शुक्रवार, 16 सितंबर 2022

मुरादाबाद मंडल के अफजलगढ़ (जनपद बिजनौर) के साहित्यकार डॉ अशोक रस्तोगी की लघुकथा ...श्रद्धा

       


शिवालय में माता का भव्य जागरण हो रहा था। भांति-भांति की पुष्प श्रंखलाओं से देवोपम भव्य दरबार सज्जित किया गया था।लब्ध प्रतिष्ठ गायक और कलाकार आये हुए थे।

     अर्पित और उसकी पत्नी शैला भी जागरण में जाने की तैयारी कर रहे थे…ऐसे ख्याति प्राप्त गायक सुनने को कहां मिल पाते हैं…और विभिन्न प्रकार की झांकियां…कभी मयूर नृत्य,कभी राधा कृष्ण का नृत्य,कभी काली माई की झांकी,कभी शिव स्तोत्र पर तांडव नर्तन…भरपूर मनोरंजन के साथ-साथ अध्यात्म की अनुभूति भी…माता की पूजा में तो अगाध श्रद्धा उनकी थी ही।

     एक कोठरी में चारपाई पर पड़ी बीमार वृद्ध वयस मां को तो उन्होंने भनक भी नहीं लगने दी थी…वह भी साथ चलने की अभिलाषा व्यक्त कर सकती थी।

     लेकिन बहू को सजते-संवरते श्रंगार करते देखकर मां ने स्वयं ही अनुमान लगा लिया कि पति को साथ लेकर वह कहीं जा रही है…कहां जा रही होगी?...शिव मंदिर में इतना सुन्दर इतना भव्य मां का दरबार सजाया गया है तो फिर वहीं जा रही होगी…

     मां भगवती में तो उसकी भी अगाध श्रद्धा थी।वह भी जीवन भर नवदुर्गे और नवरात्रों के पूरे व्रत निष्ठा और नियम पूर्वक रखती आयी थी। और जब तक देह की सामर्थ्य रही कहीं भी मां का जागरण अथवा भजन कीर्तन उसने छोड़ा नहीं था। श्रद्धा होती भी क्यों नहीं,भगवती मां ने उसकी मनोकामना भी तो पूर्ण की थी…अर्पित को उसके अंक में डालकर…अर्पित को पाने के लिए उसने कितने जप तप, कितने व्रत अनुष्ठान किये थे , उम्र के इस अन्तिम पड़ाव पर कुछ भी तो स्मरण नहीं।

     मां के दरबार में अपनी श्रद्धा की देवी की एक झलक पाने के लिए उसका भी मन ललचा उठा। उसने साहस कर बहू को आवाज लगा दी– "बहू!जरा मेरे पास तो आ!... तुम लोग आज जा कहां रहे हो?"

     बहू ने सुनकर भी अनसुना कर दिया तो उसने बेटे को पुकारा।बेटा वहीं से चीखा– "क्या है मां?यह कितनी गन्दी आदत है तुम्हारी कि हम जब भी कहीं जाने को तैयार होते हैं तुम हमें परेशान करने लगती हो!... चुपचाप नहीं लेटी रह सकतीं क्या?"

     मां सहम गयी…जब अपनी कोख से जना बेटा ही कोई बात सुनने को तैयार नहीं तो फिर बहू पर ही क्या अधिकार?...उसका भी क्या विश्वास कि वह कोई बात मान ही लेगी?

     लेकिन देवी मां के चरणों में शीश नवाने की अदम्य लालसा ने उसमें साहस भर दिया । लाठी के सहारे वह उठी और बहू के सामने पहुंचकर धीरे से ससंकोच बोली – "बहू क्या मां के जागरण में जा रही हो? मेरा भी बहुत मन था मां के चरणों में मत्था टेकने का।सोच रही थी कि आज हूं कल का क्या पता रहूं न रहूं? अन्तिम बार मां के दिव्य दर्शन कर लेती तो हृदय को बड़ी शांति मिल जाती…"

