शुक्रवार, 30 जुलाई 2021

मुरादाबाद के साहित्यकार स्मृतिशेष हुल्लड़ मुरादाबादी ने अपनी साहित्य यात्रा 'दिवाकर' उपनाम से वीर रस की कविताएं लिखने से की थी। 2 दिसम्बर 1962 को भारत चीन महायुद्ध के संदर्भ में राष्ट्रीय रक्षा कोष सहायतार्थ एक अखिल भारतीय वीर रस कवि सम्मेलन लालकिला दिल्ली में आयोजित किया गया था जिसकी अध्यक्षता महाकवि रामधारी सिंह दिनकर कर रहे थे । उक्त कवि सम्मेलन में उन्होंने अपनी एक वीर रस की रचना पढ़ी थी ----- तुम वीर शिवा के वंशज हो, फिर रोष तुम्हारा कहां गया ......। उनकी यह रचना सन 1964 में हिंदी साहित्य निकेतन द्वारा प्रकाशित साझा काव्य संग्रह 'तीर और तरंग ' में भी प्रकाशित हुई थी। मुरादाबाद जनपद के 39 कवियों के इस काव्य संग्रह का संपादन किया था गिरिराज शरण अग्रवाल और नवल किशोर गुप्ता ने । भूमिका लिखी थी डॉ गोविंद त्रिगुणायत ने । प्रस्तुत है पूरी रचना -


भारत के नौजवानों से.....

तुम वीर शिवा के वंशज हो, फिर रोष तुम्हारा कहाँ गया ? 

बोलो राणा की सन्तानों, वह जोश तुम्हारा कहाँ गया ?


पहिले।   तो   तुम्हारे   क़दमों से, सारी।  धरती  थर्राती  थी, 

सागर का दिल हिल जाता था, पर्वत की धड़कती छाती थी । 

अब चाल में सुस्ती कैसी है, क्यों पांव हैं डगमग डोल रहे ? 

कुछ करके नहीं दिखाते हो, केवल अब मुँह से बोल रहे ॥


दुश्मन को मार गिराने का आक्रोश तुम्हारा कहाँ गया ? 

बोलो राणा की सन्तानों, वह जोश तुम्हारा कहाँ गया ?


जाकर देखो सीमाओं पर, जो आज कुठाराघात हुआ,

 जाकर देखो भारत माँ के माथे पर जो आघात हुआ । 

 गर अब भी खून नहीं खौला, गर अब तक जाग न पाये हो,

  मुझको विश्वास नहीं आता, तुम भारत माँ के जाये हो ।


दुनियाँ को दिव्य दृष्टि देते, वह होश तुम्हारा कहाँ गया 

बोलो राणा की सन्तानों, वह जोश तुम्हारा कहाँ गया ? 


आँखों की मस्ती दूर करो, यह संकट में कैसी हाला ? 

टक्कर से तोड़ो प्याले को, अब बन्द करो यह मधुशाला। 

गर तुम को कुछ पीना ही है, तो फिर दुश्मन का खून पियो,

 या तो स्वदेश पर मिट जाओ, या भारत माँ के लिये जियो ।

दुश्मन की फौजें दहल उठें, वह रोष तुम्हारा कहाँ गया ? 

बोलो राणा की सन्तानों, वह जोश तुम्हारा कहाँ गया ?


हे वीरों तुम हो महाकाल, फिर काल जो आये डरना क्या ?

 जब चला सिपाही लड़ने को, तो जीना क्या या मरना क्या ? 

 यदि मिटे तो फिर इतिहासों में, बलिदान अमर हो जायेगा,

  यदि जीवित रहे तो हर मानव, आदर से शीश झुकायेगा ।


माटी का हर कण पूछेगा, वह घोष तुम्हारा कहाँ गया ? 

बोलो राणा की सन्तानों, वह जोश तुम्हारा कहाँ गया ?



::::::;प्रस्तुति:::::::

डॉ मनोज रस्तोगी, 8, जीलाल स्ट्रीट, मुरादाबाद 244001, उत्तर प्रदेश, भारत,मोबाइल फोन नम्बर 9456687822

प्रख्यात साहित्यकार मन्मथनाथ गुप्त का पत्र जो उन्होंने मुझे 4 मार्च 1986 को लिखा था ----



 

गुरुवार, 29 जुलाई 2021

मुरादाबाद मंडल के जनपद अमरोहा की साहित्यकार प्रीति चौधरी की ग़ज़ल --- चांद छत से जो मुस्कुराता है...


 

मुरादाबाद मंडल के धामपुर (जनपद बिजनौर) निवासी साहित्यकार डॉ अनिल शर्मा अनिल की पांच लघुकथाएं -----

 


एक-

जिम्मेदारी

जिस दिन से गांव में टीकाकरण करने वाली टीम पंचायत भवन पर आने लगी।राघव ने तो मजदूरी करने जाना भी बंद कर दिया। घर घर जाता, आवाज लगाता, बुलाकर लाता।बड़े बूढ़ों को गोदी में ही उठा लाता या पीठ पर टांग लाता। बिना किसी लालच के सेवाभाव से यह सब करता राघव।

आज मुखिया जी ने  बताया , शहर में मजदूरी करता था यह। वहां पूरा परिवार कोरोना की चपेट में आया और उसकी भेंट चढ़ गया।एक भाई,भाभी,पत्नी और तीन बच्चे।बस यह ही बचा।अब गांव में किसी को ऐसा दुख न उठाना पड़े, इसीलिए राघव जिम्मेदारी के साथ सबका टीकाकरण कराने में पूरा सहयोग कर रहा है।

दो-

जगा दिया

बारात तो जाने की पूरी तैयारी थी।पच्चीस लोगों की लिस्ट थामें दीनानाथ ने एक एक चेहरा देख लिस्ट पर निशान लगाना शुरू कर दिया। अब उसने पूछना शुरू किया,"वैक्सीनेशन किस किसने नहीं कराया अभी?" 

ये क्या सात बारातियों के साथ साथ एक उनके जीजा जी भी निकल आए बिना वैक्सीनेशन वाले।

दीनानाथ ने हाथ जोड़कर कहा," आपसे निवेदन है कि अपनी और अन्य लोगों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए आपका बारात में न जाना और अपने घर को वापस चले जाना बहुत ही आवश्यक है। मैं क्षमा चाहता हूं।"

दीनानाथ के जीजा जी सबसे पहले उठ खड़े हो गये, "तुमने सही कहा दीनानाथ, हम बहुत बड़ा खतरा मोल लेने और खुद खतरा बनने से बच गये भाई।आज तेरी बात ने हमें गहरी नींद से जगा दिया।"

तीन-

टीकाकरण

कविता,लेख, कहानी लिखकर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और सोशल मीडिया पर  टीकाकरण अभियान का खूब प्रचार किया राजेश जी ने।

आज खबर मिली, अस्पताल में भर्ती है।

क्या हुआ? जानकारी ली तो पता चला,भाई साहब कोरोना की चपेट में आ गये।

उनको फोन लगाया तो  बेटे ने उठाया,बोला " अंकल पापा ने बार बार कहने पर भी टीका नहीं लगवाया। हमारे समझाने पर हमें ही डॉट देते।अब सब परेशान हैं हम।"

"चिंता मत करो,सब ठीक होगा।"बस इतना ही कह सका मैं।

चार-

नियम से

लालाजी ने लाकडाउन के नियमों का पालन तो किया ही। सरकारी निर्देश और गाइडलाइन को मानते रहे।

आज अस्पताल में लाइन में खड़े देखा। वैक्सीनेशन कराने आए थे। डॉ.गुप्ता ने भीतर से ही आवाज लगायी,"अंदर आ जाइए लालाजी।बाहर मत खड़े रहिए।"

लालाजी ने हवा में हाथ लहरा दिया," ठीक हूं डॉ.साहब यहीं पर हम कोई अलग थोड़े ही है।

हम भी तो अपनी दुकान पर लाइन लगवा देते हैं।"


पांच-

गाइडलाइन

"कभी अट्ठाइस दिन कभी पैंतालीस,कभी चौरासी दिन बाद आखिर माजरा क्या है सर।"

पत्रकार ने डॉ.शुक्ला से वैक्सीन की दूसरी डोज के अंतर की बाबत सवाल किया।

"पत्रकार जी, गाइडलाइन हम तो बनाते नहीं।हम केवल उसको इंप्लीमेंट करते हैं। यह दिनों का अंतर भी मिली गाइडलाइन अनुसार बताया गया है।" डॉ.शुक्ला ने उत्तर दिया।

"सर,फिर भी आपकी निजी राय क्या है?"पत्रकार ने फिर प्रश्न कर दिया।

डॉ.शुक्ला मुस्कुराएं, बोले," आप देख रहे हैं, सरकार के स्तर से कितना बड़ा वैक्सीनेशन अभियान चल रहा है। इसमें सहयोग कीजिए और प्रयास कीजिए कि कोई भी पात्र व्यक्ति इससे वंचित न रहे। बाकी गाइडलाइन के मुताबिक हम काम कर ही रहे हैं। इसमें हमारे स्तर से कुछ कमी हो तो बताना।"

✍️  डॉ.अनिल शर्मा अनिल, धामपुर,जनपद बिजनौर,उत्तर प्रदेश, भारत

बुधवार, 28 जुलाई 2021

मुरादाबाद के साहित्यकार स्मृतिशेष डॉ कृष्ण जी भटनागर के दो गीत - ये गीत लिए गए हैं लगभग 57 साल पूर्व सन 1964 में हिंदी साहित्य निकेतन द्वारा प्रकाशित साझा काव्य संग्रह 'तीर और तरंग 'से। मुरादाबाद जनपद के 39 कवियों के इस काव्य संग्रह का संपादन किया था गिरिराज शरण अग्रवाल और नवल किशोर गुप्ता ने । भूमिका लिखी थी डॉ गोविंद त्रिगुणायत ने ।




::::::::प्रस्तुति::::::::
डॉ मनोज रस्तोगी
8,जीलाल स्ट्रीट
मुरादाबाद 244001
उत्तर प्रदेश, भारत
मोबाइल फोन नम्बर 9456687822

मुरादाबाद के साहित्यकार डॉ मक्खन मुरादाबादी के सात गीत ......

