रविवार, 6 जनवरी 2019

मुरादाबाद के साहित्यकार स्मृतिशेष पुष्पेंद्र वर्णवाल के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर केंद्रित डॉ मनोज रस्तोगी का आलेख

 




प्रख्यात साहित्यकार, इतिहासकार एवं पुरातत्ववेत्ता  पुष्पेंद्र वर्णवाल का जन्म मुरादाबाद नगर के नबावपुरा मोहल्ले में 4 नवंबर 1946 को हुआ था ।  

         तीन भाइयों एवं दो बहनों में सबसे बड़े पुष्पेंद्र वर्णवाल का वास्तविक नाम उमेश पाल वर्णवाल था ।आपके पिता नेत्र पाल एवं माता जी शांति देवी के व्यक्तित्व का आप पर पूरा प्रभाव पड़ा। आपने अपने पिताजी से ही छंद और गति पर अधिकार प्राप्त कर दिया था। विद्यार्थी जीवन काल में सन 1966 में पुस्तकालय विज्ञान में प्रमाण पत्र परीक्षा उत्तीर्ण कर कुछ समय उपरांत उत्तर प्रदेश पुस्तकालय संघ की मुरादाबाद शाखा के सचिव पद पर 1974 से 1976 ईस्वी तक रहे। नियमित अध्ययन करते हुए आगरा विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में 1972 ईस्वी में स्नातकोत्तर परीक्षा उत्तीर्ण की ।इसी बीच 25 जून 1972 को मृदुला गुप्ता से परिणय हुआ किंतु संयुक्त परिवार में आस्थावान, स्वभाव से फक्कड़, अपने ही ढंग से जीने की अलमस्त शैली वाले कवि का साथ न दे पाने के कारण विवाह के तुरंत बाद ही पत्नी का आपसे संबंध विच्छेद हो गया ।श्री वर्णवाल कुछ समय उत्तरकाशी में प्राध्यापक भी रहे । आप यहां नगर निगम में कार्यरत भी रहे ।परंतु स्पष्टवादिता और सत्य के प्रतिपादन में अपने स्वाभिमान को भी बनाए रखने की हठ में इनका किसी भी नौकरी में निर्वाह नहीं हो पाया और आपने नगर निगम की नौकरी से इस्तीफा दे दिया। विद्यार्थी काल से ही आपकी रुचि लेखन के प्रति हो गई थी ।आपकी रचनाएं वर्ष 1965 में पहली बार दिल्ली से प्रकाशित सैलानी पत्र में प्रकाशित हुई ।उसके पश्चात प्रदेश पत्रिका, दैनिक भास्कर,नव सत्यम, वीर अर्जुन आदि पत्र-पत्रिकाओं में आपकी रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैं ।
        श्री पुष्पेंद्र वर्णवाल की कृतियों में  मुक्तक संग्रह- रिमझिम,  लघु काव्य -  अभीक, ऋषि, खण्डकाव्य - शब्द मौन , विराधोद्धार, प्रबंध काव्य - उत्पविता, सिंधु विजय, गीत- विगीत संग्रह- प्रणय दीर्घा, प्रणय योग, प्रणय बंध, प्रणय प्रतीति,  प्रणय परिधि, प्रणय पर्व, नाट्य वार्तिक- बीज और बंजर जमीन, कविता संग्रह - अबला,इतिहास- ब्रज यान की आधार भूमि, समीक्षा- विजय पताका एक विहंगम दृष्टि ,निबंधकार महामोपाध्याय पंडित रघुवर आचार्य ,  उपन्यास - रामानन्द बाल विरद उल्लेखनीय हैं।  
    आपकी मुरादाबाद के शिक्षण संस्थान, मुरादाबाद के पूजा स्थान और बलि विज्ञान नामक तीन कृतियों का जापानी भाषा में अनुवाद ओसाका(जापान) निवासी प्रसिद्ध हिंदीविद डॉ कात्सुरा  कोगा द्वारा किया जा चुका है ।इसके अतिरिक्त आपकी कृति विरोधोद्धार का डॉ भूपति शर्मा जोशी द्वारा संस्कृत और शब्द मौन का ऋषिकांत शर्मा द्वारा अंग्रेजी में अनुवाद हो चुका है । आपकी कुछ कहानियों व लघुकथाओं का गुजराती व पंजाबी भाषा में भी अनुवाद हुआ है । मुरादाबाद जनपद के इतिहास के संबंध में उनके खोजपूर्ण लेख अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए ।
        आपके कृतित्व पर शोध प्रबंध - प्रणय मूल्यों की अभिव्यक्ति :नूतन शिल्प विधान (पुष्पेंद्र वर्णवाल के काव्य लोक में) -जय प्रकाश तिवारी 'जेपेश', पुष्पेंद्र वर्णवाल के विगीत-एक तात्विक विवेचन -डॉ कृष्ण गोपाल मिश्र, कवि पुष्पेंद्र वर्णवाल और उनका साहित्य - डॉ एस पी शर्मा,  विगीत और प्रेयस- डॉ छोटे लाल शर्मा नागेंद्र प्रकाशित हो चुके हैं । 

     आपका पत्रकारिता के क्षेत्र में भी एक उल्लेखनीय योगदान रहा ।आपने प्रदेश पत्रिका का संपादन, चित्रक साप्ताहिक का समाचार संपादन किया तथा सिने पायल, फिल्मी जागृति , सागर तरंग के प्रबंध संपादक रहे ।

       पुष्पेन्द्र वर्णवाल जी को साहित्य के क्षेत्र में विशेष उल्लेखनीय योगदान के लिए समय- समय पर भारत की साहित्यिक संस्थाओं द्वारा विविध उपाधियों, अलंकरणों और सम्मानों द्वारा विभूषित भी किया गया है जिनका विवरण इस प्रकार है-- विश्व हिन्दू सम्मेलन काठमाण्डू नेपाल द्वारा 'साहित्यालंकार' सम्मान (1982), साहू शिव-शक्तिशरण कोठीवाल स्मारक समिति, मुरादाबाद द्वारा साहित्य सम्मान' (1988), हैदराबाद हिन्दी अकादमी, आन्ध्र प्रदेश द्वारा साहित्य सम्मान' (1992), जगद्गुरु रामानन्दाचार्य पीठ, अहमदाबाद (गुजरात) द्वारा साहित्य सम्मान' (1994), सृजन (साहित्यिक - सांस्कृतिक-संस्था), उत्तरकाशी (उत्तराखण्ड) द्वारा साहित्य सम्मान' (2004), हिन्दी साहित्य संगम, मुरादाबाद (उ.प्र.) द्वारा 'साहित्य श्री सम्मान' (2005), राष्ट्रभाषा हिन्दी प्रचार समिति मुरादाबाद (उ.प्र.) द्वारा साहित्य गौरव सम्मान (2006), श्री पुष्पेन्द्र वर्णवाल हीरक जयन्ती अभिनन्दन समिति द्वारा हीरक जयन्ती सम्मान (2006), रूहेलखण्ड साहित्य-साधना संस्था, बरेली द्वारा सृजन सम्मान' (2009), अखिल भारतीय साहित्य कला मंच, मेरठ (उ.प्र.) द्वारा 'साहित्य भूषण सम्मान' (2012), अन्तर्राष्ट्रीय साहित्य कला मंच, मुरादाबाद (उ.प्र.) द्वारा काठमाण्डू (नेपाल) में 'साहित्य श्री सम्मान' (2013), अन्तर्राष्ट्रीय साहित्य संगम, सम्भल (उ.प्र.) द्वारा साहित्य - वैभव सम्मान' ( 2018 ) ।
     विभिन्न संस्थाओं के अध्यक्ष और पदाधिकारी भी रहे। वाट्स एप पर संचालित समूह साहित्यिक मुरादाबाद  के वह वरिष्ठ सदस्य थे ।
4 जनवरी 2019 को उन्होंने मुरादाबाद में यह नश्वर देह त्याग दी ।


✍️ डॉ मनोज रस्तोगी
8, जीलाल स्ट्रीट
मुरादाबाद 244001
उत्तर प्रदेश, भारत
मोबाइल फोन नम्बर 9456687822

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मंगलवार, 1 जनवरी 2019

मुरादाबाद के साहित्यकार स्मृतिशेष डॉ भूपति शर्मा जोशी पर केंद्रित डॉ मनोज रस्तोगी का आलेख

 




डॉ भूपति शर्मा जोशी का जन्म तहसील अमरोहा के ग्राम सरकड़ा कमाल में मार्गशीर्ष शुक्ल तृतीया तदनुसार *13 दिसंबर 1920* को सोमवार के दिन हुआ था। आपके पिता का नाम तेजो राम शर्मा तथा माता का नाम रिसालो देवी था। उनके पूर्वज महाराष्ट्र में कोंकण क्षेत्र के निवासी थे। कालांतर में आपके पितामह नंदराम के पितामह  पंजाब होकर मुरादाबाद जनपद में आ बसे थे। 

       डॉ जोशी की प्रारंभिक शिक्षा गांव के ही प्राथमिक विद्यालय में हुई। वर्ष 1932 में अमरोहा के तहसीली स्कूल में प्रवेश लिया। वर्ष 1935 में हिंदी और वर्ष 1936 में उर्दू मिडिल की परीक्षा उत्तीर्ण की। वर्ष 1944 तक विशेष योग्यता के साथ हिंदी प्रभाकर (ऑनर्स), साहित्य रत्न एवं संस्कृत साहित्य शास्त्री परीक्षाएं उत्तीर्ण की और धामपुर (जनपद बिजनौर स्थित के एम इंटर कॉलेज में हिंदी शिक्षक के रूप में नियुक्त हो गए। अध्यापन कार्य के दौरान उच्च अध्ययन के प्रति आप की ललक निरंतर बनी रही। वर्ष 1950 में साहित्याचार्य,  वर्ष 1955 में स्नातकोत्तर हिंदी और वर्ष 1958 में स्नातकोत्तर संस्कृत की परीक्षाएं उत्तीर्ण की । इसी मध्य आपका विवाह फतेहपुर विश्नोई निवासिनी लीलावती से हो गया। कुछ समय बाद पत्नी का अस्वस्थता के कारण असामयिक निधन हो गया। दूसरा विवाह अमरोहा निवासी मोहन लाल शर्मा की सुपुत्री मनोरमा जोशी से हुआ। 

       वर्ष 1957 में आपको केंद्रीय गृह मंत्रालय (वर्तमान में राजभाषा विभाग) की हिंदी शिक्षण योजना के अंतर्गत प्राध्यापक के रूप में कोचीन (केरल प्रदेश) में जाकर सरकारी कर्मचारियों को हिंदी सिखाने का सुअवसर प्राप्त हुआ। इस योजना के अंतर्गत आपने लगभग 20 वर्षों 1978 तक अहिंदी भाषी प्रांतों में हिंदी की अलख जगाई। सेवाकाल के दौरान ही उन्होंने बंगला, असमिया और मलयालम भाषाओं का ज्ञान प्राप्त कर लिया। इसके अलावा उन्हें फारसी भाषा का भी ज्ञान था। वर्ष 1968 में उन्होंने विविध भाषा मर्मज्ञ डॉ रमानाथ त्रिपाठी के निर्देशन में शोध कार्य पूर्ण किया ,जिसका विषय था- *फारसी भाषा से हिंदी में आगत शब्दों का भाषा शास्त्रीय अध्ययन* । 

      साहित्य सर्जन के नवांकुर तो आपके भीतर बाल्यकाल से ही प्रस्फुटित होने लगे थे। आप जब कक्षा 6 के विद्यार्थी थे तो आपने पहली कविता *बालचर* शीर्षक से लिखी थी। धामपुर में सेवाकाल के दौरान विद्यालय के प्रधानाचार्य और वीर रस के कवि पंडित अनूप शर्मा ने उनकी प्रतिभा को पहचान कर उन्हें प्रोत्साहित किया। उन्हीं से प्रेरित होकर उन्होंने 68 छंदों की एक काव्य रचना *प्रोत्साहन* का प्रणयन किया। ( यह रचना 1960 में केरल प्रवास के दौरान केरल भारती पत्रिका में प्रकाशित भी हुई।)   उसके बाद तो उनकी लेखनी रुकी ही नहीं।केरल प्रवास के दौरान उनकी काव्य प्रतिभा को नए आयाम मिले। उन्होंने हिंदी के साथ-साथ संस्कृत भाषा में भी गीतों और छंदों की रचना की । इसके अतिरिक्त बंगला भाषा के पद्य नाटक *मीराबाई* और असमिया के उपन्यास *सपोन जोतिया मांगे* का हिंदी में अनुवाद किया। मलयालम की अनेक कविताओं का भी पद्यानुवाद किया। मुरादाबाद के साहित्यकार स्मृति शेष पुष्पेंद्र वर्णवाल के खंडकाव्य *विराधोद्धार* का संस्कृत भाषा में रूपांतर भी किया। दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि उनका संपूर्ण साहित्य अप्रकाशित है । 

