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शनिवार, 20 दिसंबर 2025

मुरादाबाद के साहित्यकार स्मृतिशेष आनंद कुमार गौरव के दो गीत ...। ये प्रकाशित हुए हैं युगांशु मालवीय के संपादन में भोपाल से प्रकाशित मासिक पत्रिका शिवम् पूर्णा के अप्रैल - मई 2015 (वर्ष 6, अंक 2-3)अंक में पेज 35 पर ...

 




मुरादाबाद मंडल के जनपद बिजनौर निवासी साहित्यकार डॉ अजय जनमेजय के दो गीत ...। ये प्रकाशित हुए हैं युगांशु मालवीय के संपादन में भोपाल से प्रकाशित मासिक पत्रिका शिवम् पूर्णा के जून 2015 (वर्ष 6, अंक 4)अंक में पेज 18 पर ...


 

मुरादाबाद के साहित्यकार स्मृतिशेष माहेश्वर तिवारी के दो नवगीत...। ये प्रकाशित हुए हैं युगांशु मालवीय के संपादन में भोपाल से प्रकाशित मासिक पत्रिका शिवम् पूर्णा के जून 2015 (वर्ष 6, अंक 4)अंक में ...

 




मुरादाबाद के साहित्यकार स्मृतिशेष माहेश्वर तिवारी और उनके सात गीत ...। ये प्रकाशित हुए हैं सरिता सक्सेना के सम्पादन में दिल्ली से प्रकाशित पाक्षिक पत्रिका दुनिया इन दिनों के 1 सितम्बर से 15 सितम्बर 2016 (वर्ष 3, अंक 5) अंक में पेज 56-57 पर

 



मंगलवार, 18 नवंबर 2025

मुरादाबाद के साहित्यकार दुष्यंत बाबा के इक्कीस दोहे .....



