रविवार, 30 अक्तूबर 2022

मुरादाबाद मंडल के सरायतरीन (जनपद संभल) की संस्था सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता समिति (भारत) उत्तर प्रदेश ने किया साहित्यकारों रूप किशोर गुप्ता, डॉ आरसी शुक्ला, डॉ मनोज रस्तोगी, प्रो सुधीर कुमार अरोड़ा , आरिफा मसूद अंबर, डॉ राशिद अज़ीज़, सुल्तान मौहम्मद खां कलीम, त्यागी अशोका कृष्णम्, प्रदीप कुमार दीप एवं दीक्षा सिंह को सम्मानित

 मुरादाबाद मंडल के सरायतरीन (जनपद संभल) की संस्था सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता समिति (भारत)  उत्तर प्रदेश द्वारा रविवार 30 अक्टूबर 2022 को आजाद गर्ल्स डिग्री कॉलेज दीपा सराय संभल में आयोजित प्रांतीय अलंकरण सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। 

       इस समारोह में साहित्यकार एवं महाराजा हरिश्चंद्र स्नातकोत्तर महाविद्यालय मुरादाबाद के प्राचार्य प्रो सुधीर कुमार अरोड़ा को सरस्वती सम्मान, वरिष्ठ साहित्यकार एवं केजीके महाविद्यालय मुरादाबाद के पूर्व विभागाध्यक्ष अंग्रेजी डॉ आरसी शुक्ला को साहित्य रत्न सम्मान, बहजोई के वयोवृद्ध साहित्यकार रूप किशोर गुप्ता एवं मुरादाबाद के वरिष्ठ साहित्यकार एवं पत्रकार डॉ मनोज रस्तोगी को हिंदी गौरव सम्मान, मुरादाबाद की साहित्यकार आरिफा मसूद अंबर को नन्ही देवी रामस्वरूप सम्मान,  कश्मीर विश्वविद्यालय कश्मीर के उर्दू विभाग के डॉ राशिद अज़ीज़, सुल्तान मौहम्मद खां कलीम, त्यागी अशोका कृष्णम्, प्रदीप कुमार दीप एवं दीक्षा सिंह को काव्य दर्पण सम्मान से विभूषित किया गया।

      इस अवसर पर आयोजित कवि सम्मेलन एवं मुशायरा में त्यागी अशोका कृष्णम, प्रदीप कुमार दीप, दीक्षा सिंह, सुल्तान मौहम्मद खां कलीम, डॉ राशिद अज़ीज़, शफीकुर्रहमान बरकाती, डॉ मनोज रस्तोगी,रूप किशोर गुप्ता, डॉ यू सी सक्सेना, मुशीर खां तरीन, डॉ सुधीर कुमार अरोड़ा, डॉ आर सी शुक्ल, आरिफा मसूद, डॉ किश्वर जहां जैदी आदि ने काव्य पाठ कर सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। 

     समारोह की अध्यक्षता डॉ सीपी सिंह ने की। विशिष्ट अतिथि  डॉ यूसी सक्सेना, श्री मुशीर खां थे। संयोजक राष्ट्रीय अध्यक्ष हरद्वारी लाल गौतम थे । संचालन साहित्यकार त्यागी अशोका कृष्णम ने किया ।

      समारोह में रूबी, नाहिद रजा, सुरेन्द्र सिंह, रजनी कान्ता चौहान, मन्जू सक्सेना, चिंकी दिवाकर, साक्षी शर्मा, भारती ठाकुर, दीक्षा ठाकुर, नीलम गौतम, डॉ मुनव्वर ताविश, मुजम्मिल खां मुजम्मिल, डॉ शहजाद अहमद, डॉ प्रदीप कुमार त्यागी, हाजी फ़हीमउद्दीन, हाजी शकील अहमद कुरैशी, डॉ जिकरूल हक, डॉ शशीकांत गोयल, शाह आलम रौनक, ताहिर सलामी,मौ फरमान अब्बासी आदि की सक्रिय भागीदारी रही।


















शनिवार, 29 अक्तूबर 2022

मुरादाबाद के साहित्यकार श्री कृष्ण शुक्ल की व्यंग्य कविता .....


एक दिन एक कवि सम्मेलन में 

एक श्रोता 

खड़ा होकर चिल्लाया

ये क्या सुनाते हो आप, 

ये कविता नहीं चुटकुले हैं,

कल ही के अखबार में छपे हैं,

उन्हीं चुटकुलों पर मुलम्मा चढ़ाते हो,

और शान से मंच पर सुनाते हो,

और लिफाफा भी तगड़ा ले जाते हो,

जरा तो शरम करो यार

कुछ तो ऐसा सुनाओ 

जिसमें राग रंग रस छंद नजर आये

कविता में कुछ तो कवित्व नजर आये

मैं थोड़ा सकपकाया, फिर चिल्लाया,

जी हाँ, आप सच कह रहे हो,

हम चुटकुले सुनाते हैं, 

लेकिन भैय्ये सच तो यह भी है कि,

आप भी तो चुटकुले ही सुनना चाहते हो,

एक बार नहीं बार बार सुनते हो, 

वन्स मोर वन्स मोर करते हो,

और यदि हम गीत गज़ल या मुक्तक सुनाते हैं, 

तो आप ही हमें हूूट भी करते हो,

ऐसा नहीं है कि हम 

गीत गजल रस छंद नहीं लिखते

हमारे संकलन तो देखो,

उनमें तो यही सब हैं दिखते,

यहाँ तो हम आपका 

विशुद्ध मनोरंजन करते हैं, 

माल वही बिकता है 

जिसके खरीदार होते हैं,

इसीलिए हम भी चुटकुले सुनाते हैं,

किंतु इन्हीं चुटकुलों के बीच में 

आपकी सोई चेतना को भी जगाते हैं,

और भैय्ये निश्चिंत रहो,

जिस दिन ये सोई चेतना जाग जायेगी,

मंचों पर चुटकुले नहीं,

विशुद्ध कविता नज़र आयेगी


✍️ श्रीकृष्ण शुक्ल

MMIG - 69

रामगंगा विहार

 मुरादाबाद  244001

उत्तर प्रदेश, भारत

मुरादाबाद मंडल के जनपद बिजनौर निवासी साहित्यकार मनोज मानव की गीतिका ....


बहे जो दरिया वे मीठे अवश्य होते हैं।

मिले समुद्र तो खारे अवश्य होते हैं।


सभी चुनाव में वादे अवश्य होते हैं।

हटे गरीबी ये नारे अवश्य होते हैं।


किसी को मिलती नहीं मंजिलें सरलता से,

सभी के मार्ग में काँटे अवश्य होते हैं।


भले हो कागजों में पाँच साल गारंटी,

सड़क पे वर्षा में गड्ढे अवश्य होते हैं।


महान लोग सदा कर्म करते चुपके से,

जो ढोल होते वे पोले अवश्य होते हैं।


बुआ भतीजे की शादी में खुश हो कितनी भी,

महान फूफा जी रूठे अवश्य होते हैं।


कठोर लगते हैं जो लोग अपनी भाषा से,

वे दिल के द्वार को खोले अवश्य होते हैं।


समय को कोसना होता नहीं उचित मानव,

मिले सभी को ही मौके अवश्य होते हैं।


✍️ मनोज मानव 

पी 3/8 मध्य गंगा कॉलोनी

बिजनौर  246701

उत्तर प्रदेश, भारत 

मोबाइल फोन नंबर  9837252598



गुरुवार, 27 अक्तूबर 2022

मुरादाबाद मंडल के जनपद रामपुर निवासी साहित्यकार रवि प्रकाश की लघु कथा ....खुशियों की दीपावली



