रविवार, 12 मई 2024

मुरादाबाद की साहित्यकार मीनाक्षी ठाकुर का गीत ... कल सपने में आई अम्मा .


 

मुरादाबाद की साहित्यिक संस्था 'हस्ताक्षर' ने मातृ-दिवस की पूर्व संध्या पर 11 मई 2024 को आयोजित की काव्य-गोष्ठी

मुरादाबाद की साहित्यिक संस्था 'हस्ताक्षर' की ओर से मातृ-दिवस की पूर्व संध्या पर 11 मई  2024 को काव्य-गोष्ठी का आयोजन स्वतंत्रता सेनानी भवन पर हुआ। 

कवयित्री आकृति सिन्हा द्वारा प्रस्तुत माॅं सरस्वती की वंदना से आरंभ हुए कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए रामदत्त द्विवेदी ने कहा .... 

माॅं ! तुम हो आंगन की तुलसी, 

सबके मन को हर्षाती हो। 

मुख्य अतिथि धवल दीक्षित ने कहा मां पर प्रस्तुत सभी रचनाओं की प्रस्तुति उत्कृष्ट रही।

  विशिष्ट अतिथि डॉ. पूनम बंसल के अनुसार - 

जीवन के तपते मरुथल में मां गंगा की धार है। 

अनसुलझे प्रश्नों के उत्तर मां गीता का सार है। 

उसकी खुशबू हर  कोने में मां घर का श्रृंगार है।।

विशिष्ट अतिथि श्रीकृष्ण शुक्ल ने कहा - 

लगता है तुम यहीं कहीं हो, छिपी हमारे पास।

 यदा कदा होता रहता है, माँ तेरा अहसास। 

 विशिष्ट अतिथि फक्कड़ 'मुरादाबादी' की अभिव्यक्ति थी - 

ममता ने आंचल फैलाया, 

दामन ने जग से दुबकाया। 

उठी लहर दर्द की जब भी, 

उसका चेहरा सामने आया।  

कार्यक्रम का संचालन करते हुए राजीव प्रखर ने अपनी पंक्तियों से सभी को भाव विभोर करते हुए कहा - 

