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मंगलवार, 18 नवंबर 2025

मुरादाबाद के साहित्यकार दुष्यंत बाबा के इक्कीस दोहे .....



 मित्र  मंडली   को  जगी,  वृंदावन  की  प्रीत।

अजित सचिन के साथ में, दुष्यंत रवि विनीत।।1।।

भक्ति रस में डूब कर, खूब किया आनन्द।

देखे   केलि   कुँज  में,  बाबा    प्रेमानन्द।।2।।

राधा-मोहन के निकट, देख  कालिया घाट।

कुंज गलिन में देखिए, ठाकुर जी  के ठाठ।।3।।

 राधा बल्लभ लाल की, लीला बड़ी विचित्र।

जैसी  नजरें  भक्त की, वैसा दिखता चित्र।।4।।

बांके बिहारी लाल के, दर्शन मिले अनूप।

श्याम सलोने गात में, अद्भुत सुंदर रूप।।5।।

 निकुंज  वट की  छाँव  में, बैठे भोलेनाथ।

वहीं रुद्र अष्टक किया, हम पाँचों ने साथ।।6।।

राधारमण जी हमसे, मिले सदा नाराज।

पल भर की देरी हुई, फिर से चूके आज।।7।।

 निधिवन में निधियाँ झुका, वृंदा करतीं रास।

पग-पग राधा-कृष्ण का, होता  है आभास।।8।।

 धूप  दीप  नैवेद्य  ले, अंतस किया अमान।

फिर नौका में बैठकर, किया दीप का दान।।9।।

 इस इमली के पेड़ से, लोग हुए अनजान।

महाप्रभु  चैतन्य  ने, फिर  से दी पहचान।।10।।

 महारास   से    हो   गईं,   राधा   अंतर्ध्यान।

इमली तले ही बैठकर, किया कृष्ण ने ध्यान।।11।।

 यमुना  जी  में  तैरतीं, तल-तर  तरणीं तीर।

कल-कल करतीं आचमन, खारा-खारा नीर।।12।।

 यहाँ  बैठकर  देखिए, उदय  मध्य अवसान।

कितना कल-युग मुक्त है, यह टटिया स्थान।।13।।

भूख लगी थी जोर से, लंगर  छका  अमान।

दान दक्षिणा  भेंट  कर, किया शेष प्रस्थान।।14।।

अकबर दर्शन  के लिए, पहुँचा जिनके धाम।

ऐसे  वाद्य   प्रवीन   थे,  हरिदासी  उपनाम।।15।।

जहाँ नही है आज भी, कल-युग का सम्मान। 

वृंदावन   के  बीच  में, है इक टटिया स्थान।।16।।

 देख  देवरहा  संत  का, यमुना  तीर  मचान।

चंचल मनवा कह उठा, फीके महल मकान।।17।।

ऊँचे  इसी   मचान   को, करके  राधे-श्याम।

फिर से  आगे  बढ़ गए, हम पाँचों अविराम।।18।।

सकल  वर्णनातीत  है, श्री  वृंदावन धाम।

गोपी-गोपी राधिका, बच्चा-बच्चा श्याम।।19।।

अगणित गौ के आश्रम, अगणित सेवा धाम।

अगणित सेवा संत की, अगणित ही घनश्याम।।20।।

लगा ब्रजरज भाल पर, चखा भक्ति का चूर्ण।

निकट गौरी-गोपाल के, परिक्रमा की पूर्ण।।21।।

 ✍️ दुष्यंत बाबा

मुरादाबाद 244001

उत्तर प्रदेश, भारत

सोमवार, 12 मई 2025

मुरादाबाद के साहित्यकार दुष्यंत बाबा की कविता....सैनिक का शौर्य


हम भारत के शूर समर में

भीषण विध्वंस मचाते हैं

आँख उठे भारत माता पर

हम अपना शौर्य दिखाते हैं


भारत की यह पावन माटी,

यहाँ बच्चा-बच्चा वीर है

मत समझो इन्हें तृण अकिंचन

यहाँ तिनका-तिनका तीर है

तनक हवा का मिले इशारा

आंखों में घुस जाते हैं


ठहरे हुए सिंधु में तूने

पहले पत्थर मारा है

मौत मिली उसको ही निश्चित

जो हम से टकराया हैं

अब लहरों की रोक सुनामी

हम तेरे तट पर आते हैं


धर्म नही सिखलाता हिंसा