           "अरी बहू !  क्या बात है ,तीन बज गए ।अभी तक दोपहर का खाना खाने कुंदन नहीं आया कहां चला गया है"। चिंतित होते हुए अम्मा जी ने अपनी पुत्रवधू विनीता से कहा । 

          विनीता ने शांत भाव से जवाब दिया "अम्मा जी ! आज तो दीपावली है ।रात से बैठकर पटाखे और आतिशबाजी की लिस्ट तैयार कर रहे थे। वही लेने गए होंगे। मैं तो समझा - समझा कर हार गई "।

   अम्मा जी थोड़ा गुस्से में आ गईं। बोलीं" इतनी बार इसे समझाया कि पैसे को आग मत लगा लेकिन हर साल दस बीस हजार की आतिशबाजी लेकर आता है । यह भी तो नहीं देखता कि कमाई कितनी है। बस दो-चार इसके साथ के यार दोस्त हैं जो इसको चढ़ाते रहते हैं और 2 घंटे में सारा रुपया फूंक कर चले जाते हैं"।

       विनीता ने कहा " अम्मा जी! मैं हर साल समझाती हूं लेकिन कोई असर नहीं होता"।

        अब अम्मा जी थोड़ी उदास होने लगीं। खाट पर बैठ गयीं। घुटनों को सहलाने लगीं और बोलीं"-" कई साल पहले की बात है, इसने आंगन में ही सारी आतिशबाजी जला दी थी. नतीजा यह हुआ कि 2 घंटे में जाकर धुआं थोड़ा कम हुआ. मैं तो सांस लेने तक से मुश्किल में आ गई थी. बस यह समझो कि दम घुटने से बची"।

     फिर कहने लगीं कि आतिशबाजी नीचे छोड़ो, ऊपर छोड़ो ,बाहर छोड़ो !  क्या फर्क पड़ता है! धुँआ तो सब जगह हवा में फैला रहता है । आज दिवाली है लेकिन मैं तो कई दिन पहले से सांस लेने में मुश्किल महसूस कर रही हूं ।जब सारे लोग ही पटाखे छोड़ते रहेंगे और माहौल को जहरीला करते रहेंगे तो हम बूढ़े सांस लेने कहां जाएंगे "।

      यह बातें हो ही रही थीं कि दरवाजे पर कुछ आहट हुई । अम्मा जी ने विनीता के साथ जाकर बाहर देखा तो पता चला कि कुंदन खड़ा हुआ है और ठेले पर से कुछ उतरवा रहा है। विनीता ने देखा तो उसकी आंखों में चमक आ गई । मुंह से अचानक निकाला -"अरे वाह ! वाशिंग मशीन ! क्या बात है ! आज वाशिंग मशीन ले आए । मैं तो पिछले छह-सात साल से बराबर इसी  के लिए कह रही थी"।

    कुन्दन ने कहा-" आज देखो ! दीपावली के शुभ अवसर पर मैं घर में वाशिंग मशीन लेकर आया हूं । अब इसका उपयोग पूरे घर को मिलेगा , फायदा सबको मिलेगा।"

      वाशिंग मशीन घर में क्या आई, खुशी की लहर दौड़ पड़ी। अम्मा जी ने  कुंदन को सिर पर हाथ रख कर आशीर्वाद दिया। थोड़ी देर बाद जब मशीन रखकर ठेलेवाला चला गया। मशीन फिट हो गई । शाम होने लगी तो कुंदन के पास फोन आया।

     " क्यों भाई सुना है, इस साल आतिशबाजी नहीं होगी"

   कुंदन ने जवाब दिया "हां यार ! इस बार वाशिंग मशीन खरीद ली "।

   उधर से जवाब आया "अब तेरी जिंदगी में उत्साह नहीं रहा ।"

   कुंदन ने फोन बंद कर दिया लेकिन दोस्तों की संख्या 1 से ज्यादा थी .थोड़ी देर बाद फिर फोन की घंटी बजी। कुंदन ने फोन उठाया"- अरे भाई क्या बात है ? आज उदासी में दीपावली मनाओगे ? कोई आतिशबाजी नहीं, पटाखे नहीं!"

    कुंदन ने फोन रख दिया । फिर एक फोन आया "अरे यार! दीवाली तो साल में एक ही बार आती है । घर गृहस्थी  तो रोजाना चलाते रहोगे । यह क्या! वॉशिंग मशीन ले आए। पटाखे सुना है, एक भी नहीं लाये "।

    कुंदन बोला "हां सही सुना है "

    और फोन उसने काट दिया ।

               फिर जब शाम ढ़ली तो कुंदन ने विनीता से कहा-" इस बार मैंने आज सुबह ही सोच लिया था कि पटाखे और आतिशबाजी में पैसा बर्बाद नहीं करूंगा। कितनी मुश्किल से हम कमाते हैं और सचमुच हमारी हैसियत दस बीस हजार खर्च की नहीं है। पटाखों में खर्च करके वातावरण भी प्रदूषित होता है । अम्मा जी को सांस लेने में कितनी तकलीफ होती है। इसके अलावा पिछले साल सड़क पर जो हम जा रहे थे तो तुम्हें याद होगा किसी ने पैर के पास पटाखा  फोड़ दिया था और तुम्हारी साड़ी में आग लगते लगते बची । फिर भी पैर में जख्म हो गया था , जो तीन-चार दिन में जाकर भरा।... आज हम सचमुच खुशियों की दीपावली मना रहे हैं"।


✍️ रवि प्रकाश

बाजार सर्राफा, रामपुर 

उत्तर प्रदेश, भारत

मोबाइल 99976 15451

मुरादाबाद के साहित्यकार वीरेंद्र सिंह बृजवासी की लघु कथा....छटाँक भर जीरा!

 


लाला शुद्धबुद्धि अपनी किराने की दुकान पर बैठे-बैठे ग्राहकों के आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। सोच रहे थे कि आधा दिन निकल गया परंतु किसी ग्राहक का अता-पता ही नहीं।

   तभी उन्हें एक ग्राहक दुकान की ओर आता दिखाई दिया। लाला शुद्धबुद्धि ने बढ़कर ग्राहक की इच्छा जानने हेतु पूछा,क्या चाहिए श्रीमान जी।

 ग्राहक कुछ बोलता इससे पहले तराजू के पास पड़े पाँच किलो,दस किलो,बीस किलो,तथा पचास किलो वज़्न के बाटों में यह बहस ज़ोर पकड़ गई कि दुकान पर पधारे ग्राहक महोदय कितने वज़्न का सौदा खरीदने का मन बना रहे हैं।

    सबसे पहले पांच किलो का बाट आगे आया और बोला आजकल महंगाई इतनी हो गई है कि ग्राहक को पांच किलो सौदा खरीदने के लिए भी सौ बार सोचना पड़ जाता है। ऐसे समय में केवल मैं ही तो ग्राहक की इच्छा पर खरा उतरता हूँ।

  तभी उसकी बात बीच में ही काटते हुए दस किलो का बाट अकड़ कर बोला। तू छोटा मुँह बड़ी बात मत किया कर। औकात में रहकर बोलना सीख ले समझा नहीं तो,,,,,आजकल कोई भी अपनी हैसियत को गिराकर खरीदारी करना उचित नहीं समझता। कम से कम ग्राहक का पहनावा देखकर ही अनुमान लगा लिया कर। घर के खर्चे के हिसाब से ही तो चीज़ ली जाती है। अब तू देखता रह भाई साहब मुझ पर ही अपना हाथ रखने वाले हैं।