अपने अनेक देशों में हिंदी व सनातन धर्म का प्रचार प्रसार भी किया। आपके अनुज ज्योतिषाचार्य पंडित डाल चंद शास्त्री महर्षि महेश योगी के सलाहकार थे। वर्ष 1955 में ममतामयी मां रिसालो देवी के निधन के उपरांत वह अपने अनुज के माध्यम से महर्षि महेश योगी के संपर्क में आये और पेरु, चिली, पनामा, मैक्सिको, हॉलैंड, कोलंबिया, जर्मनी, यूएसए आदि देशों में हिंदी व सनातन धर्म का प्रचार प्रसार किया।

     आपको महानगर की विभिन्न संस्थाओं साहू शिव शक्ति शरण कोठीवाल स्मारक समिति, राष्ट्रभाषा हिन्दी प्रचार समिति, ब्राह्मण महासभा, मानसरोवर कन्या इंटर कालेज द्वारा सम्मानित भी किया गया ।

 आप का निधन 15 जून 2009 को गांधीनगर,मुरादाबाद स्थित आवास पर हुआ।

::::;;प्रस्तुति ::::::

डॉ मनोज रस्तोगी

8,जीलाल स्ट्रीट

मुरादाबाद 244001

उत्तर प्रदेश, भारत

मोबाइल फोन नम्बर 9456687822

मुरादाबाद के साहित्यकार स्मृतिशेष कैलाश चन्द्र अग्रवाल पर केंद्रित डॉ मनोज रस्तोगी का आलेख

 




छायावादोत्तर काल के सशक्त साहित्यकार कैलाश चन्द्र अग्रवाल का जन्म 18 दिसम्बर 1927 को मुरादाबाद के मंडी बांस मुहल्ले में हुआ । आपके पिता साहू रामेश्वर शरण अग्रवाल सुसम्पन्न सराफा व्यवसायी थे । आपकी माता का नाम श्रीमती राम सुमरनी देवी था जो अमरोहा निवासी श्री ब्रज रत्न अग्रवाल की एकमात्र सन्तान थीं। आपके पितामह भूकन शरण अग्रवाल नगर के प्रतिष्ठित साहूकार थे।

कैलाश जी की प्रारम्भिक शिक्षा अग्रवाल पाठशाला मुरादाबाद में हुई । स्व० पंडित लेखराज जी शर्मा आपकी प्राथमिक शिक्षा के गुरू थे । आपने वर्ष 1944 एवं 1946 में क्रमशः हाईस्कूल एवं इंटरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण की । वर्ष 1948 में आपने एसएम कालेज चंदौसी में स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की । आपने हिन्दी में स्नातकोत्तर की उपाधि वर्ष 1950 में लखनऊ विश्वविद्यालय से प्राप्त की तदुपरांत वर्ष 1952 में आगरा विश्वविद्यालय से एलएलबी की उपाधि प्राप्त करने के बाद वह मुरादाबाद में वकालत करने लगे।
      आपका विवाह तीन मार्च सन् 1952 को तहसील जानसठ (जनपद मुजफ्फरनगर) निवासी श्री हनुमान प्रसाद जी की सुपुत्री संतोष से हुआ । आपके ज्येष्ठ पुत्र आलोक चन्द्र अग्रवाल का 3 जनवरी2008 को स्वर्गवास हो चुका है ।उनके पुत्र अक्षय अग्रवाल हैं । द्वितीय पुत्र अतुल चन्द्र अग्रवाल पैतृक व्यवसाय (सराफा) में संलग्न हैं । उनके पुत्र डॉ मनुशेखर अग्रवाल हैं ।
   वकालत के दौरान आपके पिता का स्वास्थ्य निरंतर खराब रहने लगा । फलतः अपने पिता श्री का आदेश मानकर आप सन 1962 में वकालत छोड़कर अपने पैतृक व्यापार में लग गये । अंतिम समय तक आप इसी व्यापार से जुड़े रहे ।
  वर्ष 1945 में, जब वह इंटरमीडिएट के छात्र थे किया उनकी रुचि काव्य लेखन की ओर अग्रसर होने लगी। अपने काव्य गुरु के संबंध में कैलाश चन्द्र अग्रवाल के अनुसार सेवानिवृत्त डिप्टी कलेक्टर श्री केशव चन्द्र मिश्र से उन्होंने छन्द आदि का शान प्राप्त किया तदुपरान्त स्व पंडित दुर्गादत्त त्रिपाठी उनके काव्य गुरु रहे । धीरे-धीरे वर्ष 1947 तक उनकी प्रतिभा इतनी विकसित हो गयी कि वह परिपक्वता के साथ छन्दोबद्ध काव्य के रूप में गीत विद्या के माध्यम से अपनी अनुभूतियों को अभिव्यक्त करने लगे।  उनके प्रारम्भिक गीतों का प्रतिनिधि संकलन वर्ष 1965 में "सुधियों की रिमझिम में" स्थानीय आलोक प्रकाशन मंडी बांस के माध्यम से पाठकों को प्राप्त हुआ, जिसमें उनकी 1947 ई. से 1965 ई. तक की काव्य यात्रा के विभिन्न पड़ाव समाहित है। चौसठ गीतों  के इस संकलन के पश्चात कवि की यात्रा वर्ष 1981 में 'प्यार की देहरी' पर पहुंची। प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस कृति में उनके सन 1965 के पश्चात रचे गए 81 गीत संगृहीत हैं । वर्ष 1982 में उनका मुक्तक संग्रह 'अनुभूति' प्रकाशित हुआ, जिसमें वर्ष 1971 से 1981 तक लिखे गए 351 मुक्तक संगृहीत हैं। यह यात्रा आगे बढ़ी और वर्ष 1984 में 'आस्था के झरोखों' से होती हुई वर्ष 1985 में "तुम्हारे गीत -तुम्ही को" गीत संग्रह के माध्यम से हिन्दी साहित्य की गीत विधा के भंडार को भरने तथा छन्दोबद्ध काव्य रचना करने की प्रेरणा देती रही ।वर्ष 1989 में गीत संग्रह "तुम्हारी पूजा के स्वर" पाठकों के सम्मुख प्रभात प्रकाशन दिल्ली द्वारा आया । इसमें आपके जनवरी 1986 से फरवरी 1988 तक रचे गये 71 गीत संगृहीत है। अंतिम सातवीं कृति के रूप उनका गीत संग्रह 'मैं तुम्हारा ही रहूंगा' पाठकों के समक्ष आया। इसका प्रकाशन सन 1993 में हिन्दी साहित्य निकेतन बिजनौर द्वारा हुआ।इसमें उनके अप्रैल सन 1989 से मार्च 1992 के मध्य रचे 71 गीत संगृहीत हैं। कुल मिलाकर 441 गीतों और 351 मुक्तको के माध्यम से हिन्दी काव्य के भंडार में अपना योगदान दिया है । यह मुरादाबाद नगर का गौरव ही कहा जायेगा कि दिल्ली से प्रकाशित राष्ट्रीय दैनिक पत्र 'हिन्दुस्तान' के सम्पादकीय में आपकी काव्य पंक्तियां देश के दिग्गज साहित्यकारों के साथ अनेक बार उद्घृत की गयी ।

  इन संस्थाओं ने किया सम्मान
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हिन्दी की सुविख्यात साहित्यिक संस्था 'दधीचि हिन्दी साहित्य परिषद' सहारनपुर ने  7 दिसम्बर 1985 को आयोजित भव्य समारोह में उनके गीत संग्रह 'आस्था के झरोखों से' को वर्ष 1984 की सर्वश्रेष्ठ काव्य कृति घोषित करते हुए उन्हें  दो हजार पाँच सौ की धनराशि देकर सम्मानित किया और उन्हें 'कवि रत्न' की उपाधि से अलंकृत किया । उन्हें यह सम्मान प्रख्यात साहित्यकार जैनेंद्र कुमार द्वारा प्रदान किया गया।
वर्ष 1982 में मुरादाबाद की साहित्यिक संस्था राष्ट्र भाषा हिन्दी प्रचार समिति की ओर से आयोजित राजर्षि पुरुषोत्तम दास टण्डन जन्मशती समारोह में
आपका साहित्यिक अभिनंदन किया गया ।
व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर हो चुके हैं शोधकार्य
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कैलाश चंद अग्रवाल के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर शोध कार्य भी हो चुके हैं। वर्ष 1992 में कंचन प्रभाती ने कैलाश चंद अग्रवाल के काव्य में प्रणय तत्व शीर्षक से डॉ सरोज मार्कंडेय के निर्देशन में लघु शोध कार्य किया ।तत्पश्चात वर्ष 1995 में उन्होंने डॉ रामानंद शर्मा के निर्देशन में रुहेलखंड के प्रमुख छायावादोत्तर गीतिकार एवं श्री कैलाश चंद अग्रवाल के गीति काव्य का अध्ययन शीर्षक पर शोध कार्य पूर्ण कर पीएच-डी की उपाधि प्राप्त की।
      वर्ष 2002 में गरिमा शर्मा ने डॉ मीना कौल के निर्देशन में स्वर्गीय कैलाश चंद अग्रवाल (जीवन सृजन और मूल्यांकन )शीर्षक से लघु शोध कार्य किया। वर्ष 2008 में श्रीमती मीनाक्षी वर्मा ने डॉ मीना कौल के ही निर्देशन में स्वर्गीय श्री कैलाश चंद अग्रवाल के गीतों का समीक्षात्मक अध्ययन शीर्षक पर शोध कार्य पूर्ण किया।
इन संस्थाओं से रहा जुड़ाव
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कैलाश चन्द्र अग्रवाल वर्ष 1954 से वर्ष 1961 तक मुरादाबाद नगर के हिन्दू स्नातकोत्तर महाविद्यालय, गोकुल दास गुजराती हिन्दू इंटर कालेज, गोकुल दास गुजराती हिन्दू कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, प्रताप सिंह कन्या इंटर कालेज तथा राजकला कन्या इंटर कालेज की प्रबन्धकारिणी समितियों के सक्रिय सदस्य रहे । मुरादाबाद की प्राचीन साहित्यिक संस्था 'अन्तरा' के आप संस्थापक सदस्य रहे ।
        वर्ष 1996 में 31 जनवरी को उन्होंने इस नश्वर देह को त्याग दिया ।

✍️ डॉ मनोज रस्तोगी
8, जीलाल स्ट्रीट
मुरादाबाद 244001
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मुरादाबाद के साहित्यकार स्मृतिशेष ईश्वर चन्द्र गुप्त ईश पर केंद्रित डॉ मनोज रस्तोगी का आलेख






 