पर हमको धर्म बचाना है

जन्म लिया है जिस माटी में

उसका भी कर्ज चुकाना है

हाथ में लेकर शस्त्र-शास्त्र

सब इष्ट देव समझाते हैं


जब भी गज की मद मस्ती को

कुत्तों ने कमजोरी माना

ऐसी मार लगाई गज ने

याद आ गए नानी नाना

पिटे हुए कुत्ते भी अक्सर

ऐसे ही दाँत दिखाते है


हम भारत के शूर समर में

भीषण विध्वंस मचाते हैं

आँख उठे भारत माता पर

हम अपना शौर्य दिखाते हैं


✍️ दुष्यंत ‘बाबा’

मानसरोवर, 

मुरादाबाद 244001

उत्तर प्रदेश, भारत

गुरुवार, 8 मई 2025

मुरादाबाद के साहित्यकार दुष्यंत बाबा की रचना ...सेना की सौगंध

 


सेना ने सौगंध उठाकर, अपने मन में ठाना है

भारत माँ को वचन दे दिया, पाकिस्तान मिटाना है


जब-जब पुष्प दिए तुमको, तुमने शूल बिखेरे हैं

जब भी तम को खोना चाहा, तुमने चुने अँधेरे हैं

बहुत हुए संवाद दया के, अब गीता ज्ञान सुनाना है।


अन्न दिया खाने को तुमको, और नीर भी पीने को

पर कश्मीर जुवां पर लाकर, आग लगा दी सीने को

खूब पिलाया पानी तुमको, अब भूखे पेट सुलाना है


कितने सुहाग उजाड़े तुमने, अब उजड़े सिंदूर नही

पाकिस्तान नही होगा अब, शुभ अवसर यह दूर नही 

दानवता के अंत समय तक, सिंदूरी मिशन चलाना है


सत्य, अहिंसा और दया का, सबको ज्ञान दिया हमने

हिंसा बोकर सकल विश्व में, इज्जत खोई है तुमने

धर्म पूछकर गलती कर दी, तुमको धर्म सिखाना है


सेना ने सौगंध उठाकर, अपने मन में ठाना है

भारत माँ को बचन दे दिया, पाकिस्तान मिटाना है

✍️दुष्यंत बाबा 

मुरादाबाद 244001

उत्तर प्रदेश, भारत

शनिवार, 30 अप्रैल 2022

मुरादाबाद के साहित्यकार दुष्यंत बाबा की रचना --करिया रंग


सिपाही पहुंचा ससुराल में, अपने साथी संग

करिया रंग को देखकर, साली  हो  गयी दंग


बात करने से  बच  रही, बदल  रही  थी ढंग

दीदी हमारी गोरी चिठ्ठी, तुम हो काले भुजंग


दिल टूटा दीवान का,  थाना पहुँचा   तत्काल

एसओ साहब भी आ गए, बढ़ता देख बबाल


गुस्सा मत  करो प्यारे, हो जाओ  कुछ  शांत

ठंडा पानी पीकर तुम, सब बतलाओ वृतान्त


लगा बताने दीवान भी, उनपर कर  विश्वास

पहुंचा था ससुराल में, मन में थी कुछ आस


पर मेरी ससुराल  में, मुझ पर कसे गए तंज

साली मुझसे कह गयी, तुम हो काले भुजंग


गर्मी ऐसी भयंकर ,कि सिन्धु दरिया हो गया

दिनभर ड्यूटी करके, मैं भी करिया हो गया


मुंशी तुरंत बोल पड़ा, हो जायेगी हवा टाइट 

दिन की ड्यूटी के बाद, यदि लगा दी  नाईट


कारखास भी बोल पड़ा, खुद में बना महान

राज्य प्रहरी की  नौकरी, होती नही आसान 


हेड मोहर्रिर को  समझो, हर थाने की  दाई

समझा रहा  दिवान को, जैसे हो  बूढ़ी ताई


करिया रंग को  देखकर, मत हो ज्यादा तंग

राधा उन्ही को मिली हैं, जिनके करिया रंग

✍️ दुष्यन्त 'बाबा'

पुलिस लाइन

मुरादाबाद 244001

उत्तर प्रदेश, भारत

रविवार, 20 जून 2021

मुरादाबाद के साहित्यकार दुष्यंत बाबा का गीत --उन्हीं पिता के हम गुण गाएं उनको हम सब शीश झुकाएं