  इतना सुनते ही दोनों बाटों को पीछे धकेलते हुए बीस किलो का बाट बोला हमारे ग्राहक महोदय, दुकान तक कोई पैदल या फटीचर साइकिल पर चढ़कर थोड़े आए हैं।कार से आए हैं कार से। कोई पांच या दस किलो सामान तुलवाकर घर ले जाएंगे क्या।,,,,,

   लेकिन ग्राहक महोदय शांत खड़े रहकर कुछ सोचने लगे तभी पचास किलो वज़्न का बाट सामने आया और सम्माननीय ग्राहक से बड़े ही विनम्र भाव से बोला, श्रीमान जी यह सारे के सारे बाट एकदम मूर्ख हैं मूर्ख। यह इतना भी नहीं समझ पा रहे हैं कि आप इतनी बड़ी गाड़ी में बैठकर इस दुकान पर आए हैं तो क्या दस या बीस किलो सौदे में लिए  ही इतना पेट्रोल  फूंकेंगे। मैंन इन्हें इतनी बार समझाया है कि ग्राहक देखकर ही अपना मुंह खोला करो। मगर ये हैं,कि समझने को तैयार ही नहीं।इनको तो बिना सोचे समझे बोलना सिद्ध,,,,,

    तभी ग्राहक ने दुकानदार शुद्धबुद्धि को मात्र एक छटाँक जीरा तौलने का आदेश दिया।

    इतना सुनते ही सभी बाटों के मुँह लटक गए। मन ही मन ग्राहक को भला-बुरा कहते हुए अपने स्थान पर निर्जीव पड़े रहकर अगले ग्राहक की प्रतीक्षा करने लगे।

    तभी छटाँक भर के बाट ने गर्व से सीना चौड़ा करते हुए कहा। कि छोटों की अहमियत  को कभी कम नहीं समझना चाहिए। सबने यह कहावत तो सुनी ही होगी।

     रहिमन देखि बड़ेन कौं

     लघु  न   दीजिए  डारि।।

  दुकानदार शुद्धबुद्धि ने ग्राहक को एक छटाँक जीरा तोलकर दे दिया।और कीमत लेकर बोरी के नीचे रखते हुए कहा। कृपया आते रहिएगा आप ही की दुकान है।

   दोनों एक दूसरे का  धन्यवाद करते हुए मुस्कुराने लगे।

 ✍️ वीरेन्द्र सिंह "ब्रजवासी 

मुरादाबाद 244001 

उत्तर प्रदेश, भारत



      

                  

सोमवार, 24 अक्तूबर 2022

वाट्स एप पर संचालित समूह साहित्यिक मुरादाबाद की ओर से माह के प्रत्येक रविवार को वाट्सएप कवि सम्मेलन एवं मुशायरे का आयोजन किया जाता है । रविवार 23 अक्तूबर 2022 को आयोजित 327 वें वाट्स एप कविसम्मेलन एवं मुशायरे में शामिल साहित्यकारों डॉ अशोक कुमार रस्तोगी, श्री कृष्ण शुक्ल, नृपेंद्र शर्मा सागर, संतोष कुमार शुक्ल संत, त्यागी अशोका कृष्णम , दीपक गोस्वामी चिराग, अतुल कुमार शर्मा, अशोक विश्नोई, राजीव प्रखर, धन सिंह धनेंद्र और मनोरमा शर्मा की की रचनाएं उन्हीं की हस्तलिपि में












 

रविवार, 23 अक्तूबर 2022

मुरादाबाद मंडल के कुरकावली ( जनपद संभल ) निवासी साहित्यकार त्यागी अशोका कृष्णम् के दोहे ......आलोकित हो जिंदगी, दीवाली सी रोज



शुभ शुभ शुभ शुभ कामना, शुभचिंतक संदेश।

आई शुभ दीपावली,जगमग सब परिवेश।।


धनतेरस दीपावली,आई भाई दूज।

गोवर्धन के साथ में ,मिलकर सबको पूज।। 


लाई है दीपावली,अंधकार का नाश।

हारे मन की जीत है,विश्वासों के ताश।।


रौशन दीपों से हुआ, नगर गली हर गांव।

उखड़े उखड़े आज हैं,अंधकार के पांव।।


खील बताशे साथ में,खांड खीर के भोज।

आलोकित हो जिंदगी, दीवाली सी रोज।।


महलों में झालर लगीं, रौशन कुटिया द्वार।

लाये धन की बदलियां, दीपों का त्यौहार।। 


धन वैभव यश कामना, दीवाली के साथ।

कृपा से प्रभु राम की, मिलें सभी पुरुषार्थ।।


अष्ट सिद्धि निधियाँ मिलें, नव, सुख  हाथों हाथ।

धन देवी का आगमन,शुभ चरणों के साथ।।


✍️ त्यागी अशोका कृष्णम्

कुरकावली, संभल 

उत्तर प्रदेश, भारत


मुरादाबाद की साहित्यकार डॉ अर्चना गुप्ता का गीत रात सुहानी दीवाली की आई है.....


 

मुरादाबाद मंडल के जनपद संभल निवासी साहित्यकार अतुल कुमार शर्मा की रचना ....एक दीपक मन में जला लो


एक दीपक मन में जला लो।

परम ज्योति उससे जगा लो।।

जो अंधज्ञान को मिटा दे,

ईर्ष्या का तम घटा दे,

जो दूसरों को प्रकाश दे,

निराशा को भी आस दे,

पाप की गगरी को चटका दे,

निशा का पथ भी भटका दे,

मन को पुण्य की राह चला लो,

एक दीपक मन में जला लो।‌।

माना आज सूरज भी शरमा जाए,

शरद मौसम भी दीपों से गर्मा जाए,

घना अंधेरा कहीं छिप न पाए,

परछाईं भी न परछाईं बनाए,

यह पर्व सदा जग रोशन कर जाए,

हममें भरपूर ज्ञान भर जाए,

रीति एक प्रीत की,ऐसी चला लो,

एक दीपक मन में जला लो।।

जो बुराई का दहन कर सके,

मन,सत्य को सहन कर सके,

जो धोखेबाजी का दफन कर सके,

कुनीति का कफन बन सके,

दया-धर्म का वक्ष बन सके,

अद्भुत प्रेम की ज्योति जला लो,

एक दीपक मन में जला लो।।

माना यह दीपक जलाए तुमने,

गली-मोहल्ले जगमगाए तुमने,

सोचो क्या नया किया तुमने?

क्या गिरते को सहारा दिया तुमने?

क्या गरीब की कुटिया को निहारा तुमने ?

क्या फैलाया उसमें उजियारा तुमने ?

आज कर किसी का भला लो,

एक दीपक मन में जला लो।

परम ज्योति उससे जगा लो।।


✍️ अतुल कुमार शर्मा

 सम्भल 

उत्तर प्रदेश, भारत



मंगलवार, 18 अक्तूबर 2022

मुरादाबाद मंडल के चांदपुर (जनपद बिजनौर) की साहित्यकार उर्वशी कर्णवाल के गीत संग्रह...." मैं प्रणय के गीत गाती" की बिजनौर के साहित्यकार मनोज मानव द्वारा की गई समीक्षा....