क्या तीरथ की कामना, कैसी धन की आस। 

जब बैठी हो प्रेम से, अम्मा मेरे पास।। 

चीं-चीं करके भोर में, चिड़िया रही पुकार। 

अम्मा से कुछ कम नहीं, यह सुन्दर क़िरदार।। 

    वरिष्ठ कवि वीरेन्द्र बृजवासी ने कहा -

 मुझपे तुमपे या सारी दुनियाँ पे 

मां  भरोसा  कभी  नहीं  करती, 

तीर, तलवार   हों  या  संगीनें,

इनसे  तो माँ  कभी  नहीं डरती।

 सरिता लाल के भाव थे - 

जीवन के कुछ अधखुले पन्ने, जो एकाएक खुल जाते है़ं।

 उसके कुछ अनछुए आयाम, जो उसके पहलू से लिपट जाते हैं।

 डॉ. मनोज रस्तोगी के अनुसार - 

जीवन में पग-पग पर याद आती है माॅं।

 मन के आंगन को महका जाती है माॅं। 

योगेन्द्र वर्मा व्योम की इन पंक्तियों ने भी सभी के हृदय को भीतर तक स्पर्श किया - 

माँ का होना, मतलब दुनिया भर का होना है। 

तकलीफें सहकर भी सारे फर्ज निभाती है। 

उफ तक करती नहीं हमेशा ही मुस्काती है। 

उसका मकसद घर-आँगन में खुशबू बोना है।

 प्रो. ममता सिंह की अभिव्यक्ति थी - 

मेरी प्यारी मांँ ने मुझको 

जीवन का उपहार दिया। 

जाग जाग कर रात रात भर ,

ममता और दुलार दिया ।। 

विवेक निर्मल ने कहा - 

हो गया बूढ़ा मगर अब भी दुलारती है 

ओ लला कह कर मुझे अब भी पुकारती है।

 सुप्रसिद्ध शायर डॉ. मुजाहिद फ़राज़ का कहना था -

 ख़ुद भी आग़ोश में बचपन की वो जाती होंगी, 

माएँ जब लोरियां बच्चों को सुनाती होंगी। 

महबूब हो , बीवी हो,बहन हो कि हो बेटी, 

माँ जैसा मुहब्बत का समंदर नही देखा। 

 शायर ज़िया ज़मीर ने अपनी इस प्रस्तुति से सभी को भाव विभोर कर दिया -

 बांधना घर को इक धागे में कितना भारी है।

 इसमें तुम्हारी सिर्फ तुम्हारी ही हुशियारी है। 

तुमको है मालूम पिरोना कैसा होता है, 

मां हो तुम और मां होना ऐसा होता है। 

कवि राशिद हुसैन के अनुसार -

 माॅं के आंचल की जब हम दुआ हो गए। 

सर बुलंदी से हम आशना हो गए। 

जब कभी माॅं की गोदी में सर रख दिया,

 गम मुकद्दर से अपने हवा हो गए। 

 रचना पाठ करते हुए कमल शर्मा ने कहा -

बचपन में रोते बच्चे पर आंचल सी बन जाती माॅं। 

सीने से हरदम चिपकाए, कितने लाड़ लड़ाती माॅं। 

कवयित्री आकृति सिन्हा के भाव इस प्रकार थे - 

जिसने जीवन दिया मुझे 

जो दुनियां में लायी मुझे। 

जिसकी दुआ से मिला सबकुछ मुझे‌, 

उस मातृ शक्ति को प्रणाम मेरा दे आशीर्वाद मुझे। 

कवि अमर सक्सेना के भाव थे - 

तिरंगे में लिपटा आऊंगा मैं, 

वीर बहादुर कहलाऊंगा मैं, 

वतन से मुहब्बत है मुझे, 

वतन के लिए मर जाऊंगा मैं 

योगेन्द्र वर्मा व्योम द्वारा आभार-अभिव्यक्ति के साथ कार्यक्रम समापन पर पहुॅंचा। 





































बुधवार, 8 मई 2024

मुरादाबाद के साहित्यकार स्मृतिशेष माहेश्वर तिवारी पर केंद्रित डॉ सोनरूपा विशाल का संस्मरणात्मक आलेख गहरे-गहरे से पदचिह्न


15 सितंबर 2014 की शाम थी वो।शिव मिगलानी जी जो मुरादाबाद के प्रमुख व्यवसायियों में से एक हैं,सामाजिक तौर पर काफ़ी सक्रिय।उनके स्नेह की मैं सदा से पात्र रही हूँ।आज भी पार्किंसन की बीमारी से जूझते हुए अपने अस्थिर हाथों से फोन उठाकर कंपकपाती आवाज़ में मुझे मुरादाबाद आने का न्योता देना नहीं भूलते।ऐसे ही उस शाम उन्होंने मुझे याद किया 'एक शाम सोनरूपा के नाम' कार्यक्रम रखकर।जो मेरे गायन को दृष्टिगत रखकर रखा गया था। हमेशा से मेरा संगीत की ओर झुकाव रहा ही था।संगीत में ही शिक्षा भी ली।बाद में हिन्दी से पी. एच डी की।लेकिन 2010 से लेखन भी मेरे भीतर अंगड़ाइयां लेने लगा था।ये गंभीरता वाला था,इससे पहले बचपन वाला कविता प्रेम था मात्र।

उस कार्यक्रम के साथ मिगलानी जी ने सम्मान समारोह भी रखा था।कार्यक्रम के अध्यक्ष थे नवगीत के शिखर नामों में से एक आदरणीय माहेश्वर तिवारी जी।विशिष्ट अतिथि थे प्रसिद्ध शायर आदरणीय मंसूर उस्मानी जी।

आज तक बहुत कम ऐसे मंच हुए हैं जिन पर अपनी प्रस्तुति को लेकर मैं शत प्रतिशत संतुष्ट हुई होऊँ।लेकिन उस दिन मैं भीतर से आह्लादित थी।श्रोताओं की प्रतिक्रिया तो थी ही अच्छी मुझे भी स्वयं महसूस हुआ कि सब ठीक था।सबकी प्रशंसा और फोटोज़ लेने इच्छा मुझे अभिभूत तो कर रही थी लेकिन सातवें आसमान पर पहुँचने वाला भाव न पनपा पा रही थी।मेरे ज़हन में ज़मीन जो रहती है।

कार्यक्रम के बाद सम्मान समारोह हुआ,उदबोधन,फोटो सेशन इत्यादि।तिवारी जी और उस्मानी जी से भी शाबाशी मिली।

