मंगलवार, 25 मार्च 2025

साहित्यिक मुरादाबाद और विजयश्री वेलफेयर सोसाइटी की ओर से पं सुरेन्द्र मोहन मिश्र की पुण्यतिथि 22 मार्च 2025 को आयोजित सम्मान समारोह व काव्य गोष्ठी में अमरोहा के इतिहासकार सुरेश चंद्र शर्मा को सुरेन्द्र मोहन मिश्र स्मृति सम्मान से किया गया सम्मानित







मुरादाबाद के प्रख्यात साहित्यकार, इतिहासकार एवं पुरातत्ववेत्ता स्मृतिशेष सुरेन्द्र मोहन मिश्र की पुण्यतिथि शनिवार 22 मार्च 2025 को  मुरादाबाद मंडल के साहित्य के प्रसार एवं संरक्षण को पूर्ण रूप से समर्पित संस्था साहित्यिक मुरादाबाद और विजयश्री वेलफेयर सोसाइटी की ओर से आयोजित समारोह में अमरोहा के वरिष्ठ इतिहासकार (वर्तमान में गाजियाबाद निवासी) सुरेश चंद्र शर्मा को पं सुरेन्द्र मोहन मिश्र स्मृति सम्मान से सम्मानित किया गया। सम्मान स्वरूप उन्हें मान पत्र, श्रीफल,अंग वस्त्र और सम्मान राशि प्रदान की गई। समारोह की अध्यक्षता साहित्यकार एवं पुरातत्ववेत्ता अतुल मिश्र ने की तथा संचालन डॉ मनोज रस्तोगी एवं विवेक निर्मल ने किया। 

     नवीननगर स्थित मानसरोवर कन्या इंटर कॉलेज में मनोज वर्मा मनु द्वारा प्रस्तुत मां सरस्वती वंदना से आरंभ समारोह के प्रथम चरण में साहित्यकारों ने स्मृतिशेष पं सुरेन्द्र मोहन मिश्र तथा सम्मानित इतिहासकार सुरेश चंद्र शर्मा के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डाला। साहित्यिक मुरादाबाद के संस्थापक डॉ मनोज रस्तोगी ने कहा 22 मई 1932 को चंदौसी में जन्में पंडित सुरेंद्र मोहन मिश्र ने न केवल साहित्यकार के रूप में ख्याति प्राप्त की बल्कि इतिहासकार और पुरातत्ववेत्ता के रूप में भी विख्यात हुए। उन्होंने अतीत में दबे साहित्य को खोज कर उजागर किया। आपकी मधुगान, कल्पना कामिनी, कविता नियोजन, कवयित्री सम्मेलन, बदायूं के रणबांकुरे राजपूत, इतिहास के झरोखे से संभल,शहीद मोती सिंह, पवित्र पंवासा, मुरादाबाद जनपद का स्वतन्त्रता संग्राम,  मुरादाबाद और अमरोहा के स्वतन्त्रता सेनानी ,मीरापुर के नवोपलब्ध कवि तथा आजादी से पहले की दुर्लभ हास्य कविताएं का प्रकाशन हो चुका है तथा अनेक पुस्तकें अप्रकाशित हैं। आपका देहावसान 22 मार्च 2008 को हुआ।

    सह संयोजक आवरण अग्रवाल श्रेष्ठ ने कहा कि 22 दिसंबर 1941 को अमरोहा में जन्में सुरेश चन्द्र शर्मा का जनपदीय इतिहास लेखन के क्षेत्र में सुरेशचन्द्र शर्मा का उल्लेखनीय योगदान रहा है। हिन्दू धर्मग्रंथों का सारतत्व कोश, अमरोहा नगर का प्राचीन इतिहास, मातृस्वरूपा सरस्वती और सारस्वत समाज, सनातन धर्म ग्रंथों में गया श्राद्ध माहात्म्य, सम्भल नगर का प्राचीन इतिहास और सनातन धर्म विषयक शब्द नाम परिचय  आपकी उल्लेखनीय पुस्तकें हैं। इसके अतिरिक्त महाभारत का संख्यावाची कोश पुस्तक अप्रकाशित है।

    सम्मानित इतिहासकार सुरेश चंद्र शर्मा ने जनपदीय इतिहास के पुनर्लेखन और प्रकाशन की आवश्यकता पर बल दिया। 

    कार्यक्रम में स्मृतिशेष सुरेन्द्र मोहन मिश्र की रचनाओं का पाठ भी हुआ। उनके सुपुत्र अतुल मिश्र ने उनके गीत का सस्वर पाठ करते हुए कहा....