 192 पृष्ठों में 120 गीतों से सजा उर्वशी कर्णवाल का छंदबद्ध गीत संग्रह... ..." मैं प्रणय के गीत गाती", जिसमें मेरी दृष्टि से 25 सनातनी छंदों का प्रयोग किया गया है... द्विबाला, आनन्दवर्धक, सारः, लावणी, द्विमनोरम,स्रावि्गणी, राधेश्यामी , शृंगार, चतुर्यशोदा , माधव मालती,  विधाता, भुजंगपर्यात, सार्द्धमनोरम, गंगोदक, मानव, गीतिका, नवसुखदा , द्विपदचौपाई, महालक्ष्मी, दोहा, वीर/आल्हा, विष्णुपद, चौपाई ।

शारदे माँ की सुंदर वंदना से गीत संग्रह का बहुत सुंदर प्रारम्भ किया गया है। गीत- संग्रह में प्रेम के तीनों रूपों को बहुत ही खूबसूरती से प्रस्तुत किया है , ग्रन्थ प्रणय से शुरू होकर विरह की यात्रा करता हुआ प्रेम के अंतिम एवं सबसे भव्य स्वरूप भक्ति पर समाप्त होता है। 

यों तो संग्रह के सभी गीत छन्द एवं भावों का मधुर संगम के दर्शन कराते है लेकिन अधिकतर गीतों में भावों का विशाल सागर है जिसमें पाठक एक बार डुबकी लगाकर गहराई की ओर जाने से स्वयं को नहीं रोक पायेगा।देखिएगा प्रणय गीतों के कुछ ऐसे ही भाव--

" प्रेम पूज्य है, प्रेम ईश है, प्रेम हृदय का स्पंदन है।

  प्रेम विधाता का अनुभव है , प्रेम दिव्य का दर्शन है।।

एक और गीत देखिएगा

" एक वनिता को व्यथित कर, जा रहे पुरुषत्व लेकर।

  प्रीति की लय से विमुख हो, क्या किया बुद्धत्व लेकर।

उर निरंतर चाहता था , यह भुवन हो प्रीति सिंचित,

स्वाद रंगों से रहित यह, क्या करूंगी सत्व लेकर।

प्रीति की लय से विमुख हो, क्या किया बुद्धत्व लेकर।।

लेखिका ने प्रणय को बहुत ही खूबसूरती से परिभाषा दी है देखिएगा...

" व्याप्त हर कण में सुवासित, सृष्टि है चाहे प्रलय है।

  डूबता जो वह तरेगा, सिंधु सा गहरा प्रणय है।

  डूबकर पा ले चरम जो, या स्वयं को भी मिटा ले, 

  हो नहीं सकता पराजित , मृत्यु का उसको न भय है।

डूबता जो वह तरेगा, सिंधु सा गहरा प्रणय है।।

लेखिका ने चतुर्यशोदा जैसे अत्यंत कठिन छन्द को बहुत ही खूबसूरती से प्रस्तुत किया है , जिसकी बहुत सुरीली धुन है ...." रिहाले-मस्ती मकुंदरंजिश जिहाले हिजरा हमारा दिल है"

खुले-खुले से सुवास गेसू, मुदित हृदय को किये हुए है,

मंदिर-मंदिर सी, मलय अनोखी, लगे कि जैसे पिये हुए है।

प्रदीप्त स्वर्णिम, सवर्ण किरण सी प्रकाश करती उजास भरती।

झलक तुम्हारी अलग अनूठी कि प्राण लाखों दिए हुए हैं।।"

एक और मधुर छन्द माधवमालती का गीत देखिए

" जिंदगी के इस भँवर में, काल के लंबे सफर में,

शब्द उलझाते बहुत हैं, अर्थ तड़पाते बहुत हैं।

मौन को पढ़ना पड़ेगा,

पथ स्वयं गढ़ना पड़ेगा।।"

जब विरह के चरम पर कलम चले और उसे  मधुर ताल युक्त  गंगोदक छन्द  का साथ मिल जाये तो क्या उत्कृष्टता आती है  इस गीत में  देखिएगा, 

" भाव खो से गये शब्द मिलते नहीं, लय कहाँ गम हुई गीत कैसे लिखूँ,

श्वास या घड़कनें नाम में लीन है, पुष्प मुरझा गया पाँखुड़ी दीन है,

काँच की कोठरी , पात की झोपड़ी , पीर की ,अश्रु की, रीत कैसे लिखूँ ।"

वैसे तो संग्रह में ईश भक्ति , मातृ भक्ति के कई गीत है लेकिन एक गीत जो पितृ महिमा पर केंद्रित है बरबस आकर्षित करता है ।

" हमारे धन्य जीवन का, रहें आधार बाबू जी।

  तुम्हारे पुण्य-कर्मों को, कहें आभार बाबू जी।।

  घनी रातों में दीपक से, दिखाते रोशनी हमको,

  बने चंदा सितारों में , दिखाते चांदनी हमको।

  हमारे ग्रन्थ बाबू जी , हमारा सार बाबू जी ।।"

एक गीत में लेखिका ने समाज मे व्याप्त कोढ़ पर बड़ी सुंदर कलम चलायी है।

" शिकारी कुछ यहाँ ऐसे, चमन को छीन लेते हैं।

   जरा सी दे धरा तुमको , गगन को छीन लेते हैं।।"

आज कम्प्यूटर नेटवर्क के जमाने में पुस्तकों के महत्व को दर्शाते हुए लेखिका कहती है....

" पढ़ो पढ़ाओ किताब सब जन, सखी सहेली किताब होती,

उठे जो मन मे हजार उलझन , सवाल का ये जबाब होती।"

 अंत मे लेखिका ने गीत के माध्यम से कवि समाज के लिए संदेश दिया है कि --

" भूख- गरीबी लाचारी पर, होती खूब रही कविताई,

   अब थोड़ा सा जगना होगा, अंगारों पर लिखना होगा।

   कागज - कलम दवातें छोड़ो, तलवारों पर लिखना होगा

   उठने से पहले दब जाती, चीत्कारों पर लिखना होगा।

यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा यह छंदबद्ध उत्कृष्ट गीत संग्रह, लेखिका को साहित्य जगत में अपनी एक अलग पहचान दिलाने के समस्त गुण रखता है ।



कृति : मैं प्रणय के गीत गाती (गीत संग्रह)

रचनाकार : उर्वशी कर्णवाल

प्रथम संस्करण : वर्ष 2022

मूल्य : 300 ₹

प्रकाशक : शब्दांकुर प्रकाशन , नई दिल्ली

समीक्षक : मनोज मानव 

पी 3/8 मध्य गंगा कॉलोनी

बिजनौर  246701

उत्तर प्रदेश, भारत

दूरभाष- 9837252598

गुरुवार, 13 अक्तूबर 2022

मुरादाबाद के साहित्यकार स्मृतिशेष क़मर मुरादाबादी के सत्रह शेर

 


हम सिखादेंगे हरेक क़तरे को तूफां होना 

बे अदब हमसे न ऐ गरदिशे दौरां होना


कहीं फ़रेबे नज़र था कहीं तिलिस्मे जमाल 

कहां से बच के गुज़रते कहां ठहर जाते


जुस्तजू का हमें शऊर नहीं 

वरना मनज़िल कहीं से दूर नहीं


बारहा गरदिशे हालात पे आई है हंसी 

बारहा गरदिशे हालाता पे रोना आया


जलवे जुदा-जुदा सही हुस्न जुदा-जुदा नहीं 

एक अदा खिज़ा में है इक अदा बहार में


दौरे मय बन्द करो साज़ के नगमे रोको

अब हमें तज़करये दरदे जिगर करना है


रहेगा याद ये दौरे हयात भी हमको 

के ज़िन्दगी में तरस्ते हैं ज़िन्दगी के लिये


एक ज़र्रे में महो- अन्जुम नज़र आने लगे 

जब नज़र अपने पे डाली तुम नज़र आने लगे


कहाँ ढूंढोगे दीवानों का अपने 

मुहब्बत का कोई आलम नहीं है


न वो गुल हैं न वो गुन्चे, न वो बुलबुल न वो नग़मे बहारों में ये आलम है, ख़िज़ा आई तो क्या होगा


