये  मेरे साथ भी समय गुजारे...... !" मेरे मन की बात सुने अपने बच्चों के बीच में दो घड़ी बैठे बतियाये..!".... कभी साथ में  पिक्चर देखे!..". 

...."कभी कहीं अकेले नहीं जाना चाहता घूमने मेरे साथ ! प्रोग्राम भी बनाओ तो एक दो को चिपका ही लेता है !अपने साथ......!" तंग आ गई मैं  तो इस आदमी से ! 

"अरे यही सब करना था तो शादी क्यों... की ?".......भगवान दुश्मन को भी ऐसा पति न दे.... फूट गयी मेरी किस्मत !...... दिन भर घर से गायब रहता है रात को खाना खाने चला  आता है बेशर्म.....!"

"  हमेशा समाज सेवा! समाज सेवा ! ! समाज सेवा!!! समाज सेवा न हुई मरी गुलामी हो गयी..!.... भूत सवार है इसके  सर पर कभी अपने घर को देखता ही नहीं.....!... मैं तो तंग आ चुकी हूं !इसकी आवारागर्दी से... अगर इसे कौरोना हो गया तो कौन देखेगा ? बस सुघड़ भलाई से मतलब है !!

.....आज सुबह से ही किसी अनहोनी की कल्पना से बेचैन....... अनीता बड़बड़ाये जा रही थी। ...... मूड बिल्कुल खराब  हो रहा था।

"..........मरे कोरोना में संघ वालों के साथ  खाने के किट बांटते फिर रहे हैं न तन का होश है न  वदन का !" 

.....अगर इन्हें कोरोना हो गया तो हम लोग तो कहीं के ना रहेंगे"....? यह सोचते सोचते अनीता अपने कामों में लग गयी ।

 ......नगर में महामारी ने विकराल रूप ले लिया था...... .विशाल पूरे दिन कोरोना मरीजों को अस्पताल पहुंचाने ,सहायता पहुंचाने उनके घर वालों को भोजन किट पहुंचाने में ही व्यस्त रहने लगा था ......जो घर लौटा तो उसको गले में दर्द था .....अंदर से !..... बुखार सा भी था...... शाम से रात होते-होते तकलीफ बढ़ने लगी रात के 12:00 बजे तक गला बन्द... खांसी, जुकाम ,बुखार से बुरा हाल हो गया..... उसकी सूंघने व स्वाद  ग्रहण करने की शक्ति भी खत्म हो गई थी!

..... जांच कराने के लिए कोरोना सेंटर पर ले गए ।कोरोना पाज़िटिव रिपोर्ट आयी !

 .....अनीता क्रोध शोक से आपा खो बैठी ! ...."पड़ गयी ठंडक !"..होगयी समाज सेवा!!..... बहुत आखरी काट रखी थी....अरे मैं तो पहले ही कहती थी...मेरी सुनता कौन है? ...अब  मरो बे मौत !" 

....आखिर दुखों का पहाड़ जो टूट पड़ा था उस पर !

....... अनीता ने अपने मैके में भाइयों व ससुराल में देवर , जेठों  सभी से बात की "भैया हमारी मदद करो ! हम मुसीबत में हैं !" परन्तु कोरोना की सुन कर सभी ने वहाने बाजी कर किनारा कर लिया ।..... अब क्या करे ....तीन तीन बच्चों को लेकर कहां जाये ? किससे मदद मांगे ?

......परन्तु  ये क्या ! विशाल के मित्रों की टोली जैसे ही घर पहुंची ! खबर आग की तरह पूरे शहर में फ़ैल गयी......विशाल को  कोरोना हुआ है !........फिर क्या था उसके घर पर सामान पहुंचाने वालों का तांता लग गया !

"हम हैं न!..भाभी जी !"

 "चिन्ता मत करो !... "

"सब ठीक हो जाएगा"..!

..क्या क्या चाहिए ?.... सब हाजिर होने लगा ....क्या करना है  ? रुपए पैसे से लेकर बिना मांगे ही लोग सहयोग में जुट गए!

.... विशाल भैया  को कोई तकलीफ न हो  सब अच्छे से अच्छे इंतजाम होने लगे ....अच्छे अस्पताल में भर्ती कराया गया.... हालत ज्यादा बिगड़ने पर  तीर्थंकर से उसको मेरठ रेफर कर दिया गया...... रातों रात विशाल भैया को मेरठ में आंनद हास्पिटल में भर्ती कराया गया.....लोग रात दिन उसके बच्चों का ध्यान रख रहे थे । हर संभव परिवार की  देखभाल कर रहे थे।

......अनीता को अपने उलाहनो पर आज पश्चाताप और मलाल  हो रहा था ....और बहुत आश्चर्य भी ! ..... कि आज मुसीबत की घड़ी में जब सब अपनों ने उसका साथ छोड़ दिया था तब उसे सहायता पहुंचाने वाले .... इतने लोग....!

     अपनो की कमी तो चुभ रही थी.... पर .... अपने लोगों की कोई कमी नहीं थी ।

.....उधर अस्पताल में प्लाज्मा देने वालों की लाइन लगी हुई थी.....

 .....धीरे धीरे विशाल  स्वस्थ होकर घर आया ......घर पर मिलने वालो की भीड़ लगी थी........तिल रखने की घर में जगह नहीं थी.....!

.......... अनीता को मानो... विशाल के व्यक्तित्व के  विराट रूप का दर्शन हो रहा था..... वह व्यक्ति जो हजार ताने उलाहने सुन कर भी हमेशा जोर से हंस दिया करता था! जिसे अनीता ने हमेशा निकम्मा, संवेदन हीन, तुच्छ समझा कभी सम्मान की दृष्टि से भी नहीं देखा.....उसके इतने चाहने वाले !...

भीड़ को देख कर उसकी आंखों में आंसू थे.....शायद इसलिए कि उसका मन कह रहा था......!

........यही सब तो हैं मेरे अपने!

✍️ अशोक विद्रोही ,412 प्रकाशनगर मुरादाबाद

मोबाइल फ़ोन नम्बर 8218825541


मुरादाबाद के साहित्यकार दुष्यन्त बाबा की रचना ----क्षमा याचना पूजा अर्चन करबद्ध यही वंदन है विपत्ति को हरो हरि मेरा यही करुण क्रंदन है


 *तेरा साधक*

जीवन देने वाले क्यों मौत बांटता घर-घर में

तेरे नाम ज्योति जलाते तेरी श्रद्धा हर घर में

अपनी सृष्टि को समझ खिलौना खेल रहा है

क्यों एक के दोष को सारा जगत झेल रहा है

तू रुलाए अपने मानव को ऐसा तेरा स्तर है?

यदि सच में ऐसा हो तो ईश नही तू पत्थर है

पुत्र गलतियां  करता, बनती थोड़ी डॉट सही

हर गलती की सजा में गले को देते काट नही

माना कि मैं पापी, नीच, प्रकृति  विनाशक हूँ

तेरी सत्ता का सौदाई बन बैठा यहाँ शासक हूँ

तू ही तो कहता कर्मयोग में अच्छा या बुरा कर

फिर क्यों भ्रम में डाल रहा फलयोग भुलाकर

तूने ही बनाई नियति जिस पर चलना सबको

फिर मेरा दोष कहाँ,जो आंख दिखाता मुझको

क्षमा याचना पूजा अर्चन करबद्ध यही वंदन है

विपत्ति को हरो हरि मेरा यही करुण क्रंदन है।

✍️ दुष्यन्त ‘बाबा’, पुलिस लाइन, मुरादाबाद

 मो0-9758000057

 

गुरुवार, 22 अप्रैल 2021

मुरादाबाद के साहित्यकार डॉ मनोज रस्तोगी की व्यंग्य कविता ---- स्वस्थ भारत का निर्माण