जीवन भर ये खारे आंसू ही बेचे हैं

 सपन मोल लेने को

कनक कन गला बेचे, मिट्टी के, पत्थर के

रतन मोल लेने को 

नये पथ बनाने में सुनो, वंशधर मेरे

 कुटिया का तृण-तृण बिक जाये, 

तो क्षमा करना !!

    कार्यक्रम के दूसरे चरण में आयोजित काव्य गोष्ठी में योगेन्द्र वर्मा व्योम ने कहा ....

चलो करें मिलकर सखे, नूतन एक उपाय। 

पुनः लिखें सौहार्द की, खुशबू का अध्याय।।

दुष्यंत 'बाबा' ने कहा ...

देखा  मैंने   गर्त  में,  जाता  हुआ   समाज।

सबका  नायक  बन  गया, तस्कर  पुष्पा राज।।

श्री कृष्ण शुक्ल का कहना था ...

इन जगमग करती सड़कों के पीछे,

कुछ अंधियारी बस्ती भी पसरी हैं,

उस अंधकार में जलते दीपों का,

कोटि-कोटि अभिनंदन करता हूॅं।

नित्य होम श्वासों का करता हूॅं,

नित्य ही जीता, नित्य ही मरता हूॅं

सरिता लाल का कहना था ....

आस्मां छूने की तमन्ना है गर 

कुछ फासले तय करने ही होंगें,

जिन्दगी का कोई जुनून  है गर 

हौंसले तो बुलन्द  करने ही होंगें,

गर ख्वाहिश  है समुन्दर से

सीपियों को खोज लाने की,

तो उस खुदा की इबादत के साथ

गहरे में गोते तो लगाने ही होंगें...

सत्येंद्र धारीवाल ने कहा ....

मैं सदियों से सदियां जी आया, 

सदियां जी लूं सदियों तक।

धरती पर लोगों की सोच चली बस,  

अपने घर से नदियों तक।

हरि प्रकाश शर्मा ने कहा ...

कवि की लेखनी में, 

विद्रोही, कंटीले,जंगल है, 

कहाँ से शब्द चुराने है, 

बस यही उसका चिंतन है

डॉ राकेश चक्र ने कहा ....

सदा स्वस्थ रहना है तो फिर ,

नियमित रह पुरुषार्थ करो।

लो आहार संतुलित नित-दिन,

भाव-कर्म परमार्थ करो।।

श्रम से ही मिलती है मंजिल,

सदा आलसी रोते रहते।

आत्ममुग्धता अतिशय घातक,

दुख जीवन में बोते रहते।।

पूजा राणा ने कहा ....

तुम हो मेरे मन प्राण प्रिय 

 एक बार मिलन को आ जाओ

 बनकर मेरा मधुर गीत

 इस अधर प्रांत पर छा जाओ

डॉ मीरा कश्यप ने कहा

पीत पात पेड़ों के झर रहें हैं डाल से 

सरसराते पत्तों सा झर रहा बसंत है।

फूल सरसों के नये नये फूलों संग 

नई-नई कोपलों में दिख रहा बसंत है ।

डॉ कृष्ण कुमार नाज ने कहा ....

कोई तो है, जो बुराई से लड़ना चाहता है

मिज़ाज शहर का जब भी बिगड़ना चाहता है

हवाओ! तुम ही निकालो कोई नई तरकीब

कि ज़र्द पत्ता शजर से बिछड़ना चाहता है 

राहुल शर्मा ने कहा ....

अगर लिखोगे वसीयत अपनी 

तो जान पाओगे ये हकीकत

तुम्हारी अपनी ही मिल्कियत में 

तुम्हारा हिस्सा कहीं नहीं है

ओंकार सिंह ओंकार ने कहा ...                       