इस सब के उपरान्त डिनर टेबल पर सौभाग्य से कुछ क्षण ऐसे मिले जिसमें मैं थी,माहेश्वर जी थे और ताई जी (माहेश्वर जी की पत्नी)।

माहेश्वर जी ने बहुत ही सौम्य स्वर में मुझसे कहा - बेटा ,एक बात कहूँ यदि बुरा न मानो।

मैंने कहा - जी ताऊ जी,बिल्कुल कहिये।

वो बोले - सोनरूपा कल ही 'सरस्वती सुमन' पत्रिका का डॉ. उर्मिलेश विशेषांक मुझे मिला है।तुम्हारी संपादन क्षमता ने मुझे बहुत प्रभावित किया और तुम्हारे सम्पादकीय ने भी।इधर यदा कदा पत्रिकाओं में भी तुम्हारे गीत और ग़ज़ल पढ़ता रहता हूँ।उसे देख मुझे लगता है तुम्हें लेखन ही पहचान देगा।संगीत नहीं।फिर अपनी पूरी परम्परा को भी तुम ध्यान में रखो।

'जी ताऊ जी।बिल्कुल।आपकी बात पर मैं सिर्फ विचार ही नहीं अमल भी करने की कोशिश करूँगी।' मैंने कहा।

तभी ताई जी ने एक छोटा सा वाक्य बोला -

'बेटा स्वर तुम्हारे बहुत पक्के हैं, आवाज़ भी मधुर।लेकिन ताऊ जी की बात पर ध्यान देना।'

दोनों ने मेरे सिर पर हाथ रखा और अपने लिए तैयार खड़ी गाड़ी में बैठ कर चले गये।

उस दिन मुरादाबाद से बदायूँ आते हुए मैं लगभग सारी बातों को भूल बस इसी बात को सोचती हुई घर तक आ गयी।

इस बीच मैंने उस शाम को भी दोहरा लिया जो पापा डॉ . उर्मिलेश के नवगीत संग्रह 'बाढ़ में डूबी नदी' के लोकार्पण के अवसर पर बदायूँ क्लब में सजी थी।लोकार्पण और संग्रह पर चर्चा के साथ-साथ पापा के गीतों को गाने का भी एक सेगमेंट रखा गया था।लोकार्पणकर्ता डॉ. माहेश्वर तिवारी थे।पापा और उनका बहुत घनिष्ठ संबंध रहा।

तब मेरे विवाह को लगभग दो तीन वर्ष हुए होंगे।उन दिनों थायरॉयड ने मुझे अपना घोर शिकार बनाया हुआ था।मेरी सधी आवाज़ अब काँपने लगी थी।साँस फूलती थी।वज़न 78 किलो पर पहुँच गया था।

पिता को बेटियां अपनी इन दुविधाओं से उस समय कब अवगत करवाती थीं।सो पापा का आदेश सिर माथे पर लिया मैंने कि तुम्हें भी मेरा एक गीत गाना है।

जैसा मुझे अंदेशा था वैसा ही हुआ।मैं पापा के सुंदर गीत के साथ बिल्कुल न्याय नहीं कर पाई।मेरे साथ ही बैठीं एक और गायिका जिन्होंने पापा की ग़ज़ल गायी थी ' उम्र की धूप चढ़ती रही और हम छटपटाते रहे ' बहुत मधुर गायी।एक थर्मस में वो अपने लिए गुनगुना पानी लाई थीं।जिसको देख मैं मन ही मन सोच रही थी कि देखो ये होता है अपने गले का ध्यान और अपने पैशन की कद्र।


अब कार्यक्रम अपने अंतिम पड़ाव पर था।माहेश्वर जी के हाथों हम सभी को स्मृति चिन्ह दिये जाने थे।

उस दो पल के समय में उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखा और कहा-बढ़िया गाया और मेहनत कर।


और जब सब याद आ ही रहा है तो मैं दैनिक जागरण के लिए नवगीतकार डॉ. योगेंद्र व्योम जी द्वारा माहेश्वर तिवारी जी का वो महत्वपूर्ण साक्षात्कार कैसे भूल सकती हूँ जिसमें उन्होंने तमाम प्रश्नों के उत्तरों में एक उत्तर गीत की बुनावट पर दिया है।।उनके गीत अधिकतर दो अंतरे के रहे।लेकिन उनका विस्तार असीमित था।शब्दों की मितव्यता उनके गीतों की ख़ासियत है।एक भी अतिरिक्त शब्द उनके गीतों में नहीं नज़र आता है।हर शब्द जैसे मोती सा जड़ा हुआ।बिम्ब अनूठे जो आसानी से कहीं पढ़ने में न आएं।ये साक्षात्कार आज भी मेरे संकलन में रखा हुआ है।