स्मृतिशेष श्री ईश्वर चंद्र गुप्त ईश का जन्म 7 दिसंबर 1925 को मुरादाबाद में हुआ था। आपके पिता श्री शांति प्रसाद अग्रवाल खिलौनों के निर्माता व व्यापारी थे। आप की माता जी का नाम श्रीमती भगवती देवी था। चार भाइयों श्री राजेश्वर प्रसाद अग्रवाल, श्री मिथिलेश्वर प्रसाद अग्रवाल,श्री हृदयेश्वर प्रसाद अग्रवाल और एक बहन श्रीमती धर्मवती में सबसे बड़े श्री ईश्वर चंद्र गुप्त ईश के पितामह श्री कुंज बिहारी अग्रवाल थे।
आप की शिक्षा दीक्षा मुरादाबाद में ही हुई। आप ने वर्ष 1952 में हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग से साहित्य रत्न की उपाधि प्राप्त की। वर्ष 1954 में स्नातक, वर्ष 1957 में बीटी, वर्ष 1962 में स्नातकोत्तर (अर्थशास्त्र) एवं वर्ष 1973 में स्नातकोत्तर (समाजशास्त्र) की उपाधि प्राप्त की। वर्ष 1957 में आप की नियुक्ति परसादी लाल झंडू लाल रस्तोगी इंटर कॉलेज में अध्यापक के रूप में हो गई। वर्ष 1965 में आप इसी विद्यालय में अर्थशास्त्र प्रवक्ता के पद पर पदोन्नत हुए तथा वर्ष 1985 -86 में प्रधानाचार्य पद पर कार्यरत रहे। कुछ समय उन्होंने महाराजा अग्रसेन इंटर कालेज में भी अध्यापन कार्य किया ।
  उनका विवाह काशीपुर के व्यापारी श्री कल्लू मल अग्रवाल की सुपुत्री दयावती से वर्ष 1941 में हुआ। आप के सबसे बड़े सुपुत्र श्री सर्वेश चंद्र गुप्ता पंजाब नेशनल बैंक में वरिष्ठ प्रबंधक पद से सेवानिवृत्त होकर वर्तमान में मेरठ निवास कर रहे हैं। मंझले पुत्र डॉ आदेश चन्द्र अग्रवाल रामनगर में फार्मास्यूटिकल कंपनी एमआर  हेल्थ केयर में सीईओ हैं तथा सबसे छोटे सुपुत्र उपदेश चंद्र अग्रवाल मुरादाबाद के प्रसिद्ध आयकर व्यापार कर अधिवक्ता हैं। उनकी भी रुचि का काव्य लेखन में है। आपकी सुपुत्रियों आभा एवं शोभा का निधन हो चुका है तथा अमिता वर्तमान में सहारनपुर में निवास कर रही हैं।
   साहित्य के प्रति उनकी रुचि किशोरावस्था से ही थी। काव्य लेखन की शुरुआत के संदर्भ में वे स्वयं लिखते हैं ---"मेरी आयु सन 1933 में लगभग 9 वर्ष की थी। मेरी पूज्या मां जब मेरे  श्रद्धेय मामाजी को रामनगर (नैनीताल) कभी पत्र लिखवाती तो प्रायः  वह लय के साथ तुकबंदी में कुछ पंक्तियां भी मुझे बोल कर  लिखवा देती थीं जिन्हें मैं भी तब गुनगुनाया करता था। सम्भवतः तभी से तुकबंदी की रचना मेरे मानस पटल पर भी पाषाण में उत्कीर्ण जैसी अंकित हो गई होंगी, जो आज तक प्रेरक बनकर मेरे मौन अंतः करण को प्रति ध्वनित कर रही हैं । अतः मैं इस तुकबंदी का श्रेय प्रेरक स्त्रोत अपनी परम पूज्या प्रिय मां भगवती देवी को ही मानता हूं।" (कुछ मेरी कलम से - ईश अंजली)
    वर्ष 1991 में उनकी पहली काव्य कृति 'ईश गीति ग्रामर' प्रकाशित हुई। इस कृति में उन्होंने अंग्रेजी ग्रामर को पद्यबद्ध किया है। प्रत्येक पद में कही बात को स्पष्टीकरण एवं उदाहरण द्वारा भी समझाया गया है।
     वर्ष 1994 में उनकी दूसरी काव्य कृति 'चा का प्याला' प्रकाशित हुई। इस कृति में उन्होंने भारत में चाय का प्रवेश, चाय की महिमा, चाय और समाज के साथ-साथ भारत के इतिहास की झलक को 140 पदों में प्रस्तुत किया है।
      तीसरी कृति 'ईश दोहावली' का प्रकाशन भी वर्ष 1994 में हुआ। इसमें वंदना, नीतिपरक, धर्माचरण स्वास्थ्य, श्रृंगार और हास्य व्यंग्य के 151 दोहे हैं।    
      चौथी कृति 'ईश अर्चना' का प्रकाशन वर्ष 1995 में हुआ। इस कृति में उनकी वर्ष 1941 से 1995 तक की ईश वंदना विषयक कविताओं का संग्रह है।    
      वर्ष 1997 में प्रकाशित 'ईश अंजलि' उनकी पांचवी कृति है। इस कृति में उनकी 1940 से 1996 तक की 63 रचनाएं हैं। छठी कृति 'हिंदी के गौरव' का प्रकाशन वर्ष 2000 में हुआ। इस कृति में हिंदी के प्रमुख कवियों एवं लेखकों का जीवन परिचय, कृतित्व एवं काव्यगत विशेषताओं को पद्य गद्य में प्रस्तुत किया गया है । उनकी अंतिम सातवीं कृति चिंतन मनन वर्ष 2004 में प्रकाशित हुई।
      ईश जी की रचनाएं विभिन्न साझा काव्य संकलनों  उन्मादिनी (संपादक शिवनारायण भटनागर साकी ), समय के रंग (संपादक अशोक विश्नोई व डॉ प्रेमवती उपाध्याय), उपासना (संपादक अशोक विश्नोई ), 31 अक्टूबर के नाम( संपादक अशोक विश्नोई ) आदि में भी प्रकाशित हुईं।
       कविवर मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, पंडित ज्वाला दत्त शर्मा जन्मशताब्दी कथा सम्मान के अतिरिक्त विभिन्न संस्थाओं कार्तिकेय, लायंस क्लब दीपशिखा, विभावरी (सहारनपुर), जनता सेवक समाज, डॉ हितेश चंद्र गुप्त मेमोरियल सोसायटी, साहू शिवशक्ति शरण कोठीवाल स्मारक समिति, अखिल भारतीय साहित्यकार अभिनंदन समिति (मथुरा) सीनियर सिटीजन वेलफेयर सोसाइटी, सागर तरंग प्रकाशन, आकार आदि द्वारा भी समय-समय पर उन्हें सम्मानित किया गया।
         महानगर की विभिन्न साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं से भी ईश जी जुड़े रहे। वह मुरादाबाद की प्राचीन साहित्यिक संस्था हिंदी साहित्य सदन के संस्थापक सदस्य थे। उनका निधन 26 दिसंबर 2011 को उनके कानूनगोयान स्थित आवास पर हुआ।
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डॉ मनोज रस्तोगी
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मुरादाबाद के साहित्यकार स्मृतिशेष ललित मोहन भारद्वाज के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर केंद्रित डॉ मनोज रस्तोगी का आलेख

 







ललित मोहन भारद्वाज का जन्म मुरादाबाद में अपनी ननिहाल में 8 अगस्त 1936 ई को हुआ । आपके पितामह पं थान सिंह शर्मा, बुलंदशहर में हेड मास्टर थे। आप स्वनाम धन्य कवि थे । आपके पिता का नाम प्रभुदत्त भारद्वाज था। वह अलौकिक प्रतिभासम्पन्न, शिक्षाशास्त्री, विद्यानुरागी साहित्यप्रेमी और एचएसबी इंटर कालेज मुरादाबाद के प्रधानाचार्य थे। मुरादाबाद में आयोजित होने वाले अधिकांश सामाजिक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों की अध्यक्षता करने के कारण 'सभापति जी' नाम से भी विख्यात हो गए थे । आपकी माता जी डा० गिरिजा देवी भारद्वाज भी एक अच्छी कवयित्री थीं । आपके नाना पंडित अम्बिका प्रसाद शर्मा जी भी प्रख्यात शिक्षाविद तथा मुरादाबाद के अम्बिका प्रसाद इंटर कालेज के संस्थापक थे । इस तरह उन्हें साहित्यिक और कलात्मक संस्कार विरासत में ही प्राप्त हुए।

    आपकी प्रारम्भिक शिक्षा राजकीय इंटर कालेज में हुई। इस विद्यालय से आपने वर्ष 1951 में हाई स्कूल एवं वर्ष 1953 में इंटरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके पश्चात् आप उच्च शिक्षा प्राप्ति के लिए इलाहाबाद चले गये इलाहाबाद विश्व विद्यालय से वर्ष 1956 में आपने स्नातक, वर्ष 1958 में प्राचीन इतिहास एवं वर्ष 1960 में हिन्दी विषय में स्नातकोत्तर उपाधियां प्राप्त की। आपने वहीं एलएलबी में प्रवेश ले लिया लेकिन आकाशवाणी पूना केन्द्र में आपकी नियुक्ति वर्ष 1961 में हो जाने के कारण एक वर्ष उपरान्त आपको पढ़ाई छोड़नी पड़ी।  आप आकाशवाणी पूना में 1964 तक रहे, उसके बाद चार वर्ष लखनऊ केन्द्र में कार्यक्रम निष्पादक पद पर रहे। वर्ष 1968 में आपका स्नानान्तरण आकाशवाणी कोहिमा में हो गया । वर्ष 1969 में पिता जी के देहान्त के कारण आपको आकाशवाणी की सेवा से त्यागपत्र देना पड़ा और आप स्थायी रूप से मुरादाबाद आकर बस गये । यहाँ आकर आपने वंदना प्रिंटर्स नाम से प्रकाशन व मुद्रण व्यवसाय आरम्भ किया । वर्ष 1990 में आपको ब्रेन हेमरेज हो गया, जिसके कारण आपको यह व्यवसाय बंद करना पड़ा । लगभग डेढ़ वर्ष तक शारीरिक पीड़ा भोगने के बाद आपने औषधि व्यवसाय आरम्भ किया।

     इसी बीच दो जुलाई 1964 में आगरा निवासी पंडित जगन्नाथ प्रसाद शर्मा एडवोकेट की सुकन्या निर्मला भारद्वाज से आपका पाणिग्रहण संस्कार हुआ । आपके चार पुत्रियाँ नमिता, इरा कौशिक, हिमानी भारद्वाज , वाणी भारद्वाज एवं एक पुत्र चारु मोहन है। चारु मोहन मुम्बई में म्यूजिक डायरेक्टर हैं।

     साहित्यिक संस्कार तो उनमें प्रारम्भ से ही थे लेकिन इलाहाबाद में शिक्षाध्ययन के दौरान उन्होंने लेखन कार्य शुरू किया। इलाहाबाद में ही आपने विभिन्न नाटकों में अभिनय किया तथा अनेक नाटक एवं रेडियो रूपक लिखे, जिनका प्रसारण आकाशवाणी से हुआ । इलाहाबाद प्रवास के दौरान उन्हें महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला' तथा पंडित सुमित्रानंदन पंत का भरपूर आशीष मिला, जिससे उनकी प्रतिभा निखरती गई।

   आकाशवाणी पूना में कार्य करते हुए उन्होंने पूना फिल्म इंस्टीट्यूट द्वारा एस दिनकर के निर्देशन में निर्मित पहले सवाक् वृत्त चित्र 'गाँव की ओर' में मुख्य नायक की भूमिका भी की । आपने मुरादाबाद में अप्रैल 1973 में हिन्दी मासिक 'प्रभायन' का संपादन व प्रकाशन किया । यह पत्रिका नवनीत और कादम्बिनी के समकक्ष कही जा सकती है। कतिपय कारणवश कुछ समय पश्चात इसका प्रकाशन बंद करना पड़ा।

    स्वतंत्र रूप से आपका मुक्तक संग्रह 'प्रतिबिम्ब प्रकाशित हो चुका है तथा तीन कृतियाँ अप्रकाशित है । आपने मां दुर्गा की स्तुति में 108 मुक्तकों का सृजन भी किया । यह कृति प्रकाशनाधीन है।

    आपको विभिन्न संस्थाओं द्वारा समय समय पर सम्मानित भी किया जाता रहा है । 2 जनवरी 1995 को आपको साहू शिवशक्ति शरण कोठीवाल स्मारक समिति द्वारा  साहित्य के क्षेत्र में जिले के सर्वोच्च सम्मान से सम्मानित किया गया ।

   आप अनेक शिक्षण एवं साहित्यिक संस्थाओं से सम्बद्ध भी रहे । अंबिका प्रसाद इंटर कालेज मुरादाबाद के आप प्रबंधक रहे। इसके अतिरिक्त एचएसबी० इंटर कालेज के वरिष्ठ उपाध्यक्ष पद पर भी आप कई वर्षों तक रहे । आपका निधन 12 मार्च 2009 को आगरा में हुआ ।

✍️ डॉ मनोज रस्तोगी 

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मुरादाबाद के साहित्यकार स्मृतिशेष बहोरन सिंह वर्मा प्रवासी पर केंद्रित डॉ मनोज रस्तोगी का आलेख -----