 मित्र  मंडली   को  जगी,  वृंदावन  की  प्रीत।

अजित सचिन के साथ में, दुष्यंत रवि विनीत।।1।।

भक्ति रस में डूब कर, खूब किया आनन्द।

देखे   केलि   कुँज  में,  बाबा    प्रेमानन्द।।2।।

राधा-मोहन के निकट, देख  कालिया घाट।

कुंज गलिन में देखिए, ठाकुर जी  के ठाठ।।3।।

 राधा बल्लभ लाल की, लीला बड़ी विचित्र।

जैसी  नजरें  भक्त की, वैसा दिखता चित्र।।4।।

बांके बिहारी लाल के, दर्शन मिले अनूप।

श्याम सलोने गात में, अद्भुत सुंदर रूप।।5।।

 निकुंज  वट की  छाँव  में, बैठे भोलेनाथ।

वहीं रुद्र अष्टक किया, हम पाँचों ने साथ।।6।।

राधारमण जी हमसे, मिले सदा नाराज।

पल भर की देरी हुई, फिर से चूके आज।।7।।

 निधिवन में निधियाँ झुका, वृंदा करतीं रास।

पग-पग राधा-कृष्ण का, होता  है आभास।।8।।

 धूप  दीप  नैवेद्य  ले, अंतस किया अमान।

फिर नौका में बैठकर, किया दीप का दान।।9।।

 इस इमली के पेड़ से, लोग हुए अनजान।

महाप्रभु  चैतन्य  ने, फिर  से दी पहचान।।10।।

 महारास   से    हो   गईं,   राधा   अंतर्ध्यान।

इमली तले ही बैठकर, किया कृष्ण ने ध्यान।।11।।

 यमुना  जी  में  तैरतीं, तल-तर  तरणीं तीर।

कल-कल करतीं आचमन, खारा-खारा नीर।।12।।

 यहाँ  बैठकर  देखिए, उदय  मध्य अवसान।

कितना कल-युग मुक्त है, यह टटिया स्थान।।13।।

भूख लगी थी जोर से, लंगर  छका  अमान।

दान दक्षिणा  भेंट  कर, किया शेष प्रस्थान।।14।।

अकबर दर्शन  के लिए, पहुँचा जिनके धाम।

ऐसे  वाद्य   प्रवीन   थे,  हरिदासी  उपनाम।।15।।

जहाँ नही है आज भी, कल-युग का सम्मान। 

वृंदावन   के  बीच  में, है इक टटिया स्थान।।16।।

 देख  देवरहा  संत  का, यमुना  तीर  मचान।

चंचल मनवा कह उठा, फीके महल मकान।।17।।

ऊँचे  इसी   मचान   को, करके  राधे-श्याम।

फिर से  आगे  बढ़ गए, हम पाँचों अविराम।।18।।

सकल  वर्णनातीत  है, श्री  वृंदावन धाम।

गोपी-गोपी राधिका, बच्चा-बच्चा श्याम।।19।।

अगणित गौ के आश्रम, अगणित सेवा धाम।

अगणित सेवा संत की, अगणित ही घनश्याम।।20।।

लगा ब्रजरज भाल पर, चखा भक्ति का चूर्ण।

निकट गौरी-गोपाल के, परिक्रमा की पूर्ण।।21।।

 ✍️ दुष्यंत बाबा

मुरादाबाद 244001

उत्तर प्रदेश, भारत

सोमवार, 27 अक्टूबर 2025

मुरादाबाद के साहित्यकार स्मृतिशेष माहेश्वर तिवारी का गीत ...आज तुमको देखकर /ऐसा लगा/ संगमरमर बोलता भी है... । यह प्रकाशित हुआ है योगेन्द्र मोहन के सम्पादन में कानपुर से प्रकाशित मासिक पत्रिका कंचनप्रभा के जनवरी 1976 अंक में पेज 62 पर (वर्ष 2, अंक 4)

 




मुरादाबाद मंडल के जनपद अमरोहा ( बाद में मुंबई निवासी) के साहित्यकार स्मृतिशेष म न नरहरि ( महेंद्र नाथ नरहरि) का नवगीत ...खुशबू और आंसू । यह प्रकाशित हुआ है मुरलीधर पांडेय के सम्पादन में मुम्बई से प्रकाशित त्रैमासिक हिन्दी डाइजेस्ट संयोग साहित्य के अक्टूबर- दिसम्बर 2007 के अंक में पेज 60 पर (वर्ष 10, अंक 4)

 



मुरादाबाद के साहित्यकार स्मृतिशेष शिव अवतार सरस का बाल गीत ...कौआ और उल्लू । यह प्रकाशित हुआ है मुरलीधर पांडेय के सम्पादन में मुम्बई से प्रकाशित त्रैमासिक हिन्दी डाइजेस्ट संयोग साहित्य के अक्टूबर- दिसम्बर 2007 के अंक में पेज 70 पर (वर्ष 10, अंक 4)

 




शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2025

मुरादाबाद के साहित्यकार स्मृतिशेष माहेश्वर तिवारी के तीन नवगीत । ये प्रकाशित हुए हैं वीरेंद्र कुमार जैन के सम्पादन में बम्बई(मुम्बई) से प्रकाशित मासिक पत्रिका नवनीत के सितम्बर 1982 (वर्ष 31, अंक 9) अंक में ....

 






मुरादाबाद के साहित्यकार स्मृतिशेष माहेश्वर तिवारी का नवगीत ...इतना छोटा सा/आकाश मिला/हम अपने पंख कहां खोलें !.... यह गीत प्रकाशित हुआ है मुजफ्फरपुर से जानकी बल्लभ शास्त्री के सम्पादन में प्रकाशित पत्रिका बेला के मार्च-अप्रैल 1986 (वर्ष 5, अंक 3-4, पूर्णांक 51) अंक में .....