 


एक-----
ऋतुएँ! निकल किधर जाती हैं
==================

ऋतुएँ! निकल किधर जाती हैं
साल, साल में घर आती हैं।

नहीं एक का, साझे का है
छह बहनों का पुस्तैनी घर।
जो भी इसमें रहती आई
वह, देखी गई अकेली पर।।
रहन-सहन इस ढब का हो तो
शंकाएँ घर कर जाती हैं।

बतलाए जाते हैं, इनके
और कहीं भी ठौर-ठिकाने।
चली वहीं जाती हैं क्रम से
अपना-अपना अर्थ कमाने।।
कमा-कमाकर गर्मी, ठिठुरन
और कमा जलधर लाती हैं।

जाती एक दूसरी लौटे
निज मान सुरक्षित रखने को।
घर की बात बना रक्खी है
आते जिसको सब लखने को।।
जोड़-जमाकर जी की ठंडक
हँसने को,पतझर लाती हैं।

दो-----
खेत जोत कर जब आते थे
================

खेत जोत कर जब आते थे
थककर पिता हमारे।
कहते! बैलों को लेजाकर
पानी जरा दिखाना।
हरा मिलाकर न्यार डालना
रातब खूब मिलाना।।
बलिहारी थे, उस जोड़ी पर
हलधर पिता हमारे।

स्वर से लेकर वर्णों तक के
जो भी पाठ पढ़ाए।
इस जीवन में उत्कर्षों तक
ले, जो हमको आए।।
परम शास्त्र के मंदिर जैसे
गुरुवर पिता हमारे।

इसी लोक से अपर लोक को
जाने वाला रस्ता।
इसपर पड़कर चलने वाला
बाँधे बैठा बस्ता।।
इसी मार्ग से मिल जाते हैं
ईश्वर! पिता हमारे।

तीन-----
काम बोलता है
=========

शोर मचा है! सबका
काम बोलता है।

सच का पता न पाया
पूछ-पूछ कर हारे।
किस मुँह से बतलाएँ
जो, उसके हत्यारे।।
पर, मदिरालय में कुछ
जाम बोलता है।

चुप रहती है कुर्सी
उस पर बैठा भी चुप।
रेंग रही है फाइल
खेल-खेलकर लुकछुप।।
आगे आकर केवल
दाम बोलता है।

सुस्ती में दिन सारे
ताल ठोकती रातें।
छंद विफल हो बैठे
पास हो गईं बातें।।
जिस पर होवे, उसका
राम बोलता है।

रुष्ट देवता इतने
सुनती नहीं देवियाँ।
घाटे पर घाटा है
उस पर नई लेवियाँ।।
लिखा मुकद्दर ऐसा
धाम बोलता है।

चार----
पीले पत्ते रड़क लिए
============

नव का स्वागत करते-करते
पीले पत्ते रड़क लिए।

खींच हमें ले जाता बरबस
मधुशाला का अपनापन।
वहाँ बैठकर कलुषित में भी
दिख जाता है उजलापन।।
झूठे सच्च बोलने लगते
घूँट तनिक जो कड़क लिए।

जितना सोचो, उतना दुष्कर
हवा महल के घर जाना।
गुनी-धुनी भी सीख न पाए
खूब तैरकर तिर पाना।।
बटिया-रस्ते थक हारें तो
चल पड़ती है सड़क लिए।

अच्छे-अच्छे सपने देखे
और दिखाए औरौं को।
पके फलों का सदा टपकना
भाग्य मिला है बौरों को।।
जितनी साँसें थीं, दिल उतने
रह सीने में धड़क लिए।

पांच--------------------------
फुदक रही हैं खीलें
===========

गिद्ध और सब चीलें
लगी हुई हैं, लाशें
गिर जायें तो छीलें।

प्रोपेगैंडा के सब
अक्षर लगे चीखने।
पास हमारे आओ
हमसे कला सीखने।।
लूट घरों को,उनपर
लगा रहे खुद सीलें।

गाँव-गाँव अब भुरजी
भाड़ झोंक हर्षाए।
आये जो भुनवाने
सबने उधम मचाए।।
जली-भुनी जितनी भी
फुदक रही हैं खीलें।

चढ़ मंचों पर गरजें
भटिये इधर-उधर के।
मूषक मक़सद पूरे
गन्ने कुतर-कुतर के।।
भेड़ भेड़िए खाएँ
हुई पड़ी हैं डीलें।

अगुआ हलधर सारे
लगे देखने धन्धे।
चौपट फसल करा दी
यूज़ हो गए कंधे।।
लुटिया भरी डुबाकर
अब गंगाजल पीलें।

छह------------------------
चलो! एक हम भी होलें
==============

रोग-व्याधियों के कुनबे
एक हो गए मिलकर।
चलो! एक हम भी होलें
फटा-पुराना सिलकर।।

पाँचों उंगली अलग-अलग
सिर्फ विवशता जीतीं।
मिल बैठैं तो मिली जुली
सार शक्तियाँ पीतीं।।
सीख ग़लतियों से मिलती
दर्द दुखों में बिल कर।

दुरुपयोग शक्तियाँ जियें
तो चिंता हो पुर को।
भस्मासुर की अतियाँ ही
डहतीं भस्मासुर को।।
एक हुआ था, लेकिन सच
देवलोक भी हिलकर।

विविध धर्म भाषाएँ मिल
मानव मर्म बचाएँ।
महल, मड़ैया, घेर सभी
संजीवन हो जाएँ।।
राम हुए ज्यों पुरुषोत्तम
मर्यादा में खिलकर।

सात-----
डर बैठाते हैं
=======

गरज-गरज कर काले बादल
डर बैठाते हैं।
ज़िद पर उतर हवा आए तो
दौड़ लगाते हैं।।

ख़बर बुरी है! पर, जीने को
हरगिज़ जीना है।
सुख-दुख जीवन के साजिंदे
समय हसीना है।।
दिवस-रात ही विषम चक्र में
शुभ ले आते हैं।

भाग्य बुरा है तो मिल-जुलकर
उसे सँवारेंगे।
पास-दूर के सब ही अपने
उन्हें पुकारेंगे।।
निष्ठाओं के दम पर ही, घर
भगवन् आते हैं।

विपदाओं का गुण ही सबको
दुख पहुँचाना है।
हमने सीखा खुद को, कैसे
पार लगाना है।।
पंख खुलें तो उड़ धरती का
अम्बर छाते हैं।

✍️ डॉ मक्खन मुरादाबादी
झ-28, नवीन नगर
कांठ रोड, मुरादाबाद
पिनकोड: 244001
मोबाइल: 9319086769
ईमेल: makkhan.moradabadi@gmail.com

मुरादाबाद के साहित्यकार डॉ आर सी शुक्ल का गीत ---कौन ठहरेगा तुम्हारे गांव में .... यह गीत हमने लिया है उनके गीत संग्रह दिव्या से । उनका यह संग्रह वर्ष 2019 में प्रकाश बुक डिपो बरेली से प्रकाशित हुआ है । .

 



मुरादाबाद के साहित्यकार स्मृतिशेष ईश्वर चन्द्र गुप्त ईश की कृति -ईश दोहावली । इस कृति में उनके वंदना, नीतिपरक, धर्माचरण, स्वास्थ्य,श्रृंगार और हास्य-व्यंग्य सम्बन्धी 151 दोहे हैं ।इसके अतिरिक्त 15 सँस्कृत श्लोकों व गीता सार का पद्यानुवाद और एक कविता भी है। इस कृति की भूमिका लिखी है उमेश पाल बरनवाल 'पुष्पेंद्र' ने। यह कृति वर्ष 1994 में ईश प्रकाशन क़ानूनगोयान द्वारा प्रकाशित हुई है। यह कृति हमें उपलब्ध कराई है उनके सुपुत्र उपदेश चन्द्र अग्रवाल ने ।



 क्लिक कीजिए और पढ़िये पूरी कृति

👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇

https://documentcloud.adobe.com/link/review?uri=urn:aaid:scds:US:055002c1-552d-45a6-8a91-df90a747848d


::::::प्रस्तुति:::::

डॉ मनोज रस्तोगी, 8,जीलाल स्ट्रीट, मुरादाबाद 244001, उत्तर प्रदेश, भारत , मोबाइल फोन नम्बर 9456687822

मुरादाबाद मंडल के जनपद बिजनौर की साहित्यकार रचना शास्त्री का गीत ----मन भर मुझको प्यार करो तुम....


अब तक सबने ठुकराया 

आओ!मुझ पर अधिकार करो तुम।

तोड़ो जग-बंधन कह रहा मन,

मन भर मुझको प्यार करो तुम।


एक सहरा रहा ठहरा मुझमें,

सजल सागर से नैन रहे।

एक दूजे से मिलने की खातिर, 

हम नदिया के तट से बेचैन रहे।

एक अमावस है ठहरी मुझमें,

दीपक बन उजियार करो तुम।

मन भर मुझको प्यार करो तुम।


जीर्ण पांडुलिपि सी पड़ी इधर उधर,

मन का भोजपत्र नही किसी ने बाँचा।

कितने मेह आकर बरसे अब तक,

पर मेरे मन का मयूरा नहीं नाचा।

एक उमस आषाढ़ की रहती मुझमें,

सावन की जलधार भरो तुम।

मन भर मुझको प्यार करो तुम।


देह की देहरी लीप के मैंने, 

मानस हवन आज रचाया है।

विधि विधान से आहुति तुम देना,

बना के पुरोहित तुम्हें बुलाया है।

यज्ञ-धूम सी महक जायें साँसें मेरी,

ऐसा मंत्रोच्चार करो तुम 

मन भर मुझको प्यार करो तुम।

हाँ प्यार करो तुम ....