चकाचक सफेद कमीज पहने 

काली टोपी लगाए

लघु पुस्तिकाओं से भरा झोला 

कंधे पर लटकाए

हमारे एक राष्ट्रवादी मित्र

सुबह ही सुबह

बिना हमें बताएं

घर पर पधार गए

कोरोना काल में उन्हें देखकर 

हम सब अचकचा गए 

जब तक हम कुछ समझ पाते 

उनके स्वागत में कुछ कह पाते 

सोफे पर पसरते हुए 

उन्होंने हमारी पत्नी को

 हाथ जोड़कर की नमस्ते

बोले गुजर रहा था इस रस्ते 

सोचा आप सब से मिलता चलूं 

राष्ट्रहित पर चिंतन करता चलूं 

हमने कहा - भाई साहब                     

आजकल हम बहुत तनाव में हैं 

अगले हफ्ते पंचायत चुनाव हैं 

शहरों के साथ-साथ गांव में भी 

कोरोना पैर पसार रहा है 

हर रोज बढ़ती जा रही है 

पीड़ितों की संख्या 

बता यह अखबार रहा है 

एक और मास्क न पहनने पर 

कट रहे चालान हैं

कैसे करेंगे चुनाव ड्यूटी

यह सोचकर हम हलकान हैं

कैसे हो पाएगी दो गज की दूरी 

गांव में कैसे कट पाएगी रात पूरी

सुनकर हमारी बात 

दार्शनिक अंदाज में उन्होंने

हमें समझाया 

राष्ट्रहित का वास्तविक अर्थ 

हमें बताया

पंचायत चुनाव 

सत्ता का विकेंद्रीयकरण है 

हर राजनीतिक पार्टी में 

हर्ष का वातावरण है 

लोकतंत्र की रक्षा हेतु 

चुनाव करना -कराना 

हम सबकी जिम्मेदारी है

हमने कहा - भाई साहब 

चुनाव पर यह आपदा तो भारी है 

मौतों का सिलसिला लगातार जारी है

अस्पतालों में बेड नहीं हैं

ऑक्सीजन की मारामारी है

चाय का घूंट पीते हुए

चेहरे पर मुस्कान लाते हुए 

वह बोले 

चुनाव का मामला 

राष्ट्रहित से जुड़ा हुआ है

और राष्ट्र के हित में

अपने प्राणों की चिंता न करना 

हम सबकी जिम्मेदारी है 

रही बात इस वायरस की

यह कम इम्युनिटी वालों को ही 

पकड़ता है

गंभीर रोग वालों को ही 

जकड़ता है

यह शरीर तो नश्वर है

हमारी रक्षा करने वाला ईश्वर है

मौतों की खबरों से

बिल्कुल मत घबराइए 

तनाव से पूरी तरह मुक्त हो जाइए 

सकारात्मक सोच के साथ

राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाइये

जाते-जाते वह जता गए 

धीरे-धीरे हम 

सुनहरे कल की ओर बढ़ रहे हैं 

सशक्त भारत , स्वस्थ भारत

का निर्माण कर रहे हैं

✍️ डॉ मनोज रस्तोगी

8,जीलाल स्ट्रीट

मुरादाबाद 244001

उत्तर प्रदेश, भारत

मोबाइल फोन नम्बर 9456687822

मुरादाबाद के साहित्यकार स्मृतिशेष बहोरन सिंह वर्मा प्रवासी का गीत ---- उनका यह गीत लगभग 54 साल पहले प्रकाशित गीत संकलन 'उन्मादिनी' में प्रकाशित हुआ था। यह संग्रह कल्पना प्रकाशन , कानूनगोयान मुरादाबाद द्वारा सन 1967 में शिवनारायण भटनागर साकी के संपादन में प्रकाशित हुआ था। इस संग्रह में देशभर के 97 साहित्यकारों के श्रृंगारिक गीत संग्रहीत हैं। इसकी भूमिका लिखी है डॉ राममूर्ति शर्मा ने


 

कैसे तेरी छवि मद का स्वागत करूं 


किसने छेड़े तार हृदय की बीन के ।

किसने छेड़ी आज प्रणय की रागिनी ।।

कैसे बाँधू मुक्त केश - घन पाश में, 

कैसे तेरे नयनों की मदिरा  पियूँ। 

कैसे वारूँ उर अलि तब मुख कंज पर, 

कैसे तब अधरामृत पी युग-युग जियूँ।।

कैसे तेरी स्नेह वृष्टि स्वीकृत करूँ।

 मेरा उपवन ताक रही है दामिनी ।। किसने......


मेरा नन्दन आज विभा से रिक्त है, 

शूल मयी हैं सब सुमनों की क्यारियाँ, 

नहीं सुरभि के मादक झोंके हैं कहीं, 

उड़ती हैं केवल विषमय चिंगारियाँ ।। 

कैसे वारूँ सुमन मराली चाल पर, 

फिरती है उन्मुक्त विषमता नागिनी ।। किसने......


वैशाली की माँग अभी सूनी पड़ी, 

मिले धूल में रो-रो पटना के भवन । 

पुलिनों के दृग पंथ किसी का देखते, 

सूखे अब तक नहीं वीचियों के नयन | 

कैस तेरी छवि-मद का स्वागत करूँ ।

विधुरा है सम्प्रति सुरसरि उन्मादिनी ।। किसने .....


✍️ बहोरन सिंह वर्मा प्रवासी


:::::::::प्रस्तुति:::::::::

डॉ मनोज रस्तोगी

8, जीलाल स्ट्रीट

मुरादाबाद 244001

उत्तर प्रदेश, भारत

मोबाइल फोन नम्बर 9456687822

बुधवार, 21 अप्रैल 2021

मुरादाबाद के साहित्यकार स्मृतिशेष पंडित मदन मोहन व्यास के कृतित्व पर केंद्रित उनके अनुज पंडित ब्रह्म शंकर व्यास का आलेख जो प्रकाशित हुआ था परशादी लाल रस्तोगी इंटर कालेज मुरादाबाद की वार्षिक पत्रिका 'कल्पना' के अंक 5, वर्ष 1961-62 में ।

मुरादाबाद का व्यास परिवार अपनी संगीत और साहित्य साधना के लिये प्रसिद्ध रहा है । हिन्दी के सुप्रसिद्ध पत्रकार, आलोचक, कहानीकार , उपन्यास लेखक एवं चलचित्र-कथा लेखक पं० नरोत्तम व्यास से कौन अपरिचित है । कवि और संगीतकार पं० पुरुषोत्तम व्यास को कौन नहीं जानता ? उसी 'विटप पर पनप कर सुमन     बन  गया है जो वह है सुप्रसिद्ध कवि मदन मोहन व्यास ।

'भाव तेरे शब्द मेरे' शीर्षक से व्यास की कविताओं का एक सुन्दर-संग्रह प्रकाशित हुआ है। इसके

अतिरिक्त 'लव कुश' 'माखन चोर' (अप्रकाशित खण्ड काव्य) अनेक गीत, नाटक और लेखों की निधि उनके पास सुरक्षित है ।
सिर पर रखे बोझ के रहने पर यदि कंठ में स्वर भी आजायें तो वोझ हल्का हो जाता है। व्यास जी का जीवन गार्हस्थ-संघर्षों से बोझिल है।

'पन्थ बीहड़ अंग जर्जर
पाँव थककर चूर प्रियतम ।'

अपने कर्म के बीहड़ पन्थ को आनन्द से आद्र करने के लिए वे निरन्तर गाते हैं -
 इस प्रशान्त जीवन में सुख सन्तोष यही है
तुम मिल जातो हो तो जी बहला लेता हूँ।
तुम मिल जातीं छन्दों के बन्धन खुल जाते
मुक्त पवन में मेरे कवि के स्वर लहराते
मैं चलता हूँ क्योंकि घड़ी पल क्षण भर में ही
तुमसे अपने मन की कुछ कहला लेता हूँ।'

व्यास जी के गीतों को स्थूल रूप से दो वर्गों में विभक्त कर सकते हैं। एक आत्मपरक और दूसरे प्रकृति वर्णन सम्बन्धी । उनके आत्मपरक गीतों में अनुभूति और अभिव्यक्ति आवेग की उत्कृष्टतम अवस्था में हैं। कवि का हृदय निरन्तर जीवन की झंझाओं से टकरा-टकराकर कटुता को अपने में समाहित करने में समर्थ हो गया है । उसके अंग-प्रत्यंग में दुख, दैन्य, पीड़ा, टीस, वेदना और व्यथा ने स्थायी रूप से निवास कर लिया है। यही कारण कि प्रेम की संयोग अवस्था में भी उनकी दृष्टि वेदनाओं के अन्वेषण में लगी रहती है। रिमझिम बरसात, सागर की लहरों की क्रीडाएँ, दूर्वादल पर सुप्त ओस कण, सरिता का कलरव गान और श्रंगों के रजत हास आदि प्रकृति के सौंदर्य स्थलों में कवि के व्याकुल हृदय को किसी व्यथित के अश्रुओं का प्रवाह, किसी गम्भीर पुरुष की भावनाओं का अन्तर्द्वन्द, किसी पीड़ित के अन्तःकरण के उच्छवास, आदि का ही आभास होता है। चन्द्रमा की धवल तारिकाएँ एवं सुरभित समीर उसके हर्ष का आलम्बन नहीं बन सकती क्योंकि उसका हृदय शोकाकुल विरह विदग्धों की आहों से परिपूर्ण है चाँदनी रात खिलखिलाती रही:

पर न कोक कोकी ने पाया
मिलने का अधिकार रे
बसा किसी का सद्म किसी का
उजड़ रहा संसार रे

मिला कुमदिनी को सुहाग, पर कमल कोर कुम्हला गई ।
चांद गगन में आया तो चांदनी धरा पर छा गई ।

परिव्याप्त-वेदनाओं से यह नहीं समझना चाहिए कि कवि निराशावादी है । वह अदम्य उत्साही है। उसकी शरीर में जीवन झंझाओं को बरदास्त करने के लिए पवनपुत्र जैसी शक्ति भी अन्तर्हित है-
मैं खड़ा हूँ इस किनारे तुम खड़े प्रिय उस किनारे
बीच में बैठी सलिल-सुरसा भयंकर मार पसारे
पर न है चिन्ता मुझे कुछ वायु-सुत की शक्ति मुझ में पार कर उत्तम लहरें पास पहुंचूंगा तुम्हारे
  नयन इंगित ! यान दो लो लांघ-जल अगाध लूं मैं ।
 

व्यास जी का समस्त श्रङ्गार आस्थावादी है। उनका श्रृंगार भक्तिपरक है। प्रेम का आलम्बन अज्ञात शक्ति है, जो उन्हें सदैव प्रोत्साहित करती है।

तुम मुझे प्रणिधान दो तो अश्म को आराध लूं मैं'

व्यास जी प्रकृति की आलम्बनात्मक कविताओं में अपूर्व चित्रमयता आलंकारिकता एवं संगीतात्मकता प्राप्त होती है। 'स्वप्न' 'मधुमास', 'तितली', 'फूल' आदि कविताओं के माध्यम से एक ओर दार्शनिक अभिमतों की सरस विवेचना तथा जीवन की क्षणभंगुरता, असारता की अभिव्यञ्जना की गई है साथ ही प्रकृति के मनोरम  क्रोड़ का बिम्वग्रहण भी है।

कवि के रूप में श्री व्यास जी एक अनुपम स्वर साधक और महान शब्द शिल्पी है। अपनी प्रत्येक रचना में  एक एक अक्षर, शब्द प्रौर शब्द चिन्ह के प्रति वे अत्यन्त सावधान है। उनका शब्द-चयन भाव अनुकूल ध्वनि प्रस्फुटित करने में सदैव समर्थ है । अतुकांत रचनाओं में शब्दों का यह संयोग बहुत ही विचित्र गति लय और थिरकन उत्पन्न करता है। अतुकान्त रचनाओं में जो स्थान निराला को प्राप्त है यही व्यास जी को मिलेगा इसमें सन्देह नहीं है।




✍️✍️✍️पंडित ब्रह्म शंकर व्यास

सोमवार, 19 अप्रैल 2021

मुरादाबाद के साहित्यकार स्मृतिशेष बहोरन सिंह वर्मा प्रवासी की कृति ---सीपज । यह कृति साहित्यिक संस्था हिन्दी साहित्य सदन द्वारा वर्ष 2000 में प्रकाशित हुई थी । इस कृति में उनकी 80 हिन्दी ग़ज़लें और 30 उर्दू ग़ज़लें संगृहीत हैं। इसकी भूमिका लिखी है --सुरेश दत्त शर्मा पथिक और डॉ आरिफ हसन खान ने ।

 


क्लिक कीजिए और पढ़िये पूरी कृति
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::::::::::प्रस्तुति::::::::
डॉ मनोज रस्तोगी
8, जीलाल स्ट्रीट
मुरादाबाद 244001
उत्तर प्रदेश, भारत
मोबाइल फोन नम्बर 9456687822

रविवार, 18 अप्रैल 2021

मुरादाबाद मंडल के चंदौसी ( जनपद सम्भल ) निवासी साहित्यकार डॉ मूलचंद्र गौतम का व्यंग्य ---- मैया, मैं तो मोबाइल ही लैहों

 


सूरदास आज होते तो उन्हें कृष्ण की बाललीला में अनेक संशोधन करने पड़ते। अव्वल तो बालकृष्ण, मैया से चंद्र खिलौने की जगह मोबाइल की डिमांड करते, क्योंकि उन्हें मालूम होता कि चौदहवीं का चांद दूर से जितना खूबसूरत दिखता है, पास से उतना ही बदसूरत है। दूसरा, मैया को भी अब चंदा भैया उतने प्यारे नहीं लगते, जितने पहले थे। 'रक्षाबंधन' और 'भाई दूज' जैसे त्योहार सिर्फ दिखावे के लिए इसलिए चल रहे हैं, क्योंकि इस बहाने, बहनों को भी भाइयों से भात, छोछक की गारंटी बनी रहती है। आधुनिक युग में चंद्रमा और मोबाइल के तुलनात्मक विश्लेषण में मोबाइल का पलड़ा भारी पड़ता है।

   सुभद्रा के जमाने में मोबाइल होता तो चक्रव्यूह में फंसकर अभिमन्यु की हत्या न होती। सुभद्रा, चक्रव्यूह भेदन के बारे में अर्जुन की आवाज को रिकॉर्ड कर लेती और गर्भस्थ अभिमन्यु को बार-बार सुनाकर पक्का कर देती। यह इंटरनेट का ही कमाल है कि जो नीला-पीला ज्ञान पहले युवकों को गृहस्थाश्रम में प्रवेश पर भी उपलब्ध नहीं होता था, वह अब आंख खोलते ही थोक में मिल जाता है। गर्भावस्था में जब मां ही दिन-रात मोबाइल पर लगी रहती है तो बच्चे की डिमांड गलत नहीं।

        पुराने जमाने में गरीब मां-बाप, आठ-दस बच्चों को  एक-दूसरे की उतरन पहनाकर पाल लेते थे। एक ही हंसली पायल से सबके शादी-ब्याह निपटा लेते थे। अब बच्चों की डायरेक्ट जवानी में एंट्री से माता-पिता के तनाव में वृद्धि हो गई है। अब कानूनन उनकी पिटाई भी जुर्म है। ऐसे माहौल में अब पैदा होते ही वे ब्रांडेड माल की डिमांड करने लगे हैं। पूरे कुनबे के खर्च में अब एक बच्चा पलता है। मोबाइल प्रेम के विपरीत आधुनिक बच्चों को दुग्धपान और स्नान सख्त नापसंद है। कन्हैया जी को चोटी बढ़ने का लालच देकर मैया खूब दूध, दही और मक्खन का सेवन  करा देती थी। आज के जमाने में चोटी और लंगोटी, गुजरे जमाने के पिछड़ेपन की निशानियां हैं। संडे हो या मंडे, रोज खाओ अंडे के कल्चर में 'अमूल' ने मुश्किल से इज्जत बचा रखी है, क्योंकि 'चीता भी पीता' है कि तर्ज पर मरगिल्ला से मरगिल्ला बालक भी एक-आध बोतल पी ही जाता है।

✍️ डॉ मूलचंद्र गौतम

शक्तिनगर, चंदौसी (जनपद सम्भल ) -244412

उत्तर प्रदेश,भारत 

मोबाइल फोन नम्बर 9412322067


शनिवार, 17 अप्रैल 2021

मुरादाबाद मंडल के चन्दौसी (जनपद सम्भल) निवासी साहित्यकार अतुल मिश्र का व्यंग्य ----- काने मच्छर की महबूबा !!!!