आज जब वो नहीं रहे तो पुन: ये सब स्मृतियाँ जीवंत हो उठी हैं।उसके बाद अनगित बार उनसे भेंट हुई।कई बार कवि सम्मेलनों के मंच पर भी।लेकिन अब ये सोनरूपा दो नावों में सवार नहीं थी।बस लिख ही रही थी वो।

उसने आईसीसीआर के इम्पेनल्ड आर्टिस्ट का रिन्युअल लेटर भी अब फाड़ कर फेंक दिया था।

मेरे गीत संग्रह के लोकार्पण पर भी आये वो।अब वो ठठा कर हँसते हुए कहते - ख़ूब लिख रही है अब।

'कोकिला कुल' किताब के उन्होंने कई लेखिकायें सुझाईं मुझे।

उनके घर का नाम हरसिंगार है।हरसिंगार जो मुझे बहुत प्रिय है उसी के चित्र से साथ स्मृतियों की ये ख़ुशबू आज पन्नों पर भी सहेज रही हूँ और यहाँ भी। दोपहर से लिखना शुरु किया अब शाम घिरने को है।सोच रही हूँ कि हमारे होने में कितने लोगों का होना शामिल होता है।


 ✍️ सोनरूपा विशाल

बदायूं

मुरादाबाद के साहित्यकार स्मृति शेष माहेश्वर तिवारी को श्रद्धा सुमन अर्पित करते डॉ ओम निश्चल के दो गीत .......


कहां खो गए तुम

मुझे छोड़ कर के 

कहां छुप के बैठे हो

मुंह मोड़ कर के।

 

चलो आओ सम्मुख

 करो मुझसे बातें

 तो बातों से निकलेंगी

 कितनी ही बातें।

वो सदियों के रिश्ते

कभी जोड़ कर के।

कहां खो गए तुम

मुझे छोड़ कर के।


 अकेले हैं कितने

 तुम्हीं जानते हो 

 विकल वेदना मेरी

 पहचानते  हो 

जो वादे किए थे 

उन्हें तोड़ कर के।

कहां खो गए हो 

मुझे छोड़ कर के।


 उदासी का आलम 

 हमेशा न  होगा 

 कहीं  धूप  होगी 

 तो साया भी होगा 

भरोसा  न  तोड़ो 

ये मुंह मोड़ कर के।

कहां खो गए तुम

मुझे छोड़ कर के।

(2)

आई फिर एक और शोक की घड़ी

टूट  गई  एक  और गीत की कड़ी।


बिंबों की मालाएं

जैसे  बनफूल सी

झरती हैं धरती पर

महुए के फूल सी

भूल नहीं पाएंगे हम उनकी बंदिशें

यादों  में  उभरेगी  गीत  की लड़ी।


कवियों के कुल से 

उनका गहरा नाता था

छंदों का साथ रहे

यही उन्हे भाता था

याद बहुत आयेंगी जिंदादिल संध्याएं

बतकहियों, गीत  औ संगीत से भरी।


सरस्वती का आंगन 

कुछ सूना सूना है

उनकी अनुपस्थिति से

मन का दुख दूना है

कौन दुलारेगा अपनी आभा से गीत को

दुख  की   चादर   ओढ़े   वेदना  खड़ी।


हरसिंगार झरता था

ज्यों मन के आंगन में

इंद्रधनुष उग आता 

था नभ के दर्पण में

गीत कौन लिखेगा नदी की उदासी की

कौन  भला  फूंकेगा  लहरों  में बांसुरी।

✍️ ओम निश्चल 

नई दिल्ली

मुरादाबाद के साहित्यकार स्मृतिशेष माहेश्वर तिवारी को याद करते हुए यश मालवीय का गीत