नज़रों से ज़रा आगे कुछ दूर खयालों से

 मैंने तुम्हे देखा है इक बार कहाँ पहले


साक़िया तन्ज़ न कर, चश्मे करम रहने दे 

मेरे साग़र में अगर कम है तो कम रहने दे


हौसले बढ़ गये मौजों का सहारा पाकर

 ज़िन्दगी और जवां हो गई तूफां के करीब


अपनी ही आग में जलता हूं ग़ज़ल कहता हूं- 

शमआ की तरह पिघलता हूँ ग़ज़ल कहता हूँ


जब तेरा इन्तज़ार होता है 

फूल नज़रो पे बार होता है


क़मर हम ज़माने से गुज़रे 

लेकिन अपना ज़माना बनाकर


याद करेंगे मुददतों शाना व आईना कमर 

बज़्म से उठ रहे हैं हम जुलफे़ ग़ज़ल संवार कर


✍️ क़मर मुरादाबादी

बुधवार, 12 अक्तूबर 2022

मुरादाबाद की साहित्यकार मीनाक्षी ठाकुर की बाल कहानी ---- बत्तख का बच्चा

 


सोना बत्तख अपने दोनों बच्चों सोनू और मोनू के साथ एक बड़ी सी झील में रहती थी.उस झील का पानी बहुत  ही साफ और नीले रंग का था . उस झील में बहुत सुंदर- सुंदर  लाल और सफेद रंग के कमल के बड़े- बड़े फ़ूल खिले  हुए थे. सोना बत्तख बच्चों को लेकर झील के किनारे- किनारे ही तैरती रहती थी, झील के बीच में या अधिक दूर तक नहीं जाती थी, क्योंकि झील के बीच में एक बहुत ही  बड़ी और खतरनाक  मछली रहती थी, जो बत्तखों के छोटे बच्चों को पकड़ कर खा जाया करती थी.लेकिन वह झील के किनारे वाले पानी में नहीं आती थी, क्योंकि यहाँ पर बत्तखों के बहुत सारे परिवार आपस में मिलजुल कर रहते थे.अत: किसी भी बड़ी मछली के इस ओर आने पर सब बतखें एक साथ मिलकर, उस पर अपनी चोंच से हमला बोलकर उसे भगा देतीं थीं.

    सोना बत्तख के दोनो बच्चे बहुत सुंदर और मोती जैसे सफेद रंग वाले थे.सोनू जहाँ समझदार था, वहीं मोनू बहुत ज़िद्दी, लापरवाह  और नटखट था .वह किसी बड़े का कहना भी नहीं मानता था.सोना ने  दोनो बच्चों को झील के बीच में न जाने की सख्त़ हिदायत दे रखी थी.एक दिन सोना दोनो बच्चों को झील के किनारे बैठाकर शाम के भोजन का इंतजाम करने अपनी सहेलियों के साथ थोड़ी देर के लिए कहीं चली गयी. जाते- जाते ,सोनू और मोनू से झील के अंदर जाने को मना कर गयी. लेकिन सोना के जाते ही मोनू चुपके से झील के पानी में उतर गया और अकेला तैरने लगा. उसे तैरने में बहुत मज़ा आ रहा था.रंग -बिरंगे कमल के फूलों को देखता हुआ, वह कब झील में बीचो -बीच पहुँच गया, उसे पता ही नहीं चला.जब उसने पीछे मुड़कर देखा तो वहाँ से किनारा बहुत दूर था.उसे मोनू और सोना कहीं नज़र नहीं आ रहे थे.

 अब तो वह घबरा कर ज़ोर ज़ोर से रोने लगा. तभी उसने एक बड़ी सी मछली को अपनी ओर आते देखा. यह वही खतरनाक मछली थी, उसे देख वह भय से थर- थर काँपने लगा. तभी, उसे अपने पीछे से  एक  बड़ी मीठी सी आवाज सुनाई दी, "घबराओ मत प्यारे बच्चे..!आओ मेरे ऊपर बैठ जाओ..! जल्दी करो..!"उसने पीछे मुड़कर देखा तो एक सफेद रंग का बड़ा सा कमल का फ़ूल , उसे बुला रहा था.अतः मोनू तुरंत कूद कर उस कमल के फूल पर अपने शरीर को सिकोड़ कर बैठ गया.

वह बड़ी मछली जब  उधर आयी तो सफेद रंग के कमल के फूल पर छिपे हुए सफेद बत्तख के बच्चे को नहीं देख पायी.इस प्रकार दोनो,  एक रंग के होने के कारण उस मछली को चकमा देने में सफल हो गये.

  थोड़ी देर में कमल का फ़ूल मोनू को लेकर तैरता हुआ, किनारे पर ले आया, जहाँ सोना और सोनू, मोनू के लिए बहुत परेशान हो रहे थे. मोनू को घर वापस आया देखकर वे दोनों बहुत खुश हुए, और सफेद कमल को उसकी दयालुता के लिए धन्यवाद दिया. मोनू ने भी अपनी माँ सोना से  माफी माँगी और  वादा किया कि वह अब कभी  भी बिना बताये, घर से अकेला कहीं नहीं जायेगा और बड़ों का कहना मानेगा.अब तीनों मिलकर पहले की तरह खुशी -खुशी रहने लगे.


✍️ मीनाक्षी ठाकुर

मिलन विहार

मुरादाबाद 244001

उत्तर प्रदेश, भारत

वाट्स एप पर संचालित समूह 'साहित्यिक मुरादाबाद ' में प्रत्येक मंगलवार को बाल साहित्य गोष्ठी का आयोजन किया जाता है । मंगलवार 11 अक्तूबर 2022 को आयोजित गोष्ठी में शामिल साहित्यकारों की कविताएं


बादल आए , पानी बरसा

अक्टूबर में ढमढम,

गर्मी रानी बोली रोकर 

अब समझो हम बेदम


एसी बंद करो

पंखे को दिन में सिर्फ चलाना,

आएगा अब नहीं पसीना

मूँगफली बस खाना


रोज रात को हुई जरूरी

गरमा-गरम रजाई,

कुल्फी के दिन गए

चाय की चुस्की मन को भाई 

✍️रवि प्रकाश

बाजार सर्राफा

रामपुर 

उत्तर प्रदेश, भारत

मोबाइल 99976 15451

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उमड़-घुमड़ कर बादल आए,

काली रात घनेरी लाए।

आजा रामू,आजा श्यामू,

खुशी निराली मन को भाए।।


टप-टप बूंदें गिरतीं हैं,

आसमान से झरतीं हैं।

देख नज़ारा इतना प्यारा,

मन में मस्ती भरतीं हैं।।


ठंडी-ठंडी हवा चली,

लगती कितनी भली-भली।

मन मस्ती से झूम उठा,

मच उठी अब खलबली।।


✍️अतुल कुमार शर्मा

 सम्भल 

उत्तर प्रदेश, भारत 

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सुंदर झरना जल बरसाता ।

कलकल करके बहता जाता।


सूरज के रंगों से मिलकर

 बन जाता रंगों का संगम, 

कभी न रुकता बाधाओं से

राहें हों कितनी भी दुर्गम, 

हर पत्थर को भेद-भेदकर 

आगे चलता , वेग बढ़ाता ।


कोमल जल है फिर भी देखो 

दूर हटाता पत्थर को भी, 

मृदुता का आदर करने का 

पाठ पढ़ाता भूधर को भी,

जल की मृदुतामय दृढ़ता को 

भूधर भी तो शीश झुकाता ।


हे नन्हे-प्यारे मानव तुम 

दृढ़ विश्वास बनाए रखना ,

कष्ट पड़ें चाहे कितने भी 

मानवता से कभी न हटना ,

पक्का- नेक इरादा ही तो 

हर मुश्किल को सरल बनाता ।

 ✍️ओंकार सिंह 'ओंकार'

