शनिवार, 6 अगस्त 2022

मुरादाबाद के साहित्यकार स्मृतिशेष शचींद्र भटनागर के सात नवगीत । ये नवगीत लिए गए हैं उनके नवगीत संग्रह ’कुछ भी सहज नहीं’ से। उनका यह नवगीत संग्रह वर्ष 2015 में हिन्दी साहित्य निकेतन बिजनौर से प्रकाशित हुआ है और इसकी भूमिका लिखी है पारसनाथ ’गोवर्धन’ ने ।

 


(1) कहाँ आ गए

कवि तुम कहाँ आ गए भाई

यह तो है बाजार

यहाँ पर क़दम क़दम बिखरी चतुराई


यहाँ न काम करेंगे शब्द,

अर्थ या टटके बिंब तुम्हारे 

भीतर उतर नहीं पाएँगे

गीतों वाले सहज इशारे


गोताख़ोर नहीं हैं

नापें जो उन भावों की गहराई


सबके बाड़े अलग

सभी के अपने-अपने अलग अखाड़े 

मंचों की है अलग सियासत 

अलग वहाँ राजे-रजवाड़े


पूरा दल दौड़ा आता है

सिर्फ़ एक आवाज़ लगाई


सस्ती चीज़ों पर

ऊपर से चढ़े मुलम्मे हैं चमकीले 

चटखारे भरते हैं

उनको देख-देखकर रंग रँगीले


जितना घटिया माल भरा है 

उतनी ही दूकान सजाई


(2) सहज नही

चलते-चलते जीवन गुज़रा

मंजिल मिलती कैसे

जबकि उधर की पगडंडी से हटे हुए हैं लोग


पकड़ न पाए पथ

जो बिल्कुल जाना-पहचाना था

भीड़ संग चल दिए उधर ही

जो पथ अनजाना था


भटकन का अहसास हुआ 

फिर भी विस्मय है भारी

उसी भीड़ के संग आज भी डटे हुए हैं लोग


अड़ी हुई हैं पथ में आकर

कुछ मज़बूत शिलाएँ

अलग-अलग सब शक्ति लगाते

कैसे उन्हें हटाएँ


जीवन-धारा का प्रवाह

फिर क्यों अजस्र रह पाता

जब अपने उद्गम स्रोतों से कटे हुए हैं लोग


सभ्य कहाने के प्रयास में

सब संकीर्ण हुए हैं

नींव सुदृढ़ थी

फिर भी कितने जर्जर जीर्ण हुए हैं


कुछ भी सहज नहीं रह पाया है

अब शिष्टाचारों में

भाव-शब्द-संबोधन सारे रटे हुए हैं लोग


(3) भीतर की बात

बंधु!

आज कुछ अपने भीतर की बात करें 

क्या रक्खा मात्र इन विमर्शो में


होती है जब कोई

दुर्घटना नई-नई

भीड़ घरों से बाहर खूब जुटा करती है।

किसी दामिनी के प्रति 

रोषभरी करुणा तब 

गली-गली लोगों के हृदय में उभरती है


लगता है

लोग सभी मिलकर जुट जाएँगे

अब अनीतियों से संघर्षों में

क्या रक्खा मात्र इन विमर्शो में 


हर अनीति के विरुद्ध

चर्चा-परिचर्चा में

शब्दों के बड़े-बड़े व्यूह गढ़े जाते हैं

सड़कों पर शांतिमार्च होते हैं

मंचों से

ज़ोरदार भाषण, वक्तव्य पढ़े जाते हैं


सोच में न लेकिन

कुछ परिवर्तन आता है 

बीतते महीनों में वर्षों में

क्या रक्खा मात्र इन विमशों में


रोज ख़बर छपती है

समाचार-पत्रों में

मन नहीं बदलते हैं भाषणों सभाओं से

केवल भय और दमन 

संभव हो पाता है.

बड़े-बड़े नियमों से, दंड संहिताओं से


अपने मन का भी

हम चोर स्वयं पहचानें

एक व्यावहारिकता दीखे निष्कर्षो में 

क्या रक्खा मात्र इन विमर्शों में


सारी ओषधियों के

नाम गिनाने-भर से

रोग-दोष का कुछ उपचार नहीं होता है

भीमकाय उपदेशों

सम्मोहक भजनों से

पथभूले मन का प्रतिकार नहीं होता है।


बात प्रभावी होती

स्वयंसिद्ध सूत्रों से

अपनी हो निष्ठा जब ऊँचे आदर्शों में

क्या रक्खा मात्र इन विमर्शों में


(4) नया घर

इस नए घर में बहुत कुछ है.