✍️ रचना शास्त्री, बिजनौर, उत्तर प्रदेश, भारत

मुरादाबाद की साहित्यकार मोनिका शर्मा मासूम की ग़ज़ल --भूखों मरने के पुराने हुए किस्से साहिब खाते पीते हुए अब जान ये जाने लगती है


ज़िंदगी जब ज़रा खाने कमाने लगती है

मौत का खौफ महामारी दिखाने लगती है


मन में विश्वास कि उम्मीद भरी आंखो से

ये ज़ुबां टेर तेरे दर की सुनाने लगती है


दिल को जब भी जरा सी देर सुकूं मिलता है

जी जलाने को तेरी याद ही आने लगती है


भूखों मरने के पुराने हुए किस्से साहिब

खाते पीते हुए अब जान ये जाने लगती है


अपने अपराध तिजोरी में छिपाकर दुनिया

आंसू घड़ियाली सरेआम बहाने लगती है


✍️ मोनिका मासूम, मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश, भारत

मुरादाबाद की साहित्यकार मीनाक्षी ठाकुर की ग़ज़ल --फैसला तकदीर का जो हो गया अब आखिरी मैं अकेली ही चली,सबको पराया देखकर ....


खो गयी हैं मंज़िलें भी, लड़खड़ाता देखकर,

छोड़कर वो चल दिये डूबा किनारा देखकर।।


वो पराया  हो गया ,जो था कभी मेरा सनम

हो गयी हैरान हूँ मैं ये नज़ारा देखकर।


ज़िंदगी नाराज़ है या ,है मुकद्दर की ख़ता

मौत भी खामोश है मुझको तड़पता  देखकर


फैसला तकदीर का जो हो गया अब आखिरी

मैं  अकेली ही चली,सबको पराया देखकर ।


आँधियों औकात में रहना ज़रा कुछ देर तक,

झुक सका क्या आसमाँ,टूटा सितारा देखकर ।


✍️ मीनाक्षी ठाकुर, मिलन विहार, मुरादाबाद ,उत्तर प्रदेश, भारत

मुरादाबाद के साहित्यकार वीरेंद्र सिंह बृजवासी का गीत ---सुरसा सी महंगाई देखो, मुँह बाए प्रत्यक्ष खड़ी है, भूख, गरीबी, लाचारी की, आज किसे परवाह पड़ी है,


ओढ़ झूठका स्वयं लबादा,

बन   बैठे   साधू  सन्यासी,

झूठों को सम्मानित करके,

सच्चों  को  ये  देते  फांसी।

         

बिल्ली भाग्य टूटते  छींके, 

फिरहरपल इतरातेक्योंहो,

साम-दाम से सत्ता पाकर,

ईश्वर को झुठलाते क्योंहो,

वैर भाव का पाठ पढ़ाकर,

जन-मानस में भरें उदासी।


सुरसा  सी  महंगाई  देखो,

मुँह  बाए प्रत्यक्ष खड़ी  है,

भूख, गरीबी, लाचारी  की,

आज किसे परवाह पड़ी है,

हिन्दू,मुस्लिम,सिख,ईसाई,

लगते  सारे  धर्म  सियासी।


खेती - बाड़ी, उद्योगों  की,

खुले आम बोली लगती है,

इनको   चेताने  वालों   के,

सीनों में  गोली  लगती  है,

सिर्फ आंकड़ों में जिंदा  हैं,

सूख रही हैं फसलें प्यासी।


आसमान छू  रही   पढ़ाई,

किसने इसपर रोक लगाई,

मनचाहा  व्यापार बनाकर,

शिक्षा   की  दे  रहे  दुहाई,

पुश्तैनी   धंधे   की    नेता,

सीख दे रहे अच्छी-खासी।


लोगों  में  सद्भाव  नहीं  है,

सर्व धर्म समभाव  नहीं  है,

सिर्फ वोटकी राजनीति से,

बढ़कर कोई दांव  नहीं  है,

पर उपदेश कुशल  बहुतेरे,

फंसते इसमें नगर निवासी।

             

✍️ वीरेन्द्र सिंह "ब्रजवासी", मुरादाबाद/उ,प्र, भारत,  मोबाइल फोन नम्बर 9719275453

                  

                       

मंगलवार, 27 जुलाई 2021

मुरादाबाद की साहित्यकार मीनाक्षी ठाकुर का व्यंग्य ---बर्तन पुराणःएक व्यथा


घर में चार बरतन होंगें तो आपस में बजेंगे ही,यह कहावत तो बहुत पुरानी है।लेकिन जो इन बरतनों को बरसों से मांँजता -घिसता आया हो उसका क्या? कभी किसी ने सोचा है उसके बारे में। 

      खाना बनाने के बाद फैली हुई रसोई को समेटने के बाद बरतन माँजते ऐसा लगा कि  अचानक ही घर के सारे बरतन मेरी तरफ घूर घूर के देख रहे हों।मैने डरते डरते सबसे पहले कुकर जी को पानी भरकर एक ओर रखा ,तो लगा कि  ससुर जी पूछ  रहे हो,"बहू मेरी चाय कब बनेगी?"

मैने सहम कर साडी का पल्लू कमर में खोंसा और परात माता को उठाया और जूने से साफ करने लगीं,तभी माता जी की तली में चिपके आटे ने कहा,"बहू जरा संभलकर मांज ,देख तेरे गोरे -गोरे हाथ खुरखुरे न हो जायें।मैने परात माता को पानी भरकर ससुर  जी की बगल मे बैठाया तो दोनो खीसें निपोरते मुझे यों घूरने लगे जैसे मेरे पीहर से कोई कपड़ा लत्ता घटिया आ गया हो।खैर अब टीपैन फूफा जी की बारी थी.उफ्फ्फ बच्चों के फूफा जी ,!!!चाय की पत्ती से लाल होकर यूँ मुस्कुराये जैसे अभी अभी म्हारेरे नंदोई सा बनारसी पान चबाकर  पूछ रहे हों,"और जी !!साले साहब आये नहीं दफ्तर से अभी तक?,आजकल  कमाई ज़्यादा  हो रही है शायद?।मैने घबरा के जल्दी जल्दी टीपैन को  माँजकर एक ओर रखा।

तभी मुझे फूल से नाजुक मेरे छोटे छोटे बच्चों की तरह  कप गिलास  नज़र आये।हाय !!कलेजा ही काँप गया।कौन  इन बच्चों को यहाँ रख गया सिंक में,मैनै गुस्से मे आँखें लाल पीली कीं और  हृदय में पीर दबाये अपनी मासूम सी क्राकरी मांजकर एक ओर रख दी।तभी मेरी नज़र सिंक के पानी में तैरती मेरी सखियों समान कलछी,चमची,पौनी  पर पड़ी, जो न जाने कबसे मेरी ओर देख रही थीं मानो पूछ रही  हों कि घर गृहस्थी तो हमारी भी है,पर तुझे तो फुरसत ही नहीं हमसे बात करने की।मैने मुस्कुराते हुए उन्हें साफ करके स्टैंड में सजा दिया।तभी देखा देवर जैसा बे पैंदी का लोटा जो कभी सास की तरफ कभी मेरी तरफ  अवसर के अनुरूप होता  रहता है ,मुहँ फुलाये बैठा था।चलो भाई तुम भी निकलो सिंक से।और ये देखो जिठानी की तरह मुँह फुलाये चिकनी कढ़ाई... हाय राम...बड़ी मेहनत से चमकीं ये महारानी!!और दूध का बड़ा भगोना साफ करते -करते तो पसीने छूट गये।चम्मच से मलाई खुरचते ऐसा लगा मानो जेठ जी कह रहे हों," देख 'छोटे' तेरी घरवाली की आजकल बहुत जुबान चलने लगी है।काबू में रख इसे।"


"हुँहह...मुझे  क्या...?अब तो आदत पड़ गयी है सबकी सुनने की।कहते रहो..।"यही सोचकर  मैं फिर से बरतन घिसने लगीं।

हाय ये क्या !!लंच बाक्स के डिब्बे- डिब्बी,ननदो और उनके बच्चों की तरह संभाले नहीं सँभल रहे थे।बड़े यत्न से साफ किया उन्हें भी उल्टा रखकर स्लैब पर लगाया।

 लो जी अब बारी आयी  तवा  महाराज की जो पूरा दिन  पूरे घर का बोझ उठा उठाकर जला भुना बैठा है,घर का मालिक...मैने मुस्कुराकर 'उन्हें' भी साफ करके फिर से गोरा चिट्टा बनाया।

अब आखिर में चाय की छलनी ...देखो सबके दोष कैसे निथारकर एक ओर फेंकती है!!अब खुद को तो बहुत ही करीने से साफ करना था।लिहाज़ा वक्त लगा ...पर चमचमा गयीं मैं...थोड़ी ही मेहनत से..।

 अब.....!!अब क्या..? मैं हूँ  ,मेरी रसोई!और  मेरे बरतन ...अक्सर तनहाई में बाते करते हैं और कहते हैं कि  चार बरतन होंगे तो बजेगें ही न....!और जो बजता नहीं वो  टूट  जाता है।

खैर...!!चाय बन रही है।पीकर जाइएगा।

✍️ मीनाक्षी ठाकुर, मिलन विहार, मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश, भारत

मुरादाबाद के साहित्यकार डॉ पुनीत कुमार की लघुकथा ---टीका


"मुझे नहीं लगवाना ये टीका। बुढ़ापे का शरीर है सुई का दर्द कौन झेलेगा और फिर  _उसके बाद बुखार और दर्द की शिकायत भी मैने सुनी है।" कलावती जिद पर अड़ी थी। उसके बेटे रामलाल ने उसको समझाते हुए कहा "अम्मा तुम नहीं  जानती,ये कोरोना बीमारी बहुत खतरनाक है। इसकी कोई दवा भी नही है। टीका लगवाकर ही इससे काफी हद तक बचा जा सकता है। लेकिन कलावती कुछ सुनने को तैयार नहीं थी।  रामलाल ने आखिरी कोशिश करते हुए कहा _ "अच्छा अम्मा एक बात बताओ।जब हम छोटे थे और घर से कहीं बाहर जाते थे,तो हमारे माथे पर आप काला टीका क्यों लगाती थीं।" "वो तो तुम्हे किसी की नजर ना लगे,इस लिए लगाते थे।"