भूल जा तू  तूल देना, दोस्तों की भूल को।

 दोस्तों से हाथ अपना, और भी बढ़कर मिला 

 डॉ पुनीत कुमार ने कहा ....

कोई फेसबुक,कोई व्हाट्सएप,

कोई व्यस्त है गेम में

बच्चे बूढ़े सब पागल हैं

मोबाइल के प्रेम में

अलग अलग सबके कमरे हैं

पड़ोसियों से रहते हैं

दिखती है एक साथ फैमिली

केवल फोटोफ्रेम में

कमल शर्मा ने कहा ....

ना कोई पहले मेरे

ना किसी के बाद हूं मैं

आती जाती हर घड़ी में

शाद हूं , आबाद हूं मैं

नाम पीतल का मगर सोना हूं मैं

देख लो मुझको , मुरादाबाद हूं मैं

अशोक विश्नोई ने कहा...

मन में सुंदर स्वप्न सजाएं

हर असमंजस दूर भगाएं

घोर निराशा के तम में सब

आओ ! आशा के दीप जलाएं।

   इनके अतिरिक्त डॉ प्रेमवती उपाध्याय, राजीव सक्सेना, प्रत्यक्ष देव त्यागी, डॉ धनंजय सिंह, रवि चतुर्वेदी, मूलचंद राजू ,इशांत शर्मा इशू , मनोज कुमार मनु, राशिद मुरादाबादी, संजीव आकांक्षी, डॉ ममता सिंह, डॉ अर्चना गुप्ता, राशिद हुसैन, मयंक शर्मा, प्रीति अग्रवाल आदि ने भी काव्य पाठ किया। आभार आवरण अग्रवाल श्रेष्ठ ने व्यक्त किया ।

































































































गुरुवार, 20 मार्च 2025

मुरादाबाद मंडल के जनपद रामपुर निवासी साहित्यकार रवि प्रकाश की कहानी .....शराब का पहला दिन

 


इमरती ने संदूक में रखे हुए रुपयों में से जब खर्च के लिए बीस रुपये निकालने चाहे तो देख कर उसकी तो चीख ही निकल गई। साड़ी के नीचे बहुत सँभाल कर और छिपाकर उसने बारह सौ रुपये रख दिए थे। उसी में से धीरे-धीरे बीस-तीस रुपये निकालकर खर्च करना शुरू हुआ था ।लेकिन रुपए कहाँ जा सकते हैं ? वह सोच में पड़ गई । लॉकडाउन चल रहा है । घर का दरवाजा अगर खुला भी रह जाए तो इस समय चोर-डकैतों का कोई खतरा नहीं होता।


घर पर चारों तरफ एक निगाह डालते ही उसका शक गहरा गया । जरूर यह पति का ही काम होगा । वही एक घंटे से गायब हैं। दौड़ती हुई बदहवास अवस्था में इमरती घर के दरवाजे से निकल कर गली में आ गई और पागलों की तरह चारों तरफ पति को ढूँढने लगी । तलाश में ज्यादा देर नहीं लगी। सामने से ही हाथ में शराब की बोतल थामें लड़खड़ाते हुए कैलाश आ रहा था। पति का नाम कैलाश ही था ।

.इमरती के बदन में जैसे आग लग गई। इतनी मेहनत से मैं बर्तन माँज कर जैसे- तैसे बारह सौ रुपए लाती हूँ और इस बार तो बिना काम किए ही मालकिन ने बारह सौ रुपए हाथ में थमा दिए थे । यह कहते हुए कि इमरती ! हमारी गुँजाइश तो नहीं है, लेकिन फिर भी तुम्हारी हालत देखकर मना भी नहीं कर पा रहे हैं ।

तपाक से हाथ से बोतल छीनी । घसीटते हुए घर के दरवाजे तक ले आई । “कहाँ हैं रुपए ? क्या किया ? ”

कैलाश के मुँह से कोई शब्द नहीं निकल पा रहा था । जो कह भी रहा था , वह अस्पष्ट था और बुदबुदाते हुए ही कुछ बोल पा रहा था । इमरती ने अपना सिर पकड़ लिया। ” हे भगवान ! अब महीना कैसे चलेगा ? अभी तो सत्रह मई तक लॉकडाउन है । फिर जाकर पता नहीं क्या हो ?”