1-बी-241 बुद्धि विहार ,मझोला,

मुरादाबाद(उत्तर प्रदेश) 244103 

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कापी ,पेंसिल ,चाक , सिलेट कभी हथियार थे हमारे ,

हम भी कभी "राजा" थे  दीपू, मुन्ना की सेना के सहारे 

सेना के "राजा" रोज बदल दिए जाते थे ,

कभी "राजा" तो कभी "सैनिक" हम बन जाते थे ,

लडाई  मे बाल खींचकर  पेंसिल की नोक हम चुभाते थे,

अगले दिन फिर रूठे मिञो को हम मनाते थे ,

चिंता मुक्त खेलना कूदना तो रोज का काम था ,

घर पहुँचकर न पूछो बस आराम ही आराम था ,

याद कर इन मीठी यादों को "बचपन" में खो जाता हूँ ,

बदल चुके परिवेश में खुद को बहुत अकेला पाता हूँ ,

लौट नहीं सकता वो "बचपन" , बीत गया सो बीत गया ,

जंग लड़ो अब जीवन की तुम , लड़ा वही जंग जीत गया ।

✍️विवेक आहूजा 

बिलारी 

जिला मुरादाबाद

उत्तर प्रदेश, भारत

मोबाइल फोन नंबर 9410416986

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आजा प्यारी गौरैया हम तुझको नहीं सतायेंगे।

दाने डाल टोकरी में अब तुझको नहीं फँसायेंगे।

छत पर दाना पानी रखकर हम पीछे हो जाएंगे।

छोटे छोटे घर भी तेरे फिर से नए बनाएंगे।

आजा प्यारी गौरेया अब तुझको नहीं सतायेंगे।।


हुई ख़ता क्या नन्हीं चिड़िया जो तू हमसे रूठ गयी।

या तू जाकर दूर देश में अपना रस्ता भूल गयी।

एक बार तू लौट तो आ हम सच्ची प्रीत निभाएंगे।

दूर से तुझको देख देखकर अब हम खुश हो जाएंगे।

आजा प्यारी गौरेया हम तुझको नहीं सतायेंगे।।


चीं चीं करती छोटी चिड़िया याद बहुत तू आती है।

जब कोई तस्वीर किताबों में तेरी दिख जाती है।

एक बार तू बापस आ हम फिर से रंग जमाएंगे।

सुंदर सी तस्वीर तेरी हम फिरसे नई बनाएंगे।

आजा प्यारी गौरेया हम तुझको नहीं सतायेंगे।।

✍️नृपेंद्र शर्मा "सागर"

ठाकुरद्वारा 

मुरादाबाद 

उत्तर प्रदेश, भारत 

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चूहे खाये बिल्ली रानी। 

आखिर कब तक यही कहानी।। 


बहुत सह चुके अब न सहेंगे ,

बिल्ली तेरी ये मन मानी।।


हम चूहों को खा-खा कर तुम ,

खुद को समझी ज्ञानी ध्यानी।। 


शक्ति एकता में है कितनी ,

बात न अब तक तुमने जानी।।


ख़ूब भगा कर मारेंगे हम, 

याद करा देंगे फिर नानी।।


छोड़ो खाना चूहे अब तुम ,

ढूंढो दूजा दाना पानी।।


✍️प्रो. ममता सिंह

मुरादाबाद 244001

उत्तर प्रदेश, भारत 

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किया पराजित घने घनों को ,

छायी धूप सुहानी ।

तरसाने की बारिश ने थी,

मानों मन में ठानी ।।


पर सूरज जी के सामने,

चली नहीं मन मानी ।

गये घने घन घर हैं अपने , 

पहने चूनर धानी ।।


ॠतु शरद की बारी आयी , 

चमन फूल लायेगी ।

रंग बिरंगी क्यारी में ,

ठंड गुलाबी भायेगी ।।


✍️डाॅ. रीता सिंह 

मुरादाबाद 244001

उत्तर प्रदेश, भारत 

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ले आता मैं चाँद जमीं पर

लेकिन  अभी मैं छोटा हूं।

वैसे मैं  जिद्द का हूं पक्का,

पर कर लेता समझौता हूं।।


मूझे कोई कम न समझना

सब कहें 'सिक्का खोटा'हूं।

पल में इधर , पल में उधर,

बस मैं 'बेपेंदी का लोटा' हूं।।


सबसे मैं  लड़-भिड़ जाता ,

डर नहीं लगे-कि छोटा  हूं।

बच्चे  मुझसे भय खा भागें ,

क्योंकि कुछ तगडा़ मोटा हूं।।


छोड़ मुझे सब दावत खाते

मैं घर पहन खडा़ लंगोटा हूं ।

गोदी  उठा न  कोई  मनावे

अपने आंगन लोटा-पोटा हूं।।


कान्हा बाल-गोविंद बताओ,

क्या लगता  इतना मोटा  हूं ।

दस-दस रोटी सुबह शाम खा

दो लोटे दूध ही पीके सोता हूं।।

✍️धनसिंह 'धनेन्द्र'

चन्द्र नगर

मुरादाबाद 244001

उत्तर प्रदेश, भारत 

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 बोली से पहचानो बच्चों

कौन  आपके  पास  खड़ा

कौन  देह  में  छोटा तुमसे

बोलो   तुमसे   कौन  बड़ा  ।


बड़े ध्यान से सुनो बताओ

बच्चों स्वर यह किसका है

इंदु  बोली   दीदी   यह  तो

गौरैया   के  स्वर    सा   है।


कांवकांव की बोली कर्कश

कौन   सुनाता   है   तुमको

बोला  चीनू    मुंडेरों     पर

दिखते   हैं    कौए   हमको।


कानों  को  चौकन्ना  करके

म्याऊँ    कौन   बोलता   है

गुड़िया बोली नन्हा बिल्ला

अपनी   पोल   खोलता है।


कोई  बतलाए  कुकड़ू   कूँ

करके   कौन   जगाता   है

मुर्गे का  स्वर ही  तो  दीदी

निंदिया   दूर    भगाता  है।


ऐसे  ही  अनेक  जीवों  के

स्वर    बच्चों   ने  पहचाने

घूम-घूमकर चिड़ियाघर में

लगे  सभी को  सिखलाने।


हैं  सबकी आँखों  के  तारे

सारे    ये     बच्चे      प्यारे 

यही  देश  के   कर्णधार  हैं

सही   स्वरों   के    रखवारे।

✍️वीरेन्द्र सिंह "ब्रजवासी"

मुरादाबाद 244001

उत्तर प्रदेश, भारत

मोबाइल फोन नंबर 9719275453

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देखो बच्चों कितनी न्यारी ?

दुनिया कितनी प्यारी प्यारी?


नभ में ऊंचे पंछी उड़ते ,

किन्तु झुंड में वे ही जुड़ते ।

जो हैं एक से पंखों वाले,

करतब उनके बड़े निराले।

अजब प्रभु की माया सारी,

दुनिया कितनी प्यारी प्यारी?