"बस इसे भी ऐसे ही समझ लो। कोरोना की बुरी नजर से बचना है तो टीका लगवाना जरूरी है।" कलावती के दिमाग में ये बात बैठ गई।वो फुर्ती से उठीं और बोलीं __"ठीक है,तेरी ताई और  चाची को भी साथ ले चलते हैं।"

✍️  डॉ पुनीत कुमार, T 2/505 आकाश रेजीडेंसी मुरादाबाद 244001, M 9837189600

मुरादाबाद की साहित्यकार डॉ शोभना कौशिक की लघुकथा ----बहु


रिद्धिमा विवाह से पहले बहुत डरी हुई थी ।उसे डर विवाह से नही ,बल्कि अपनी सासू माँ से लग रहा था ।जैसा कि उसे पता था ,कि सास बहुत तेज होती हैं ,जरा चैन नही लेने देती ,आदि- आदि ।        खैर, विवाह का दिन भी आ गया फेरे ले रिद्धिमा रोहित के साथ विदा हो अपनी सपनों की दुनिया ले ससुराल आ गयी ।उसे मन ही मन डर लग रहा था ।खैर, रोहित की दिलासा से वह थोड़ी सहज हुई ।।       अगले दिन सबेरे उठ उसने सबसे पहले नहा-धो कर चाय बना कर सासु माँ के कमरे में पहुँचाने गई।सासु माँ उठ चुकी थीं व पूजा कर रही थी ।रिद्धिमा को देख बोली ",बैठो बेटा, मैं जानती हूँ, तुम्हें नए परिवेश में ढलने में थोड़ा वक्त लगेगा ।लेकिन इस बात की कतई चिंता मत करना ,धीरे- धीरे तुम यहाँ के सारे तौर-तरीके , रीति -रिवाज सीख जाओगी।और फिर घबराहट कैसी, मैं हूँ तुम्हारे साथ , जो समझ न आये बेहिचक मुझसे पूछ लो ।

       आखिर माँ हूँ तुम्हारी ,आज से एक नही दो माएँ हैं तुम्हारी ।एक मायके में और एक ससुराल में।कह पल्लवी ने रिद्धिमा को गले लगा लिया ।सच रिद्धिमा का सारा डर एकदम दूर हो गया ।वह सोच रही थी ,कितनी भाग्यशाली है वह जो उसे ऐसी सासू माँ मिली ।आज पंद्रह वर्ष बीत जाने पर भी दोनों में वैसा ही अगाध प्रेम है ,जैसा पहले था ।माँ -बेटी जैसा और रिद्धिमा ने भी सही अर्थों में अच्छी बहु होने की परिभाषा गढ़ दी ।जो केवल और केवल आपसी सामंजस्य से ही सम्भव हो पाई ।

✍️ डॉ शोभना कौशिक, बुद्धिविहार, मुरादाबाद

मुरादाबाद मंडल के सिरसी (जनपद सम्भल) के साहित्यकार कमाल जैदी वफ़ा की कहानी ------- "पछतावा"


"देखो जी, मेरी बात कान खोलकर सुन लो. बाबूजी को हम अपने साथ ही रखेंगे. आखिर इतने वर्षो से सचिन ही तो बाबूजी की पेंशन ले रहा है. बाबूजी की पेंशन पर आखिर हमारा भी तो हक़ है।" राजेश की पत्नी आशु ने पति के कान भरते हुए कहा। 

"ठीक है बाबा,मै बाबूजी से कहकर देखता हूं .वह माताजी से अलग रहना भी तो नही चाहते और तुम कहती हो कि माताजी को सचिन के पास ही रहने दो ।" राजेश ने आशु की बात का जवाब देते हुए कहा .

अगले दिन राजेश ने माताजी और बाबूजी से कहा कि वह बाबूजी को अब अपने साथ लेकर जाना चाहता है. कुछ वर्ष वह उसी के पास रहेंगे. वह उनका शहर में अच्छे से इलाज भी करा देगा. थोड़ा न नुकर के बाद आखिर बाबूजी राजेश के साथ जाने को तैयार हो ही गये। 

       राजेश उन्हें अपने साथ शहर ले आया हर माह वो ए टी एम के जरिये बाबूजी की पेंशन बैंक से ले आता था. बाबूजी का चंद माह में ही वहाँ से दिल उचाट होने लगा उन्हें फिर से अपना कस्बा याद आने लगा. वहाँ सब एक दूसरे से घुले मिले थे. यहाँ सब अनजान थे. कोई नमस्ते करना तो दूर नमस्ते का जवाब देना भी गवारा नही करता था। बाबूजी यहाँ पहले से और अधिक बीमार रहने लगे.  और एक रात हार्ट अटैक से उनकी मौत हो गई. घर मे कोहराम मच गया. आशु बाबूजी से ज्यादा यह सोचकर रो रही थी कि हर माह बाबूजी की पेंशन के अब चालीस हजार कहा से आएंगे. बाबूजी की मौत को सुनकर माताजी और सचिन भी परिवार सहित राजेश के यहां आये और अंतिम संस्कार के बाद वापस अपने कस्बे लौट गये               बाबूजी की पेंशन अब माताजी को मिलने लगी थी उधर माताजी के मायके में  उनका छोटा भाई अमेरिका में जा बसा और जाते जाते उसने गांव का घर व ज़मीन अपनी बहन यानी माताजी के नाम कर दी। यह सुनकर आशु व राजेश पछता रहे थे कि काश वह बाबूजी के साथ माताजी को भी अपने साथ ले आते।

✍️ कमाल ज़ैदी "वफ़ा", सिरसी (संभल), मोबाइल फोन नम्बर 9456031926

मुरादाबाद के साहित्यकार वीरेंद्र सिंह बृजवासी की कहानी ------- बेटी क्यों बेचारी है!


अरे लाला बनवारी लाल,बड़ी जल्दी में हो,ऐसी क्या बात है जो दो मिनिट रुककर दो बात भी नहीं कर सकते।नहीं-नहीं ऐसी कोई बात नहीं शंकर लाल।मैं अपने बेटे के लिए कुछ ताजे फल,मेवे और उसकी पसंद के नुक्ती के लड्डू लेकर आया था सोचा उसे जाकर देआऊं।मैं चाहता हूँ कि वह खूब तंदरुस्त और सुंदर हो।अभी उसके खाने-पीने की उम्र है।कोई हारी-बीमारी उसे छू भी न पाए।बड़े होकर वही तो हमारा सहारा बनेगा।

 बनवारी लाल की बात बीच ही में काटते हुए शंकर लाल ने कहा उस सुंदर बिटिया लक्ष्मी के लिए कुछ भी नहीं।ऐसी क्या बात है वह कोई पराई है क्या।

      तुमने ठीक कहा शंकर लाल बेटी तो पराया धन होती ही है।उससे क्या मोह, उसको तो एक न एक दिन यह घर छोड़कर जाना ही जाना है।फिर मैं फ़िज़ूल उसके ऊपर खर्चा क्यों करूं।

   मैंने लक्ष्मी की माँ को बोल दिया है कि अब यह लगभग पांच साल की हो रही है।इसे घर का काम धंधा भी सिखाओ।सबेरे उठकर पूरे घर में झाड़ू,दोपहर का खाना, चौका-बर्तन के साथ-साथ कुछ सिलाई-कढ़ाई करना भी सिखाया करो।खाली पड़े-पड़े खाएगी तो मोटी और हो जाएगी।शंकर लाल उसकी बात सुनकर चुचाप अपने घर लौट गए।

      यह सुकर बेटी ने पापा से कहा।पापा अगर मैं सारे दिन घर का ही काम करूंगी तो पढ़ने स्कूल कैसे जाऊँगी। मुझे भी तो पढ़-लिख कर आगे बढ़ना है।

      बनवारी लाल झल्लाते हुए,,,,,चल,चल आई बड़ी पढ़लिख कर आगे बढ़ने वाली।पढ़-लिख कर तू कौन सी कलेक्टर बनेगी।तेरे लिए उतनी ही पढ़ाई काफी है ताकि तू चिट्ठी-पत्री बांच सके।

       बेटी लक्ष्मी अपना सा मुंह लेकर आंखों में आंसू भरे माँ के पास जाकर अपने पढ़ने के बारे में पिता जी को समझाने की ज़िद करने लगी। माँ ने कहा बेटी तेरे पिता जी ठीक ही तो कह रहे हैं।

कल से घर के काम में मेरा हाथ बटाना सीख।

     बेटा मोहन भी अब काफी बड़ा हो चुका था।परंतु पढ़ाई में फिसड्डी ही निकला।वह हाई स्कूल भी पास नहीं कर सका।फिर भी पापा कहते क्या हुआ,अगर पास नहीं हुआ वह तो घर का चिराग है चिराग।कुछ नहीं तो दुकान पर बैठकर ही नौ के सौ कर लेगा।अब तो उसकी शादी वाले भी घर का चक्कर काटने लगे।

     बनवारी लाल पत्नी से बोला क्यों भाग्यवान लड़की तो अपने घरवार की हो चुकी।अब मोहन की भी शादी हो जाए तो कैसा रहे।ठीकठाक रिश्ते भी आ रहे हैं। जैसी आपकी इच्छा।

     शादी होते ही मोहन के स्वर बदलने लगे।अब वह केवल वही करता जो उसकी पत्नी कहती।कभी-कभी तो माता-पिता पर बेतहाशा चीख-चीखकर घर से निकल जाने की धमकी भी देने लगा।