पति बेसुध होने लगे थे । उन्होंने तो शराब ऐसे पी रखी थी कि जैसे मुफ्त में राशन बँट रहा हो। दौड़ती हुई इमरती मालकिन के घर की तरफ चल दी। रास्ते में सोचती रही कि किस मुँह से अपने पति की शराबी आदत को मालकिन के सामने बता पाऊँगी ? कैसे उनसे अब कुछ और रुपए माँग पाऊँगी ? और वह भी क्या दे पाएँगी ?

मालकिन के घर के दरवाजे पर घंटी बजाई और खुद मालकिन दरवाजा खोलने के लिए जब आईं तो इमरती उनको मुरझाई हुई देखकर आश्चर्यचकित रह गई । बगैर दरवाजा खोले ही उन्होंने कहा ” हमने तो तुम्हें पहली तारीख को ही वेतन के सारे रुपए दे दिए थे और लॉकडाउन रहने तक काम करने के लिए मना भी कर दिया था ताकि न कोई घर में आए, न कोई जाए ।अब क्या बात है?”

” मालकिन मैं बहुत परेशान हो गई हूँ। आपसे दो मिनट बात करनी है।” इमरती ने रुआँसे होकर जब कहा तो मालकिन ने दरवाजा खोल कर उसे अंदर बुला लिया। इमरती ने रोते-रोते सारी घटना मालकिन को बता दी और कहा कि अगर हजार रुपए एडवांस मिल जाएँ तो महीने भर का खर्चा चल जाएगा वरना भूखे पेट ही रोजाना सोना पड़ेगा ।”-कहते हुए इमरती रो रही थी ।

तभी उसकी नजर मालकिन पर गई। मालकिन की आँखों से आँसू बह रहे थे। इमरती समझी कि मालकिन मेरे दुख से दुखी हैं । कहने लगी ” मालकिन आप दुखी मत हो । मैं जैसे भी होगा , दिन काट लूँगी।”

तभी मालकिन ने इशारे से कहा “मैं तुम्हें अपने घर की हालत भी बताने जा रही हूँ।” और फिर साहब को पलंग पर जूते पहने हुए लेटी हुई अवस्था में मालकिन ने दिखा दिया। कहने लगीं ” यह भी सुबह से पिए हुए पड़े हैं । एक घंटा पहले घर से गए थे। अलमारी की सेफ में जितने रुपए रखे थे, सब उठाकर ले गए और पेटियों में भर – भर के शराब ले आए । तब से बैठकर पी रहे हैं। मैंने विरोध किया तो मुझे पीटने लगे ।”-कहकर मालकिन अपने शरीर पर पड़े हुए चोटों के निशान दिखाने लगीं। इमरती अपना रोना भूल गई और मालकिन के प्रति सहानुभूति से भर उठी ।

✍️रवि प्रकाश

बाजार सर्राफा

रामपुर 

उत्तर प्रदेश, भारत

मोबाइल 9 997615451

रविवार, 16 मार्च 2025

मुरादाबाद के साहित्यकार डॉ आर सी शुक्ल की काव्य कृति ....एक छोटा आदमी बड़ा हो ही नहीं सकता की राजीव सक्सेना द्वारा की गई समीक्षा ....कविताओं के जरिए बिखरे सामाजिक यथार्थ की पड़ताल

 पुरुष कितना भी बड़ा हो जाये

  स्त्री से छोटा ही रहेगा

  स्त्री उसकी माँ है .....

  इन कालजयी पंक्तियों के रचनाकार हैं मुरादाबाद  के वरिष्ठ कवि -   डॉ राजेश चन्द्र शुक्ल। हिंदी -अंग्रेजी में अनक़रीब बीस कविता संग्रहों के  रचनाकार  शुक्ल जी केवल पीतल नगरी के ही नहीं बल्कि देश के उन चुनिंदा कवियों में से हैं जो अपने विशद रचनाकर्म के जरिये एक बड़े कैनवास पर 'यथार्थ की रचना  और पुनर्रचना ' करते हैं। इसका जीवंत प्रमाण है उनका सद्य प्रकाशित कविता संकलन --'एक छोटा आदमी कभी बड़ा हो ही नहीं सकता'