उसका कितना अद्भुत खेला

जंगल में पशुओं का मेला।

नाना जाति विविध प्रकार,

भालू ,चीते, हिरन, सियार।

लौमड़ी, बन्दर हाथी भारी

दुनिया कितनी प्यारी प्यारी?


नदियां ,झरने, झील, तालाब,

बर्षा में जल राशि बहाव।

जल जीवों से भरे समंदर,

शार्क,ह्वेल,मछली जल अंदर,

कितने करें शिकार शिकारी।

दुनिया कितनी प्यारी प्यारी?


धरती पर फैली हरियाली,

पत्ती-पत्ती डाली डाली।

वियावान जंगल का शोर,

जिसका कोई ओर न छोर।

आक्सीजन दें हरें बिमारी,

दुनिया कितनी प्यारी प्यारी?


सदा रखो सुन्दर व्यवहार,

कभी नहीं तू हिम्मत हार।

धरती का बस यही आवरण।

कहलाता है पर्यावरण।

कर्म करो जो हो सुखकारी।

दुनिया कितनी प्यारी प्यारी?


✍️अशोक विद्रोही

412 प्रकाश नगर

मुरादाबाद 244001

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रंग बिरंगे पंखों वाली,तितली बोली बड़ी निराली

आओ बच्चों मेरे साथ, बहुत रंग हैं मेरे पास ॥


बच्चे बोले तितली रानी ,पंख हमें भी लाओ ना

रंग बिरंगे बाग बगीचे,हमको भी दिखलाओ ना ॥


सपने में भी अब तो हमको ,दिखती तितली रानी

परियों जैसी करते मस्ती और करते मनमानी ।


मन करता है कभी-कभी, कि मैं पक्षी बन जाऊँ 

अपने पंख पसारुँ मैं और नभ में उड़ जाऊँ ॥


रंग बिरगे पंखों वाली,तितली सा लहराऊँ

इतनी सुंदर मेरी सहेली, मन ही मन इठलाऊँ ॥


✍️विनीता चौरासिया

शाहजहाँपुर 

उत्तर प्रदेश, भारत 

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मंगलवार, 11 अक्तूबर 2022

मुरादाबाद की साहित्यकार पूजा राणा की पांच बाल कविताएं


 (1) बारिश

 धूप खिल रहीं थीं चारों ओर

 तड़के की हो रहीं थीं भोर

 तभी अचानक घिर आये बादल

बारिश हुई और नाचे मोर

झम झम बारिश की बरसे फ़ुहार

 ऐसे लगे जैसे आ गयी बहार

पेड़ों के पंछी लगे चहचहाने

मानो जैसे कोई हो त्यौहार

सावन में मनभावन बारिश

जुड़ रहें हैं यूँ मन के तार

फ़िर माँ ने पीछे से आवाज लगाई

अंदर आओ यूँ डांट लगाई

मन में चंचलता बारिश को देखूँ

धीरे धीरे से हाथों में यूँ पानी ले लूँ

तभी माँ ने बंद किया दरवाजा

बोली पूजा अब तो आजा

मैं बोली थोड़ा रुको ज़रा

बारिश को देखूं सुनो ज़रा

छम छम में नाचूँ गाऊं

जोर जोर से शोर मचाऊं

देखो बारिश आज, खुशियाँ ले आयी हैं

गर्मी को दूर भगाएगी, आज ठंड हो जाएगी

ओ बारिश अब रोज ही आना

नित्य बरस के मन हर्षाना


(2) मेरी कल्पना

मन करता हैं उड़ जाऊं मैं भी

आसमान में पंछी बनकर

दुनिया देखूँ इन आँखों से 

शोर मचाऊं मै भी तनकर

फिर नन्हे नन्हें कदमों से मैं

चलकर भागूँ और गिर जाऊं

प्यार से माँ उठाये मुझको

और गुस्से से मुँह फुलाऊं

माँ का वो ममता सा आँचल

मुझ पर प्यार लुटायेगा

माँ के आँचल में छुप जाना।

मुझे बहुत याद आएगा


(3)  मैं नटखट कान्हा जैसा

ठुमक ठुमक चलु ऐसी चाल

कान्हा के जैसे हो गाल

सिर पर मेरे मोर मुकुट हो

ऊपर से ये घुंघराले बाल

छम छम करता नृत्य करूं

माँ के आँचल में छुपा रहूँ

ढूढ़ें गोपियां मुझको नित दिन

मैं मुँह से गोपी गोपी गोपी कहूँ

लीलाओं से अपनी मैं

कर दूं सबको तंग, बेहाल

सिर पे मेरे मोर मुकुट हो

ऊपर से घुंघराले बाल

 

(4)    प्यारी सखी

आओ सखियों सब खेल रचायें

झूमे नाचे यूँ गीत सुनायें

मन में रखे भाव ख़ुशी का

औऱ एक दूजे की सखियां बन जायें

हरी भरी पेड़ों की डाली

काली कोयल की कूक निराली

हरे भरे पेड़ों को पानी देता

गुनगुनाता बाग का माली

सब देखें और ख़ुश हो जायें

झूमें नाचें और गीत सुनायें


(5) सुनो मेरा सपना

मीठी तान सुनाती कोयल

बौराई थी डालों पर 

नज़र पड़ी थी मुझ पर हया की

मेरे घुंघराले बालों पर

ठुमक ठुमक चलती थी चिड़िया

दाना चुगकर लाती थीं

धीरे धीरे से अपने बच्चों को

चुपके से खिलाती थीं

भूल गयी थी दुनिया को मैं

अलबेली सी घटा छायी थी

यह मनोरम दृश्य देखकर 

याद मुझे माँ आयी थी

फिर आँखे खुली थी,

उड़ गए थे सपनें

देखें भी थे, क्या

सच में सपनें

आँखे बंद थी तो कितना अच्छा था

लगता मुझको हर सपना सच्चा था

✍️ पूजा राणा

राम गंगा विहार 

मुरादाबाद 244001

उत्तर प्रदेश, भारत

मुरादाबाद के साहित्यकार पंडित बलदेव प्रसाद मिश्र की दुर्लभ कृति...व्याख्यान रत्नमाला। यह कृति वर्ष 1922 में श्री वेंकटेश्वर मुद्रण यंत्रालय मुंबई द्वारा प्रकाशित हुई है। इस कृति में पण्डित दीनदयाल शर्मा, महामहोपदेशक पण्डित अम्बिकादत्त जी व्यास, साहित्याचार्य महामहोपदेशक पण्डित श्रीकृष्णशास्त्री, महामहोपदेशक पण्डित गोविन्दरामजी शास्त्री, विद्यावारिधि पण्डित ज्वालाप्रसाद जी मिश्र, स्वामी हंसस्वरूपजी, पं० दुर्गादत्त, पं० हरिदत्तजी शास्त्री तथा एनी बेसेंट आदि के अद्भुत व्याख्यान हैं।


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::::::::::प्रस्तुति:::::::::

डॉ मनोज रस्तोगी

8,जीलाल स्ट्रीट 

मुरादाबाद 244001

उत्तर प्रदेश, भारत 

मोबाइल फोन नंबर 9456687822



सोमवार, 10 अक्तूबर 2022

मुरादाबाद की साहित्यकार डॉ रीता सिंह की पांच बाल कविताएं

 



1- उठो लाल अब हुआ सवेरा

उठो लाल अब हुआ सवेरा

चिड़ियों ने डाला है डेरा,

किरणें भी द्वारे तक आयींं

लगा रहीं धरती पर फेरा । 


चमक रही सूरज की लाली 

कोयल कूक रही है डाली,

सरर सरर पातों की धुन पर 

झूम रही हवा बनी आली । 


कलियाँ मुस्कायीं उपवन में

उछल रहे शावक वन - वन में ,

देख भोर का समय सुहाना

घूमे खग दल दूर गगन में । 


2 - बादल आये बादल आये....