खुला आँगन नहीं है


खिल रहे चेहरे

गुलाबों से सभी के

हर नयन से छलछलाता हर्ष भी है 

टिक न पाए धूल जिस पर

इस तरह का

टाइलों का चमचमाता फ़र्श भी है


बाहरी दीवार

मेकअप में खिले चेहरे नए-से

पर न है आभास पुरवा का

सजल सावन नहीं है


खिड़कियों पर

आधुनिक शीशे जड़े हैं

धूप भी सीधी न आ सकती उतरकर

अब करुण वातास का

आना कठिन है

क्योंकि बहता है पवन अभिजात भीतर


है कमी कुछ भी न ए०सी० 

कूलरों की, गीजरों की

किंतु अमराई तले की 

अनछुई सिहरन नहीं है


शीशियों से

खुशबुएँ बाहर निकलकर 

बंद कमरों को बहुत गमका रही हैं।

क्यारियों की

रात-रानी, मोगरे की

गंध को आतंक से हड़का रही हैं


पर धरा के छोर तक जाती

हवाओं में घुले जो

वह सहजतासिक्त

संवेदन नहीं है


वह खुला आँगन

जहाँ से सूक्ष्म स्वर में ही

निरभ्राकाश से संवाद होता


स्थूल से

उस अनदिखी निस्सीमता तक

एक आरोही अखंडित नाद होता


शोर मल्टीमीडिया के 

साधनों से भर गया घर 

किंतु वह आह्लाद से भरपूर

अपनापन नहीं है।


(5) नियति

इस आयातित भीड़-भाड़ में 

अब एकाकी ही चलना है नियति हमारी


मन की कौन सुनेगा

नहीं किसी को फ़ुरसत

सब करते हैं सिर्फ़ दिखावा

बाहर हैं ठंडी खुशबुएँ

डियो की लेकिन

भीतर खौल रहा है लावा


होंठों पर मुस्कान रँगी है

पर भीतर-भीतर जलना है नियति हमारी


धारा से विपरीत दिशा में

अगर किसी ने

अलग-अलग बहने की ठानी

उसे नकार दिया जाता है

सबके द्वारा

कहकर उसकी सोच पुरानी

इच्छा से या विवश

समय के विकृत साँचे में ढलना है नियति हमारी


(6) विस्मरण

भागदौड़ का जीवन

भा गया हमें

सर्पिल सड़कों में हम अपना घर भूलें


औरों से

कैसे हम निकल सकें आगे

इसलिए सुबह से

 हम संध्या तक भागे

हाँफते रहे

रुके नहीं लेकिन पल-छिन

बीतती रहीं

जगमग रातें, सूने दिन


निमिष-निमिष

शोर सघन इस क़दर हुआ

हम निर्मल नदिया का कल-कल स्वर भूले


कौंध-कौंध जाती है

एक कल्पना-सी 

अंतरिक्ष के कैसे

हम बनें निवासी


ध्यान में रहा करते 

चंद्र और मंगल 

अपनों के लिए नहीं 

शेष एक भी पल 


अमरबेल फैली है 

अमराई पर 

हम अमृतवाणी का हर अक्षर भूले हैं 


भेड़ों से हम 

चलते रहे आँख मींचे

 देखा तक नहीं किसी पल 

 ऊपर-नीचे

 केवल कुछ शब्द रटे

सीख ली प्रथाएँ

याद नहीं रहीं 

हमें प्रेरणा कथाएँ 

स्वयं सभ्य कहलाएँ 

इस प्रयास में

न्यू ईयर याद रहा, संवत्सर भूले


(7) पुश्तैनी हवेली

ऊँचे परकोटे के भीतर 

एक हवेली है पुश्तैनी


पक्की सड़क आज भी जाती है 

विशाल फाटक से घर तक 

घर की दीवारें दरवाज़े 

कल चमका करते थे लकदक 

आज द्वार, आँगन, कमरों के 

इतने अधिक हुए बँटवारे 

हर कोने में धूल जमी है 

इनकी मिट्टी कौन बुहारे 


रोज़ नई दीवारें उठतीं 

रुकती नहीं हथौड़ी-छैनी


परकोटे के भीतर 

रहते लोगों के मन बँटे हुए हैं

दूज, तीज, होली, दीवाली 

रक्षाबंधन बँटे हुए हैं


खेत बँट गए

और बँट गए उनमें उगे अन्न के दाने

एक भवन में रहकर भी सब 

रहते आपस में अनजाने


किंतु अलग रहकर भी 

मन में रहती है हरदम बेचैनी 


यहाँ रहेंगे सभी एकजुट 

यह सोचा होगा पुरखों ने 

नहीं कल्पना होगी 

ये परिणाम कभी होंगे अनहोने 

इन्हें हुए बेअसर सूर के पद

या तुलसी की चौपाई 

अथवा प्रेमदीवानी मीरा ने 

जो थी रसधार बहाई

 इन्हें न समझा पाएगी 

 कबिरा की साखी, सबद, रमैनी


 :::::::::प्रस्तुति::::::

डॉ मनोज रस्तोगी

8,जीलाल स्ट्रीट

मुरादाबाद 244001

उत्तर प्रदेश, भारत

मोबाइल फोन नंबर 9456687822




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