  संकलन की कविताओं में शुक्ल जी एक 'जेनुइन' अथवा खाँटी कवि के तौर पर हमारे आसपास के यानी समाज के बिखरे हुए और प्रायः अनचीन्हे यथार्थ की व्यापकता और गहनता से  ही नहीं बल्कि क्वांटम स्तर पड़ताल करते हैं। दरअसल,कविता केवल यथार्थ की पड़ताल ही नहीं हैं बल्कि उसकी रचना और पुनर्रचना भी है।प्रस्तुत संकलन  में  सर्वत्र यही प्रयत्न कवि शुक्ल जी ने पूरी ईमानदारी से किया है। तभी उन्होंने  अपनी अधिकांश कविताओं के विम्ब अपने आसपास के परिवेश और सामान्य जनजीवन से उठाए हैं।प्रस्तुत संकलन की कविताओं के विम्ब और विषय किसी वायवी या रहस्यलोक की सृष्टि नहीं है बल्कि हमारे सामने के यथार्थलोक की सृष्टि ही अधिक हैं। संकलन की भूमिका में कवि शुक्ल जी स्वयं कहते हैं --"कवि के रूप में मैंने चील की तरह ऊँचे आकाश में उड़ने का प्रयास कभी नहीं किया है..."

  कवि शुक्ल कविता संकलन की एक कविता में समाज की विसंगतियों , विद्रूपों  और मनुष्य की नियति पर निर्ममतापूर्वक प्रहार करते हुए कहते हैं --

 कथावाचक खूब सुनाते हैं ऐसी कहानियां

 कि पूजा --पाठ करने से

बदल सकती है आदमी की हैसियत

किन्तु यह सच नहीं है

अंधविश्वासों की मदिरा 

पिलाई जा रही है गरीबों को सदियों से....

  संकलन की संभवतया सबसे तीखी कविता--'रिक्शावाला ' में शुक्ल जी एक विचलित कर देने वाले यथार्थ को उद्घाटित करते हुए कहते हैं--

  तुम हर वक्त

  जूझते रहते हो ऐसे प्रश्नों से

  जिनका कोई हल

  नहीं है तुम्हारे पास

  रिक्शावाला प्रश्न नहीं करता

  किसी मुसीबत के आने पर .....

  अगर कवि शुक्ल जी ने निरंतर क्षरणशील समाज और उसके छिन्न -भिन्न  हो रहे ताने -बाने को अपनी कविताओं का विषय बनाया है तो  अपनी स्त्री विषयक कविताओं में'पछाड़ खाती स्त्री ' को  एक नए आलोक और जीवन संदर्भों के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत कर स्त्री विमर्श और उसकी मूल संवेदना की अनदेखी भी नहीं की है।स्त्री को लेकर कवि शुक्ल जी ने सचमुच अनूठे विम्ब रचे हैं।

  कभी कथाकार राजेन्द्र यादव ने 'कविता के अंत ' की घोषणा की थी किन्तु प्रभात प्रकाशन प्रकाशन बरेली से प्रकाशित कवि राजेश चन्द्र शुक्ल का यह कविता संकलन न केवल कविता की जययात्रा में सृजनात्मकता के नए प्रस्थान बिंदु उपस्थित करता है अपितु कविता में एक आम पाठक की रुचि और उसके विश्वास को भी  बहाल करता है।कुछ नया पढ़ने और  कुछ क्षण ठहरकर सोचने की दृष्टि से यह काव्य संकलन  पाठकों को निराश नहीं करेगा।



कृति :  एक छोटा आदमी बड़ा हो ही नहीं सकता (काव्य संग्रह)

कवि : आर सी शुक्ल

प्रकाशन वर्ष : 2024

मूल्य : 550₹ 

प्रकाशक : प्रकाश बुक डिपो, बड़ा बाजार, बरेली 243003 

समीक्षक: राजीव सक्सेना, डिप्टी गंज, मुरादाबाद 244001,उत्तर प्रदेश,भारत। मोबाइल फोन नंबर 94126 77565 ई - मेल -rajjeevsaxenaa @ gmail.com