 


हमारे कानों पर दो मच्छर थे, जो अपने फर्ज़ पूरे करने के लिहाज़ से भिनभिना रहे थे। सोने से पूर्व की सही भूमिका बनाने के लिए हमने कई क़िस्म की परिवर्तनीय करवटें भी लीं, लेकिन ये मच्छर भी न जाने किस ज़िद में थे। टीवी के विज्ञापनों में जापानी शक़्ल की मच्छर गपकने वाली मशीन स्विच बोर्ड पर लगी हम पर हंसती नज़र आ रही थी। ऐसा लग रहा था कि जैसे मच्छरों से मशीन ने कुछ 'सैटिंग' कर रखी है। तमाम मच्छर  उस मच्छरमार मशीन का शुक्रिया अदा करने उसके आसपास भी आ-जा रहे थे। 

एक मच्छर दूसरे से कह रहा था- "आदमी की नीयत अगर इस मशीनी दवा की तरह ख़राब रही, तो कोई हमारा शरीर-बांका भी नहीं कर सकता।" 

" वो तो सही है, मगर तू इस आदमी की सुरंग में मत चले जाना। इसने अगर अपने कान पर हाथ रख लिया, तो तू वहीं घुटकर मर जायेगा। यह आदमी ऐसा कई बार कर चुका है।" दूसरे मच्छर ने हमारी शरारत के घातक परिणामों की ओर इशारा करते हुए उसे याद दिलाया।

"तुमसे ज़्यादा मुझे पता है- इसके बारे में। काने मच्छर की महबूबा उसी सुरंग में जाकर मरी थी। बाद में उसकी लाश बड़ी अस्त-व्यस्त हालत में इसके बिस्तर पर पड़ी मिली थी। बेचारी नगर-निगम के दवा न छिड़कने का अभी और फ़ायदा उठा सकती थी। उम्र ही क्या थी अभी उसकी ?" काने मच्छर की महबूबा के प्रति अपनी हार्दिक संवेदनायें व्यक्त करते हुए पहला मच्छर हमारे कान के पास से सरक लिया।

"काने मच्छर की महबूबा से तुम्हारे भी तो कुछ ताल्लुक़ात रहे थे पहले ? उसके बच्चे कौन से इलाक़े में हैं आजकल ?" दूसरे मच्छर ने काने की महबूबा से पहले मच्छर के नाजायज़ संबंधों का पुनर्स्मरण हुए ऐसे पूछा, जैसे वह कोई बहुत गोपनीय तथ्य उजागर कर रहा हो।

"तो क्या हुआ ? कौन नहीं था उसके पीछे ? तुम भी तो वेटिंग-लिस्ट में चल रहे थे ?"  काने मच्छर की महबूबा के आशिक़ों की पूरी लिस्ट सुनाये बिना पहले मच्छर ने दूसरे मच्छर का मुंह बंद किया और उड़कर मच्छरमार जापानी मशीन का शुक्रिया अदा करने उसके ऊपर आकर बैठ गया।

✍️ अतुल मिश्र, श्री धन्वंतरि फार्मेसी, मौ. बड़ा महादेव, चन्दौसी, जनपद सम्भल, उत्तर प्रदेश, भारत

मुरादाबाद के साहित्यकार स्मृतिशेष पंडित मदन मोहन व्यास पर केंद्रित डॉ राजीव सक्सेना का आलेख ---- एक भूला - बिसरा कवि--स्व. मदन मोहन व्यास । यह आलेख उनकी कृति समय की रेत पर ( साहित्यकारों के व्यक्तित्व- कृतित्व पर एक दृष्टि ) में संगृहीत है। यह कृति वर्ष 2006 में श्री अशोक विश्नोई ने अपने सागर तरंग प्रकाशन मुरादाबाद द्वारा प्रकाशित की थी। श्री सक्सेना वर्तमान में प्रभारी सहायक निदेशक (बचत) , मथुरा हैं ।


यह मेरे नगर की विडम्बना रही है कि इसमें जितने भी साहित्यकारों को जन्म दिया। वे उनमें से अधिकांश उपेक्षित रह गये हैं या फिर विस्मृति के गर्त में डूब गये है। यूं उनके अपवाद भी हैं जैसे जिगर मुरादाबादी एवं हुल्लड़ मुरादाबादी। किन्तु इन अपवादों को छोड़कर शेष की नियति उपेक्षा, निराशा और अपवंचना ही रही है। मुरादाबाद के विस्मृत साहित्यकारों में से एक हैं- स्व० मदन मोहन व्यास। यद्यपि एक समय था जब हर किसी की जुबान पर एक नाम चढ़ा था व्यास जी का, लेकिन अब स्थिति विपरीत है। युवा पीढ़ी में से बहुतेरे तो यह भी नहीं जानते होंगे कि उनके नगर में मदन मोहन व्यास नामक कोई सरस्वती पुत्र भी हुआ था। दरअसल, यह केवल युवा पीढ़ी का दोष नहीं, बल्कि वे कथित साहित्यकार भी दोषी हैं जो अपने आप को व्यास जी के बहुत निकट होने का दम भरते हैं। इन कथित साहित्यकारों ने कभी युवा पीढ़ी को व्यास जी के बारे में या उनके कृतित्व से परिचित कराने की आवश्यकता ही न समझी।

       व्यास जी, जैसा कि सर्वविदित है, मुरादाबाद के प्रसिद्ध व्यास घराने के सदस्य थे। यह परिवार अपनी साहित्य और संगीत साधना के लिए बड़ा प्रसिद्ध रहा है। कई प्रतिभाशाली लोगों ने इस परिवार में जन्म लिया है  जिनमें प्रमुख हैं प्रसिद्ध फिल्मकार व रामकथा के विद्वान श्री नरोत्तम व्यास एवं स्वयं श्री मदन मोहन व्यास। व्यास जी एक उच्च कोटि के कवि और विद्वान अध्यापक थे। साहित्य के अलावा वे संगीत के क्षेत्र में भी दखल रखते थे। एक कवि के तौर पर भी व्यास जी का पदार्पण लगभग उस समय हुआ जब हिन्दी काव्य में छायावादी काव्य रचा जा रहा था। स्पष्ट है कि व्यास जी पर भी छायावाद का प्रभाव पड़ा। फलस्वरूप उन्होंने जो गीत व कविताएं लिखी उनमें स्वत: ही छायावाद के तत्वों का समावेश हो गया । उनकी कविता में प्रकृति के प्रति अनुराग और रहस्यवाद को स्पष्ट तौर पर  देखा जा सकता है।

   यूँ तो व्यास जी के काव्य में बहुत से गुण और बहुत से तत्व खोजे जा सकते हैं। किन्तु एक तत्व उनकी कविताओं में प्रमुख तौर पर दृष्टि गोचर होता है जो उन्हें अन्य कवियों की अपेक्षा विशिष्टता प्रदान करता है। व्यास जी एक संगीतकार भी थे, अत: उनका संगीतकार व्यक्तित्व उनके कवि व्यक्तित्व को भी प्रभावित करता था। उनका संगीत स्वत: उनकी कविताओं व गीतों में समाविष्ट हो जाता था। यही कारण है कि उनके सम्पूर्ण काव्य में संगीत तत्व की प्रधानता है जो संगीतात्मकता और गेयता उनकी रचनाओं में है वह अब दुर्लभ है। मैं समझता हूँ कि व्यास जी काव्यात्मक संगीत के मामले में अंग्रेजी के प्रसिद्ध कवियों शैली और स्विनबर्न के समकक्ष थे।

     व्यास जी से अपनी वार्तालापों के जरिये मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि वे काव्य में छन्दबद्धता के हिमायती थे। वे कहते थे कि काव्य सृजन का असली आनन्द व कवि का प्रयास छन्द में ही निहित है। यद्यपि वे छन्द व काव्य के पक्षधर थे, तथापि अकविता के प्रति भी उनकी अरुचि न थी। जब व्यास जी की जीवन संध्या निकट थी मुझे एक-दो बार उनके श्रीमुख से कुछेक यथार्थवादी कविताएं सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

      कविता के बारे में व्यास जी के विचार बड़े स्पष्ट थे। उनकी मान्यता थी कि काव्य आदमी के अन्दर एक प्रकार का सौंदर्यबोध (एस्थेटिक सेंस) जाग्रत करता है। उनका कहना था कि काव्य में आनन्द लेना और आनन्द के लिए काव्य रचना प्रत्येक सुसंस्कृत व्यक्ति के क्रिया-कलाप का साधारण अंग होना चाहिए। वे कहते थे कि काव्य का प्राथमिक उद्देश्य आनन्द की सृष्टि या मनोरंजन प्रदान करना है, शेष सारे उद्देश्य गौण हैं।

      काम्पटन रिकेट ने एक जगह लिखा है - 'जो शब्दों की दुनिया में प्रविष्ट होता है उसे आजीवन गरीब रहने की प्रतिज्ञा करनी होती है।' अन्य साहित्यकारों की भांति व्यास जी को भी आजीवन संघर्षरत रहना पड़ा। वे संघर्ष करते ही रहे-कभी अपने मूल्यों के लिए तो कभी व्यक्ति और समाज के लिए, जब तक वे स्वयं टूट नहीं गये लेकिन संघर्षमय जीवन को गाकर, हंसी-खुशी काटने में विश्वास रखते थे। प्रसिद्ध कवि बच्चन के अनुसार व्यास जी की मान्यता थी- 'संघर्ष में जुटे हुए, चिंताकुल घड़ियों के भार को हलका करने के लिए, थकान मिटाने के लिए, आगे कार्य करने की प्रेरणा पाने के लिए कुछ गा लिया जाए तो बुरा क्या है। यहीं, इसी तरह से गाना ठीक है। जिन को गाने के सिवा कोई काम नहीं वे मुझे बीमार लगते हैं।