बादल आये , बादल आये

कितना सारा पानी लाये,

छत ,सड़क और सब खेतों में

रिमझिम-रिमझिम कर मुस्काये । 


मस्त पवन तरुवर लहराये

मानों मधुरिम गीत सुनाये,

मोती सी गिरती बूँदों ने

जिया सभी के बड़े लुभाये । 


पर फैली कीचड़ गलियों में

फंस गया कचरा नलियों में

कूड़ा फेंके जो सड़कों पर

अपनी करनी पर पछताये । 


3-बोले कागा काँव - काँव ...

बोले कागा काँव - काँव

चली भोर है पाँव - पाँव 

नदी ,शिखर और खेत से

पहुँच गयी है गाँव - गाँव । 


घर की छत आकर बैठे 

करे कबूतर गूटर - गूँ

देख - देख मुन्नी चहकी

बोली माँ से दाना दूँ । 


कहता मुरगा कुकड़ूँ - कूँ

अब तक मुन्ना सोया क्यूँ 

उठ मुंडेरी पर तेरी

गाती चिड़िया चूँ चूँ चूँ । 


जपता मिट्ठू राम - राम

भजता वही प्रभु का नाम

कोयल गीत सुरीले गा 

चली गयी है अपने ठाम । 


4-आओ चलें वनों की ओर....

आओ चलें वनों की ओर 

जहाँ सुरीली होती भोर ,

खग समूह मिल सुर लगाते

खोल पंख उमंग दिखाते,

नाचे मस्ती में है मोर ।।


भानु किरण पहुँची हर कोर

नरम धूप की पकड़े डोर,

पात चमक उठे ज्यों झालर

उछल रहे तरुवर वानर,

एक छोर से दूजे छोर ।

आओ चलें वनों की ओर ।।। 


दिन दहाड़े गज चिंघाड़े

भालू बजा रहे नगाड़े,

मृग नाचते ता - ता थैया

मनहु सब हैं भैया - भैया,

चारों ओर खुशी का शोर ।।


घूम रहे सिंह गरजते 

जान जीव दल सब बचाते,

कहीं शिकार, कहीं शिकारी

सोच एक से एक भारी,

लगी जीतने की है होर ।

आओ चलें वनों की ओर ।। 


5 -कोरोना ने पैर पसारे...

कोरोना ने पैर पसारे

घर में रहना मुन्ना प्यारे ,

दादी - दादा संग खेलना

खेल नये - पुराने सारे ।


योग ध्यान से जीवन जीना

हल्दी डाल दूध है पीना,

तुलसी ,अदरक और मुनक्का

काढ़ा इनका लेना मीना ।

स्याह ,मिर्च और दाल चीनी

रोग डरेंगे इनसे न्यारे ।।


सब जीवों की सुध है लेना

चिड़िया को है दाना देना,

देना गैया को भी चारा

जब तक उसका पेट भरे ना ।

कौआ कूकर माँगें रोटी

घूम रहे भूखे बेचारे ।।


पढ़ना पुस्तक सभी पुरानी

पूर्वजों की सत्य कहानी,

चलना आदर्शों पर उनके

जीवन जिनका अमिट निशानी ।

सूरज सम जो राह दिखाते

तम से कभी नहीं वे हारे ।

कोरोना ने पैर पसारे...... 

✍️ डॉ रीता सिंह

  आशियाना 1, कांठ रोड 

मुरादाबाद 244001

मोबाइल नंबर - 8279774842 



मुरादाबाद के साहित्यकार माहेश्वर तिवारी को लखनऊ की प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था सर्वजन हिताय साहित्यिक समिति ने किया डॉ. अम्बिका प्रसाद गुप्त स्मृति सम्मान 2020 से सम्मानित


लखनऊ की प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था सर्वजन हिताय साहित्यिक समिति की ओर से रविवार नौ अक्टूबर 2022 को लखनऊ में हज़रतगंज स्थित प्रेस क्लब सभागार में आयोजित भव्य सारस्वत सम्मान समारोह में प्रख्यात साहित्यकार माहेश्वर तिवारी को वर्ष 2020 का 'डॉ. अम्बिका प्रसाद गुप्त स्मृति सम्मान' प्रदान किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष एवं विचारक प्रोफेसर सूर्य प्रसाद दीक्षित, विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. विश्वम्भर शुक्ल, नवगीतकार वीरेंद्र आस्तिक तथा संस्था के उपाध्यक्ष जगमोहन नाथ कपूर सरस, रामेश्वर प्रसाद द्विवेदी प्रलयंकर, राकेश बाजपेई के कर कमलों से समारोह के मुख्य अतिथि नवगीतकार माहेश्वर तिवारी को अंगवस्त्र, मानपत्र, प्रतीक चिह्न एवं सम्मान राशि भेंट कर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम का संचालन संस्था के संस्थापक व संयोजक राजेन्द्र शुक्ल राज ने किया।          कार्यक्रम में सम्मानित माहेश्वर तिवारी ने अपने नवगीत पढ़े- 

"एक तुम्हारा होना क्या से क्या कर देता है

बेज़ुबान छत दीवारों को घर कर देता है

आरोहों अवरोहों से बतियाने लगती हैं

तुमसे जुड़कर चीज़ें भी बतियाने लगती हैं

एक तुम्हारा होना अपनापन भर देता है"। 

      इस अवसर पर लखनऊ के स्थानीय कवियों शिव भजन कमलेश, डॉ रंजना गुप्ता, सोम दीक्षित, अम्बरीष मिश्र आदि अनेक कवियों ने कविता पाठ किया।

श्री माहेश्वर तिवारी को लखनऊ में डॉ. अम्बिका प्रसाद गुप्त स्मृति सम्मान से सम्मानित किए जाने पर मुरादाबाद की साहित्यिक संस्था अक्षरा, हस्ताक्षर एवं मुरादाबाद लिटरेरी क्लब की ओर से डॉ. अजय अनुपम, डॉ. मक्खन मुरादाबादी, डॉ. कृष्ण कुमार नाज़, योगेन्द्र वर्मा 'व्योम', ज़िया ज़मीर, राजीव प्रखर, हेमा तिवारी, डॉ. पूनम बंसल, डॉ. प्रेमवती उपाध्याय, डॉ. मनोज रस्तोगी, मनोज मनु, मयंक शर्मा, फरहत अली, राहुल शर्मा आदि ने बधाई दी।





:::::::प्रस्तुति::::::

योगेन्द्र वर्मा 'व्योम'

संयोजक- अक्षरा, मुरादाबाद

मोबाइल-9412805981

मुरादाबाद मंडल के जनपद संभल (वर्तमान में मेरठ निवासी)के साहित्यकार सूर्यकांत द्विवेदी की घनाक्षरी

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मुरादाबाद मंडल के जनपद अमरोहा की साहित्यकार प्रीति चौधरी की रचना...... हाथ की लकीरें

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मुरादाबाद मंडल के जनपद रामपुर (वर्तमान में शाहजहांपुर निवासी) की साहित्यकार विनीता चौरसिया का गीत

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मुरादाबाद के साहित्यकार राजीव प्रखर का मुक्तक ....

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