मुरादाबाद के साहित्यकार स्मृतिशेष सुरेन्द्र मोहन मिश्र के व्यक्तित्व और कृतित्व पर केंद्रित डॉ मनोज रस्तोगी का आलेख ।यह प्रकाशित हुआ है दैनिक जागरण मुरादाबाद संस्करण के 16 मार्च 2025 के सबरंग पेज पर

 


अतीत में दबे साहित्य को खोजा सुरेन्द्र मोहन मिश्र ने 

 

पुण्यतिथि 22 मार्च पर विशेष आलेख 


      पंडित सुरेंद्र मोहन मिश्र ने न केवल साहित्यकार के रूप में ख्याति प्राप्त की बल्कि इतिहासकार और पुरातत्ववेत्ता के रूप में भी विख्यात हुए। उन्होंने अतीत में दबे साहित्य को खोज कर उजागर किया।

     साहित्य, इतिहास और पुरातत्व को अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित करने वाले सुरेन्द्र मोहन मिश्र का जन्म 22 मई 1932 को चंदौसी के लब्ध प्रतिष्ठित ब्राह्मण परिवार में हुआ। आपके पिता पंडित रामस्वरूप वैद्यशास्त्री रामपुर जनपद की शाहबाद तहसील के अनबे ग्राम से चंदौसी आकर बसे थे। उनकी आयुर्वेद जगत में अच्छी ख्याति थी। उनके द्वारा स्थापित धन्वतरि फार्मसी द्वारा निर्मित औषधियाँ देश भर में प्रसिद्ध हैं । उनका निधन 22 मार्च 2008 को मुरादाबाद में अपने दीनदयाल नगर स्थित आवास पर हुआ ।

    बचपन से ही साहित्यिक पुस्तकें पढ़ने में उनकी रुचि थी। साहित्य अनुराग के कारण ही आप कविता लेखन की ओर प्रवृत्त हुए। उधर, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की शाखाओं में गाये जाने वाले कोरसों का भी मन पर पूरी तरह प्रभाव पड़ा। 

     आपकी प्रथम कविता दिल्ली से प्रकाशित दैनिक सन्मार्ग में वर्ष 1948 में प्रकाशित हुई । उस समय आपकी अवस्था मात्र सोलह वर्ष की थी। इसके पश्चात् आपकी पूरी रुचि साहित्य लेखन की ओर हो गयी। प्रारम्भ में आपने छायावादी और रहस्यवादी कवितायें लिखी। वर्ष 1951 में जब वह मात्र 19 वर्ष के थे उनकी प्रथम काव्य कृति मधुगान प्रकाशित हुई। इस कृति में उनके 37 गीत हैं। दूसरी कृति वर्ष 1955 में 'कल्पना कामिनी शीर्षक से पाठकों के सन्मुख आई। इस श्रृंगारिक गीतिकाव्य में उनके वर्ष 1951-52 में रचे 51 गीत हैं। लगभग 27 वर्ष के अंतराल के पश्चात उनकी तीसरी काव्य कृति कविता नियोजन का प्रकाशन वर्ष 1982 में हुआ। प्रज्ञा प्रकाशन मंदिर चन्दौसी द्वारा प्रकाशित इस कृति में उनकी वर्ष 1972 से 1974 के मध्य रची 26 हास्य-व्यंग्य की कविताएं हैं। वर्ष 1993 में उनकी चौथी कृति 'बदायूं के रणबांकुरे राजपूत' का प्रकाशन हुआ। प्रतिमा प्रकाशन चन्दौसी द्वारा प्रकाशित इस कृति में बदायूँ जनपद के राजपूतों का संक्षिप्त इतिहास प्रस्तुत किया गया है। पाँचवीं कृति इतिहास के झरोखे से संभल का प्रकाशन वर्ष 1997 में प्रतिमा प्रकाशन मुरादाबाद द्वारा हुआ। इसका दूसरा संस्करण वर्ष 2009 में प्रकाशित हुआ । वर्ष 1999 में उनकी छठी कृति कवयित्री सम्मेलन का प्रकाशन हिन्दी साहित्य निकेतन बिजनौर द्वारा हुआ। इस कृति में उनको 42 हास्य-व्यंग्य कविताएं हैं। वर्ष 2001 मैं सातवीं कृति के रूप में ऐतिहासिक उपन्यास 'शहीद