 वे मुझे बीमार लगते हैं निकुंजों

में पड़े जो गीत अपना मिनमिनाते

गीत लिखने के लिए जो जी रहे हैं 

काश, जीने के लिए वे गीत गाते ।

व्यास जी की अपने समकालीन समाज पर तो गहरी पकड़ थी ही वे एक स्वप्नद्रष्टा और दूरदृष्टि सम्पन्न कवि भी थे। जो दलित विमर्श और नारी विमर्श आधुनिक हिन्दी साहित्य का प्रमुख स्वर है व्यास जी ने दशकों पहले अपनी कृति 'हमारी घर' में 'हृदय से दो सब को सम्मान' शीर्षक में उसे अभिव्यक्ति दी है।

 दान दो नहीं चाहिए भीख

सभी को जीने का अधिकार ।

तुम्हारा यह पवित्र कर्तव्य

न समझो इसको तुम उपकार । 

हृदय के सौदे की यह बात

हृदय से दो सब को सम्मान ।

करो श्रम-धन-धरती का दान ।

यह बहुत कम लोगों को ज्ञात होगा कि व्यास जी एक सिद्धहस्त बालगीतकार भी थे। उन्होंने रमा शंकर जैटली 'विश्व' के बाद मुरादाबाद से प्रकाशित होने वाले बाल मासिक 'बाल विनोद' का सम्पादन किया था। व्यास जी ने बच्चों के लिए कई सरस बाल गीतों की रचना की थी जो आज भी बालकों को कण्ठस्थ हैं। व्यास जी के गीत प्रवाहमयता और छन्द की दृष्टि से उत्कृष्ट है इसलिए बच्चों को सहज ही याद हो जाते हैं। यद्यपि व्यास जी द्वारा रचित बाल साहित्य आज प्रायः उपलब्ध नहीं हैं किन्तु कतिपय संकलनों में आज भी उनके बाल गीत उपलब्ध हैं।

व्यास जी के बाल साहित्य के प्रति रुझान और उनके योगदान को प्रसिद्ध बाल साहित्यकार निरंकार देव 'सेवक' ने भी स्वीकार किया था और अपने प्रसिद्ध ग्रंथ 'बाल गीत साहित्यः इतिहास एवं समीक्षा' में उनका सम्मान सहित उल्लेख भी किया था। व्यास जी का एक प्रसिद्ध बाल गीत दृष्टव्य है।

"इस मिट्टी के बेटे हम,

 इस मिट्टी पर लेटे हम,

 इस मिट्टी पर बड़े हुए, 

 लोटपोट कर खड़े हुए,

 इसकी आन निभायेंगे,

 इस पर जान गवांयेंगे,

 इसकी सीमाओं के रक्षक,

 वीर जवान जिन्दाबाद।

 हिन्दुस्तान जिन्दाबाद ।"

व्यास जी के दो ही काव्य संग्रह प्रकाशित हुए हैं- 'भाव तेरे शब्द मेरे' और 'हमारा घर'। *अब आवश्यकता इस बात की है कि उनकी सभी अप्रकाशित रचनाओं को संकलित कर प्रकाशित किया जाए ताकि युवा पीढ़ी उनसे परिचित हो सके और साहित्य में उन्हें स्थान दिलाया जा सके।


✍️ डॉ राजीव सक्सेना

डिप्टी गंज

मुरादाबाद 244001

उत्तर प्रदेश, भारत

मुरादाबाद की साहित्यकार स्मृतिशेष डॉ मीना कौल की छह रचनाएं ..…...


 (1)

सावन  की मत बात करो, इस कोरोना काल में

सावन भी सूखा जाएगा, इस कोरोना काल में।


सूने हैं  सुख के आँगन ,दुख की चादर है मैली

जीवन ह॔स है तड़प रहा  ,फँसा हुआ है जाल में।


घेवर फैनी मेंहदी चूड़ी , कैसे झूले गीत मल्हार

देवालय भी हैं बंद पड़े , इस अभागे साल में।


धरती का आँचल रीता ,अम्बर का दामन खाली

नहीं दिखती वो सौगातें ,जो सज जाएं  थाल में।


सखी सहेली रिश्ते नाते ,सिमट गए दरवाज़ों तक

आस लगी बस कदमों की ,जाने हैं किस हाल में। 


गरजते बादल बरसती बूंदे ,सावन का संगीत हैं

मन के मीना गीत हैं बिखरे, न सुर में न ताल में।


जीवन की उम्मीद है टिकी,जग के पालनहार पे

समेट ले ये उलझन सारी,गति भर दे चाल में।


(2)


आओ लिखें नई कहानी,हम देश को सजाने की,

न हो जिसमे राजा- रानी,न हो बात खजाने की।


ले अतीत से उजला सोना, वर्तमान को रचें सुनहरा

नीव में रखें अभिलाषा हम,भविष्य उच्च बनाने की।


अपनी मिट्टी अपना पानी,अपना घर अपना समाज

अपनी धरती आप चुनें हम,फसलें नई उगाने की।


चल सागर से मोती लाएं, अम्बर से तारे लाएं हम,

लिखें नाम हवाओं पर लें,सौगन्ध सुगंध फैलानेकी


सत्य अहिंसा करूणा क्षमा, चरित्र चेतना अनुशासन

जीवन शिक्षा हो संपादित ,सर्वत्र सर्वदा पढ़ाने की ।


अपनी माता अपनी भाषा,निज गौरव इसे बनाएं हम

बन जाएँ आदर्श भावना,सकल विश्व को सिखाने की


मन दर्पण पर जमी  हुईं ,भूलें सारी अब हटाएं हम

रखें सब पर समान दृष्टि ,वसुधैव कुटुंब बसाने की।


हम ही राष्ट्र के सजग प्रहरी,हम ही वीरों की संतान

बात नहीं करने देंगे कभी,निज देश को झुकाने की।


रंग  बिरंगे सुमन खिलें , यहाँ सतरंगी छटा निखरे

अपनी डगर बना मीना, हर दिल में समा जाने की।

   

(3)


वक्त के आगे किसी का जोर नहीं चलता

बड़े- बड़े सूरमाओं को हाथ मलते देखा है ।


खादी पहन देश भक्त होने का दम्भ भरता,

रेशम पहने देश द्रोह की राह चलते देखा है।


कहीं गरीब  के आँगन में चूल्हा नहीं जलता

कहीं दंगो की आग में गाँव जलते देखा है।


उम्र भर सूखा रहने  पर शिकवा नहीं करता

भूखे बच्चे की आह से पेड़ फलते देखा है।


हर पिता अपने अंदर बच्चे सा दिल रखता

आँच के अहसास से लोहा गलते देखा है।


दिल के पत्थर होने का जो खुद दावा करता

हमने उसकी आँख में आँसू पलते देखा है।


धन -वैभव ,रूप-रंग पर गर्व नहीं कभी करना

क्षण भंगुर धन की महिमा रूप ढलते देखा है।


सावित्री सा विश्वास अगर मन में हो जो बसता

कितना भी हो चाहे सख्त वक्त टलते देखा है।


मीना किसी के साथ भी बहुत नहीं घुलना

अपनो को अपनो के सपने छलते देखा है।


(4)


जिंदगी आजकल

कोरोना के खौफ में गुजर रही है

  हर कदम पर बीमारी

  एक नयी साजिश रच रही है।

  वायरस के बोझ से

  हर व्यवस्था कुचल रही है

  निर्दोषों की चीख से

  मानवता भी दहल रही है।

  महामारी की आग में

  हर इच्छा ही जल रही है

  दूर देश से उठी आग

  कितनी साँसें निगल रही है।

  आपसी सद्भाव पर

  संदेह की काली छाया पड़ रही है

  धर्म स्थल पर भी

  शत्रु की काली दृष्टि पड़ रही है।

  कौन है जिसने

  यह अवांछित कर दिया

अपने ही घर में

हमें असुरक्षित कर दिया।

आखिर कब तक

जिंदगी कोरोना के साए में गुजरेगी

आँखें कब तक

अपने सपनों को तरसेंगी।

कभी कभी लगता है

इसकी कोई दुआ जरूर आएगी

महामारी छोड़ पीछे

मीना जिंदगी आगे बढ़ जाएगी।।

  