जो देकर अपनी ऊर्जा करता नवग्रह का संचार।

उसी सूर्य सम तात है सन्तान के सकल संसार।।


पिता सूर्य  हैं, पिता  है  बरगद

गम में दुखी हैं खुशी में गदगद

बच्चों में मिल बच्चे बन  जाएं

हर दुख को खुद ही सह जाएं

उन्हीं  पिता  के हम  गुण गाएं

उनको हम  सब शीश  झुकाएं


पिता  हैं  पोषक, पिता सहारा

ये  संतति  के  हैं  सृजन  हारा

पूरे  कुल  का  जो भार उठाएं

कभी न इनके दिल को दुखाएं

उन्हीं  पिता  के  हम  गुण गाएं

उनको हम  सब शीश  झुकाएं


पिता  हैं  मेला,  पिता  है ठेला

पिता बिना लगे संसार अकेला

अपना  दुःख  न  कभी जताएं

जो बिना आंसुओं  के  रो पाएं

उन्हीं  पिता  के  हम  गुण गाएं

उनको हम  सब शीश  झुकाएं


पिता  क्रोध, पिता  पालनहारा

इनके  क्रोध  में  छिपा  सहारा

दुःख  में भी तो ये हंसते  जाएं

हम  रहस्य  को समझ न पाएं

उन्हीं  पिता  के हम  गुण गाएं

उनको हम  सब शीश  झुकाएं


पिता कठोर  हैं उतने ही मृदल

जो नित पिता का आशीष पाएं

वह कर्म  करें  न पाछे पछताएं

सारी  विपदा  से वह बच जाएं

उन्हीं  पिता  के  हम  गुण गाएं

उनको हम  सब शीश  झुकाएं


पिता सृष्टि संतान की पिता ही जन आधार।

पिता की छाया  मात्र  से  हो  जाता उद्धार!।।

✍️ दुष्यन्त बाबा, पुलिस लाइन, मुरादाबाद

रविवार, 6 जून 2021

मुरादाबाद के साहित्यकार दुष्यन्त बाबा का गीत -----धरा से कितने ही वृक्ष भी पाए प्राण वायु और फल भी पाए कितने ही काटे कितने जलाए अब कटने से भी इन्हें बचाओ


हे!  मानव तुम  धरा बचाओ

कुछ तो इसका कर्ज चुकाओ

 

बूंद-बूंद  जल संचित  करती

अपने स्वेद से प्यास बुझाती

फिर भी न कोई कीमत पाती

ऐसे न  इसको व्यर्थ  बहाओ

 

सुबह  सबेरे  सूरज उग आता

फिर  सारे जग  को चमकाता

नही  किसी  से  ये विल पाता

ध्यान रखो! इसके  गुण गाओ

 

धरा से कितने ही वृक्ष भी पाए

प्राण  वायु और फल भी पाए

कितने ही काटे कितने जलाए

अब कटने से भी इन्हें बचाओ

 

नदियां धरा  की आभूषण  हैं

रत्नगर्भा और  कृषि भूषण है

समृद्धि  की परिचायक भी  है

प्रदूषण से  तुम इन्हें  बचाओ

 

हे!  मानव तुम  धरा बचाओ

कुछ तो इसका कर्ज चुकाओ

✍️दुष्यंत बाबा, पुलिस लाइन, मुरादाबाद

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2021

मुरादाबाद के साहित्यकार दुष्यन्त बाबा की रचना ----क्षमा याचना पूजा अर्चन करबद्ध यही वंदन है विपत्ति को हरो हरि मेरा यही करुण क्रंदन है


 *तेरा साधक*

जीवन देने वाले क्यों मौत बांटता घर-घर में

तेरे नाम ज्योति जलाते तेरी श्रद्धा हर घर में

अपनी सृष्टि को समझ खिलौना खेल रहा है

क्यों एक के दोष को सारा जगत झेल रहा है

तू रुलाए अपने मानव को ऐसा तेरा स्तर है?