       बेटी लक्ष्मी से यह सब देखा न गया।उसने माता-पिता से बड़े विनम्र भाव से प्रार्थना की कि आप चिंता क्यों करते हो ,अगर भैया आपके साथ नहीं रहना चाहते, वह अकेले रहना चाहे हैं तो रहें।आप दोनों अभी इसी वक्त हमारे साथ चलो।

      यह सुनकर बनवारी लाल सुबुक-सुबुककर रोने लगे और रो-रोकर बस यही कहते रहे बेटी मुझे माफ़ करना मैंने तुम्हारा बड़ा अपमान किया।मैं बेटे के प्यार में अंधा हो गया था।पर अब समझा बेटियां ही घर का चिराग होती हैं।

वह एक नहीं दो-दो घरों को रौशन करके भी मां-बाप का साथ निभाना नहीं भूलतीं।

मैं तो यही कहूंगा----

   बेटी   क्यों   बेचारी   है,

   वह  तो  राजदुलारी   है,

   बेटी  ही  तो जीवन  की,

   महक भरी फुलवारी  है।

✍️ वीरेन्द्र सिंह "ब्रजवासी",  मुरादाबाद/उ,प्र, 9719275453

                 

                    ,

मुरादाबाद के साहित्यकार विवेक आहूजा की कहानी----अंत भला तो सब भला


जय , सुनील और संदीप की गिनती मौहल्ले के सबसे शैतान बच्चों में होती थी । तीनों आए दिन कोई न कोई शैतानी करते ही रहते थे , मोहल्ले वालों के साथ साथ उनके घर वाले भी उनकी इन शैतानों की वजह से बहुत परेशान रहते थे। क्योंकि वह पढ़ाई में लगातार पिछड़ते जा रहे थे , घर वालों की चिंता भी लगातार बढ़ रही थी । मगर खास बात यह थी कि तीनों की दोस्ती देखते ही बनती थी । जहां भी जाते तीनों संग संग ही जाते थे , चाहे कोई खुराफात हो घूमने जाना हो उनका संग हमेशा रहता था ।

                  एक दिन तो हद ही हो गई जब उन्होंने मंदिर के सामने बहुत सारे पटाखे छोड़ दिए आजिज होकर मोहल्ले वाले उनके घर शिकायत लेकर पहुंचे ।  शिकायत सुन घर वालों का पारा हाई हो गया , उन्होंने तीनों की जमकर लताड़ लगाई और आदेश पारित कर दिया कि अगर आइंदा ऐसा हुआ तो वह घर में ना घुसे । जय सुनील और संदीप को घर में पड़ी लताड़ इतनी बुरी लगी की उन्होंने घर छोड़ने का फैसला कर लिया और रात वाली ट्रेन से ही घर से भाग गए । जब सुबह उठकर घरवालों ने देखा तो जय , सुनील और संदीप घर पर नहीं थे । पूरे मोहल्ले में शोर हो गया कि तीनों बदमाश लड़के घर से भाग गए हैं , पूरे मोहल्ले ने राहत की सांस ली..... चलो कुछ दिन तो शांति रहेगी ।  लेकिन घरवाले बुरी तरह परेशान हो गए उन्होंने जगह-जगह उनकी तलाश करी पर उनका कहीं अता पता नहीं चला , हार कर वह भी टिक कर घर पर बैठ गए और मन ही मन सोचने लगे कि जब पैसे खत्म हो जाएंगे तो घर वापस आ जाएंगे ।                          

                   जय , सुनील व संदीप घर से भागकर ट्रेन में तो बैठ गए थे पर उन्हें पता नहीं था ट्रेन कहां जा रही है ।  पूरी रात का सफर कर ट्रेन सुबह शिमला के स्टेशन पर पहुंच गई शिमला के स्टेशन पर जय , सुनील व संदीप तीनों बहुत प्रसन्नता पूर्वक उतरे पर उनके पास इतने पैसे नहीं थे कि शिमला के किसी महंगे होटल में रह सके , अतः शिमला के नजदीक ही एक गांव में एक किसान के घर पर रुक गए , गांव में उन्होंने सभी को यही बताया कि वे शिमला घूमने आए हैं । तीनों की घर पर इतनी बेइजती हुई थी कि अब उन्होंने पक्का फैसला कर लिया था कि घर वापस नहीं जाना है और बाहर रहकर ही खूब पैसा कमाएंगे । लेकिन दो-चार दिनों में ही उनके हौसले पस्त हो गए शिमला जैसे महंगे शहर में गुजारा करना उनके लिए मुश्किल हो गया उनके पैसे भी अब खत्म होने लगे थे , तीनों ने विचार किया चलो दिल्ली चलते हैं , वहां उन्हें जरूर काम मिलेगा यही सोच वह अपना बोरिया बिस्तरा उठा दिल्ली आ गए ।

                   दिल्ली पहुंचकर कई दिनों की भागदौड़ के पश्चात जय व सुनील को एक ढाबे पर वेटर की नौकरी मिल गई व संदीप एक मोटर मैकेनिक के पास लग गया । तीनो का अपनी नौकरी से प्राप्त धनराशि से मुश्किल से ही गुजारा हो पाता था । इस तरह 6 माह का समय गुजर गया इधर उनके  घर वाले भी उनके घर ना आने की वजह से बहुत परेशान थे और जगह-जगह जाकर उनकी तलाश कर रहे थे । अब तीनों को अच्छे से समझ आ चुका था कि बगैर शिक्षा पूर्ण करें वह कभी कामयाब नहीं हो सकते और उनकी की गई कारगुजारीओं के कारण उनके घर वालों को कितना दुख हुआ होगा । अंततः उन्होंने वापस घर जाने का फैसला कर लिया 1 दिन तीनों ने अपना सारा सामान बांधा और वापस अपने शहर आ गए । तीनों को वापस घर पर पाकर घर वाले बहुत प्रसन्न हुए तीनों ने अपने घरवालों से माफी मांगी , वह आगे से पढ़ाई में पूरा ध्यान देने व किसी भी प्रकार की कोई शैतानी ना करने का वादा किया । घर वाले भी तीनों के स्वभाव में इस परिवर्तन को देख अति प्रसन्न थे , उनको पता था यह परिवर्तन जीवन में किए गए अथक संघर्ष के कारण हुआ है , क्योंकि उन्हें इसका अनुभव था । उन्होंने अपने बच्चों में आए इस परिवर्तन के लिए परम पिता का शुक्रिया अदा किया व मन ही मन प्रसन्न होते हुए कहा "अंत भला तो सब भला"

✍️ विवेक आहूजा , बिलारी, जिला मुरादाबाद 

@9410416986

@8923831037




मुरादाबाद मंडल के जनपद रामपुर निवासी साहित्यकार रवि प्रकाश की लघुकथा ----सिरफिरा

   


"दो लाख बीस हजार रुपए  की सौ कुर्सियाँ बैठेंगी । आपका सारा काम पूरा हो जाएगा । कुर्सी में ही लिखने की सुविधा वाली डेस्क भी रहेगी । अलग से मेज की जरूरत नहीं पड़ेगी ।"-फर्नीचर विक्रेता ने अपने शोरूम पर रखी हुई बहुत सी कुर्सियों में से एक कुर्सी को दिखाते हुए सरकारी विभाग के एक बड़े अधिकारी से कहा । अधिकारी को अपने विभाग के नवनिर्मित कॉन्फ्रेंस-हॉल के लिए सौ कुर्सियाँ खरीदनी थीं, जिनके लिए उचित दुकान तथा उचित दर की तलाश वह कर रहा था ।

      "देखिए भाई ! दो हजार दो सौ रुपए  की यह कुर्सी तो बहुत महँगी बैठ रही है । वैसे भी हमें अभी दो दुकानों की कोटेशन और लेनी हैं ।"- अधिकारी के इतना कहते ही फर्नीचर विक्रेता सजग हो गया ।

          कहने लगा - "कोटेशन में क्या रखा है ? बाकी दो कोटेशन भी हम ही दे देंगे और आपको भी खुश करेंगे ।"

        "वह तो हम समझ रहे हैं । मगर बाईस सौ रुपए की कीमत बहुत ज्यादा है । आपके खुश करने से भी काम नहीं बन पाएगा ।"

      "दस परसेंट आप को दे देंगे । अब तो ठीक रहेगा ?"

      "आप कुर्सियों की कीमत चालीस प्रतिशत कम कर दीजिए । फिर तीनों कोटेशन आप भी बना कर दे सकते हैं । हमें कोई आपत्ति नहीं होगी।"

       " कैसी बातें कर रहे हैं साहब ? चालीस प्रतिशत कम करने के बाद क्या तो आपको बचेगा और क्या हमें बचेगा ?"