बहोरनसिंह वर्मा 'प्रवासी का जन्म 20 दिसम्बर 1921 को जनपद मुरादाबाद (वर्तमान जनपद सम्भल) के  कस्बे  सिरसी में हुआ। आपके पिता सिपाही सिंह स्वर्णकारी का कार्य करते थे। प्रारम्भिक शिक्षा सिरसी में हुई । वर्ष 1936 में हिन्दी मिडिल, वर्ष 1937 में उर्दू मिडिल, वर्ष 1940 में विशेष योग्यता हिन्दी की परीक्षा पास की। इसके उपरान्त वह प्राइमरी टीचिंग की ट्रेनिंग के लिए आंवला चले गये। वहाँ से वर्ष 1941 में आने के बाद उनकी नियुक्ति नयी बस्ती मुरादाबाद स्थित नगर पालिका के स्कूल में प्राइमरी शिक्षक के रूप में हो गयी। नौकरी लगने के एक वर्ष बाद वर्ष 1941 में आपका विवाह चांदपुर ( जनपद बिजनौर) निवासिनी राजरानी वर्मा से हो गया। नौकरी के दौरान आपके हृदय में आगे पढ़ने की इच्छा उत्पन्न हुई, जिसके परिणामस्वरूप वर्ष 1950 में अंग्रेजी विषय लेकर आपने हाई स्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण की तथा वर्ष 1953 में शेष सभी विषयों से पुनः हाई स्कूल किया । मुरादाबाद के अनेक नगरपालिका स्कूलों में अध्यापन करते हुए आप वर्ष 1982 में प्रधानाध्यापक पद से सेवानिवृत्त हुए। इसके बाद भी कुछ वर्षों तक आपने केजीके इंटर कालेज के प्राइमरी विभाग में शिक्षक के रूप में कार्य किया।                        वर्ष 1940 में जब उन्होंने हिंदी विशेष योग्यता की परीक्षा उत्तीर्ण की उस समय उन्होंने अपने पाठ्यक्रम में निर्धारित कवियों को पूर्ण मनोयोग से पढ़ा। पढ़ते-पढ़ते उनमें कविता के अंकुर फूटने लगे और 'सरस्वती वंदना के रूप में उन्होंने पहली रचना लिखी । उन दिनों 'प्रवासी' जी दीवान का बाजार में रहा करते थे, वहीं एक दुकान पर रोज़ शाम को कुछ शायरों की महफिल हुआ करती थी। 'प्रवासी' जी अक्सर वहाँ जाया करते थे। धीरे-धीरे उनका रुझान उर्दू लेखन की ओर हो गया और वे शायरी करने लगे ।

     आजादी के बाद उनकी साहित्यिक प्रवृत्ति फिर से हिन्दी की ओर हुई और वह हिन्दी में काव्य रचना करने लगे। उनकी काव्य रचनाओं में न केवल आध्यात्म का, श्रृंगार रस का, पुट है वरन देश में व्याप्त सामाजिक विद्रपताओ, विषमताओं, शोषण तथा वर्तमान समस्याओं आदि का भी पुट मिलता है।

उनकी प्रथम काव्य कृति 'प्रवासी पंच सई' अशोक प्रकाशन मुरादाबाद द्वारा वर्ष 1981 में प्रकाशित हुई थी। इसकी भूमिका डॉ जयनाथ नलिन ने लिखी। इस कृति में उनके 504 दोहे संगृहीत है। दूसरी कृति "मंगला" डॉ प्रेमवती उपाध्याय के सद्प्रयासों से वर्ष 1999 में अशोक विश्नोई ने सागर तरंग प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की थी । इस कृति में उनके 57 भक्तिपद संगृहीत हैं। इसकी भूमिका उमेश पाल वर्णवाल 'पुष्पेंद्र' ने लिखी। तीसरी कृति "सीपज" डॉ इंदिरा गुप्ता के सद्प्रयासों से डॉ अजय अनुपम ने साहित्यिक संस्था हिन्दी साहित्य सदन द्वारा वर्ष 2000 में प्रकाशित की। इस कृति में उनकी 80 हिन्दी ग़ज़लें और 30 उर्दू ग़ज़लें संगृहीत हैं। इसकी भूमिका सुरेश दत्त शर्मा पथिक और डॉ आरिफ हसन खान ने लिखी।

 उनकी रचनाएँ डॉ गिरिराज शरण अग्रवाल द्वारा संपादित तथा डायमंड पाकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित हिन्दी की सर्वश्रेष्ठ गजलें, साहिल झांसवी द्वारा संपादित-हिन्दी-उर्दू की सर्वश्रेष्ठ गजलें, नज्में व मुक्तक 'महकते फूल' अतरंग प्रकाशन, रामपुर द्वारा प्रकाशित काव्य संग्रह 'इन्द्र धनुष, सागर तरंग प्रकाशन द्वारा प्रकाशित 'इकतीस अक्टूबर के नाम, शिव नारायण  भटनागर 'साकी' द्वारा संपादित काव्य संकलन 'उन्मादिनी', तथा डा. सुभाष  चन्द्र सक्सेना व डा. महेश दिवाकर द्वारा संपादित 'प्रणय गन्धा' आदि संकलनों में भी संगृहीत हैं

    इसके अतिरिक्त  समाज उत्थान, दशानन, जाहनवी, मेढ़ संदेश, बृज समाचार, अरुण, नवज्योति, सहकारी युग, विनायक,संकल्पिका, अन्तःकरण, रवि मित्र, आदर्श कौमुदी आदि अनेक पत्र-पत्रिओं व स्मारिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं । आपकी अप्रकाशित कृतियाँ वेदना, गजल मंजूषा, मुक्तक शतक, शतपुष्पी, जलते फूल, चुभती अलियां, बाल मंजरी आदि हैं ।

      प्रवासी जी की साहित्यिक सेवाओं को दृष्टि में रखते हुए स्थानीय संस्था राष्ट्र भाषा हिन्दी प्रचार समिति  द्वारा वर्ष १९८२ में राजर्षि पुरूषोत्तम दास टंडन जन्मशती समारोह में उनका नागरिक अभिनंदन भी किया गया। इसके अतिरिक्त वर्ष १९८८ में  श्री यशपाल सिंह स्मृति साहित्य शोध पीठ द्वारा भी उन्हें सम्मानित किया जा  चुका है ।

      आपका निधन वर्ष 2004 में दीपावली के दिन 12 नवम्बर को हुआ ।

    ✍️ डॉ मनोज रस्तोगी

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मुरादाबाद के साहित्यकार स्मृतिशेष दुर्गा दत्त त्रिपाठी पर केंद्रित डॉ मनोज रस्तोगी का आलेख



 हिन्दी के प्रख्यात कवि, कहानीकार, पत्रकार और लेखक दुर्गादत्त त्रिपाठी का जन्म 19 मई 1906 को बरेली में हुआ था । उनके पूर्वज मूलतः अल्मोड़ा जिले के चौसर के निवासी थे । किन्तु कालान्तर में वे मुरादाबाद जनपद के चंदौसी नगर में आ गये । आपके पिता श्री गोविन्द दत्त त्रिपाठी रेल कर्मचारी थे । आपके पितामह श्री गोपाल दत्त त्रिपाठी अध्यापक थे, उन्नति करते- करते इंस्पैक्टर ऑफ स्कूल्स हो गये । वह भी एक अच्छे कवि थे । उनके नाना श्री हरदेव पंत आगरा के महाराजा के राजगुरू थे ।

    आपकी प्रारम्भिक शिक्षा काशी में हुई । सैन्ट्रल स्कूल काशी से एडमीशन परीक्षा कक्षा 10 उत्तीर्ण की । उनके पश्चात् रामजस इंटर कालेज, तथा रामजस कालेज आनन्द पर्वत दिल्ली से इंटरमीडिएट तथा बीए की परीक्षा उत्तीर्ण कर महात्मा गाँधी की 'पढ़ना छोड़ो' आज्ञा पर पढ़ाई छोड़कर कांग्रेस के स्वयं सेवक बन गये ।

      इसी दौरान वह फिल्मों में काम करने के विचार से द्वितीय महायुद्ध के समय कलकत्ता चले गये और वहाँ कुछ समय तक रहे । वहाँ उनकी भेंट जाने-माने फिल्म निर्देशक श्री देवकी कुमार बोस से हुई । वे त्रिपाठी जी की योग्यता से बहुत प्रभावित हुए । उन्होंने त्रिपाठी जी को अपने यहाँ हिन्दी उच्चारण विभाग में सहयोगी के रूप में सवेतन काम दिया और फिल्म 'रामानुज में सवेतन भूमिका भी दी । कलकत्ता में रहते हुए उन्होंने हिन्दी की 'मतवाला' और अंग्रेजी की 'मॉर्डन रिव्यू' जैसी स्तरीय पत्रिकाओं का संपादन भी किया । कलकत्ता प्रवास के दौरान ही उनके पिता श्री का देहान्त हो गया । इस प्रकार अपने पिताश्री की दिवंगति से त्रिपाठी जी पर अकस्मात् अपने परिवार का भार आ पड़ा । उघर द्वितीय महायुद्ध अपने पूरे जोरों पर था । लेखकों पर ब्रिटिश सरकार भाँति-भांति के अत्याचार कर रही थी । पुलिस आये दिन उनकी तलशियाँ लेती और उनकी पाण्डुलिपियाँ उठाकर ले जाती । उन सब प्रतिकूल परिस्थितियों को देखते हुए वे विवश कर मुरादाबाद लौट आये। कलकत्ता से वापस आने के उपरान्त उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित होने वाले अपने समय के प्रसिद्ध हिन्दी मासिक महारथी में सहायक सम्पादक पद पर लगभग 3 वर्ष तक कुशलता पूर्वक कार्य किया । 

   आजीविका की दृष्टि से सम्पादन कार्य में त्रिपाठी जी ने यह अनुमव किया कि उससे उनकी और उनके परिवार की आवश्यकताओं की पूर्ति सम्भव नहीं हो सकेगी इस स्थिति में उन्होंने अपने पिताश्री की भांति रेल विभाग में ही नौकरी की । वे वहाँ गार्ड के रूप में सन 1961 तक सेवारत रहे ।

    हिन्दी साहित्य के प्रति उनकी रुचि विद्यार्थी जीवन से जागरूक हो चुकी थी। काशी में शिक्षा प्राप्ति के दौरान अध्यापक के रूप में हास्य रस के सुविख्यात कवि कृष्णदेव गौड़,बेढब बनारसी और ब्रज भाषा के सुकवि श्री भगवान दीन 'दीन' का उन्हें स्नेह प्राप्त हुआ । पाण्डेय बेचन शर्मा 'उग्र, विनोद शंकर व्यास, लक्ष्मीनारायण मिश्र, कमलापति त्रिपाठी उनके सहपाठी तथा मित्र रहे थे । काशी में ही श्री जयशंकर प्रसाद, श्री रामनाथ 'सुमन' ,पंडित जनार्दन झा द्विज, पंडित शिवपूजन सहाय, शिवदास गुप्त 'कुसुम', आदि स्थापित साहित्यकारों की महत्वपूर्ण संगति में रहे । इसके अतिरिक्त उन्हें पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला', पं. सुमित्रानंदन पंत, श्री भवानी प्रसाद मिश्र, पं. अनूप शर्मा 'अनूप, श्री अमृत लाल नागर, डॉ. इलाचन्द्र जोशी, आचार्य चतुरसेन शास्त्री आदि साहित्य - महारथियों का भी सान्निध्य प्राप्त हुआ था । 'महारथी' पत्रिका में कार्य करते हुए वह हिन्दी के महान कथाकार जैनेन्द्र कुमार तथा भगवती प्रसाद वाजपेयी के सम्पर्क में आये । इन समस्त साहित्यकारों के सनिध्य का प्रभाव उनकी लेखन एवं रचनात्मक शैली पर पड़ा । उन्होंने न केवल काव्य विधा में लेखन किया अपितु वह एक सिद्धहस्त कहानीकार उपन्यासकार एवं निबन्धकार भी थे । उनकी प्रकाशित कृतियों में गाँधी संवत्सर (महाकाव्य) शकुन्तला (खण्ड काव्य), तीर्थ शिला (काव्य संग्रह), अमर सत्य (उपन्यास) तथा मंटो मिला था (उपन्यास), स्वर्ग( महाकाव्य), सन्धि और विच्छेद(खण्ड काव्य),निर्बलता का शाप ( महाकाव्य) , कल्पदुहा ( काव्य) उल्लेखनीय हैं। इसके अतिरिक्त आपने  शंकराचार्य, आरोहा, आसव, अनुजा,  सौम्या, कृतम्भरा, भूयसी, श्रेयम्वदा,  मधुलिपि, पत्रांक, रक्त ग्रन्थि, वृन्दा, मामिका, यज्ञशेप, कलापी, प्रेयति, सघस्का,त्वदीया,उर्वरा, वेशिका, छन्दा, कदित्सा,कन्था, गतिका, स्वरन्यास, प्रत्यय, प्रकाम, उपनाह, गेया, शरण्या, प्रत्यक्ष, मुहूर्त, युगीन, निबन्ध गीत, गीतिका, वेणुजा, निशार्क, प्रेयम्वदा, परिचित और प्रशस्तियाँ, अनुश्रतियाँ ( सभी काव्य ), उत्तरदायी,जहां बंटवारा नहीं होता, बर्लिन की रक्तरेख (सभी उपन्यास) क्रमगत, विश्वास का लक्ष्य, जीने का सहारा, उतरा हुआ मद, अन्तरे अनेक टेक एक( सभी कहानी संग्रह) कृतियों की भी रचना की । इनमें से अधिकांश अप्रकाशित हैं ।