कोई किरन अकेली करती माहेश्वर को याद


टूट गया है गीतों वाला

बरसों का संवाद

कोई किरन अकेली करती

माहेश्वर को याद


हरसिंगार के फूल से आंसू

झर झर झरते हैं 

चुप रहकर भी जाने कितनी

बातें करते हैं 


सब कुछ सूना लगे

इलाहाबाद, मुरादाबाद


स्वप्न रेत के गीली आंखों में 

भर जाते हैं 

होठों पर लेकिन मीठी

वंशी धर जाते हैं 


धीरे धीरे हो जाता है

पीड़ा का अनुवाद


पोर पोर में जलती सी

समिधाएं होती हैं 

एक नहीं कितनी ही

गीत कथाएं होती हैं 


बदला बदला सा लगता है

छंदों का आस्वाद।


✍️ यश मालवीय

मुरादाबाद के साहित्यकार स्मृतिशेष माहेश्वर तिवारी पर केंद्रित अर्चना उपाध्याय का संस्मरणात्मक आलेख .......तीन लोगों का समूह था: अब शून्य है

 


बाल पत्रिकाओं से शुरु हुआ मेरा किताबी सफ़र परिपक्वता के साहित्य प्रेम में बदल गया था।

प्रेमचंद से नई वाली हिंदी तक बहुत कुछ पढ़ा- जाना।समय- समय पर छपना- छपाना,पुरस्कार, सम्मान, पत्रिका संपादन आदि बहुत कुछ पर ठहरना भी हुआ।

लेकिन कुछ तो अपने काम की व्यस्तता ने धीमा रखा तो बहुत कुछ साहित्यिक दुनिया की अकथित परिभाषाओं ने असर डाला।

सालों के लंबे समय तक……

फिर मुरादाबाद आना हुआ। यहाँ भी उत्कृष्ट साहित्यिक पृष्ठभूमि थी, लोगों से परिचय तो हुआ लेकिन बढ़ाने की इच्छा नहीं हुई।

आदरणीय माहेश्वर बाबूजी को कौन नहीं जानता, ना भर पाने वाली तकलीफ़ के साथ बाँट रही हूँ कि मैं इस शहर में रहकर भी लंबे समय तक उनसे नहीं मिली थी।एक बार किसी कार्यक्रम में जब उनसे भेंट हुई ।तब उन्हें और क़रीब से जाना-

समझा। उनकी सरलता ने मुझ पर स्थायी प्रभाव छोड़ा था।सब उन्हें सम्मान के साथ दद्दा कह कर संबोधित कर रहे थे और वो अपने सादगी भरे अतुल्य व्यक्तित्व के साथ सभी से जुड़े थे।उनकी मधुर मुस्कान में मिले आशीर्वाद का सम्मोहन आख़िरकार मुझे उनके घर तक खींच ही ले गया।उस दिन उनके फ़ोन पर पता समझाने से लेकर स्वागत तक के अपनेपन ने ही मानो एक स्थायी संबंध का इशारा कर दिया था। कमरे में रखी सरस्वती माँ की मूर्ति और कई सारे पुरस्कार उनका पुनः परिचय देना चाह रहे थे लेकिन मुझे वहाँ कोई बड़ा साहित्यकार नहीं मिला, बल्कि एक स्नेहिल अम्मा- बाबूजी का साथ था। जिनके पास निश्छल प्रेम का एक ऐसा समंदर था जिसमें से मुझे भी अनमोल मोती मिलने वाले थे।वह दिन और आज का दिन , उनका स्नेहपाश आजीवन के लिए मुझे जकड़ चुका था।बीतते समय के साथ लगभग हर दूसरे -तीसरे दिन की बातों ने हमारे रिश्ते पर पड़े साहित्यिक शुरुआत के झीने आवरण को हटा कर पारिवारिक स्निग्धता से ढक दिया। 

उन पति- पत्नी का प्रेम मित्रता के अनूठे स्वाद से भरा था । उनकी चुहल भरी बातें, एक दूसरे का ख़्याल, उपस्थित समय को मंदिर की घंटियों की झंकार जैसे गुंजायमान कर देता।

एक को फ़ोन करो तो वो दूसरे को ज़रूर थमा देता था, एक को मेसेज करो तो जवाब दूसरा देता। इसलिए

जल्दी ही मैंने हम तीनों का एक वाट्स एप ग्रुप बना दिया और उसका नाम रखा अम्मा- बाबूजी । उस दिन वो खिलखिला कर हंसे थे और बोले बिलकुल सही किया हमारी ‘बिट्टू ‘ने।इस संबोधन ने तो मुझे पचास छूती उम्र में भी घर की उस ठुनकती नन्ही बच्ची में बदल दिया जिसके पास ज़िद, दुलार, अधिकार और न जाने कितनी चीजों की अंतहीन सूची होती है और सब पूरी होती है।