मोती सिंह' का प्रकाशन प्रतिमा प्रकाशन मुरादाबाद द्वारा हुआ।

     वर्ष 2003 में उनकी तीन काव्य कृतियों- पवित्र पंवासा, मुरादाबाद जनपद का स्वतन्त्रता संग्राम तथा मुरादाबाद और अमरोहा के स्वतन्त्रता सेनानी का प्रकाशन हुआ । इसी वर्ष उसकी एक कृति मीरापुर के नवोपलब्ध कवि' का प्रकाशन हुआ। उनके देहावसान के पश्चात उनकी बारहवीं कृति आजादी से पहले की दुर्लभ हास्य कविताएं का प्रकाशन उनके सुपुत्र अतुल मिश्र द्वारा वर्ष 2009 में किया गया।

     उनकी अप्रकाशित कृतियों में महाभारत और पुरातत्व, मुरादाबाद जनपद की समस्या पूर्ति, स्वतंत्रता संग्रामः पत्रकारिता के साक्ष्य, चंदौसी का इतिहास, भोजपुरी कजरियां, राधेश्याम रामायण पूर्ववर्ती लोक राम काव्य, बृज के लोक रचनाकार, चंदौसी इतिहास दोहावली, बरन से बुलन्दशहर, हरियाणा की प्राचीन साहित्यधारा, स्वतंत्रता संग्राम का एक वर्ष, दिल्ली लोक साहित्य और शिला यंत्रालय, रूहेलखण्ड की हिन्दी सेवायें, भूले-बिसरे साहित्य प्रसँग, रसिक कवि तुलसी दास, हिन्दी पत्रों की कार्टून- कला के दस वर्ष उल्लेखनीय हैं।

   वर्ष 1955 में ही उनकी रुचि पुरातत्व महत्व की वस्तुएं एकत्र करने में हो गयी। इसी वर्ष उन्होंने चंदौसी पुरातत्व संग्रहालय' की नींव डाल दी जो बाद में कई वर्ष तक मुरादाबाद के दीनद‌याल नगर में हिन्दी संस्कृत शोध संस्थान, पुरातत्व संग्रहालय के रूप में संचलित होता रहा। पुरातत्व वस्तुओं की खोज के दौरान उन्होंने प्राचीन युग के अनेक अज्ञात कवियों प्रीतम, ब्रह्म, ज्ञानेन्द्र मधुसूदन दास, संत कवि लक्ष्मण, बालक राम आदि की पाण्डुलिपियाँ खोजी । हस्तलिखित पाण्डुलिपियों का अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि इनमें से अनेक ग्रंथ दुर्लभ थे।

   उनकी समस्त पुरातात्विक धरोहर वर्तमान में उनके सुपुत्र अतुल मिश्र के अलावा बरेली के पांचाल संग्रहालय, स्वामी शुकदेवानन्द महाविद्यालय, शाहजहांपुर में 'पं. सुरेन्द्र मोहन मिश्र संग्रहालय'  तथा रजा लाइब्रेरी में संरक्षित है। 

    ✍️ डॉ मनोज रस्तोगी, वरिष्ठ साहित्यकार

शुक्रवार, 14 मार्च 2025

मुरादाबाद मंडल के कुरकावली (जनपद संभल) निवासी साहित्यकार त्यागी अशोका कृष्णम् की रचना ....होली के हुलास में


होली के हुलास में

अंग-अंग खिल उठे, रंग रंग मिल उठे, 

पीने लगे जब सब,एक ही गिलास में।

ऐसी जोड़ तोड़ वाली, व्याकरण पढ़ी गयी,

कुछ भी न फर्क रहा, संधि व समास में।

रस छंद सुर ताल, करने लगे कमाल, 

गीत व गजल बैठ, गये आस-पास में।

कौन चाची  कौन ताई, कौन दादी भाभी कौन,

कुछ भी न होश रहा, होली के हुलास में।।

✍️त्यागी अशोका कृष्णम्

कुरकावली, संभल 

उत्तर प्रदेश, भारत

मुरादाबाद के साहित्यकार योगेन्द्र वर्मा व्योम के दोहे ....। ये प्रकाशित हुए हैं हरियाणा के प्रमुख दैनिक समाचारपत्र "देश रोज़ाना" के 13 मार्च 2025 के अंक में .....