     श्री त्रिपाठी जी की दिल्ली और उत्तर प्रदेश की अनेक पत्र-पत्रिकाओं में कहानी एवं कविता प्रायः प्रकाशित होती रही है । मुरादाबाद से प्रकाशित 'अरुण' और 'प्रदीप'  से आपका घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है। आपका निधन 30 जनवरी 1979 को हुआ।


✍️ डॉ मनोज रस्तोगी

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मुरादाबाद के साहित्यकार स्मृतिशेष हुल्लड़ मुरादाबादी पर केंद्रित डॉ मनोज रस्तोगी का आलेख -----






हास्य व्यंग्य कवि हुल्लड़ मुरादाबादी एक ऐसे रचनाकार रहे जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से न केवल श्रोताओं को गुदगुदाते हुए हास्य की फुलझड़ियां छोड़ीं बल्कि रसातल में जा रही राजनीतिक व्यवस्था पर पैने कटाक्ष भी किए। सामाजिक विसंगतियों को उजागर किया तो आम आदमी की जिंदगी को समस्याओं को भी अपनी रचनाओं का विषय बनाया।  पदम् श्री गोपालदास नीरज के शब्दों में कहा जाए तो  हुल्लड़ मुरादाबादी की ख्याति हास्य व्यंग विधा के एक श्रेष्ठ कवि के रूप में है लेकिन उन्होंने जो दोहे और गजलें कहीं हैं वे उन्हें एक दार्शनिक कवि के रूप में भी स्थापित करने के लिए पर्याप्त हैं। हास्य के लहजे में कुछ शेर तो उन्होंने ऐसे कहे हैं जो बेजोड़ हैं और जो हजार हजार लोगों की जुबान पर हैं। हिंदी में तो कोई भी हास्य का ऐसा कवि नहीं है जो उनकी ग़ज़लों के सामने सिर ऊंचा करके खड़ा हो सके।

हिंदी के हास्य कवियों की जब कभी चर्चा होती है तो उसमें हुल्लड़ मुरादाबादी का नाम भी प्रमुखता से लिया जाता है । जी हां , एक समय तो ऐसा था जब  हुल्लड़ मुरादाबादी  अपनी हास्य कविताओं से पूरे देश मे हुल्लड़ मचाते फिरते थे। कवि सम्मेलन हो या किसी पत्रिका का हास्य विशेषांक छपना हो तो हुल्लड़ मुरादाबादी का होना जरूरी समझा जाता था । रिकॉर्ड प्लेयर पर अक्सर उनकी रचनाएं बजती हुई सुनने को मिलती थीं ।दूरदर्शन का कोई हास्य कवि सम्मेलन भी हुल्लड़ जी के बिना अधूरा समझा जाता था। इस तरह अपनी रचनाओं के माध्यम से हुल्लड़ मुरादाबादी ने पूरे देश में अपनी एक विशिष्ट पहचान कायम की ।

आजादी से पहले मुरादाबाद आकर बसा था परिवार

हुल्लड़ मुरादाबादी का जन्म 29 मई 1942 को गुजरांवाला (जो अब पाकिस्तान में है )हुआ था।  उनके पिता श्री सरदारी लाल चड्डा बर्तनों का व्यवसाय करते थे। उनकी माता जी का नाम विद्यावंती था। यह संभवतः कम लोगों को ही मालूम होगा कि आप का वास्तविक नाम सुशील कुमार चड्ढा था।  भारत के आजाद होने से पहले ही आपका पूरा परिवार मुरादाबाद आकर बस गया था। 

  चार भाइयों और तीन बहनों  विजय कुमार चड्ढा, सुभाष चड्ढा, अशोक चड्ढा, शशि कोहली, सुधा आनन्द और नीलम सेठी में सबसे बड़े हुल्लड़ मुरादाबादी की शिक्षा दीक्षा मुरादाबाद में ही हुई। सन 1958 में आपने पारकर इंटर कॉलेज से हाईस्कूल तथा वर्ष 1960 में इंटरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण की थी।बीएससी सन 1965 में तथा सन 1971 में हिंदी विषय से स्नातकोत्तर की परीक्षा स्थानीय हिंदू डिग्री कॉलेज से  उत्तीर्ण की । इसी बीच 1969 में आपका विवाह हो गया। वर्ष 1970-71 में आपने एस एस इंटर कॉलेज तथा 1971-72 में आरएन इंटर कॉलेज में अध्यापन कार्य किया । इसी बीच 30 नवम्बर 1969 को उनका विवाह अजमेर निवासी पन्ना लाल अरोड़ा की सुकन्या कृष्णा के साथ हुआ । उनसे उन्हें एक सुपुत्र नवनीत और दो सुपुत्रियाँ सोनिया व मनीषा चड्ढा की प्राप्ति हुई। ( नवनीत का असमय निधन 2018 में हो गया। वर्तमान में सोनिया दुबई और मनीषा पूना में निवास कर रही हैं। ) 

 पहली बार लाल किले पर 1962 में पढ़ी कविता

 पारकर इंटर कॉलेज में जब वह पढ़ते थे तो वहां हिंदी के एक अध्यापक पंडित मदन मोहन व्यास थे जो  एक चर्चित साहित्यकार व संगीतकार भी थे उन्हीं की प्रेरणा व निर्देशन में हुल्लड़ मुरादाबादी का साहित्यिक जीवन प्रारंभ हुआ।  वह दिवाकर उपनाम से वीर  रस की कविताएं लिखने लगे।  2 दिसम्बर 1962 में आपने पहली बार किसी स्तरीय मंच से काव्य पाठ किया । भारत चीन महायुद्ध के संदर्भ में उस वर्ष राष्ट्रीय रक्षा कोष सहायतार्थ एक अखिल भारतीय वीर रस कवि सम्मेलन लालकिला दिल्ली में आयोजित किया गया जिसकी अध्यक्षता महाकवि रामधारी सिंह दिनकर कर रहे थे । उक्त कवि सम्मेलन में एक श्रोता के रूप में हुल्लड़ जी भी मौजूद थे । कविसम्मेलन के दौरान राष्ट्र की रक्षा के लिए कुछ देने का प्रश्न आया तो उन्होंने अपनी एक सोने की अंगूठी उतार कर दे दी तथा देशभक्ति से ओतप्रोत एक वीर रस की रचना भी पढ़ी, जिसकी पंक्तियां थी -

 तुम वीर शिवा के वंशज हो, फिर रोष तुम्हारा कहां गया।

बोलो राणा की संतानों, वह जोश तुम्हारा कहां गया।।

 जाकर देखो सीमाओं पर, जो आज कुठाराघात हुआ ।

जाकर देखो भारत मां के, माथे पर जो आघात हुआ।।

गर अब भी खून नहीं ख़ौला, गर अब तक जाग न पाए हो ।। 

मुझको विश्वास नहीं आता, तुम भारत मां के जाए हो ।।

इसके बाद तो न जाने कितने कवि सम्मेलनों में रचना पाठ किया और एक तरह से वे हास्य के पर्याय बन गए । आपने मुरादाबाद के कुछ बुद्धिजीवियों व रचनाकारों को साथ लेकर हास परिहास नामक संस्था का भी गठन किया। वर्ष 1971 में यहीं से हास परिहास नामक एक मासिक पत्रिका भी संपादित की जो वर्ष 1975 तक प्रकाशित होती रही।  

 फिल्मों में भी किया अभिनय

आपकी रचनाओं की ख्याति को देखते हुए वर्ष 1977 में मशहूर हास्य अभिनेता व निर्माता निर्देशक आई एस जौहर ने उन्हें फिल्मों में लिखने का ऑफर भी दिया। उस समय वह नसबंदी फिल्म का निर्माण कर रहे थे।  उन्होंने हुल्लड़ जी का उसमें एक गीत क्या मिल गया सरकार तुझे इमरजेंसी लगा कर लिया जिसे संगीतबद्ध कल्याणजी-आनंदजी ने किया तथा महेंद्र कपूर व मन्ना डे ने गाया। इस तरह धीरे-धीरे उनका फिल्मों की ओर झुकाव होने लगा और वर्ष 1979 में वह मुरादाबाद छोड़कर मुंबई जाकर स्थाई रूप से रहने लगे। वहां प्रसिद्ध अभिनेता निर्देशक निर्माता मनोज कुमार को अपना गुरु बनाया तथा उन्हीं की प्रेरणा से आगे बढ़ते गए । फिल्म सन्तोष में भी उन्होंने एक अच्छी भूमिका निभाई । इससे पूर्व शिवानी की कहानी पर आधारित फिल्म बंधन बांहों का में भी उन्होंने अभिनय किया। दरअसल अभिनय करने के अंकुर भी उनमें छात्र जीवन में ही फूटे । वर्ष 1960-61 में हिंदू डिग्री कॉलेज की हिंदी साहित्य परिषद द्वारा आयोजित एकांकी नाटक प्रतियोगिता में उन्हें सर्वोत्तम अभिनय करने पर प्रथम पुरस्कार प्राप्त हुआ था । इसके अतिरिक्त भगवतीचरण वर्मा के एकांकी नाटक दो कलाकार , ऋषि भटनागर रचित सफर के साथी, डॉ शंकर शेष रचित एक और द्रोणाचार्य में भी  उन्होंने प्रमुख भूमिकाएं अभिनीत की।

 सन 1989 में सपरिवार लौटे मुरादाबाद

परिवार के साथ मुंबई चले जाने के बाद भी मुरादाबाद से उनका जुड़ाव बना रहा। यही कारण रहा कि वर्ष 1989 में  गर्दिश के दिनों में वह पुन: सपरिवार यहां वापस लौट आए। मुंबई से जब वह वापस मुरादाबाद आए तो साहित्य के प्रति उनका मन उचट सा गया था। उनका साहित्य से पुन: रिश्ता कायम हुआ दैनिक स्वतंत्र भारत के माध्यम से।  अपने मित्र चुन्नी लाल अरोड़ा के बहुत आग्रह के बाद उन्होंने स्वतंत्र भारत के लिए लिखना शुरू किया। उसके बाद फिर उन्होंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा।  वर्ष 2000 में  वह फिर मुरादाबाद की पंचशील कालोनी छोड़कर पूरी तरह मुम्बई में बस गए।  12 जुलाई 2014 को उन्होंने मुंबई के  गोरेगांव स्थित अपने आवास पर अंतिम सांस ली ।

 प्रकाशित साहित्य एवं सम्मान

हुल्लड़ मुरादाबादी की  प्रमुख कृतियों में इतनी ऊंची मत छोड़ो, मैं भी सोचूं तू भी सोच, अच्छा है पर कभी कभी, तथाकथित भगवानों के नाम,सत्य की साधना, त्रिवेणी , हज्जाम की हजामत, सब के सब पागल हैं , हुल्लड़ के कहकहे ,हुल्लड़ का हंगामा,   हुल्लड़ की श्रेष्ठ हास्य व्यंग रचनाएं ,हुल्लड़ सतसई, हुल्लड़ हजारा, क्या करेगी  चांदनी, यह अंदर की बात है,जिगर से बीड़ी जला ले  मुख्य हैं । एचएमबी द्वारा आपकी हास्य रचनाओं के अनेक रिकॉर्ड्स एवं कैसेट्स रिलीज हो चुके हैं जिनमें प्रमुख रूप से हंसी का खजाना , हुल्लड़ का हंगामा , हुल्लड़ के कहकहे, हुल्लड़ मुरादाबादी से मिलिए बेहद पसंद की गई हैं । आपको विभिन्न पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया जिनमें प्रमुख रूप से काका हाथरसी पुरस्कार, महाकवि निराला सम्मान, हास्य रत्न अवार्ड, कलाश्री पुरस्कार, ठिठोली पुरस्कार, इंडियन जेसीज का टी ओ वाई पी अवार्ड  मुख्य हैं। 