सोमवार, 20 अक्टूबर 2025

मुरादाबाद के साहित्यकार श्रीकृष्ण शुक्ल के दस दोहे


घोर अमावस की निशा छिपा रही मुख आज।

जगमग है दीपावली, उसको आती लाज।।1।।


ज्यों दीपों की ज्योत से मिटे धरा का शोक।

ऐसे ही करते रहें जग भर में आलोक।।2।।


दीप देहरी पर सखे, करें प्रज्वलित आप।

धन्वंतरि काटें सभी, पाप ताप, संताप।।3।।


जो समर्थ हैं बाल दें, दीपक कई हजार।

घना ॲंधेरा दूर हो, जगमग सब संसार।।4।।


कोना कोना झाड़ कर, स्वच्छ करें घर द्वार।

मन के नरकासुर मिटें, खुशियां मिलें हजार।।5।।


दीप और रंगोलियां,  तोरण वंदनवार।

लक्ष्मी स्वागत हेतु सब, सजे हुए घर द्वार।।6।।


मात्र कनिष्ठा पर उठा, गोवर्धन गिरि राज।

कौतुक लीलाधर किया, हर्षित गोप समाज।।7।।


मिल जुलकर सबने लिया, अन्नकूट का भोग।

सिखा दिया  श्रीकृष्ण ने, समरसता का योग।।8।।


यमुना के घर यम गये, हुआ खूब सत्कार।

भगिनी को निज बंधु से, मिला प्यार उपहार।।9।।


सुख संपति वैभव बढ़े, और बढ़े व्यापार।

मंगलमय हो आपको, दीपों का त्योहार।।10।।


✍️ श्रीकृष्ण शुक्ल

T-5/1103

आकाश रेजीडेंसी एपार्टमेंट्स

आदर्श कालोनी, कांठ रोड

मुरादाबाद 244001

उत्तर प्रदेश, भारत

मुरादाबाद मंडल के जनपद रामपुर निवासी साहित्यकार ओंकार सिंह विवेक के छह दोहे


बना लिया  जिनको  यहाँ, निर्धनता ने  दास।

धनतेरस  पर हो भला, उनमें  क्या उल्लास।।1।।


खील-बताशे-फुलझड़ी, दीपों  सजी   क़तार।

ले   आई   दीपावली, कितने   ही   उपहार।।2।।


हो   जाये   संसार   में, निर्धन  भी   धनवान।

लक्ष्मी  माता   दीजिए, कुछ  ऐसा   वरदान।। 3।। 


हो   जाये    संसार   में, अँधियारे   की   हार।

भर  दे  यह  दीपावली, हर मन  में उजियार।। 4।।


निर्धन  को  देें वस्त्र-धन, खील  और  मिष्ठान।  

उसके मुख  पर भी सजे, दीपों  सी मुस्कान।। 5।।  


दीवाली   के    दीप   हों, या   होली  के   रंग।

इनका आकर्षण  तभी, जब हों प्रियतम संग।।6।।


✍️ओंकार सिंह विवेक

रामपुर

उत्तर प्रदेश, भारत 

मुरादाबाद मंडल के जनपद अमरोहा की साहित्यकार शशि त्यागी के दस दोहे ...


