सोमवार, 20 मई 2024

मुरादाबाद की संस्था कला भारती की ओर से आयोजित काव्य गोष्ठी में रविवार 19 मई 2024 को वरिष्ठ गीतकार वीरेन्द्र 'ब्रजवासी' को कलाश्री सम्मान

 



महानगर मुरादाबाद के वरिष्ठ गीतकार वीरेन्द्र सिंह 'ब्रजवासी' को उनकी साहित्यिक साधना के लिए कला भारती साहित्य समागम, मुरादाबाद की ओर से रविवार 19 मई 2024 को आयोजित समारोह में कलाश्री सम्मान से अलंकृत किया गया। उपरोक्त सामान-समारोह एवं काव्य-गोष्ठी का आयोजन मिलन विहार स्थित आकांक्षा इंटर कॉलेज में हुआ। राजीव प्रखर द्वारा प्रस्तुत माॅं सरस्वती की वंदना से आरंभ हुए कार्यक्रम की अध्यक्षता बाबा संजीव आकांक्षी ने की। मुख्य अतिथि डॉ. प्रेमवती उपाध्याय एवं विशिष्ट अतिथियों के रूप में डॉ. बृजपाल सिंह यादव एवं रामदत्त द्विवेदी मंचासीन हुए। कार्यक्रम का संचालन आवरण अग्रवाल श्रेष्ठ ने किया। 

    सम्मान स्वरूप वीरेन्द्र 'ब्रजवासी' को अंग-वस्त्र, मानपत्र एवं प्रतीक चिह्न अर्पित किए गए। उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर आधारित आलेख का वाचन राजीव प्रखर एवं अर्पित मान-पत्र का वाचन योगेन्द्र वर्मा व्योम द्वारा किया गया। 

      सम्मानित साहित्यकार वीरेन्द्र 'ब्रजवासी' की साहित्यिक यात्रा पर अपने विचार रखते हुए कार्यक्रम अध्यक्ष बाबा संजीव आकांक्षी ने कहा - "श्री ब्रजवासी सामाजिक जीवन से जुड़े हुए एक ऐसे संवेदनशील रचनाकार हैं जिनकी रचनाएं काव्य से जुड़े प्रत्येक  पाठक अथवा श्रोता के हृदय को गहराई तक स्पर्श कर जाती हैं।" 

 श्री ब्रजवासी की रचनाधर्मिता पर विशिष्ट अतिथि डाॅ. प्रेमवती उपाध्याय का कहना था - "अपनी पावन भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति से जुड़े रहकर, समाज के प्रत्येक वर्ग तक अपनी गहरी पैठ बनाना श्री ब्रजवासी जी के रचनाकर्म की विशेषता रही है।" 

विशिष्ट अतिथि डॉ. बृजपाल सिंह यादव ने कहा - "उनका रचनाकर्म जहाॅं एक ओर ब्रज की महान परम्परा के दर्शन कराता है वहीं दैनिक जीवन से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण मुद्दों पर भी उनकी पैनी दृष्टि रहती है। वह समस्याओं की बात ही नहीं करते अपितु उनके यथासंभव हल भी प्रस्तुत करते हैं।"            उपरोक्त सम्मान समारोह में वीरेन्द्र 'ब्रजवासी' के सम्मान में एक काव्य-गोष्ठी का भी आयोजन हुआ। काव्य-पाठ करते हुए सम्मानित साहित्यकार वीरेन्द्र ब्रजवासी ने कहा - 

माॅं का दिल कितना होता है, 

चिड़िया के जितना होता है। 

खुशियों में जितना खुश होता, 

दुख में उतना ही रोता है। 

भूख-प्यास को माॅं बच्चे की, 

किलकारी से पढ़ लेती है। 

ऑंचल से ढक कर बच्चे का, 

उदर दूध से भर देती है। 

काला टीका लगा नज़र की, 

चिंता से डरना होता है।"

 इसके अतिरिक्त अन्य उपस्थित रचनाकारों दुष्यंत बाबा, राजीव प्रखर, आवरण अग्रवाल श्रेष्ठ, योगेन्द्र वर्मा व्योम, डॉ. मनोज रस्तोगी, मनोज मनु, ओंकार सिंह ओंकार, नकुल त्यागी, योगेन्द्र पाल सिंह विश्नोई, रमेश गुप्त, अभिनव चौहान, रामदत्त द्विवेदी, डॉ. प्रेमवती उपाध्याय, बाबा संजीव आकांक्षी, रघुराज सिंह निश्चल आदि ने भी विभिन्न सामाजिक मुद्दों को अपनी-अपनी  रचनाओं के माध्यम से उठाया। मनोज मनु द्वारा आभार-अभिव्यक्ति के साथ कार्यक्रम समापन पर पहुॅंचा।









































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