            "आप सोच लीजिए । आपको बचे तो हमें कुर्सियाँ बेच दीजिए और अगर कुछ नहीं बच रहा है तो हम दूसरी दुकान तलाश करें।"- अधिकारी का लहजा अब सख्त था।

       दुकानदार झुँझलाने लगा था । बोला "ठीक है । तीस प्रतिशत कम कर दूंगा। इससे ज्यादा नहीं हो पाएगा । आपकी समझ में आए ,तो हम से ले लीजिए ।"

    कुछ देर तक अधिकारी सोचता रहा। फिर बोला " चलो ! ऐसा करते हैं आपके हिसाब से कुर्सी की कीमत एक हजार पाँच सौ चालीस बैठ रही है आप चौदह सौ रुपए का रेट लगा दीजिए । कुर्सियाँ भिजवा दीजिए । हम आपको एक लाख चालीस हजार रुपए का चेक पेमेंट कर देंगे ।"

             दुकानदार ने एक मिनट सोचा । अधिकारी के चेहरे की तरफ कुछ पढ़ने की कोशिश की ,मगर जब पढ़ने को कुछ नहीं मिला तो बोला " ठीक है ! चौदह सौ में ही आप ले लीजिए । पाँच दिन बाद कुर्सियाँ पहुँच जाएँगी।"

        सौदा तय करके जब अधिकारी शोरूम से बाहर चला गया तो दुकानदार अपने सहकर्मी से दबी जुबान में कहने लगा  - "अजीब सिरफिरे आदमी से पाला पड़ा है। मुझे तो इसके दिमाग का एक पेंच ढीला नजर आता है ।

✍️ रवि प्रकाश ,बाजार सर्राफा, रामपुर (उत्तर प्रदेश) मोबाइल फोन नम्बर 99976 15451

मुरादाबाद की साहित्यकार राशि सिंह की लघुकथा ----जय एकतावाद


अचानक सारा वातावरण  कौओ की काँव-काँव से गूँज उठा l वारिश के दिन है कहीं  कोई साँप वगैरह  न निकल आया हो यही सोचकर सभी घरों  से लोग बाहर निकल आये क्योंकि  अक्सर साँप को देखकर ही पंछी  ज्यादा चिल्लाते हैं l 

यह क्या एक कौवा  नीचे पडा  हुआ था और उसके  पास देवेंद्र जी  का पालतु  कुत्ता  जैसे ही वह कुत्ता  इसको उठाने  की कोशिश करता सभी कौवे काँव -काँव कर उसके  पीछे  पड़ जाते वह भागता तो उसके ऊपर उड़कर रोकने का प्रयास करते l 

अन्त में  कुत्ता  थक गया और बैठकर लम्बी जीभ निकाल कर हाँफ़ने लगा l 

कौवे अभी भी चिल्ला रहे थे l 

आदमी  सोचने  लगे शायद  यह  सब कौवे एक ही जाति के हैं  तभी तो इतनी एकता है कि अपने जैसे ही कौवे को बचाने के लिये इतनी एकता के साथ कुत्ते  से लड़ रहे हैं l 

एक और अच्छाई कि  इन के पास मोबाईल नहीं  है नहीं  तो बचाने की बजाय वीडीओ बनाने में  लग जाते हमारी  तरह l 

✍️ राशि सिंह , मुरादाबाद,  उत्तर प्रदेश, भारत 

मुरादाबाद के साहित्यकार अशोक विद्रोही की कहानी --मेरे अपने

 


........"एक महीना हो गया इस आदमी को.... जब से मरा कोरोना फैला है ....किसी की फिक्र है इसे.... ? "

"... न मेरी......! न बच्चों की !सुबह 6:00 बजे निकल जाता है! और रात को 11:00 बजे पहुंचता है वापस घर।

..... घर में ! क्या सामान है ......  क्या नहीं ? राशन महीने में एक बार ही लाता है!..... फिर बीच में दो बार सब्जी..... बस हो गया ! मेरा तो मन भर गया इस आदमी से.!.... आखिर  मेरा भी तो मन है.....कि ये  मेरे साथ भी समय गुजारे...... !" मेरे मन की बात सुने अपने बच्चों के बीच में दो घड़ी बैठे बतियाये..!".... कभी साथ में  पिक्चर देखे!..". 

...."कभी कहीं अकेले नहीं जाना चाहता घूमने मेरे साथ ! प्रोग्राम भी बनाओ तो एक दो को चिपका ही लेता है !अपने साथ......!" तंग आ गई मैं  तो इस आदमी से ! 

"अरे यही सब करना था तो शादी क्यों... की ?".......भगवान दुश्मन को भी ऐसा पति न दे.... फूट गयी मेरी किस्मत !...... दिन भर घर से गायब रहता है रात को खाना खाने चला  आता है बेशर्म.....!"

"  हमेशा समाज सेवा! समाज सेवा ! ! समाज सेवा!!! समाज सेवा न हुई मरी गुलामी हो गयी..!.... भूत सवार है इसके  सर पर कभी अपने घर को देखता ही नहीं.....!... मैं तो तंग आ चुकी हूं !इसकी आवारागर्दी से... अगर इसे कौरोना हो गया तो कौन देखेगा ? बस सुघड़ भलाई से मतलब है !!

.....आज सुबह से ही किसी अनहोनी की कल्पना से बेचैन....... अनीता बड़बड़ाये जा रही थी। ...... मूड बिल्कुल खराब  हो रहा था।

"..........मरे कोरोना में संघ वालों के साथ  खाने के किट बांटते फिर रहे हैं न तन का होश है न  वदन का !" 

.....अगर इन्हें कोरोना हो गया तो हम लोग तो कहीं के ना रहेंगे"....? यह सोचते सोचते अनीता अपने कामों में लग गयी ।

 ......नगर में महामारी ने विकराल रूप ले लिया था...... .विशाल पूरे दिन कोरोना मरीजों को अस्पताल पहुंचाने ,सहायता पहुंचाने उनके घर वालों को भोजन किट पहुंचाने में ही व्यस्त रहने लगा था ......जो घर लौटा तो उसको गले में दर्द था .....अंदर से !..... बुखार सा भी था...... शाम से रात होते-होते तकलीफ बढ़ने लगी रात के 12:00 बजे तक गला बन्द... खांसी, जुकाम ,बुखार से बुरा हाल हो गया..... उसकी सूंघने व स्वाद  ग्रहण करने की शक्ति भी खत्म हो गई थी!

..... जांच कराने के लिए कोरोना सेंटर पर ले गए ।कोरोना पाज़िटिव रिपोर्ट आयी !

 .....अनीता क्रोध शोक से आपा खो बैठी ! ...."पड़ गयी ठंडक !"..होगयी समाज सेवा!!..... बहुत आखरी काट रखी थी....अरे मैं तो पहले ही कहती थी...मेरी सुनता कौन है? ...अब  मरो बे मौत !" 

....आखिर दुखों का पहाड़ जो टूट पड़ा था उस पर !

....... अनीता ने अपने मैके में भाइयों व ससुराल में देवर , जेठों  सभी से बात की "भैया हमारी मदद करो ! हम मुसीबत में हैं !" परन्तु कोरोना की सुन कर सभी ने वहाने बाजी कर किनारा कर लिया ।..... अब क्या करे ....तीन तीन बच्चों को लेकर कहां जाये ? किससे मदद मांगे ?

......परन्तु  ये क्या ! विशाल के मित्रों की टोली जैसे ही घर पहुंची ! खबर आग की तरह पूरे शहर में फ़ैल गयी......विशाल को  कोरोना हुआ है !........फिर क्या था उसके घर पर सामान पहुंचाने वालों का तांता लग गया !

"हम हैं न!..भाभी जी !"

 "चिन्ता मत करो !... "

"सब ठीक हो जाएगा"..!

..क्या क्या चाहिए ?.... सब हाजिर होने लगा ....क्या करना है  ? रुपए पैसे से लेकर बिना मांगे ही लोग सहयोग में जुट गए!

.... विशाल भैया  को कोई तकलीफ न हो  सब अच्छे से अच्छे इंतजाम होने लगे ....अच्छे अस्पताल में भर्ती कराया गया.... हालत ज्यादा बिगड़ने पर  तीर्थंकर से उसको मेरठ रेफर कर दिया गया...... रातों रात विशाल भैया को मेरठ में आंनद हास्पिटल में भर्ती कराया गया.....लोग रात दिन उसके बच्चों का ध्यान रख रहे थे । हर संभव परिवार की  देखभाल कर रहे थे।

......अनीता को अपने उलाहनो पर आज पश्चाताप और मलाल  हो रहा था ....और बहुत आश्चर्य भी ! ..... कि आज मुसीबत की घड़ी में जब सब अपनों ने उसका साथ छोड़ दिया था तब उसे सहायता पहुंचाने वाले .... इतने लोग....!

     अपनो की कमी तो चुभ रही थी.... पर .... अपने लोगों की कोई कमी नहीं थी ।

.....उधर अस्पताल में प्लाज्मा देने वालों की लाइन लगी हुई थी.....

 .....धीरे धीरे विशाल  स्वस्थ होकर घर आया ......घर पर मिलने वालो की भीड़ लगी थी........तिल रखने की घर में जगह नहीं थी.....!

.......... अनीता को मानो... विशाल के व्यक्तित्व के  विराट रूप का दर्शन हो रहा था..... वह व्यक्ति जो हजार ताने उलाहने सुन कर भी हमेशा जोर से हंस दिया करता था! जिसे अनीता ने हमेशा निकम्मा, संवेदन हीन, तुच्छ समझा कभी सम्मान की दृष्टि से भी नहीं देखा.....उसके इतने चाहने वाले !...

भीड़ को देख कर उसकी आंखों में आंसू थे.....शायद इसलिए कि उसका मन कह रहा था......!

........यही सब तो हैं मेरे अपने!

✍️ अशोक विद्रोही , 412,प्रकाशनगर, मुरादाबाद, मोबाइल फोन नम्बर 8218825541

मुरादाबाद मंडल के गजरौला (जनपद अमरोहा) की साहित्यकार रेखा रानी की लघुकथा -----गुरु दक्षिणा


विद्यालय से वापस लौटते  हुए सीमा की स्कूटी अज्ञात वाहन की चपेट में आ गई और टक्कर लगने से स्कूटी सहित सड़क किनारे गहरी खाई में जा गिरी । सीमा गंभीर रूप से घायल अचेत अवस्था में पड़ी थी...…। 

      श्याम अपनी कार से ऑफिस से वापस लौट रहा था, उसने देखा कि ....सड़क के किनारे बहुत सारे लोग एकत्र हैं ।   उसने तुरंत गाड़ी रोक कर साइड में ली। उतर कर देखा तो उसके होश उड़ गए ...."अरे ये तो सीमा मैम हैं "... पास जाकर हिला डुला कर देखा स्थिति गंभीर थी। श्याम ने आनन - फानन में गाड़ी में सीट पर लिटाकर तेज़ी से हॉस्पिटल लेकर चल दिया रास्ते से ही हॉस्पिटल में संपर्क किया ....इमर्जेंसी में भर्ती कराया।               डॉक्टर ने चेक अप के पश्चात कहा कि  "सिर और नाक में चोट होने के कारण इनका ब्लड ज्यादा बह गया है ,तुरंत ही ऑपरेशन करना होगा और ब्लड भी चाहिए"। श्याम की आंखों से अश्रु धार बह रही थी ..  