     बहू की भृकुटी वक्र हो गयी– "मां जी! आपसे कितनी बार कहा है कि हमारे काम में अड़ंगा मत लगाया करो! न कहीं आते जाते समय हमें रोका-टोका करो! पर सठिया गयी हो न, मान कैसे सकती हो?... अच्छा खासा मूड खराब कर दिया…दो कदम तो तुमसे चला नहीं जाता, जागरण में जाओगी?... भीड़ की रेलमपेल में कहीं कुचल कुचला गयीं तो और हमारी जान को मुसीबत खड़ी हो जाएगी। वैसे भी हम कौन सा मंदिर जा रहे हैं, इनके दोस्त की मां बीमार है उसे देखने जा रहे हैं आधे घण्टे में लौट आएंगे।"

     बहू से निराश होकर बूढ़े नेत्रों में याचना भाव लिये वह बेटे की ओर मुड़ गयी– "बेटा! मैं तुम दोनों के काम में बिल्कुल भी अड़ंगा नहीं लगाऊंगी।बस तू मुझे मंदिर तक पहुंचा आ! उसके बाद तुम दोनों को जहां जाना हो वहां चले जाना और उधर से लौटते समय मुझे भी लेते आना। अंतिम समय में एक बार मां के दर्शन हो जाएं तो समझ लूंगी कि मैंने सारे तीरथ कर लिये।"

     पुत्र ने क्षणार्ध भर को पत्नी की ओर देखा…पत्नी ने आंखों ही आंखों में उसे कोई संकेत किया तो वह आवेश में आ आ गया – "अम्मा! तुम पागल हो गयी हो। बीसियों बीमारियां तुम्हारे शरीर में घुसी पड़ी हैं।पता है तुम्हें कुछ,कितना खर्च आ रहा है तुम्हारी दवाइयों पर? मंदिर की भीड़ में तुम्हें चोट वगैरह लग गयी तो कैसे करा पाएंगे तुम्हारा इलाज? इतना धन आएगा कहां से? …दो कदम चलने में तुम्हारी सांस फूलने लगती है मंदिर तक कैसे चल पाओगी? या तुम्हें कन्धे पर बैठाकर ले जाऊं?"

     वृद्धा मां उपहास की हंसी हंस पड़ी – "ना बेटा ना! तू क्यों ले जाएगा मुझे अपने कंधों पर बैठाकर? वह तो मैं ही थी कि जब तू छोटा था तब बीमार होने पर भी तुझे अपने कंधों पर बैठाकर माता के दरबार में ले जाती थी और तेरा मत्था टिकवाती थी। क्योंकि मैं मां हूं न। तू क्या जाने मां की ममता का मूल्य?बेटा तू अब भी कहे तो मैं अब भी तुझे अपनी पीठ पर लादकर घिसटती-घिसटती मां के दरबार तक ले ही जाऊंगी। और बेटा तुझे याद है न कि तेरे कालेज की फीस भरने के लिए मैंने अपना सारा जेवर बेच दिया था…और तू कहता है कि इलाज का खर्च कहां से आएगा?... वाह बेटा वाह!..."

     लेकिन पुत्र मां की बात सुनने के लिए रुका नहीं। पत्नी का हाथ पकड़ कर तत्काल बाहर की ओर निकल गया…मां के जागरण में शीश नवाने के लिए…ताकि मां सारी मनोकामनाएं पूर्ण कर सके।

     इधर श्रद्धा की यह विडंबना देखकर बूढ़े नेत्रों से जलधार बह चली…बेटा और बहू घर में विद्यमान जीवन्त देवी मां का तिरस्कार कर जागरण में कृत्रिम देवी मां को शीश झुकाने गये थे।

  ✍️ डॉ अशोक रस्तोगी

अफजलगढ़, बिजनौर

7 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (17-09-2022) को  "भंग हो गये सारे मानक"   (चर्चा अंक 4554)  पर भी होगी।
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    कृपया कुछ लिंकों का अवलोकन करें और सकारात्मक टिप्पणी भी दें।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 

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  2. सहृदय धन्यवाद आदरणीय शास्त्री जी इस उत्साह वर्धन जनित प्रतिक्रिया के लिए... हृदय तल से आभार आपका।
    डॉ अशोक रस्तोगी अग्रवाल हाइट्स राजनगर एक्सटेंशन गाजियाबाद

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  3. बहुत बहुत सुन्दर , मार्मिक और नई पीढी के लिए सन्देशवाहक का काम करने वाली कहानी | बहुत बहुत शुभ कामनाएं |

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  4. मर्म स्पर्शी कथा।
    हृदय तक आलोडित करती रचना।

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