(5 )

  तेरे कारण

तेरे कारण

कोरोना तेरे कारण

कितने दिन हो गए

काम पे नहीं गए

भूल गए सारे सपनों को

नजरबंद हो गए

तेरे कारण

कोई कितना भी लुभाए

निकलूँगी न मैं घर से

घर में ही बैठूँगी

कमरे बदल बदल के

दरवाजे पर गई

झांक के मैं आ गई

आग लगे इस वायरस को

दूर अपने हो गए

तेरे कारण

झाडू मैं जोर जोर से

सब घर के कोने कोने

फिर याद आया

बरतन भी हैं धोने

झट रसोईघर गई

काम सब कर गई

कूकर में चावल

मिक्सी में चटनी

फिर खाली हो गई

तेरे कारण

तेरे कारण

कोरोना तेरे कारण


(6)


भ्रष्टाचार का रावण बढ़ता जाता है। 

शिष्टाचार का राम नजर नहीं आता है ।। 

जब जब धर्म की हानि होगी

और बढ़ेगा अत्याचार 

तब-तब धर्म की रक्षा हेतु 

धरती पर होगा अवतार

 गीता का यह सार अखर-सा जाता है।

शिष्टाचार का राम नजर नहीं आता है ।।

 हाहाकार का रावण बढ़ता जाता है। 

 जै-जैकार का राम नजर नहीं आता है।।


देश कभी सोने की

चिड़िया कहलाता। 

भ्रष्ट आदमी खड़ा 

देखकर मुस्काता ।।

सोने का संसार बिखर-सा जाता है। 

शिष्टाचार का राम नज़र नहीं आता है ।।

 अपकार का रावण बढ़ता जाता है।

उपकार का राम नजर नहीं आता है।। 

देश की सत्ता पर जो

जम कर बैठे हैं।

रक्षक होकर भक्षक ही

बनकर ऐंठे हैं 

नेता का हर रूप बदल सा जाता है।

 शिष्टाचार का राम नजर नहीं आता है ।।

लूटमार का रावण बढ़ता जाता है। 

बलिदानों का राम नजर नहीं आता है ।।

नैतिकता के सारे

बन्धन तोड़ दिए

मानवता के सही

मायने छोड़ दिए।।

घोटालों का बाजार पनप सा जाता है।

शिष्टाचार का राम नजर नहीं आता है।

दुराचार का रावण बढ़ता जाता है।

 सदाचार का राम नजर नहीं आता है।

राष्ट्र के कर्णधार जहाँ 

संवरते     हैं

राजनीति के अड्डे वहाँ 

बिचरते     हैं

शिक्षा में व्यापार नजर-सा आता है।

शिष्टाचार का राम नजर नहीं आता है।।

अंधकार का रावण बढ़ता जाता है।

 उजियारों का राम नजर नहीं आता है

हाय व्यवस्था की अर्थ

पर रोते हैं। 

वही फसल तो काटेंगे

जो बोते हैं ।।

धरती का शृंगार उजड़ सा जाता है।

शिष्टाचार का राम नजर नहीं आता है ।। 

अंहकार का रावण बढ़ता जाता है। 

संस्कार का राम नजर नहीं आता है ।।

 बहुत सह लिया जनता ने

अब नहीं सहेगी

भ्रष्ट व्यवस्था की सत्ता 

अब नहीं रहेगी 

जनता में प्रतिकार नजर-सा आता है। 

चेतना में चमत्कार नजर-सा आता है ।।

अत्याचार का संहार नजर-सा आता है।

 भ्रष्टाचार में प्रहार नजर-सा आता है ।।

कोई अन्ना, राम, कृष्ण

बनकर आएगा

रावण औ कंस के सिर को

काट गिरायेगा ।।

अमृत का पारावार नजर-सा आता है।

 सृष्टि पर अवतार नजर-सा आता है ।।

भ्रष्टाचार का नाश नजर अब आता है। 

शिष्टाचार का राम नजर अब आता है ।। 

असत्य पर सत्य की

होकर विजय रहेगी

खड़ी अनीति की लंका

 सागर बीच बहेगी

खुशियों का त्यौहार नजर अब आता है। 

हर व्यक्ति में राम नजर अब आता है ।।


 ✍️✍️ डॉ मीना कौल , मुरादाबाद

गुरुवार, 15 अप्रैल 2021

मुरादाबाद की साहित्यिक संस्था राष्ट्रभाषा हिन्दी प्रचार समिति की ओर से 14 अप्रैल 2021 को ऑन लाइन काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया । प्रस्तुत हैं गोष्ठी में शामिल साहित्यकारों की रचनाएं -----

          (  एक )
वोट देने हेतु
आस्तीन से पसीना
पोंछता कतार में लगा
भारतीय नागरिक
अपने अधिकारों की लड़ाई
हर बार हारा है ।
वह कल भी
असहाय बेचारा था,
वह आज भी,
असहाय बेचारा है ।।

            ( दो )

तीन चौके पन्द्रह
का हिसाब बैठा कर ,
गुणा भाग कर।
कच्चा- पक्का
हिसाब आ गया।
मेरी गली का गुंडा
सत्ता पा गया ।।

           ( तीन )

जो मेरे पास है
वह तुम्हारे पास नहीं
फिर
हम एक क्यों नहीं हो जाते
जो तुम्हें चाहिए मैं दूंगा
जो मुझे चाहिए तुम दोगे
फिर बाद में
मैं करूँगा तुम्हारी भावनाओं
पर चोट ।
पहले मुझे चाहिए तुम्हारा
कीमती वोट ।।

✍️ अशोक विश्नोई, मुरादाबाद
         मो ० 9411809222
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तेरी बीती उम्र अब जात रे ,
तू क्यों करता उत्पात रे,।।
दैवयोग से मिली देह यह
जो अनमोल रत्न है ।
मानेगा ईश्वर अनुशासन
गर्भ में दिया वचन है ।
धन का लोभी अहंकार वश ,
करता अब क्यों घात रे ।।1 ।।
ओ अज्ञानी न कर नादानी
समय बहुत है थोड़ा
संयम के चाबुक से अब तो
रोक ले मन का घोड़ा ।
रहा दौड़ता यदि निरंकुश
बिगड़े, बनी यह बात रे ।। 2 ।।
मिली भाग्यवश मानव योनि
विगत पुण्य था तेरा ।
कलुष प्रमादी दुश्चिंतन ने
आकर तुझको घेरा ।
इस उर्वरा मनो भूमि पर
उगने दे जलजात रे ।।3 ।।
तू क्यों करता उत्पात रे ....

✍️डॉ प्रेमवती उपाध्याय, मुरादाबाद
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बाबा ने जग में दिया भारत को सम्मान
संबिधान रच कर किया जन-जन का कल्याण।

आगे बढ़ने की रही केवल मन में चाह
दुनियाँ को दिखला दिया कठिन न कोई राह।

हर-पल चुभता ही रहा छुआ-छूत का डंक
धरती से कैसे मिटे यह वीभत्स कलंक।

गहन सोच अध्य्यन किया तोड़ा कलुषित तंत्र
शिक्षा संग संघर्ष का दिया अनूठा मंत्र।

बिना परिश्रम के नहीं बन सकती कुछ बात
सारी दुनियां चलेगी तभी तुम्हारे साथ।

पहले करना सीख लो नारी का सम्मान
वरना संभव ही नहीं मानव का उत्थान।

नहीं असंभव कुछ यहाँ करलो तनिक विचार।
जो कठिनाई से डरा निष्चित उसकी हार।

सिर्फ साल में एक दिन आते बाबा याद
इसके पहले कुछ नहीं और न इसके बाद।

भेद-भाव को त्यागकर धरें सभी का ध्यान
ढोंग तपस्या त्याग कर जपें बुद्ध का नाम।

✍️वीरेंद्र सिंह ब्रजवासी, मुरादाबाद/उ, प्र,
मोबाइल फोन नम्बर 09719275453
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मुस्कानों के तिलक लगा कर आंसू का सत्कार करो
दुख सुख जो भी मिलें राह में सबको अंगीकार करो

दूर दूर तक द्वेष घृणा का फैल रहा है अँधियारा
रात अमावस की काली है नहीं तनिक है उजियारा
पहले बन कर दीप जलो तुम फिर तम पर अधिकार करो