ख़ुद को संभालते हुए बोला," डॉक्टर जितना ब्लड चाहिए मेरा ले  लीजिए और रुपए पैसे की चिंता मत कीजिए प्लीज़ मेरी मैम को बचा लीजिए......। " ऑपरेशन के पश्चात   सीमा को ओ.टी.से रूम में शिफ्ट किया गया... जब होश में आई तब श्याम ने माथे पर हाथ फेरते हुए कहा कि ..."मैम अब कैसी हैं "? सीमा मुस्कुराई और बोली "आख़िर , तुमने दे ही दी मुझे गुरु दक्षिणा .....श्याम शांत हो कर मुस्कराते हुए शून्य में निहारने लगा......।

✍️ रेखा रानी, विजय नगर गजरौला, जनपद अमरोहा, उत्तर प्रदेश

वाट्स एप पर संचालित समूह "साहित्यिक मुरादाबाद" में प्रत्येक रविवार को वाट्स एप कवि सम्मेलन एवं मुशायरे का आयोजन किया जाता है । इस आयोजन में समूह में शामिल साहित्यकार अपनी हस्तलिपि में चित्र सहित अपनी रचना प्रस्तुत करते हैं । रविवार 25 जुलाई 2021 को आयोजित 262 वें आयोजन में शामिल साहित्यकारों उमाकान्त गुप्त ,कंचन खन्ना, शिवकुमार चंदन, रेखा रानी,सन्तोष कुमार शुक्ल सन्त, विवेक आहूजा, राजीव प्रखर, प्रीति चौधरी, डॉ शोभना कौशिक, अशोक विद्रोही, मनोरमा शर्मा, डॉ रीता सिंह, कमाल जैदी, डॉ प्रीति हुंकार, सूर्यकांत द्विवेदी, मीनाक्षी वर्मा और श्री कृष्ण शुक्ल की रचनाएं उन्हीं की हस्तलिपि में .....



















 :::::::प्रस्तुति::::::

डॉ मनोज रस्तोगी, 8,जीलाल स्ट्रीट, मुरादाबाद 244001,उत्तर प्रदेश, भारत, मोबाइल फोन नम्बर 9456687822

सोमवार, 26 जुलाई 2021

मुरादाबाद के साहित्यकार स्मृतिशेष ईश्वर चन्द्र गुप्त ईश का गीत ----मैं अंगारों पर चलूँ तुम, फूल पर चलते रहोगे । मैं गरल पीता रहूँ तुम, जलद से रमते रहोगे ।। उनका यह गीत अशोक विश्नोई व डॉ प्रेमवती उपाध्याय के सम्पादन में प्रकाशित काव्य संकलन 'समय के रंग' में प्रकाशित हुआ है। यह साझा काव्य संकलन सागर तरंग प्रकाशन मुरादाबाद द्वारा वर्ष 2002 में प्रकाशित हुआ था ।



मैं अंगारों पर चलूँ तुम, फूल पर चलते रहोगे । 
मैं गरल पीता रहूँ तुम, जलद से रमते रहोगे ।। 
पी अंधेरा दीप जलकर, 
तमस पथ में झलक भरते ।।
तपन शीतल पवन सहकर, 
कमल मन की तपन हरते ।।
दे रहे उपहार पर तुम मुस्करा छलते रहोगे ।
मैं अँगारों पर चलूँ, तुम फूल पर चलते रहोगे ।।
स्नेह सिंचित श्रम-सुमन से, 
वाटिका सुरभित बनाता । 
जेठ श्रावण-पूस में भी, 
स्वेद भर भूतल सजाता ।। 
घुन बना पिसता रहूँ तुम देव से पुजते रहोगे ।
 मैं अंगारों पर चलूँ तुम, फूल पर चलते रहोगे ।।
शूल से कर्त्तव्य पथ को, 
चमन सा मधुमय खिलाता । 
हृदय में पीड़ा संजोए. 
रजत-पट पथ पर बिछाता ।।
धरा पर पीड़ित रहूँ तुम, चन्द्रिका पीते रहोगे । 
मैं अंगारों पर चलूँ तुम, फूल पर चलते रहोगे ।।
फूट की आँधी उड़े तो, 
सुप्त भावों को जगाती । 
लूट-हिंसा-स्वार्थ-भय की, 
बिजलियाँ पग-पग जलातीं ।।
ठोकरें सहता रहूँ तुम, योजना गढ़ते रहोगे । 
मैं अँगारों पर चलूँ तुम, फूल पर चलते रहोगे ।। 
आँसुओं की गंग-यमुना, 
मर्म सागर को सुनाती
 स्नेह ममता की तरंगें, 
 वज्र मन झर झर बहाती ।।
हृदय में जलता रहूँ तुम,इन्दु से खिलते रहोगे । 
मैं अंगारों पर चलूँ तुम, फूल पर चलते रहोगे ।। 
धरा पर विछता तिमिर सा, 
भ्रमर गुन-गुन विजय गाते । 
गगन का आंगन न हँसता,
दर्द नीरव स्वर सुनाते ।।
पवन दूषित बिखरता तुम, कोष निज भरते रहोगे 
मैं अंगारों पर चलूँ तुम, फूल पर चलते रहोगे || 
मैं गरल पीता रहूँ तुम , जलद से रमते रहोगे।।

✍️ ईश्वर चन्द्र गुप्त ईश

:::::::::प्रस्तुति::::::::
डॉ मनोज रस्तोगी, 8, जीलाल स्ट्रीट, मुरादाबाद 244001,उत्तर प्रदेश, भारत, मोबाइल फोन नम्बर 9456687822

रविवार, 25 जुलाई 2021

मुरादाबाद मंडल के कुरकावली (जनपद सम्भल)निवासी साहित्यकार स्मृतिशेष रामावतार त्यागी की काव्य कृति - गाता हुआ दर्द । इस कृति में उनके 101 गीत संग्रहीत हैं । इसका प्रकाशन 1982 में कन्दर्प प्रकाशन नई दिल्ली-2 द्वारा किया गया था । इस कृति की पीडीएफ हमें उपलब्ध कराई है श्री मनोज जैन जी, भोपाल (मध्य प्रदेश) ने।


 क्लिक कीजिए और पढ़िये पूरी कृति

👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇👇

https://documentcloud.adobe.com/link/review?uri=urn:aaid:scds:US:f2d17e37-7269-4d5c-a658-6a3062a5e815


:::::::::::प्रस्तुति:::::::::

डॉ मनोज रस्तोगी

8, जीलाल स्ट्रीट

मुरादाबाद 244001

उत्तर प्रदेश, भारत

मोबाइल फोन नम्बर 9456687822

मुरादाबाद के साहित्यकार माहेश्वर तिवारी का नवगीत ---एक गिलहरी धीरे धीरे सूरज कुतर गई ....


 

मुरादाबाद की साहित्यकार डॉ मीरा कश्यप का आलेख ---दयानंद गुप्त जी की कहानियों में जीवन के विविध पक्ष

 


रचना रचनाकार के व्यक्तित्व का परिचायक होती है, मुरादाबाद के ख्यातिलब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकारों में श्री दयानंद गुप्त जी का साहित्य अविस्मरणीय है ।वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति थे ,साहित्य सृजन के साथ ही उन्होंने समाज सेवा व शिक्षा जगत को अपने औदात्य व्यक्तित्व से उज्ज्वल और प्रशस्त किया है।जीवन की चुनौतियों को सहर्ष स्वीकार कर उनका सामना करने को निरंतर तत्पर रहते थे  । उनके व्यक्तित्व पर तत्कालीन परिवेश का गहरा प्रभाव पड़ा ,जिससे गांधी जी के आवाहन पर स्वतंत्रता संग्राम की क्रांति में अपने जीवन की आहुति देने को तैयार हो गये  । पेशे से वकील होते हुए भी साहित्यिक अभिरुचि रखते थे  । "नैवेद्य" उनकी कविताओं का संकलन है, जिसमें जीवन के अनेक रंग देखने को मिलते हैं ।हिंदी साहित्य की दृष्टि से देखा जाय तो गुप्त जी का लेखन काल छायावाद ,प्रगतिवाद से गुजरते हुए प्रयोगवाद के समानांतर चलता रहा है जबकि उनका स्पष्ट मानना था कि मुझे किसी वाद में न बाँधा जाय ,परन्तु इन सभी रूपों का प्रभाव उनके साहित्य में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है । इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापन के दौरान निराला जैसे प्रतिष्ठित कवि के छत्रछाया में रहकर उनका कृपा प्राप्त करना किसी भी व्यक्ति के लिए गौरव का पल हो सकता है निराला जी का आशीर्वाद उनको निरन्तर मिलता रहा । उनके काव्य कृति की भूमिका निराला जी ने लिखकर उनके साहित्य को और भी प्रधान बना दिया ।