यदि सच में ऐसा हो तो ईश नही तू पत्थर है

पुत्र गलतियां  करता, बनती थोड़ी डॉट सही

हर गलती की सजा में गले को देते काट नही

माना कि मैं पापी, नीच, प्रकृति  विनाशक हूँ

तेरी सत्ता का सौदाई बन बैठा यहाँ शासक हूँ

तू ही तो कहता कर्मयोग में अच्छा या बुरा कर

फिर क्यों भ्रम में डाल रहा फलयोग भुलाकर

तूने ही बनाई नियति जिस पर चलना सबको

फिर मेरा दोष कहाँ,जो आंख दिखाता मुझको

क्षमा याचना पूजा अर्चन करबद्ध यही वंदन है

विपत्ति को हरो हरि मेरा यही करुण क्रंदन है।

✍️ दुष्यन्त ‘बाबा’, पुलिस लाइन, मुरादाबाद

 मो0-9758000057

 

शनिवार, 13 मार्च 2021

मुरादाबाद के साहित्यकार दुष्यन्त बाबा की लघुकथा ---महिला दिवस

   


मिस्टर तिवारी ने अपने कार्यालय में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में मिस मेहता को मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया था। मिस मेहता उस समय हतप्रभ रह गयीं जब कार्यक्रम में महिलाओं का सम्मान करते समय फोन आ जाने पर पत्नी को तिवारी जी खरी-खोटी सुनाने लगे । 

✍️दुष्यन्त 'बाबा' ,पुलिस लाइन, मुरादाबाद,मो0-9758000057

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2021

मुरादाबाद के साहित्यकार दुष्यन्त बाबा की कहानी -----साहब का कुत्ता


बात उन दिनों की है, जब भोला राम आरक्षी के रूप में बड़े साहब के कार्यालय में तैनात था पुराने साहब के ट्रान्सफर के बाद नये साहब की तैनाती हुई। नये साहबछोटे से कद थे परन्तु बडे चटपटे थे। साहब ने अपने थोड़े से सामान के साथ कार्यालय में आगमन किया चूंकि कार्यालय तथा आवास एक ही परिसर में था साहब के आते समस्त कार्यालय स्टाफ शिष्टाचार भेंट के लिए इकट्ठा हो गया सभी के परिचय के साथ भोला राम ने भी साहब को सलाम ठोंक दिया। साहब कभी ए.एस.पी. से सीधे आई.जी. बने थे बडे़ साहब में पूरी हनक थी बात-बात पर अपने कन्धे पर लगे स्टार और अन्य साज सज्जा की ओर देखते हुए स्टाफ को कहते थे कि "जमीनी अफसर रहा हूँ कभी कोई गड़बडी़ की तो छोडूंगा नही"समस्त स्टॉफ एक शब्द में “जी सर” कहकर साहब की तारीफ में कसीदे लगाने लग जाता।

          कुछ ही समय बीता था कि साहब की मैडम का मय सामान के बंगले पर आगमन हुआ। सभी कर्मचारियों ने बडे़ उत्साह के साथ सामान उतरवा दिया। कर्मचारियों का धन्यवाद करने साहब हाथ में जंजीर थामे एक कुत्ता साथ में लिए आ गये। साहब सभी को 'धन्यवाद' कहने वाले ही थे कि सभी ने चापलूसी भरे एक ही स्वर में कहा "साहब आपका कुत्ता बहुत अच्छा है कहा से मंगाया है" इतना सुनते ही साहब का पारा सातवें आसमान पर हो गया। समय की नजाकत को कोई भाप न सका, सभी मूकदर्शक बने साहब की खरी-खोटी सुन रहे थे। जब साहब का गुस्सा कुछ ठण्डा हुआ तब साहब ने कुत्ते के परिचय देते हुए बताया कि इसका नाम “बाबूजी” है कर्मचारियों द्वारा इस नाम के पीछे छिपे तथ्य को जानने की जिज्ञासा को भांपते हुए साहब ने बताया कि जब यह लगभग तीन माह का था तब हमारे ससुर जी की ससुराल से भेंट किया गया था ससुर के ससुर यानि कि बाबूजी की याद में इसका नाम ”बाबूजी“ रखा गया है तथा इन्हें परिवार के सदस्यों की तरह सम्मान दिया जाता है अगले ही दिन से एक कर्मचारी को विशेष रूप से उसकी देखभाल करने के लिए नियुक्त किया गया। जब भी कोई अपनी पत्रावलियां साइन कराने जाता तो बाबूजी की तारीफ में एक दो कसीदे पड़ देता इससे उसकी डाक समय से साइन हो जाती थी साथ ही साहब भी अच्छे मूड़ में दिखाई देते थे। परन्तु कभी-कभी टेलीफोन डयूटी के साथ एक विशेष समस्या आ जाती थी, कि जब भी साहब कहते थे कि 'बाबूजी को बुलाओ!' तो यह समझ नही आता था की कुत्ते को बुलाना है या लिपिक को क्यूंकि दोनों ही बाबूजी हैं इसी वजह से आये दिन टेलीफोन डयूटि की डांट पड़ जाती थी। चूंकि बडे साहब थे बडे़-बडे़ लोग उनसे मिलने आते थे परन्तु सभी "बाबूजी" का नाम बडे अदब से लिया करते थे “बाबूजी” के तारीफ करके ही बडे़-बड़े काम यूं ही निकाल लिया करते थे।