 :::::;;;; प्रस्तुति :::::::

 


डॉ मनोज रस्तोगी

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 मुरादाबाद 244001

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मुरादाबाद के साहित्यकार स्मृतिशेष वीरेन्द्र कुमार मिश्र पर केंद्रित डॉ मनोज रस्तोगी का आलेख

 




श्री वीरेंद्र कुमार मिश्र
का जन्म मुरादाबाद में 3 फरवरी 1922 (शैक्षिक अभिलेखानुसार 1 जुलाई 1922) को हुआ। आपके पितामह डॉ मुन्नालाल उस समय के चर्चित चिकित्सक थे तथा पिता पंडित मुरारी लाल रेल विभाग में कार्यरत थे। आप की माता जी का नाम सावित्री देवी था।

 श्री मिश्र ने राजकीय हाई स्कूल नजीबाबाद (जिला बिजनौर) से कक्षा 3 व 4 की परीक्षा उत्तीर्ण की। उसके बाद उन्होंने राजकीय इंटर कॉलेज मुरादाबाद में प्रवेश ले लिया। यहां से वर्ष 1938 में हाईस्कूल और वर्ष 1940 में इंटरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण की। वर्ष 1941 में अपने प्रयाग केंद्र से साहित्य रत्न की उपाधि प्राप्त की। वर्ष 1945 में व्यक्तिगत परीक्षार्थी के रूप में सीनियर कैंब्रिज की परीक्षा उत्तीर्ण की। उसके पश्चात एक विषय अंग्रेजी से इंटरमीडिएट की परीक्षा वर्ष 1946 में उत्तीर्ण की तथा वर्ष 1949 में एक विषय अंग्रेजी लेकर स्नातक किया। वर्ष 1950 में बलवंत राजपूत कॉलेज आगरा से तीन माह का रिफ्रेशर कोर्स किया और उसके पश्चात वर्ष 1951 में आगरा विश्वविद्यालय से हिंदी में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की । इतने अध्ययन के बाद भी आप को सन्तोष नहीं हुआ और आप ने वर्ष 1954 में केजीके महाविद्यालय में स्नातकोत्तर कक्षा अंग्रेजी में प्रवेश ले लिया परंतु एक अंग्रेजी प्रवक्ता जो ईसाई थे, से हिंदू धर्म की आलोचना करने पर विवाद हो गया। परिणाम यह हुआ कि उनकी उपस्थिति कम कर दी गई और वे परीक्षा में नहीं बैठ सके। बाद में वर्ष 1957 में उन्होंने संस्कृत विषय में स्नातकोत्तर उपाधि आगरा विश्वविद्यालय से प्राप्त की। वर्ष 1964 में डॉ गोविंद त्रिगुणायत के निर्देशन में हिंदी के नवीनतम नाट्यरूप- उद्भव विकास और शिल्प विधि विषय पर शोध हेतु आप की रूपरेखा स्वीकृत हुई परंतु विद्यालय से सेवा मुक्त कर दिए जाने से उत्पन्न विवाद में उलझ जाने के कारण आपका शोध कार्य पूर्ण न हो सका।

    वर्ष 1944 में आपकी अस्थाई नियुक्ति जूनियर हाई स्कूल मुरैना (ग्वालियर) में हो गई लेकिन तीन माह पश्चात वह नौकरी छोड़कर मुरादाबाद आ गए। फरवरी 1945 में आपके मामा श्री कैलाश चंद्र त्रिवेदी जो झांसी में डिप्टी कलेक्टर थे, ने झांसी में मिलिट्री इंजीनियरिंग सर्विस में ऑफिसर ट्रेनिंग के लिए भर्ती करा दिया। नौ  माह बाद द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हो जाने के कारण यह ट्रेनिंग भी समाप्त हो गई । बाद में वर्ष 1946 में वह ऋषिकुल जूनियर हाई स्कूल कटघर मुरादाबाद में अध्यापक हो गए। वर्ष 1947 में उनकी नियुक्ति एच एस बी इंटर कॉलेज मुरादाबाद में अध्यापक के पद पर हो गई जहां से वर्ष 1948 में उनकी नियुक्ति हैविट मुस्लिम इंटर कॉलेज मुरादाबाद में हो गई। वर्ष 1964 में विद्यालय के तत्कालीन प्रबंधक ने रुष्ट होकर उन्हें निलंबित कर दिया जिसके खिलाफ वह उच्च न्यायालय चले गए । इसी समय उन्होंने लाला राम कीर्ति शरण सोशलिस्ट के कहने पर अपने अंतरंग मित्र  शिवशंकर सक्सेना तथा कुमार आनंद सिंह के सहयोग से लाइनपार में आचार्य नरेंद्र देव श्रमिक जूनियर हाई स्कूल की स्थापना की। वर्ष 1965 में उच्च न्यायालय के आदेश से उनका निलंबन समाप्त हो गया और उन्होंने पुनः हैबिट मुस्लिम इंटर कॉलेज में अध्यापक के पद पर कार्यभार ग्रहण कर लिया। वर्ष 1982 में वह सेवानिवृत्त हो गए।

     वर्ष 1948 जनवरी में श्री मिश्र का विवाह डॉ रामचंद्र शर्मा निवासी नवाबपुरा मुरादाबाद की पुत्री प्रकाश देवी से हुआ। आपके बड़े सुपुत्र मधुप मिश्र वर्तमान में रेती स्ट्रीट में ही निवास कर रहे हैं । छोटे सुपुत्र महेंद्र मिश्र इटौंजा (लखनऊ) में एक विद्यालय संचालित कर रहे हैं। एक पुत्र मनोज मिश्र का निधन हो चुका है। आपकी तीन पुत्रियों रेखा, पूर्णिमा और रीता में पूर्णिमा का निधन हो चुका है।

      छात्र जीवन में पंडित अंबिका प्रसाद जी, पंडित मूल चंद्र शर्मा तथा हिंदी शिक्षक पंडित रघुनंदन प्रसाद जी की प्रेरणा से साहित्य के प्रति रुचि जागृत हुई और वह लेखन कार्य करने लगे। वर्ष 1940 में उन्होंने विद्यालय के वार्षिक उत्सव में मंचन के लिए लघु नाटक 'उद्धार' की रचना की। इसके बाद उन्होंने अनेक कहानियों, कविताओं और नाटकों की रचना की। वर्ष 1958 में उनकी प्रथम नाट्य कृति छत्रपति शिवाजी प्रकाशित हुई । इस कृति का द्वितीय संस्करण वर्ष 1990 में प्रकाशित हुआ। उनका कहानी संग्रह पुजारिन वर्ष 1959 में प्रकाशित हुआ। इसमें उनकी 14 कहानियां संकलित हैं। इस कृति का द्वितीय संस्करण वर्ष 1992 में प्रकाशित हुआ इस कृति की भूमिका डॉ गोविंद त्रिगुणायत ने लिखी। उनकी इस कृति का समीक्षात्मक अध्ययन वर्ष 1995 में (लेखक - जयप्रकाश तिवारी जेपेश) अहिवरण प्रकाशन नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित हुआ। वर्ष 1990 में नाटक गुरु गोविंद सिंह, वर्ष 1992 में नाटक सम्राट हर्ष और आचार्य चाणक्य प्रकाशित हुए । उनकी अप्रकाशित नाट्यकृतियों में शेरशाह सूरी और विक्रमादित्य उल्लेखनीय हैं । उन्होंने हाई स्कूल, प्रथमा और अन्य समकक्ष परीक्षाओं के लिए उपयोगी पुस्तक विनोदिनी हिंदी साहित्य सफलता की भी रचना की।

       नाटक छत्रपति शिवाजी के लिए शारदा विद्यापीठ द्वारा उन्हें साहित्य वाचस्पति उपाधि से सम्मानित किया गया।इसके अतिरिक्त  साहू शिव शक्ति  शरण कोठीवाल स्मारक समिति मुरादाबाद समेत अनेक संस्थाओं द्वारा उन्हें समय-समय पर सम्मानित भी किया जाता रहा। उनका निधन 28 अप्रैल 1999 को हुआ।


 ✍️ डॉ मनोज रस्तोगी

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मुरादाबाद के साहित्यकार स्मृतिशेष राजेंद्रमोहन शर्मा श्रृंग पर केंद्रित डॉ मनोज रस्तोगी का आलेख ---

 





श्री राजेंद्र मोहन शर्मा श्रृंग 
का जन्म अपनी ननिहाल चंदौसी में ज्येष्ठ कृष्णा अमावस्या विक्रमी संवत 1991 तदनुसार 12 जून 1934 को हुआ। आपके पिता पंडित रामगोपाल शर्मा झांसी में नायब तहसीलदार थे। आप मूल रूप से काशीपुर के रहने वाले थे। वर्ष 1958 में आप मुरादाबाद में आकर बस गए। आपकी माता जी का नाम जानकी देवी शर्मा था।

आप की प्रारंभिक शिक्षा झांसी तथा काशीपुर में हुई। वर्ष 1950 में आपने उदय राज हिन्दू हाई स्कूल काशीपुर से हाई स्कूल, वर्ष 1952 में श्यामसुंदर मैमोरियल कॉलेज चंदौसी से इंटरमीडिएट, वर्ष 1954 में इसी कॉलेज से बीए, वर्ष 1971 में हिंदू कॉलेज मुरादाबाद से हिंदी में स्नातकोत्तर की परीक्षाएं उत्तीर्ण कीं। स्नातक की उपाधि प्राप्त करने के पश्चात 24 जुलाई 1954 को विद्युत विभाग में उपखंड अधिकारी मैनपुरी कार्यालय में पर्यवेक्षक पद पर आप की पहली नियुक्ति हुई। विद्युत विभाग की सेवा छोड़कर वर्ष 1957 में आपने उत्तर रेलवे प्रधान कार्यालय बड़ौदा हाउस नई दिल्ली की सामान्य शाखा में लिपिक पद पर कार्यभार ग्रहण कर लिया। वर्ष 1958 में आप का स्थानांतरण मुरादाबाद हो गया। विभिन्न पदों पर कार्य करने के उपरांत वर्ष 1996 में आप अधीक्षक यांत्रिक शाखा के पद से सेवानिवृत्त हुए।

 5 दिसंबर 1962 को मुरादाबाद के मोहल्ला किसरौल, दीवान का बाजार निवासी वैद्य विशम्भर नाथ त्रिवेदी की सुकन्या लक्ष्मी त्रिवेदी से आपका विवाह हुआ। आप के चार पुत्र अनुराग मिश्र, मुकुल मिश्र, पराग मिश्र, दीपक मिश्र तथा दो पुत्रियां अल्पना शर्मा तथा गरिमा शांख्यधार हैं।

 वर्ष 1950 में जब वह हाई स्कूल के छात्र थे, आपकी रुचि लेखन कार्य की ओर प्रवृत हुई और वह कविताएं, लेख, कहानी, रेखाचित्र, संस्मरण, एकांकी लिखने लगे। उनकी रचनाएं देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं साहित्य संदेश (आगरा), सरस्वती संवाद (आगरा ) , स्वतंत्र भारत( लखनऊ), भारत( प्रयाग),  आज(वाराणसी), नवयुग (जयपुर), उल्का (लखनऊ), आदर्श (कोलकाता), विश्वज्योति (होशियारपुर), लोकतंत्र (काशीपुर), नवनीत( मुंबई), नवभारत टाइम्स (दिल्ली), प्रदेश पत्रिका (मुरादाबाद) में प्रकाशित भी हुई । उनकी काव्य रचनाएं श्रृंग, कहानियां ऋतुराज और हास्य व्यंग्य कविताएं मच्छर मुरादाबादी उपनाम से  प्रकाशित हुई। स्वतंत्र रूप से उनका प्रथम गीत संग्रह 'अर्चना के गीत' वर्ष 1960 में प्रकाशित हुआ। एक लंबे समय अंतराल के पश्चात मुरादाबाद के साहित्यकार योगेंद्र वर्मा व्योम के सद्प्रयासों से प्रबंध काव्य 'शकुंतला' और गीत संग्रह 'मैंने कब ये गीत लिखे हैं' वर्ष 2007 में प्रकाशित हुए। उनकी अप्रकाशित रचनाओं में मुक्तक शतक (मुक्तक संग्रह), गहरे पानी पैठ (लघुकथा संग्रह), श्रृंगारिकता( मुक्त छंद), सीख बड़ों ने हमको दी (बालोपयोगी कविताएं), भूली मंजिल भटके राही, अंबर के नीचे (कहानी संग्रह), अंतर्दृष्टि , लेखांजलि, साहित्य के गवाक्ष में मुरादाबाद (मुरादाबाद के साहित्यकारों के व्यक्तित्व व कृतित्व पर विवेचनात्मक लेख) उल्लेखनीय हैं। इसके अतिरिक्त उनकी रचनाएं तीर और तरंग, उन्मादिनी, स्वप्न गीत, जय जवान जय किसान, युद्ध नद के किनारे, ज्योति पुरुष, नई काव्य प्रतिभाएं एवं 31 अक्टूबर के नाम आदि साझा संकलनों में भी प्रकाशित हुईं। उन्होंने मोदी जीरॉक्स रामपुर के तकनीकी कार्यक्रम लीडरशिप थ्रू क्वालिटी की तीन अंग्रेजी पुस्तकों  का हिंदी अनुवाद भी किया। उन्होंने एक हस्तलिखित मासिक पत्र 'साहित्य संवाद' का भी संपादन किया। आकाशवाणी के रामपुर केंद्र से भी उनकी रचनाओं का समय-समय पर प्रसारण होता रहा।