दीपक  राह  निहारते,  है   अँधियारी  रात।

सबसे पहले सुमर लें,गणपति जी की बात।।1।।


अंतर्मन गणपति बसा, जीमे  छप्पन  भोग।

मोदक  सोहे  हाथ  में, कैसा  शुभ  संयोग।।2।।


राम चरित मानस भला,सु रचित तुलसी संत।

जन -मन की पीड़ा हरे, करें  कष्ट  का  अंत।।3।।


इस  अंधेरी  रात  में,  दीप  दिखाता  राह।

सुमिरन हो श्री राम का, कष्टों का  हो  दाह।।4।।


श्वास -श्वास में  राम  हैं, तन में  मन में  राम।

हर पल मन यह गा रहा,राम नाम अविराम।।5।।


राम नाम  विश्वास  है, सुमिरन  का  आधार।

राम नाम  की  नाव से, भव सागर  हो पार।।6।।


दीप कहो दीपक कहो, या कहो शुभ चिराग।

उर  सदा  उल्लसित  रहे, गूंँजे  जीवन  राग।।7।।


सूनि   देहरी   साजते, जलते   बाती   तेल।

जलते दीपक कह रहे,बिछड़ों का हो मेल।।8।।


पिता तुल्य इह लोक में, अन्य नहीं इनसान।

हर बालक के मन बसा, यथा होत भगवान।।9।।


सारी  धरती  गेह   है, अंबर  तक  फैलाव।

मानवता  अपनाइए, तब ही  होत  लगाव।।10।।

✍️शशि त्यागी 

अमरोहा

उत्तर प्रदेश, भारत

मुरादाबाद जनपद के बिलारी निवासी साहित्यकार नवल किशोर शर्मा नवल का गीत ....आओ तम को दूर भगायें

 


दीप प्रज्ज्वलित करके यारो,

आओ तम को दूर भगायें।

अन्तर्मन को करें प्रकाशित,

जन-जन में जागृति हम लायें।


मन के कलुषित पाप मिटेंगे,

द्वेष कुहासा छट जायेगा।

जीवन है अनमोल धरा पर,

हर बन्धन फिर कट जायेगा।


मुक्त कण्ठ से गीत खुशी के,

आओ सब मिलजुलकर गायें।

दीप प्रज्ज्वलित करके यारो 

आओ तम को दूर भगायें।


सुख,समृद्धि अरु खुशहाली का

सूर्य उदय होगा घर-घर में।

निर्धन की किस्मत चमकेगी

खूब धान्य होगा हर कर में।


मुस्काते बच्चों के चेहरे,

उछल-कूद करते इतरायें।

दीप प्रज्ज्वलित करके यारो,

आओ तम को दूर भगायें।


चौदह बरस बाद फिर रघुवर 

लौटेंगे अपने महलों में।

वनवासी कष्टों को सहकर

दुष्ट दलन कर कठिन पलों में।


सभी नगरवासी खुश होकर

स्वागत में हँस दीप जलायें।

दीप प्रज्ज्वलित करके यारो

आओ तम को दूर भगायें।


✍️नवल किशोर शर्मा नवल 

बिलारी 

जनपद मुरादाबाद

उत्तर प्रदेश, भारत


मुरादाबाद के साहित्यकार ओंकार सिंह 'ओंकार' की सजल ......आज तो दीपावली है ....


दीप-शोभा को निरखकर, खिल गई मन की कली है। 

हर तरफ दिखता उजाला, आज तो दीपावली है।।


हो रहे बच्चे मगन सब,  छोड़कर वे बम पटाखे। 

फुलझड़ी को छोड़ने की, होड़ अब उनमें चली है।। 


झालरें अब टँग रही हैं, द्वार, घर, दीवार पर। 

रोशनी से जगमगाती, दिख रही सुंदर गली है।। 


बन रहे पकवान घर-घर, गृहणियाँ मिलकर बनातीं, 

एक पूड़ी बेलती है,  दूसरी ने फिर तली है।। 


बेटियाँ आँगन सजातीं,  खींचकर सुंदर रँगोली। 

दिख रहा सुंदर अधिक है, घर जहाँ छोटी लली है।। 


पूजते 'ओंकार' मिलकर, आज देवी लक्ष्मी को। 

स्वच्छ मन से पूजता जो, लक्ष्मी उसको फली है।।

 

✍️ओंकार सिंह 'ओंकार' 

मुरादाबाद 244001

भारत, उत्तर प्रदेश

रविवार, 14 सितंबर 2025

मुरादाबाद के साहित्यकार वीरेन्द्र सिंह बृजवासी का गीत ......अपनी प्यारी हिन्दी


झूठ-मूठ  ही क्यों खाते हो,

हिन्दी        की       सौगंध?