      एक दिन कर्मचारी जब बाबूजी को बाहर घुमाने ले गया था तभी आठ-दस बाहरी कुत्तों ने "बाबूजी" की जमकर नुचाई कर दी किन्तु देखभाल वाले कर्मचारी ने जैसे-तैसे बचाकर, बाहर ही नहला-धुलाकर ठीक कर दिया जिससे इस घटना का कानों-कान किसी को पता नही लगने दिया किन्तु कार्यालय के कुछ लोग इस दृश्य को देख चुके थे। भोला राम भी जिनमें से एक था। एक दिन जब साहब कार्यालय परिसर का भ्रमण कर रहे थे कि भोला राम साहब के सामने आते हुए उत्साह पूर्वक बताया कि “साहब अपने बाबूजी को तो बाहरी कुत्ता ने बहुत बुरी तरह धोया है” इतना सुनते ही साहब बौखला गये और तुरन्त हैड क्लर्क को बुलाया गया तथा भोला राम को सात दिन की फटीक/दलील के साथ सात दिवस अर्थदण्ड सजा बतौर दिया गया। "बाबूजी" से ईर्ष्या रखने वालों की कडी़ में एक नाम और जुड़ गया भोला राम का। 

       कुछ ही दिन बीते थे कि पुराने साहब कि मैडम शहर आई थीं सोचा जब शहर आये ही है तो बडे़ साहब से शिष्टाचार भेंट करते चलें। चूंकि उनके पति तो डी.आई.जी. रहे थे, सोचा बड़े साहब मिलकर अच्छा लगेगा। मैडम का आगमन हुआ तो कर्मचारियों द्वारा पुराने साहब की मैडम होने के नाते सीधे साहब के कार्यालय कक्ष में बैठा दिया गया तथा टेलीफोन द्वारा साहब को मैडम के आगमन की सूचना दे दी, चूंकि भोला राम भी मैडम से पुराना परिचित था इस नाते पता चलने वह भी वहां आ चुका था। भोला राम मैडम का अभिवादन कर कुशलक्षेम पूछ ही रहे थे कि “बाबूजी” का आगमन हो गया मैडम को पूर्व से ही साहब का "बाबूजी" के प्रति स्नेह का पता था अतः मैडम ने बाबूजी पुचकारते हुए जैसे ही हाथ बढ़ाया कि बाबूजी ने अनजान समझकर मैडम पर हमला कर दिया। जब तक भोला राम 

मैडम को बाबूजी से बचा पाते तब-तक बाबूजी दो दांत मैडम के बाजू में गड़ा चुके थे। जिससे मैडम का ब्लाउज बाजू से कुछ फट गया था जब तक साहब का आगमन 

हुआ तब तक भोला राम बाबूजी को भगा चुके थे।

        साहब आकर बैठे अभिवादन हुआ ही था कि मैडम ने "बाबूजी" की शिकायत न करते हुए उसकी तारीफ में कसीदे पढ़ दिये कि "साहब! अपने ये जो बाबूजी बहुत अच्छे है बहुत अच्छा काटते है मुझे भी काटा, बहुत अच्छा लगा और गुद-गुदी सी हुई" चिलमबाजी की परकाष्ठा को भोला राम हतप्रभ बना निर्जीव सा खड़ा देख रहा था। भोला राम मन ही मन सोच रहा था कि 'हे प्रभु! चिलम बाजी की भी हद होती है' थोडी देर खडे़ रहने के पश्चात चुप-चाप बाहर निकल आया। भेंटवार्ता खत्म हुई। बडे साहब भी शिष्टाचार दिखाते हुए मैडम को बाहर तक छोड़ने आये। भोला राम पुनः मैडम से मिला और एन्टी-रैबीज के इजैक्शन लगवाकर मैडम को गंतव्य तक छोड़ आया।