फैशन की आंधी ने तोड़ीं लाज भरी मर्यादाएं
बढ़ती इच्छाओं ने ही दीं रोज़ नयी ये विपदाएं
छोटी छोटी खुशियों से ही स्वप्न बड़े स्वीकार करो

पैसे की खातिर रिश्तों ने रिश्तों का ही क़त्ल किया
ममता के आँचल को बेचा अहंकार का जाम पिया
भृष्ट आचरण के दानव का और नहीं विस्तार करो

✍️डॉ पूनम बंसल, मुरादाबाद
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अफसरशाही मस्त है, आम आदमी त्रस्त।
लेकिन तारणहार हैं, बस चुनाव में व्यस्त।।

कोरोना का देखिए, अजब गजब ये खेल।
रैली मेलों से सदा, ये रखता है मेल।।
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बहुत हो गया कोविड जी अब तो जाओ।
जाओ भी अब हठधर्मी मत दिखलाओ।।

कुछ दिन के मेहमान सरीखे आ जाते।
खाते पीते कुछ दिन और चले जाते।
लेकिन तुम तो तम्बू गाढ़े  बैठे हो।
पता नहीं तुम किस गुमान में ऐंठे हो।
सारे हैं हल्कान,  तरस कुछ तो खाओ।
बहुत हो गया कोविड जी अब तो जाओ ।

डेंगू और चिकनगुनिया भी आते हैं।
किंतु शराफत वह भरपूर दिखाते हैं।
थोड़े दिन मेहमाननवाजी करके वह।
फिर चुपचाप विदाई लेकर जाते हैं।
शिष्टाचार उन्हीं से आप सीख आओ।
बहुत हो गया कोविड जी अब तो जाओ

राजी से यदि नहीं गये, पछताओगे।
वैक्सीन से आप खदेड़े जाओगे।।
भारतवासी जिसके पीछे पड़ते हैं।
उसकी जड़ तक जाकर मट्ठा भरते हैं।
बुरे फँस गये भारत में अब पछताओ।
बहुत हो गया कोविड जी अब तो जाओ ।।

✍️ श्रीकृष्ण शुक्ल, मुरादाबाद
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हम देश के हर फैसले पर                                  एतराज जताते हैं
और तो और
अपनी ही हार पर
जश्न मनाते हैं
चोला हमने भले ही
पहन रखा है रंग बिरंगा
पर मन में हमारे
हमेशा रहता है हरापन
भूल जाते हैं सारे एहसान
खत्म करते रहते हैं अपनापन                            राह में कभी सीधा चलना नहीं भाता है
हमेशा उल्टा चलना ही सुहाता है
खाकर यहां का अन्न
गीत औरों का गाना आता है                                            

नहीं लिखते हम                                                   
भविष्य की सुनहरी इबारत
इतिहास के काले पन्नों  को ही

 हम दोहराते हैं 

वैसे हमें देश से बहुत प्यार है      

 अपने को ही देशभक्त कहलाते हैं

✍️ डॉ मनोज रस्तोगी
8,जीलाल स्ट्रीट
मुरादाबाद 244001
उत्तर प्रदेश, भारत
मोबाइल फोन नंबर 9456687822
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लोकतंत्र में लोग

सुना आपने!
लोग बोल रहे हैं
एक-एक कर
परतें खोल रहे हैं
अखबार सभी
और चैनल भी
देश में फिर से
कोरोना बढ़ रहा है
डर का एक नया
अध्याय गढ़ रहा है
अस्पताल मरीजों से भर रहे हैं
और आमलोग मर रहे हैं
कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है
हर कोई बस
अपने आप से जूझ रहा है
भयंकर तनाव हैं
लेकिन हम व्यस्त हैं
मस्त हैं
क्योंकि
कहीं विधानसभा के
तो कहीं पंचायत के
चुनाव हैं
बेशक
हर दिन हर पल
कम हो रही है
ज़िन्दगी और मौत के
बीच की दूरी
लेकिन आप ही बताओ
क्या और कुछ भी है
इस समय
चुनाव से ज़्यादा ज़रूरी
लोग जियें या मरें
हम क्या करें
हमारी नीयत में
कहाँ कोई खोट है
लेकिन यह भी तो सत्य है कि
लोकतंत्र में लोग
लोग नहीं
सिर्फ वोट हैं

✍️ योगेन्द्र वर्मा 'व्योम',मुरादाबाद
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सारी दुनिया में देश मेरा रंगीला है
इसका पावन इतिहास बड़ा गर्वीला है

हर कंकड़ कंकड़ में शंकर ,
डमरू ध्वनि जिनकी प्रलयंकर!
गल सजती सर्पों की माला,
तन पर लिपटी है मृगछाला ।
बिष पीकर  जिनका कंठ हो गया नीला है
सारी दुनिया में देश मेरा रंगीला है।।

अरुणोदय सर्वप्रथम होता !
पश्चिम दिश रवि निशदिन सोता।
उत्तर हिमपर्वत वर विशाल
भारत माता का सजा भाल।।
दक्षिण  सागर उत्ताल लहर नखरीला है
सारी दुनिया में देश मेरा रंगीला है

कबिरा, रहीम के दोहों में।
कवि सूरदास आरोहों में।
तुलसी  मानस में रचा बसा,
मीरा के पद में प्रेम पगा !
दिनकर शोलों सम  प्रखर ओज भड़कीला है
सारी दुनिया में देश मेरा रंगीला है।।

रक्तिम दरिया तूफानी है।
लक्ष्मी बाई मर्दानी  है।
सुखदेव, भगतसिंह,राजगुरु
आजाद खौलता यहां लहू।।
मंगलपांडे सा यौद्धा छैल छबीला है।
सारी दुनिया में देश मेरा रंगीला है।।

✍️ अशोक विद्रोही,412प्रकाशनगर, मुरादाबाद
मोबाइल फोन 8218825541
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सुनो!
ओ मेरे जन्मों के साथी
मैं कभी साध न सकी
षडज
ऋषभ
गांधार
मध्यम
पंचम
धैवत
निषाद
आदि सात सुरों को
अपने स्वर में,
नहीं कर पायी इनकी साधना।
लयभंग इस जीवन में,
लय से हीन ही रही मेरी वाणी।
मेरे इस अतुकान्त जीवन को
न मिल सकी कभी कोई तुक
#साहित्य_संगीत_कला_विहीन मुझे,
केवल तुम्हारे प्रेम की मर्यादाओं ने,
#पुच्छ_विषाण_हीन
होते हुए भी,
पशु होने से बचाये रखा
हां बचाये रखा है
मुझे पशु होने से.....।

✍️रचना शास्त्री, मुरादाबाद
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अरे चीं-चीं यहाँ आकर, पुनः हमको जगा देना।
निराशा दूर अन्तस से, सभी के फिर भगा देना।
चला है काटने को जो, भवन का मोकला सूना,
उसी में नीड़ अपना तुम, मनोहारी लगा देना।
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चली सुनामी पाप की, ऐसी आज प्रचण्ड।
कब गरजेगा राम जी, पुनः धनुष कोदण्ड।।
(भगवान श्रीराम का धनुष 'कोदण्ड' नाम से जाना जाता है।

रैन बसेरा जग भया, जीवन ढालती शाम।
नटखट पंछी प्राण के, चल कर ले विश्राम।।

प्यासे को संजीवनी, घट का शीतल नीर।
दम्भी सागर देख ले, तू कितना बलवीर।।

कहें कलाई चूम कर, राखी के ये तार।
तुच्छ हमारे सामने, मज़हब की दीवार।।

पंछी दरबे में पड़ा, हुआ बहुत हैरान।
भीतर से ही सुन रहा, आज़ादी का गान।।

वहशी-चोर-बिचौलिये, गुण्डे-झोला छाप।
कुर्सी तेरी गोद में, हुए सभी निष्पाप।।

✍️राजीव 'प्रखर', मुरादाबाद
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बहाना ढूँढ लिया तुमको रँग लगाने का,
मिला नसीब से मौक़ा क़रीब आने का

चले भी आओ कि होली भी पास आयी है,
खुला  है दर  सदा  मेरे  ग़रीबखाने का

ज़रा सी बात पे यूँ रूठना नहीं अच्छा
हसीन प्यार का मौसम है मुस्कुराने का,

भुला दो रंजिशे तक़रार में क्या रक्खा है
मिलाओ दिल, यही है वक़्त मान जाने का

दिखा है चाँद भी पूनम का बाद मुद्दत के
तेरा भी आज का वादा था छत पे आने का।

✍️ मीनाक्षी ठाकुर, मुरादाबाद
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ग़म के बाज़ार में खड़ा शायर
बेचे खुशियों की हर अदा शायर