अंग्रेजी संग खुश रहने का,

किया      स्वयं  अनुबंध !


अपनी माँ को माँ कहने से,

डर     क्यों      लगता    है?

हिन्दी   की  गोदी  में  बैठो,

मिट     जाएं    सब  फंद !


हिन्दी  भाषा सबकी भाषा,

सकल   विश्व    में   व्याप्त,

सब भाषाओं की जननी है,

तनिक    न    इसमें  द्वन्द्व !


लिखने-पढ़नेमें रुचिकर है,

अपनी      प्यारी      हिन्दी,

बसी हुई सबके मन में ज्यों,

फूलों         में     मकरंद !


माँ का पहलाशब्द सभीको,

हिन्दी          ने         सौंपा,

केवल हिन्दी  में  बसता  है,

ममता       का     आनंद !


सबको साथमें लेकर चलती,

रखे     न    मन     में    मैल,

हिन्दी के बिन  पूर्ण  न  होते,

गीत,   गजल      के    बंद !


हिन्दी पढ़ो पढ़ाओ जग  को,

बांटो          यह       सौगात,

सच कहता हूँ कभी न होगी,

हिन्दी     की     गति  मंद !


विश्व   हिन्दी  दिवस   हमारा,

पावनतम       उत्सव       हो

सदियों-सदियों तक महकेगी

पावन        हिन्दी       गंध !

    

✍️ वीरेन्द्र  सिंह "ब्रजवासी"

मुरादाबाद 244001

उत्तर प्रदेश, भारत

मोबाइल फोन नम्बर 9719275453

                

मुरादाबाद मंडल के कुरकावली (जनपद संभल) के साहित्यकार त्यागी अशोका कृष्णम् की घनाक्षरी.



आंचल में भरे हुए,ढेर सारे हीरे मोती।

भाव प्रेम भरा हुआ, विजय उद्घोष है।

बिहारी का कृष्ण प्रेम,जायसी की नागमती।

मीरा की दीवानगी है,भूषण का रोष है।

भाल ऊंचा किए हुए,सीना तान खड़ी हुई।

संस्कृत की प्रिय पुत्री,नहीं पितृ दोष है।

दुनिया में भाषा बोली,बोली जाती चाहे जो भी।

भाषा हिंदी प्रिय बड़ी, बड़ा शब्द कोष है।


✍️त्यागी अशोका कृष्णम्

कुरकावली,संभल

उत्तर प्रदेश, भारत

मंगलवार, 22 जुलाई 2025

मुरादाबाद के साहित्यकार स्मृतिशेष माहेश्वर तिवारी की याद में भोपाल के साहित्यकार मनोज जैन का गीत ...



याद माहेश्वर तिवारी जी हमें,

अब आ रहे हैं।


हों जहाँ भी वहीं महफ़िल, 

लूट लेते थे।

आरोह या अवरोह में कब, 

छूट लेते थे।


हैं जहाँ भी इस समय वह मगन,

हो मुस्का रहे हैं।

याद माहेश्वर तिवारी जी हमें,

अब आ रहे हैं।


प्रेम रस के थे पुजारी,

प्रेम करते थे।

बोल हों ज्यों मोंगरे के,

फूल झरते थे।


गीत गजलों में पराई वेदना,

को गा रहे हैं।

याद माहेश्वर तिवारी जी हमें,

अब आ रहे हैं।


वह समय की नब्ज़ पर, 

रख हाथ गाते थे।

गीत की संवेदना में,

देश लाते थे।


मार्गदर्शक बन सभी को 

राह नव,

दिखला रहे हैं।

याद माहेश्वर तिवारी ,

जी हमें,

अब आ रहे हैं।


✍️ मनोज जैन, 

संस्थापक संपादक 

समूह / ब्लॉग वागर्थ 

106 विट्ठलनगर

गुफ़ामन्दिर रोड लालघाटी 

भोपाल 462030 

मध्य प्रदेश,भारत