 *हिन्दी साहित्य संगम का किया गठन*

 वर्ष 1960 में उन्होंने स्थानीय साहित्यकारों के साथ 'हिन्दी साहित्य संघ' की स्थापना की। इस संस्था के माध्यम से वह समय-समय पर काव्य गोष्ठियों का आयोजन करते रहे। वर्ष 1964 में इस संस्था का नाम 'हिंदी साहित्य संगम' कर दिया गया। वर्तमान में भी यह संस्था संचालित हो रही है। इस संस्था  द्वारा प्रत्येक माह के प्रथम रविवार को काव्य गोष्ठी का आयोजन किया जाता है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक वर्ष हिन्दी दिवस की पूर्व संध्या 13 सितंबर को एक साहित्यकार को हिंदी साहित्य गौरव सम्मान से सम्मानित किया जाता है। प्रत्येक वर्ष दिसंबर माह में एक साहित्यकार को श्री राजेंद्र मोहन शर्मा श्रृंग स्मृति सम्मान से सम्मानित किया जाता है। वर्तमान में इसके अध्यक्ष राम दत्त द्विवेदी हैं।

 *पंडित नेहरू की स्मृति में प्रकाशित किया था साझा काव्य संग्रह महामानव नेहरू* 

पंडित जवाहरलाल नेहरू के निधन पर वर्ष 1964 में उन्होंने हिंदी साहित्य संगम की ओर से साझा काव्य संग्रह 'महामानव नेहरू' प्रकाशित किया था। इसका संपादन उन्होंने, सुशील दिवाकर (हुल्लड़ मुरादाबादी) और संदेश भारती ने किया था। प्रकाशन समिति के अध्यक्ष ब्रह्मानंद राय, उपाध्यक्ष मनोहर लाल वर्मा तथा मोहदत्त साथी थे। इस संकलन में 74  साहित्यकारों की रचनाएं शामिल हैं। इस संकलन का विमोचन 27 मई 1965 को हिंदू महाविद्यालय के सभागार में केजीके महाविद्यालय मुरादाबाद के तत्कालीन हिंदी विभागाध्यक्ष महेंद्र प्रताप के कर कमलों द्वारा हुआ।

 *विभिन्न संस्थाओं से रहा जुड़ाव* 

 श्रृंग जी ने अखिल भारतीय स्वतंत्र लेखक मंच नई दिल्ली की जनपदीय शाखा की मुरादाबाद में स्थापना की तथा उसके अध्यक्ष रहे । इसके अतिरिक्त वह राष्ट्रभाषा हिंदी प्रचार समिति, एकता साहित्यिक मंच और विविध कला संगम आदि संस्थाओं से भी जुड़े रहे।

  *विभिन्न संस्थाओं ने किया सम्मानित*

 अखिल भारतीय कला संस्कृति साहित्य परिषद मथुरा द्वारा उन्हें उनकी कृति अर्चना के गीत पर साहित्यालंकार की उपाधि से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त साहू शिव शक्ति शरण कोठीवाल स्मारक समिति, ज्योत्सना, पुरालेखन केंद्र, सागर तरंग प्रकाशन, केंद्रीय सचिवालय हिंदी परिषद नई दिल्ली, सरस्वती साधना परिषद मैनपुरी, विप्रा कला साहित्य मंच द्वारा भी उन्हें सम्मानित किया गया। उनका निधन 17 दिसंबर 2013 को हो गया।

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मुरादाबाद के साहित्यकार स्मृति शेष बलदेव प्रसाद मिश्र के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर केंद्रित डॉ मनोज रस्तोगी का आलेख



हिन्दी, संस्कृत, फारसी, बंगला, मराठी, गुजराती तथा अंग्रेजी भाषाओं के ज्ञाता, उपन्यासकार, नाटककार, इतिहासकार, टीकाकार, कवि एवं सम्पादक पंडित बलदेव प्रसाद मिश्र ने अत्यन्त अल्प समय में हिन्दी साहित्य की जो सेवा की है उसे शब्दों की सीमा रेखाओं में बाँधना असम्भव है । मात्र 36 वर्ष के जीवन काल में उन्होंने पचास से भी अधिक कृतियाँ हिन्दी साहित्य को दी तथा अनेक समाचार पत्रों का सफलतापूर्वक सम्पादन किया ।

     विद्यावारिधि पंडित ज्वाला पंसाद मिश्र के भ्राता, *इस बहुमुखी प्रतिभा का जन्म उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद नगर में पौष शुक्ल 11 संवत् 1926 (सन् 1869 ई०) में हुआ था।* इनके पिता का नाम पंडित सुखानंद मिश्र तथा माता का नाम श्रीमती गंदा देवी था । कात्यायन मुनि के गोत्र में उत्पन्न पंडित बलदेव प्रसाद मिश्र के पूर्वज सुठियांय के रहने वाले थे । इनके दादा पंडित शिवदयालु मिश्र आयुर्वेद के प्रसिद्ध वैद्य थे। कहा जाता है कि एक बार पटना जिलाधीश विल्सन क्यालेक्टर की पत्नी के पेट में शूल का दर्द उठा। अनेक कुशल चिकित्सकों को दिखाने के उपरान्त भी उनकी पत्नी रोगमुक्त नहीं हुई तो पंडित शिवदयाल मिश्र जी को बुलाया गया उन्होंने मात्र एक घंटे में श्रीमती विल्सन को दर्द से मुक्ति दिला दी। यह देखकर जिलाधीश महोदय ने पंडित शिवदयालु मिश्र को एक बहुमूल्य शाल, पाँच सौ रूपये तथा प्रशंसापत्रादि से सम्मानित किया । साथ ही उन्हें अपना पारिवारिक चिकित्सक भी बना लिया । कुछ समय पश्चात् जब श्री विल्सन का स्थानान्तरण पटना से मुरादाबाद हुआ तो पंडित शिवदयालु मिश्र भी यहाँ आ गये ।

      पंडित बलदेव प्रसाद मिश्र को आरम्भ में देवनागरी की शिक्षा दी गयी थी। अंग्रेजी शिक्षा के लिए आपके पिता ने इनका प्रवेश गवर्नमेंट हाईस्कूल में कराया जहाँ आपने लगभग 6 वर्ष अध्ययन किया। उन्हें बहुभाषाविद थे। हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेजी, फारसी के अतिरिक्त बंगला, मराठी और गुजराती भाषाओं में आपने अच्छी योग्यता प्राप्त कर ली थी। बांग्ला भाषा का ऐसा अभ्यास था कि बंगला पुस्तक हाथ में लेकर एक साथ ही उसका अनुवाद असली पुस्तक के समान बोलते जाते थे, यही नहीं वह मराठों के साथ मराठी,गुजरातियों के साथ गुजराती और बंगालियों के साथ बंगाली में ही बोलते थे।

    वर्ष 1886 से अपने हिन्दी भाषा में लेखादि लिखने आरम्भ कर दिये । 20 वर्ष की अवस्था में आपने समाचार-पत्रों का सम्पादन करना आरम्भ कर दिया । आपने 'साहित्य सरोज', सत्य-सिंधु, भारतवासी, भारत भानु और सोलजर पत्रिका का सम्पादन किया। कुछ समय पश्चात आपने मुरादाबाद नगर में ही मित्रों के साथ 'तन्त्र - प्रभाकर' प्रेस खोला तथा एक साप्ताहिक पत्र तन्त्र प्रभाकर निकाला । कुछ समय बाद वह उससे अलग हो गए।

      पंडित बलदेव प्रसाद समाचार-पत्रों के पढ़ने के शौकीन थे। आयुर्वेद और तन्त्रशास्त्र में भी विशेष रुझान था । इतिहास, धर्म आदि में भी उनकी रूचि थी । दिन-रात आप स्वाध्याय व लेखन कार्य में संलग्न रहते थे। इस कारण आपको विवाह करने की तनिक भी इच्छा नहीं थी। कुटुम्ब तथा माता और पं० ज्वाला प्रसाद मिश्र के आग्रह पर आपने सन् 1900 ई० में दिनरा (बरेली) निवासी श्रीमती केतकी देवी के साथ विवाह किया।  

     हिन्दी नाट्य साहित्य को उनकी प्रथम भेंट मीराबाई नाटक है। जिसका प्रकाशन श्री बैंकटेश्वर स्टीम मुद्रणालय से हुआ है। इस नाटक का रचनाकाल सन् 1897 है। 96 पृष्ठों के इस धर्मगुलक ऐतिहासिक नाटक की प्रस्तावना में मुरादाबाद निवासी लाला शालिग्राम तथा विद्यावारिधि पंडित ज्याला प्रसाद मिश्र द्वारा रचित नाटकों का भी उल्लेख किया गया है । मीराबाई नाटक को पाँच अंकों में विभक्त किया गया है। नाटक में पंडित बलदेव प्रसाद मिश्र ने गीत, गजल, पद, चौपाई, ठुमरी, दादरा, हरिगीतिका छन्द का भी भरपूर प्रयोग किया है । ऐतिहासिक दृष्टि से नाटक में काफी विसंगतियाँ है इस नाटक को रचने का मुख्य उद्देश्य जनता में भक्ति भावना पैदा करना ही रहा है।

     पंडित बलदेव प्रसाद का दूसरा नाटक प्रभास मिलन है। इसका कुछ अंश 'सत्य- सिन्धु' मासिक पत्र में प्रकाशित हुआ था जिसे बाद में पुस्तकाकार रूप में श्री वेंकटेश्वर प्रेस ने प्रकाशित किया 144 पृष्ठों के इस नाटक में छह अंक है। यह एक पौराणिक एवं भक्तिप्रधान नाटक है। इसके उपरान्त मौलिक नाटक के रूप में तीसरा 'नन्द विदा नाटक है । इसका प्रकाशन मुरादाबाद स्थित 'लक्ष्मी नारायणः यन्त्रालय में सन् 1906 ई० में हुआ था। 66 पृष्ठ के इस नाटक को पाँच अंकों में विभक्त किया गया है।

      पंडित बलदेव प्रसाद जी ने सन् 1900 में 'लल्ला बाबू' शीर्षक से एक प्रहसन की  भी रचना की। तीस पृष्ठीय इस प्रहसन के माध्यम से समाज में व्याप्त कुरीतियों, आर्थिक विषमताओं को भी बखूबी उजागर किया है

       हिन्दी उपन्यास साहित्य को भी पंडित बलदेव प्रसाद मिश्र ने कई अच्छी कृतियाँ दी। आपके द्वारा रचित उपन्यास 'पानीपत', पृथ्वीराज चौहान' 'तांतिया भील', का उल्लेख मिलता था। इसके अतिरिक्त आपने 'संसार वा महास्वप्न' नामक उपन्यास की भी रचना की 127 पृष्ठ के इस उपन्यास का प्रकाशन श्री बॅकटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई से हुआ है । प्रेम परक सामाजिक उपन्यास की श्रेणी में आने वाला आपका 'मयंकमाला' उपन्यास है। यह 60 पृष्ठ का उपन्यास है ।