जिस दिन वो अपने नए घर के एक कमरे को लाइब्रेरी में बदल रहे थे उस दिन उनके पास ढेरों बातें और एक मासूम उत्साह था ,तब क्या पता था कि जिस लाइब्रेरी में किताबें पढ़ते हुए चाय पीना था वहाँ अब साथ होना भी आभासी है।

मुझे वापस लिखने- पढ़ने से उन्होंने ही जोड़ा।मेरे समूह और प्रयास की सराहना की,मेरी कविताओं - कहानियों को सुनते, मुझे सुझाव देते, साहित्य समर्पण के लिए प्रेरित करते, कभी अपना कोई गीत गाते या कभी अपना कोई संस्मरण सुनाते बाबूजी..

बातों - यादों का कोलाज़ बनाओ तो सब सीमित हो जाता है लेकिन जिए गए विस्तार को कुछ शब्दों में समेट लेना आसान है क्या? 

मेरे लिये तो नहीं।

बाबू जी की गिरती तबियत ने सभी को बेचैन कर दिया था, इस बार जब उन्हें मिलने गई थी तो सुस्त से लेटे थे, मैंने कहा बाबूजी ,ये नहीं चल पाएगा, और सचमुच थोड़ी देर में ही वो उठे , बातें की और बोले अगली बार आओगी तो मैं चलता दिखाई दूँगा,

पर ऐसे चले जाना तो तय नहीं हुआ था।मेरे दिये करौली बाबा के लॉकेट को तकिये के नीचे रखते थे। मैंने कहा कि मन्नत माँगी है आपके ठीक होने पर फिर जाऊँगी, तो बोले -“मुझे ले चलोगी ना।” मैंने कहा- पहले पूरा ठीक होना पड़ेगा।

मैं बाबूजी को ले जाना चाहती थी!

मैं उन्हें ले जाना चाहती हूँ!…


अम्मा बताती हैं कि नवरात्रों में पूजा- पाठ को लेकर बाबूजी बहुत संवेदनशील रहते थे, इस बार भी उन्होंने हवन के लिए पूछा था लेकिन इस बार ख़ुद को ही समिधा होना चुन लिया।अंतिम विदा में भी उनके चेहरे की ओर देखने का साहस मुझसे नही हुआ,

लेकिन तब भी तमाम अधूरे वादों- इरादों की तीखी छुअन मेरी आँखों में चुभ गई है।

अंतिम दिन भी अम्मा को नवरात्रि का पाठ करते,  सुनने वाले बाबूजी के बिना उनकी पूजा अब कभी पूरी हो पाएगी क्या?

इतने पास रहकर भी उनसे इतनी देर से मिल पाने का मलाल कभी मन से भुला पाऊँगी क्या?

एक झटके में पूरा जीवन एक प्रश्न बन जाता है, और हमारे पास कोई उत्तर नहीं होता।

जब तक गाड़ी मुड न जाए तब तक गेट पर खड़े रहने वाले बाबूजी क्या अब भी अपनी बिटिया को ऐसे विदा करेंगे!

अपनों से मिला दुःख बहुत बड़ा होता है, लेकिन बताने के लिए शब्द घट जाते हैं।जो उनसे मिला … जिया…उसे कहने- सुनने की अनुमति मुझे अब सिर्फ़ मन से मन तक ही महसूस हो रही है।

 मेरे इस वाट्स एप ग्रुप की शून्यता मेरे अंतिम समय तक नहीं भर पाएगी।

संस्मरण बाँटना तो स्मृति का अंश भर है, लेकिन पीड़ा उम्र भर की स्मृति।

बाबूजी की बिट्टू

 अर्चना उपाध्याय 









मंगलवार, 7 मई 2024

उर्दू साहित्य शोध केंद्र मुरादाबाद की ओर से रविवार 5 मई 2024 को यादें सतीश फिगार कार्यक्रम आयोजित



मुरादाबाद के साहित्यकार स्मृतिशेष सतीश कुमार गुप्ता फि़गार मुरादाबादी को याद करते हुए उर्दू साहित्य शोध केंद्र मुरादाबाद की ओर से रविवार 5 मई  2024 को आयोजित परिचर्चा में साहित्यकारों ने कहा सतीश फिगार का मुरादाबाद के उर्दू साहित्य में उल्लेखनीय योगदान रहा है।

