गुझिया इठलाकर बल खाकर
पिचकारी से बोली
चल आजा
हम खेलें होली
गूँज रहा मस्ती की धुन पर
फागुन का आलाप
लेकिन तू कोने में छिपकर
बैठी है चुपचाप
बुला रही है उम्मीदों की
रंग-बिरंगी टोली
धीरज रख फिर से आएगा
वही पुराना दौर
फूटेगा जब आमों पर फिर
निश्छलता का बौर
यहाँ-वहाँ सब ओर करेगा
टेसू हँसी-ठिठोली
तुझमें रंग भरे जीवन के
मुझमें भरी मिठास
चल मिलकर वापस लाते हैं
रिश्तों में उल्लास
अपनेपन के गाढ़े रँग से
रचें नई रंगोली
✍️योगेन्द्र वर्मा 'व्योम'
मुरादाबाद 244001
उत्तर प्रदेश, भारत

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