आईना वक्त का हुआ शायर
मीर ओ गालिब सा हर बड़ा शायर

अपने लफ़्ज़ों में घोलकर मरहम
ग़म के मारों को दे शिफा शायर

दर्दो- गम देखकर ज़माने के
अपने अश्कों को पी गया शायर

स्वाद इसने  भी चख लिया ग़म का
दिल यह अपना भी हो गया शायर

मंच पर चुटकुले सुनाता है
दौर ए हाजिर का सिरफिरा शायर

ग़म की मुश्किल रदीफ़ से "मासूम"
क़्वाफ़ी ए दिल लगा रहा शायर

✍️ मोनिका मासूम,मुरादाबाद
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कब तक घर में कैद रहेंगे ,काम जरूरी करने होंगे।
लड़ते लड़ते इस वायरस से  विजय शिखर छूने होंगे।
सच्चा मित्र वही है जो आरसी रास्ता सही दिखाए।
विपदा के आते ही जो उससे हमें बचाए ।
कठिन घड़ी में हमने अपने मित्र दो बनाए।
जंग है नन्हे से वायरस से इसने बहुत सताए।
इसके भय से हमको अपने प्राण नहीं  खोने होंगे।
लड़ते- लड़ते इस वायरस से विजय शिखर छूने होंगे।
आज कोरो ना का संकट सारी दुनिया में गहराया।
देखो छोटे से वायरस ने कैसा कोहराम मचाया।
भारत अक्सर अपने दम पर विश्व गुरु है कहलाया।
कठिन रास्तों पर चलकर ही परचम फहराया।
आत्मसुरक्षा की खातिर कुछ ठोस कदम रखने होंगे।
कब तक घर में कैद रहेंगे ,काम जरूरी करने होंगे।
  लड़ते -लड़ते इस वायरस से विजय शिखर छूने होंगे।
  मास्क ,ग्लब्स से पहले हमको मीत साथ दो रखने होंगे।
अपने -अपने मोबाइल में कैद हमें यह करने होंगे।
   आरोग्य सेतु और भैया आयुष कवच  मनोहर होंगे।
    जब हम घर से बाहर होंगे।
    सच्चे पहरेदार ये  होंगे।
    जैसे ही संक्रमित व्यक्ति आसपास मंडराएगा ।
    मित्र आरोग्य सेतू हमारा चौकन्ना हो जाएगा।
    साथ हो ऐसा मित्र हमारे तो क्यों हम घबराए ।
    विपदा के आते ही जो उससे हमें बचाए।
    आयुष भैया कवच बनेंगे और हमको सिखलाएंगे।
    कैसी होगी दिनचर्या आहार-विहार समझाएंगे।
    योगा -प्राणायाम ,आहार कैसा कब कब खाएंगे।  प्रतिरक्षा शक्ति को बढ़ा हम विश्व गुरु कहलाएंगे।।
  कोरोना की जंग में एक दिन निश्चित ही विजयी होंगे।       कब तक घर में कैद रहेंगे,काम जरूरी करने होंगे।
  आज अभी संकल्पित हों सब, 
  घर से बाहर रखेंगे तब पग।          
  अपने -अपने मोबाइल में डाउनलोड करना होगा।   आरोग्य और आयुष कवच साथ रोज रखना होगा।           रेखा देखना भारत एक दिन सिरमौर अपना होगा।   
   कब तक घर में कैद रहेंगे , ख्वाब पूर्ण करने होंगे ।
  
✍️ रेखा रानी , विजयनगर गजरौला
जनपद अमरोहा।
------------------------------


बात इस दिल की बताने हम भला जाते कहाँ।
जो रखे पिन्हा गमों को हमसफ़र पाते कहाँ  ll1ll

दिल सुनें दिन रात जब तन्हा सदाएं प्यार की।
शोर रूखी महफ़िलों के यार तब भाते कहाँ ll2ll

अन्जुमन उज़डा हुआ था शाख हर  ग़मगीन थी।
गीत उस माहौल में हम प्रीत के गाते कहाँ   ll3ll

वक़्त कुछ देना मुनासिब भी नहीं समझा मुझे
फिर भला नज़दीक दिल के वह कभी आते कहाँ ll4ll

  बेवज़ह ही सोचकर यह मुस्कुराते हम रहे।
  ज़र्ब दिल के भीड में हम यार सहलाते कहाँ ll5ll
                       
✍️  प्रीति चौधरी, गजरौला,अमरोहा
  --------------------------



जिंदगी रंग हर पल बदलती रही।
साथ गम के ख़ुशी रोज़ चलती रही।।

शम्अ जो राह में तुम जला के गये।
आस में आपकी बुझती जलती रही।।

रिफ़अतें जो जहाँ में अता थी मुझे।
रेत सी हाथ से वो फिसलती रही।

क्या कहूँ दोस्तों दास्ताँ बस मिरी।
शायरी बनके दिल से निकलती रही।।

जो खिली रौशनी हर सुबह जाने क्यों।
शाम की आस में वो मचलती रही।।

क्या बचा अब है 'आनंद' इस दौर में।
लुट गया सब कलम फिर भी चलती रही।।

✍️अरविंद कुमार शर्मा "आनंद"
मुरादाबाद (यू०पी०)
8979216691
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कोरोना फिर से लौट आया
सब के दिलों में फिर डर बैठाया।

स्कूल बंद करवा दिये
परिक्षा को टलवा दिया।

शादी समारोह कम होगें
भीड़ भाड़ से सभी बचेंगे।

मास्क पहनना जरूरी
वर्ना चालान कटने की मजबूरी।

साफ़ सफाई रखिये सब
घर बाहर आस पास।

सैनेटाजर का इस्तेमाल करना साथ
तभी मिलना किसी से हाथ।

मत दान भी करना जरूरी
पंक्तियों में रहे दो गज दूरी।

माता से करो सभी प्रार्थना
कोरोना का मिटा दो नाम निशा मां।।

✍️ चन्द्र कला भागीरथी धामपुर जिला बिजनौर
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आओ लौट चलें हम  निज
सभ्यता संस्कृति की  ओर ।

दोनों  हाथ  जोड़कर   ही
अभिवादन  सत्कार   करें,
छोड़  बहिर्मुखता  अपनी
अंतर्मुखता  से प्यार  करें,
हाथ  गले  न  मिलें  मिले
दिल  बंधे   प्रेम  की  डोर ।

आया है बस एक अकेला
जाना   भी   है ‌   अकेला,
बंद करें महफिल बाजारी
बंद   माल   और    मेला,
संयम  और  सहयोग   से
कट जायेगा संकट घनघोर ।

हो   आशा    का    संचार
नकारी   ऊर्जा   होवे  दूर,
नित  प्रति   यज्ञ   आहुति
घर में  समिधा और कपूर,
तुलसी और  गिलोय   का
सेवन जीवन स्वस्थ विभोर ।

क्रोध  दंड  संकेत  प्रकृति
का  रुप  है   ये  महामारी,
जीव   हिंसा  रस   विषय
बंद बनो  शुद्ध शाकाहारी,
क्षमा  मांगने  मां   प्रकृति
के आंचल का पकड़ो छोर ।

आओ लौट चलें हम निज ,
सभ्यता संस्कृति की ओर ।।

✍️शुचि शर्मा, शेरकोट
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आओ ! सिंहनाद करें
जन-गण-मन का भाव लिए
शुद्र-निर्बल साथ लिए,
मानवता का व्रत ह्रदय में
“वंदेमातरम्” कहकर
देशप्रेमियों का सत्कार करें,
आओ.....! सिंहनाद करें ।।२।।
खुलेद्वार “गिद्ध” न झाँके
विश्वासघात की रूह काँपे
स्वपन में न दर्पण ताकें,
शत्रु ह्रदय प्रति-साँस
“भारत माता” की जय-जय कार करें
आओ...! सिंहनाद करें ।।३।।   

✍️ प्रशान्त मिश्र
राम गंगा विहार, मुरादाबाद
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दोपहर में दिन, सुनहरा हो जाता है
बरसात में खेत, हरा भरा हो जाता है
पति कितना भी, बड़ा पहलवान हो
बीवी के सामने, अधमरा हो जाता है

✍️नजीब सुल्ताना
प्रेम वंडरलैंड, मुरादाबाद
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