 दीवान का बाजार में आयोजित कार्यक्रम यादें सतीश फिगार  का प्रारंभ उनके द्वारा लिखित हम्द (ईश वंदना) से मोहम्मद ज़हीन ने किया । कार्यक्रम संयोजक डॉ मोहम्मद आसिफ हुसैन ने सतीश फिगार की शख्सियत और शायरी के हवाले से एक विस्तृत आलेख प्रस्तुत किया, जिसमें उन्होंने फि़गार साहब की शायरी एवं उनकी रचना धर्मिता पर प्रकाश डालते हुए बताया कि मुरादाबाद के साहित्यिक इतिहास में सतीश फ़िगार एकमात्र हिंदू शायर हैं जिनका नातिया काव्य संग्रह प्रकाशित हुआ। उनका निधन बीती 7 अप्रैल को हो गया था।

    प्रख्यात शायर मंसूर उस्मानी ने सतीश फ़िगार की शायरी पर बात करते हुए बताया कि कुछ शायरों के दरमियान किसी बिंदु पर चर्चा हो रही थी, फिगार साहब ने उस में भाग लेना चाहा तो उनसे कहा गया कि आप शायर नहीं है, इस चर्चा में भाग नहीं ले सकते हैं। फिगार साहब ने  उसी समय ठान लिया कि वह एक बड़ा शायर बनकर दिखाएंगे। अतः वह तत्कालीन प्रसिद्ध उस्ताद शायर शाहबाज अमरोही की खिदमत में पहुंच गए और उन्होंने उर्दू शायरी के छंद शास्त्र एवं व्याकरण में महारत हासिल की और मुरादाबाद के साहित्यिक पटल पर इस तरह छाए कि उन्होंने फिकरे जमील, ख्वाबे परेशान, अक्से जमाल, कौसर मिदहत और ख़लवत के अलावा देवनागरी में कसक और भीगे नयन जैसे संग्रहों से साहित्य को मालामाल किया।

     प्रसिद्ध नवगीतकार योगेंद्र वर्मा व्योम ने कहा की फिगार साहब का जाना न सिर्फ उर्दू साहित्य की अपूरणीय क्षति है बल्कि हम लोगों का एक छायादार वृक्ष से वंचित हो जाना है। साहित्यिक मुरादाबाद शोधालय के संस्थापक डॉ मनोज रस्तोगी ने कहा कि हालांकि उम्र के आखिरी पड़ाव पर फि़गार साहब ने सजल जैसी नई विधा में भी कहने की कोशिश की और उनके दो सजल संग्रह भी प्रकाशित हुए लेकिन वास्तव में वह ग़ज़ल के ही शायर थे। मुरादाबाद में जब-जब ग़ज़ल की बात होगी तो फि़गार साहब को भुलाया नहीं जा सकता। रघुराज सिंह निश्चल जी ने कहा कि फ़िगार साहब मेरे बहुत करीबी मित्र थे उन्होंने अपनी सारी जिंदगी उर्दू साहित्य की सेवा में लगा दी। सैयद मोहम्मद हाशिम कुद्दूसी ने कहा कि फ़िगार साहब सादा मिज़ाज और साफ कहने वाले इंसान थे, तकल्लुफ, बनावट और दिखावा ना तो उनकी ज़िंदगी में था और ना ही उनकी ग़ज़लों में नजर आता है। वह जो कुछ कहते थे साफ-साफ कहते थे। असद मौलाई ने कहा कि फिगार साहब मेरे पिता राहत मौलाई साहब के पास आते और घंटों शेरो शायरी पर गुफ्तगू करते थे। उनके दुनिया से जाने पर निश्चित तौर पर मुरादाबाद के साहित्य में एक बड़ा स्थान रिक्त हो गया है। इस अवसर पर डॉ मुजाहिद फ़राज़, इंजीनियर फरहत अली खान और ज़िया ज़मीर एडवोकेट ने भी विचार व्यक्त किए । उर्दू साहित्य शोध केंद्र के संस्थापक डॉ मोहम्मद आसिफ हुसैन ने सभी मेहमानों का धन्यवाद ज्ञापित किया। 





























:::::::::प्रस्तुति:::::::::

डॉ मोहम्मद आसिफ हुसैन

संयोजक 

उर्दू साहित्य शोध केंद्र मुरादाबाद 

8410544252

9457880988