गुरुवार, 13 मार्च 2025

मुरादाबाद मंडल के बहजोई (जनपद संभल ) के साहित्यकार दीपक गोस्वामी चिराग की ग़ज़ल....खुशियों की बौछार है होली ....


रंगों का त्यौहार है होली।

खुशियों की बौछार है होली।।

बर्षों से जो बसा है मन में।

गंगा-जमुनी प्यार है, होली।।

कचरी, पापड़, भल्ले, गुंझिया ।

व्यंजन की भंडार है होली।।

कृष्ण खेलते राधा के सँग।

ब्रज की फाग-फुहार है, होली।। 

घुटी भांग, पीते ठंडाई।

मस्ती अपरंपार है होली।।

पिचकारी-टोली बच्चों की।

रंगों की भरमार है होली।।

नफरत छोड़ो मिलो प्रेम से ।

करती यही पुकार है होली।।


✍️दीपक गोस्वामी चिराग, 

शिव बाबा सदन, कृष्णाकुंज 

बहजोई (संभल)-244410 

उत्तर प्रदेश, भारत

मो. 9548812618

मंगलवार, 11 मार्च 2025

मुरादाबाद के साहित्यकार ओंकार सिंह ओंकार की रचना .... आ गया मौसम सुहाना गुनगुनाने के लिए

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मुरादाबाद की साहित्यकार डॉ प्रेमवती उपाध्याय का गीत... होली के रंग में हम अपना मन रंगा लें

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मुरादाबाद की साहित्यकार मीनाक्षी ठाकुर का गीत... प्रीत की पिचकारियां ले फाग फिर से आ गया ...

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मुरादाबाद के साहित्यकार मयंक शर्मा का गीत... रंगों के रंग में रंग जाए खेलें मिलकर होली

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मुरादाबाद के साहित्यकार योगेंद्र वर्मा व्योम की ग़ज़ल... गधों की बढ़ गई है आजकल औकात होली में

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मुरादाबाद के साहित्यकार वीरेंद्र सिंह बृजवासी का गीत.... कान्हा बरसाने मत अईयो...

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मुरादाबाद की साहित्यकार डॉ पूनम बंसल का गीत.... रूठों को चलो हम मनाएं रंगों का उपहार लिए

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मुरादाबाद की साहित्यकार डॉ अर्चना गुप्ता का गीत ....टेसू की खुशबू ले आई होली

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मुरादाबाद की साहित्यकार मीनाक्षी ठाकुर के दोहे... खांस खांस कर मफलर जी ने घूंट हार का गटका..

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मुरादाबाद के साहित्यकार मनोज मनु की ग़ज़ल... हल्ला गुल्ला हंसी ठिठोली सारी सारी रात हुई ...

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मुरादाबाद की साहित्यकार सरिता लाल का गीत ... मैंने चुनरिया भिगो ली

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सोमवार, 10 मार्च 2025

मुरादाबाद मंडल के जनपद रामपुर निवासी रवि प्रकाश की रचना... होली पर इस बार है महाकुंभ की छाप

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मुरादाबाद मंडल के जनपद अमरोहा निवासी साहित्यकार सत्येंद्र धारीवाल का गीत... फागुन गाते होली में

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मुरादाबाद के साहित्यकार शिवकुमार शर्मा का गीत.... होली है होली है भई होली है

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मुरादाबाद की साहित्यकार डॉ अर्चना गुप्ता का गीत ....खेल रहे आंखों – आंखों में होली सजनी से साजन

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मुरादाबाद से प्रकाशित दैनिक समाचारपत्र "अमर उजाला" में आज 10 मार्च 2025 के अंक में मुरादाबाद के रचनाकारों द्वारा फागुन और होली के परिप्रेक्ष्य में लिखी गईं रचनाओं पर केंद्रित योगेंद्र वर्मा व्योम का आलेख......