          जब यह बात कार्यालय में पता लगी तो साहब के गोपनीय सहायक (स्टैनो) ने नम्बर बनाने में बिल्कुल देरी नही की और तुरन्त साहब को बताया कि “साहब! अपने बाबूजी ने मैडम को दांत मार दिये है जिसके इन्फैक्शन का खतरा बाबूजी को भी बराबर है” साहब "बाबूजी" के प्रति सहायक जिम्मदारी और तत्परता का भाव देख बहुत खुश हुए। तथा कर्तव्य के प्रति संवेदनशीलता को देखते हुए तुरंत सहायक को रिवार्ड दिये जाने की घोषणा की गयी। सहायक की बात मानते हुए तत्काल “बाबूजी” को अस्पताल भेजने की तैयारियां की जाने लगी। जिप्सी कार मंगायी गयी उसमें रंगीन कालीन बिछाकर "बाबूजी" को बैठा दिया गया। देख-रेख करने वाले कर्मचारी को साथ बैठाकर अस्पताल जाने के लिए रवाना कर दिया गया। अन्य कोई स्टाफ इसलिए साथ नही भेजा गया था कि साहब के पी.आर.ओ. ने इस सम्बंध में पहले ही डॉक्टर को अवगत करा दिया गया था।

      जिप्सी कार कार्यालय से कुछ दूरी पर ही मुख्य मार्ग पर पहुंची ही थी कि "बाबूजी" को सड़क पर “बाबूजिन” (कुतिया) दिखाई पड़ गयी, "बाबूजिन" को देखकर वानप्रस्थ काट रहे "बाबूजी" अपने संयम को साध न सके, और चलती कार से ही छलांग दी। कर्मचारी कुछ प्रयास करता उससे पहले ही सामने से आ रहे एक ट्रक ने ”बाबूजी“ को सड़क पर चिपका दिया। बस अब क्या था! कर्मचारी और जिप्सी का ड्राईवर अवाक् खडे़ एक दूसरे का मुँह देख रहे थे, कुछ समझ नही आ रहा था कि क्या करें! फिर भी उन्होने मार्ग पर चलते ट्रैफिक को रोककर "बाबूजी" के गले में बंधा पट्टा व जंजीर खोल ली और बापस आ गये।

       किसी तरह हिम्मत जुटाते कार्यालय पहुंचे वहाँ पहुँच कर दोनों ने पी.आर.ओ. तथा टेलीफोन डयूटी से बाबूजी की मृत्यु की सूचना साहब को देने का अनुरोध किया। परन्तु बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधता। जब कोई उपाय न सूझा तो दोनों स्वयं ही सीधे हिम्मत जुटाते हुए साहब के सामने पहुँचे। साहब तभी मध्यान्ह भोजन कर कार्यालय में बैठे ही थे। दोनो ने हाथ जोड़कर जंजीर दिखाते हुए कहा कि “साहब! बाबूजी अब नही रहे” फिर क्या था साहब का आक्रोश देखते ही बनता था। तुरन्त साहब की गाड़ी लगवायी गयी और तत्काल घटनास्थल पर पहुंचे परन्तु तब तक देर हो चुकी थी राष्ट्रीय राजमार्ग होने के कारण न जाने कितने ही वाहन "बाबूजी" के ऊपर से गुजर चुके थे "बाबूजी" के रूप में अब केवल सड़क से चिपकी "बाबूजी" की खाल ही शेष बची थी। खाल को खुरपी मंगाकर खुर्चा गया। बाल्टी में रखकर कार्यालय लाया गया पूरे विधि-विधान से "बाबूजी" का अन्तिम संस्कार किया गया। साथ ही मोक्ष प्राप्ति के लिए ब्राह्मण भोज भी कराया गया।

        समस्त कार्यालय में आज "बाबूजी" की मौत की सुगबुगाहट थी। एक कुत्ते की मौत के रूप में प्रत्येक कर्मचारी की संवेदनाएं थी। परन्तु "बाबूजी" की मौत का सुखद अहसास प्रत्येक स्टाफ कर्मी के चेहरे पर साफ दिखाई पड़ रहा था क्योंकि शायद ही कोई बचा हो जिसे "बाबूजी" की वजह से किसी न किसी रूप में डांट न पड़ी हो।

✍️दुष्यन्त 'बाबा', मुरादाबाद

मो0न0-9758000057