    मौलिक उपन्यासों की रचना के अतिरिक्त पंडित बलदेव प्रसाद मिश्र ने बंगला भाषा के भी कई उपन्यासों का अनुवाद किया है। सर रमेश चन्द्र दत्त कृत शिवाजी विजय' उपन्यास का आपने 'जीवन प्रभात' शीर्षक से अनुवाद किया । इस उपन्यास का अनुवाद लगभग सन् 1889 ई0 के आसपास किया गया है। उपन्यास की शुरूआत में महाराज शिवाजी की जन्म - पत्रिका भी दी गयी है । यह 224 पृष्ठों का उपन्यास है तथा प्राप्य प्रति का प्रकाशन काल सन् 1909 ई० है ।

    बंगला भाषा के किसी उपन्यासकार के देवी उपन्यास का भी आपने अनुवाद किया था । उपन्यास की भूमिका पढ़ने से ज्ञात होता है कि इसका अनुवाद सन् 1887 ईo में हुआ था लेकिन उस समय कोई मित्र उनसे वह हस्तलिखित प्रति माँग कर ले गया तब बलदेव प्रसाद जी ने इसका सन् 1890 में दोबारा अनुवाद किया । बंगला भाषा से अनुदित एक अन्य उपन्यास 'कुन्दनदिनी या विषवृक्ष' का उल्लेख प्राप्त होता है

   भाषा टीकादि ग्रन्थों में पंडित बलदेव प्रसाद मिश्र के पुरूषसूक्त, लघु भागवतामृत, कल्कि पुराण, आध्यात्म रामायण, बाराही संहिता, सूर्य सिद्धान्त, आयुर्वेद चिन्तामणि, चिकित्साजन, रखेन्द्र चिन्तामणि, आश्चर्य योगमाला तंत्र, गायत्री तंत्र, मंत्र चिन्तामणि, क्रिपोहीश तन्त्र, नित्य तंत्र तथा मेघदूत प्रमुख है ।

  पंडित बलदेव प्रसाद मिश्र को मेसरेजिम से भी अत्यधिक प्रेम था। मेसमरेजिम विद्या की सर्वप्रथम 'जागती कला' नामक पुस्तक आपने लिखी । इसका द्वितीय संस्करण सन् 1897 ई० में प्रकाशित हुआ था। इसके बाद 'मृतक मिलाप' (सन् 1897 ई0), 'महाविद्या' (सन् 1914 ई0) पुस्तकें प्रकाश में आयी ।

ऐतिहासिक पुस्तकों में आपके द्वारा 'टाड राजस्थान' का हिन्दी अनुवाद प्रसिद्ध है। इसके अतिरिक्त 'नेपाल का इतिहास भी आपने रचा।

    महर्षि दयानन्द सरस्वती कृत 'सत्यार्थ प्रकाश' का खण्डन करते हुए आपके ज्येष्ठ भ्राता विद्यावारिधि पंडित ज्वाला प्रसाद मिश्र ने 'दयानन्द तिमिर भाष्कर की रचना की थी। यह ग्रन्थ सन् 1890 में प्रकाशित हुआ था। इस ग्रन्थ का मेरठ के किसी आर्यसमाजी पं० तुलसीराम ने खण्डन करते हुए 'भाष्कर प्रकाश' रचा जिसमें 'सत्यार्थ प्रकाश' का मण्डन करते हुए सनातन धर्म पर अनेक आक्षेप लगाये । 'भाष्कर प्रकाश' के उत्तर में पंडित बलदेव प्रसाद मिश्र ने पं० ज्वाला प्रसाद रचित 'दयानन्द तिमिर भाष्कर का मण्डन और दयानंदीय मत का खण्डन करते हुए 'धर्म- दिवाकर' की रचना की । यह कृति सन् 1898 ई० में आर्य भाष्कर प्रेस से प्रकाशित हुई थी।

     पंडित बलदेव प्रसाद मिश्र की अधिकांश कृतियाँ श्री बैंकेटेश्वर स्टीम प्रेस से ही प्रकाशित हुई है। इसके अतिरिक्त भगवान जैन प्रेस लखनऊ, हिमालय प्रेस मुरादाबाद, लक्ष्मीनारायण प्रेस मुरादाबाद, तंत्र प्रभाकर प्रेस मुरादाबाद, तंत्र प्रभाकर प्रेस मुरादाबाद तथा हरि प्रसाद भागीरथ बम्बई से भी कुछ कृतियों का प्रकाशन हुआ है ।

     आपका निधन श्रावण शुक्ल सप्तमी, संवत् 1962 तदनुसार 6 अगस्त 1905 ई० को रात्रि आठ बजे हुआ था । 

✍ डॉ मनोज रस्तोगी

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मुरादाबाद मंडल के कुरकावली (जनपद सम्भल ) निवासी साहित्यकार स्मृतिशेष रामावतार त्यागी पर केंद्रित डॉ मनोज रास्तो




रामावतार त्यागी का जन्म 8 जुलाई सन 1925 को जनपद संभल के कुरकावली नामक ग्राम के त्यागी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके दादा चौधरी श्री इमरत सिंह एक अच्छे जमींदार थे । उनके पिता का नाम श्री उदल सिंह तथा माता का नाम भागीरथी देवी था। निरंतर मुकदमें बाजी में लगे रहने के कारण इनका परिवार कालांतर में एक मामूली किसान परिवार में बदल गया परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी न होते हुए भी उनके परिवार के रीति रिवाज व्यवहार सब जमींदारों जैसे ही थे।

    चार भाइयों रामावतार त्यागी, रामकुमार त्यागी, रामनिवास त्यागी, राजेन्द्र त्यागी एवं एक बहन लीलावती  में सबसे बड़े रामावतार त्यागी छोटी जाति के बच्चों के साथ खेलते थे जो उनके परिवार को पसंद नहीं था। यही नहीं वह अपने विरोधी परिवारों में भी प्रतिदिन आया जाया करते थे।इस पर उन्हें परिवार से प्रताड़ना भी मिलती थी । इसका परिणाम यह हुआ कि अपने जीवन के प्रारंभिक काल में ही उनके अंदर विद्रोह के स्वर फूटने लगे । उनकी रुचि भजन, गाने ,कीर्तन, रामायण , आल्हा आदि में शुरू से ही अधिक थी। वह बचपन से ही तुकें मिलाया करते थे इस प्रकार उनके अंदर काव्यांकुर भी फूटने लगे थे 

  उन्होंने संभल के किंग जॉर्ज यूनियन हाई स्कूल जो वर्तमान में हिंद इंटर कॉलेज के नाम से जाना जाता है, से वर्ष 1944 में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की। मैट्रिक के बाद उन्होंने आगे पढ़ने की इच्छा प्रकट की तो घर वालों ने इसका विरोध किया । इसके बावजूद उन्होंने चंदौसी के एसएम डिग्री कॉलेज में दाखिला ले लिया और वहां से 1948 में स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद वह दिल्ली चले गए व हिंदू कॉलेज से उन्होंने 1950 में एम ए हिंदी की परीक्षा उत्तीर्ण की।

   रामावतार त्यागी का विवाह वर्ष 1941 में उस समय हो गया था जब वह सातवीं कक्षा में अध्ययन रत थे। कालांतर में उनकी पत्नी क्रांति ने उनसे नाता तोड़ लिया था। उनसे उनकी पुत्री राजबाला त्यागी का जन्म हुआ । वह वर्तमान में दिल्ली निवास कर रही हैं । दूसरा विवाह वर्ष 1960 में सुश्री सुयश से हुआ। उनसे उन्हें पुत्र सन्देश पवन त्यागी की प्राप्ति हुई । वह वर्तमान में मुंबई निवास कर रहे हैं।

  सन 1950 में उनकी भेंट नवभारत टाइम्स के रविवारीय संस्करण के संपादक और नवयुग के सहायक संपादक श्री महावीर अधिकारी से हुई और इसके बाद उनकी  रचनाओं का प्रकाशन नवभारत टाइम्स और नवयुग में शुरू हो गया। धीरे धीरे उनकी ख्याति एक कवि के रूप में फैलने लगी। इसी दौरान उन्होंने दिल्ली में ही राम रूप विद्या मंदिर नामक शिक्षण संस्था में अध्यापन कार्य भी किया लेकिन कुछ समय बाद उनकी यह नौकरी छूट गई और वह बेरोजगार हो गए। 

 लगभग दो साल तक बेरोजगार रहने के बाद उन्होंने समाज पत्रिका में 6 महीने संपादन का कार्य भी किया उसके बाद वह समाज कल्याण पत्रिका में 1 साल तक संपादक रहे ।कुछ दिन साप्ताहिक हिंदुस्तान में भी काम किया। उसके बाद वह नवभारत टाइम्स के संपादकीय विभाग में कार्यरत रहे ।

उनका पहला काव्य संग्रह वर्ष 1953 में 'नया खून' नाम से पुष्प प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित हुआ। इस संग्रह में उनका विद्रोही स्वर मुखरित हुआ है। उसके पश्चात 1958 में 'आठवां स्वर' प्रकाशित हुआ। इस संग्रह में उनके 58 गीत हैं । इस कृति की भूमिका प्रख्यात साहित्यकार रामधारी सिंह दिनकर ने लिखी । 'मैं दिल्ली हूं'( 1959), 'सपने महक उठे'( 1965), 'गुलाब और बबूल'( 1973), ' गाता हुआ दर्द'( 1982), ' लहू के चंद कतरे'( 1984), 'गीत बोलते हैं'(1986) काव्य संग्रह प्रकाशित हुए। वर्ष 1954 में उनका उपन्यास 'समाधान' प्रकाशित हुआ। इसके अतिरिक्त 1957 में  उनकी कृति 'चरित्रहीन के पत्र'  पाठकों के समक्ष आई ।

     राजपाल एंड संस प्रकाशन दिल्ली ने आज के लोकप्रिय हिंदी कवि पुस्तक माला के अंतर्गत रामावतार त्यागी परिचय एवं प्रतिनिधि कविताएं का प्रकाशन प्रकाशन किया । क्षेमचंद्र सुमन के संपादन में प्रकाशित इस कृति में उनके 45 गीत संग्रहित हैं। इसके अतिरिक्त वाणी प्रकाशन द्वारा शेरजंग गर्ग के संपादन में' हमारे लोकप्रिय गीतकार - रामावतार त्यागी' तथा उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान लखनऊ द्वारा केशव प्रसाद वाजपेई के संपादन में 'रामावतार त्यागी- व्यक्तित्व एवं कृतित्व' कृतियों का भी प्रकाशन हो चुका है ।

उनका निधन 12 अप्रैल 1985 को हुआ ।

 चर्चित रहा फ़िल्म में लिखा गीत 

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रामावतार त्यागी ने महावीर अधिकारी की कहानी पर केंद्रित उमेश माथुर के निर्देशन में निर्मित फ़िल्म 'जिंदगी और तूफान' के लिए एक गीत ' जिंदगी और बता तेरा इरादा क्या है' भी लिखा था यह गीत हिंदी फिल्मों के सर्वश्रेष्ठ गीतों में गिना जाता है। इस गीत को सुप्रसिद्ध गायक मुकेश ने गाया था। संगीत दिया था। यह फ़िल्म 1975 में रिलीज हुई थी।

 हिंदी पाठ्यक्रम में भी शामिल रही उनकी रचनायें

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उनकी रचनाएं एनसीईआरटी के हिंदी पाठ्यक्रम में भी शामिल की गई । उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद के कक्षा 8 के पाठ्यक्रम में  शामिल उनका गीत 'मन समर्पित तन समर्पित और यह जीवन समर्पित / चाहता हूं देश की धरती तुझे कुछ और भी दूं। ' सर्वाधिक चर्चित रहा ।

व्यक्तित्व और कृतित्व पर शोधकार्य

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स्मृति शेष रामावतार त्यागी जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर संभल की सिंधु त्यागी ने प्रख्यात साहित्यकार एवं एमजीएम कॉलेज के पूर्व प्राचार्य डॉ डीएन शर्मा के निर्देशन में शोध कार्य पूर्ण किया है। इसके अतिरिक्त धनोरा के अंकित त्यागी गुलाब सिंह पीजी कॉलेज चांदपुर की हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ साधना के निर्देशन में 'रामावतार त्यागी के गीतों का विश्लेषणात्मक अध्ययन' शीर्षक पर शोध कार्य कर रहे हैं।

 पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी और संजय गांधी को पढ़ाई थी हिंदी 

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पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने रामावतार त्यागी को राजीव गांधी और संजय गांधी की हिंदी स्पीकिंग क्लास के लिए निजी शिक्षक भी नियुक्त किया था बाद में इंदिरा गांधी द्वारा उन्हें गुलमोहर पार्क दिल्ली में मकान भी आवंटित किया गया । 

✍️ डॉ मनोज रस्तोगी

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