'कारवां ' ,'शृंखलाएँ ''मंजिल' उनके कहानी संग्रह हैं ,जिसकी कुछ कहानियां पाठकों पर अपना अमिट छाप छोड़ती हैं ।' नेता' कहानी राजनीतिक परिपेक्ष्य को लेकर लिखी गयी कहानी है, जिसमें यह दर्शाया गया है कि राजनीति के पंकिल जीवन में व्यक्ति देश सेवा के नाम पर कितना स्वार्थी हो सकता है, वह राष्ट्र ,समाज और यहां तक कि परिवार के साथ भी छल करता रहता है  ,सेठ दामोदर दास जैसे पात्र जिनके लिए परिवार और स्वार्थ से ऊपर और कुछ भी नहीं है ,देश काल की दृष्टि से वह काल राजनीतिक उथल- पुथल और आजादी की क्रांतिकारी चेतना से भरा पड़ा था ,व्यक्ति और समाज के लिए राष्ट्र हित सर्वोपरि था परिवार गौण हो गया था, अपना पूरा जीवन राष्ट्रहित में समर्पण करते हुए हमारे महापुरुषों और राजनेताओं ने अपने जीवन की आहुति दे दी थी ।सेठ दामोदरदास गांधीवादी विचार धारा से प्रभावित थे ,अपनी पार्टी में प्रभावशाली   स्थान रखते थे, उनकी व्यस्तता व दैनिक क्रियाकलाप उनके देशप्रेमी होने के प्रमाण देते हैं ,यहाँ तक कि अपनी पत्नी और पुत्री के लिए भी उनके पास समय नहीं होता था ,उनका कहना था कि - " हमें मानव में विभिन्नता पैदा करने का अधिकार कहाँ ? अपने सम्बन्धियों  को औरों से अधिक प्रेम करने का हमें कोई हक नहीं ।" इस सम्वाद से यह स्पष्ट होता है कि तत्कालीन परिवेश में ईमानदारी और सच्चरित्र कितना मायने रखता था, उनका पूरा जीवन देशहित व सामाजिक उत्थान के लिए होम हो जाता है।सेठ दामोदरदास अपने परिवार में पत्नी व छोटी बच्ची से प्रेम तो बहुत करते हैं ,पर उसे प्रकट करने का उनके पास समय न होता था, उनके इस व्यवहार से उनकी पत्नी का हृदय बहुत ही आहत होता था । गीत सुनने का आग्रह करना, और उस भावनात्मक वक़्त में भी, उन्हें अपने भाषण के लिए नोट तैयार करते देख पत्नी को चोट पहुंचती है -- गीत तो आप कहीं भी सुन सकते थे, मेरी ही क्या जरूरत थी .....उनके अपमानित स्त्रीत्व की ज्वाला निकल रही थी । 

' विद्रोही ' कहानी में  गुप्त जी ने एक कलाकार की सौंदर्यात्मक दृष्टि पर प्रकाश डाला है, कि कैसे एक कलाकार सौंदर्य के कल्पना लोक में विचरता रहता है और रूप के मादकता में डूबा रहता है।सौंदर्य प्रिय कलाकार अपने निर्मित छायाचित्र में इतना तल्लीन रहता है कि उसका सामाजिक यथार्परक जीवन से कोई वास्ता नहीं रह जाता है, वह चाहता है कि इस सौंदर्य साधना को समाज का हर व्यक्ति समझे ,उपेक्षित दुराग्रह से वह कुंठित मानसिकता से ग्रस्त हो जाता है, क्योंकि जिस तरह की कला को वह श्रेष्ठ समझता है वह सामाजिक धरातल पर अश्लीलता की श्रेणी में आता है।धीरे -धीरे कुंठित होता हुआ कलाकार की चेतना ,अवचेतन मन मे संग्रहित होती विचारधारा में अपने जीवन का स्वर्णिम पल हारने लगता है, क्योंकि जीवन में हर व्यक्ति के लिए सौंदर्य की अलग -अलग सत्ता होती है, हतोत्साहित कलाकार विद्रोही हो समाज से कटने लगता है ।

'नया अनुभव ' कहानी लेखक की गांधीवादी विचारधारा को स्पष्ट करती है ,कहानी का मुख्य पात्र रामजीमल अनेक बुराइयों से ग्रस्त है, चोरी के इल्जाम में उसे जेल भी जाना पड़ता है ,जेल से लौटने के बाद उसे कोई नौकरी या काम धंधा देने को तैयार नहीं होता है, थका हारा ,भूखा -प्यासा एक मन्दिर में शरण लेता है ,पर उसकी लोलुप दृष्टि मंदिर में रुपयों से भरी थैली पर रहती है और रात में सबके सो जाने के बाद मौका देख कर उसे लेकर भाग जाता है, महंत के शिष्यों द्वारा पकड़े जाने पर, उसे जब महंत के पास लाया जाता है तो महंत उसका पक्ष लेते हुए कहते हुए कहते हैं कि यह थैली मैंने स्वयं ही इस को दिया है, यह सुनते ही रामजीमल के जीवन में नवीन चेतना जन्म लेती है ,उसको लगता है कि जिस समाज में अभी तक उसे उपेक्षित होना पड़ रहा था ,महंत जी के बदले हुये व्यवहार ने उसके अंदर एक नया अनुभव जागृत किया ,ग्लानि और आत्मविश्वास से भरा एक नये जीवन का जन्म होता है, जैसे लेखक यह कहना चाहता हो कि - पाप से घृणा करो ,पापी से नहीं ,महंत उसे सुधरने का एक मौका देता है । 

'न मंदिर न मस्जिद ' कहानी में लेखक को धार्मिक उन्माद में आशावाद और सकारात्मक चेतना का स्पष्ट दर्शन दिखता है ,लगातार कम हो रहे एहसास और अपनेपन के प्रति गुप्त जी चिंतित तो हैं ही,हमारे सामाजिक परिवेश में छिन्न - भिन्न होती नैतिकता को लेकर अशांत है, आज की विद्रूप व्यवस्था, जहां समस्याओं का अंबार तो है, लेकिन समाधान नहीं है ।आज हम समस्याओं से दुखी नहीं, बल्कि समस्या हमारी मूर्खताओं से दुखी है, जहां हम समस्या को समस्या की तरह न लेकर उसका समाधान केवल धर्म या राजनीति में ही खोजते हैं, जिससे समस्या दुखी होती है और समाधान नदारद । धार्मिक उन्माद किस तरह समाज को खोखला बनाकर, व्यक्ति को सामाजिक जीवन मूल्यों से दूर कर देती है। धर्म के ठेकेदार धर्म के आड़ में अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं और आम आदमी को हिंदू-मुस्लिम या मंदिर-मस्जिद के नाम पर मतभेद पैदा करते हैं,इस कहानी के माध्यम से गुप्त जी के विचार हिंदू-मुस्लिम एकता के बीच सामंजस्य स्थापित करते हुए देखा जा सकता है, आज वर्तमान में इस कहानी की प्रासंगिकता सिद्ध होती दिखती है, क्योंकि आज धर्म के नाम पर ओछी राजनीति समाज की एक बहुत बड़ी समस्या है ।

' परीक्षा ' कहानी भावनात्मक व मनोवैज्ञानिक छाप छोड़ती है ,बनारस के गौरवशाली संगीत परम्परा में नृत्य का एक स्वर्णिम अतीत रहा है एक नर्तकी जिसके लिए धन -दौलत और रूप का लावण्य ही सर्वोपरि है। एक भिक्षु के निवेदन पर सशर्त अपना जीवन नये दृष्टि कोण से जीना चाहती है। नर्तकी कनक की सभा में एक से बढ़कर एक प्रतिभाशाली व वैभव सम्पन्न संगीत प्रेमियों का तांता लगा रहता है, वहाँ पर एक भिक्षुक का आना अप्रत्याशित सा लगता है, परन्तु कनक उसकी चुनौती को सहर्ष स्वीकार करती है और भिक्षुक के बनाये शर्तों के अनुरुप जीवन यापन करने को तैयार हो जाती है, किस प्रकार वासना पूरित जीवन कुछ ही दिनों में वैरागी हो जाता है ,जो नर्तकी नाच - गाने को अपने जीवन का श्रेष्ठतम मानती हो ,वहीं उन सबसे दूर रहकर भक्ति में तल्लीन हो जाती है और उसका हृदय परिवर्तन हो उठता है, अन्ततः उस भिक्षु को अपना गुरु मानते हुए सारा ऐश्वर्य छोड़कर विलासिता के जीवन से विमुख हो जाती है, सारा राग -रंग विलुप्त होने लगता है, इस प्रकार मोह -माया का जीवन त्याग कर भक्ति- मार्ग पर निकल पड़ती है ,यह कहानी गौतम बुद्ध और आम्रपाली की यादों को ताजा कर देती है गुप्त जी की यह कहानी स्त्री जीवन के सुधारात्मक पक्ष को प्रस्तुत करती है । वास्तव में जो लोग सामाजिक मान्यताओं से ऊपर उठकर जीवन जीते हैं के सामान्य स्थिति व असमान्य स्थिति दोनों में ही अलग दिखाई देते हैं ।

 गुप्त जी भी सामान्य जीवन व आचार- विचार का समर्थन करते हुए दिखते हैं जो उनके वैचारिक रूप से सम्पन्न भाव व आम आदमी की पीड़ा को कोरी कल्पना शीलता से अधिक मानते हैं, यथार्थ जीवन से लगाव ,उनका स्वभाव बन चुका था, उनकी कहानियां सीधी -सरल भाषा में हमारे नैराश्य जीवन के अन्तस् में झांककर हमें नई आशा के प्रति एक आश्वस्ति- बोध भरती है जो कि एक अनूठापन है। जीवन का आपाधापी और अंधापन ,जहां हर व्यक्ति इतनी जल्दी में हो कि वह हर लक्ष्य पर नैराश्य ही अनुभव कर रहा है ,आज प्रेम महज औपचारिकता के कुछ भी नहीं है, हमारा अनुभव चूक चला है और भरोशे प्रायः खत्म हो चुके हैं, ऐसे में उनकी सीधी -सरल भाषा कहानी में सपाट बयानी की एकता का रूपक गढ़ रही है ।एक सच्चे साहित्यकार का जीवन कबीर का जीवन है जो कर्तव्य के साथ -साथ समाज को दिशा देने का संकल्प लेकर निरन्तर चलता रहता है और ये कार्य गुप्त जी अपनी प्रखर चेतना से कर रहे थे ,इस प्रकार उनकी कहानियों में जीवन अनेक रूपों में रूपांतरित हुआ है  ।

✍️ डॉ मीरा कश्यप, विभागाध्यक्ष हिंदी, के .जी .के .महाविद्यालय, मुरादाबाद 244001,उत्तर प्रदेश, भारत