शनिवार, 15 मई 2021

मुरादाबाद की संस्था राष्ट्रभाषा हिन्दी प्रचार समिति की ओर से 14 मई 2021 को ऑनलाइन काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। गोष्ठी में शामिल साहित्यकारों वीरेन्द्र सिंह ब्रजवासी,अशोक विश्नोई, डॉ पूनम बंसल , डॉ मनोज रस्तोगी,अशोक विद्रोही, मीनाक्षी ठाकुर, प्रीति चौधरी, रेखा रानी, कंचन लता पांडेय, डॉ रीता सिंह, हेमा तिवारी भट्ट, शिशुपाल "मधुकर ", रचना शास्त्री, राम सिंह 'निशंक', राम किशोर वर्मा, के पी सिंह 'सरल', शुचि शर्मा ‌, चन्द्र कला भागीरथी, प्रशान्त मिश्र, प्रवीण राही, राजीव प्रखर, रामेश्वर प्रसाद वशिष्ठ और योगेन्द्र पाल सिंह विश्नोई की रचनाएं ------


मौतसे जीवन बचाने का समय है,

जिंदगी को गुनगुनाने का समय है,
कब तलक  एकांत  में  बैठे  रहेंगे,
हुनरकोभीआज़मानेका समय है।
            
नोचकर मायूसियों  के पंख  फैकें,
हौसलों की भी उड़ानों को न रोकें,
व्याधियां नव रूप ले आती  रहेंगी,
कहाँतक इनका भयंकर,रूप देखें,
उठो, इनको मात देनेका समय है।

एकता की डोरको अक्षुण्य रखना,
सदा अंतरात्मा  को  पुण्य  रखना,
कोरोना कीअग्नि मेंजलते हुए को,
सहायतादेकरस्वयंकोधन्य रखना,
सांसमेंअबआस भरनेका समय है,

वैश्विक बीमारियों  का  दंश  झेला,
बड़ीमाता,प्लेग सा भयभीत  रेला,
समयके आगे ठहरपाया नहींकुछ,
रहगया बनकर समयकाएकखेला,
बुद्धि क्षमताआजमानेका समयहै।

कहर कोरोना ने बरपाया हुआ  है,
मौतबनकर हरतरफ छायाहुआ है,
करोड़ोंकी जिंदगी को लीलकरभी,
नित बदलकररूप इतरायाहुआ है,
सभीको टीका लगानेका समय है।

क्याबिगाड़ेगा हमारा हम गजब हैं,
मास्क,दूरी,हाथ  धोने में अजब हैं,
यह डरे  हमसे न हम इससे  डरेंगे,
प्रणहमारा कोरोनापर हीसितब है,
हारकर भी जीतजानेका समय है।
मौत से जीवन-----------------
           
✍️ वीरेन्द्र सिंह ब्रजवासी, मुरादाबाद/उ,प्र, मोबाइल फोन नम्बर 9719275453
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भारतीय,भावुक नागरिक ने
नव- निर्वाचित नेता
को बधाई
देने का विचार बनाया,
उसने फोन घुमाया ,
नेता जी बोले
कौन है भाई
नागरिक ने उत्तर
दिये बिना ही
पश्न किया,
आप कहाँ से बोल रहे हैं
श्री मान
नेता जी
जो अभी तक
अभिमान के आवरण से
मुक्त नहीं हो पाये थे,
झुँझलाकर बोले,
जहन्नुम से-
नागरिक ने उत्तर दिया
मैं भी, यहीं सोच रहा था
कि
तुम जैसा नीच, कमीन, बेईमान
स्वर्ग में तो जा ही नहीं सकता ।।

✍️ अशोक विश्नोई, मुरादाबाद
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आस है विश्वास है ये अब न दुख की रात हो
मुस्कुराएं सब दिशाएं फिर सुनहरा प्रातः हो

छा रहा है घोर तम ये खो गई है चाँदनी
वेदना के साज पर है सिसकियों की रागनी
कष्ट के बादल छँटे फिर नेह की बरसात हो
मुस्कुराएं सब दिशाएं.....

हैं घिरे अवसाद में सब ढूँढ़ते हैं ताज़गी
रूठती ही जा रही है प्राण वायू ज़िंदगी
योग से साँसें सँवारें नव सृजन की बात हो
मुस्कुराएं सब दिशाएं.....

सूखती जाती नदी ये आँख से जो बह रही
मानवी भूलें करीं जो वो सजा है सह रही
एक शिव का आसरा बस ईश कृपा प्रपात हो
मुस्कुराएं सब दिशाएं.....

जीत जाएंगे समर ये हाथ में ले हाथ हम
कोशिशे होंगी सफल अब चल पड़े हैं साथ हम
खिलखिलाकर फिर खिलेंगे प्रीत का जलजात हो
मुस्कुराएं सब दिशाएं फिर सुनहरा प्रातः हो

✍️ डॉ पूनम बंसल ,10.गोकुल विहार , कांठ रोड, मुरादाबाद उ प्र
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स्वस्थ भारत का निर्माण
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चकाचक सफेद कमीज पहने
काली टोपी लगाए
लघु पुस्तिकाओं से भरा झोला
कंधे पर लटकाए
हमारे एक राष्ट्रवादी मित्र
सुबह ही सुबह
बिना हमें बताएं
घर पर पधार गए
कोरोना काल में उन्हें देखकर
हम सब अचकचा गए
जब तक हम कुछ समझ पाते
उनके स्वागत में कुछ कह पाते
सोफे पर पसरते हुए
उन्होंने हमारी पत्नी को
हाथ जोड़कर की नमस्ते
बोले गुजर रहा था इस रस्ते
सोचा आप सब से मिलता चलूं
राष्ट्रहित पर चिंतन करता चलूं
हमने कहा - भाई साहब                    
आजकल हम बहुत तनाव में हैं
अगले हफ्ते पंचायत चुनाव हैं
शहरों के साथ-साथ गांव में भी
कोरोना पैर पसार रहा है
हर रोज बढ़ती जा रही है
पीड़ितों की संख्या
बता यह अखबार रहा है
एक और मास्क न पहनने पर
कट रहे चालान हैं
कैसे करेंगे चुनाव ड्यूटी
यह सोचकर हम हलकान हैं
कैसे हो पाएगी दो गज की दूरी
गांव में कैसे कट पाएगी रात पूरी
सुनकर हमारी बात
दार्शनिक अंदाज में उन्होंने
हमें समझाया
राष्ट्रहित का वास्तविक अर्थ
हमें बताया
पंचायत चुनाव
सत्ता का विकेंद्रीयकरण है
हर राजनीतिक पार्टी में
हर्ष का वातावरण है
लोकतंत्र की रक्षा हेतु
चुनाव करना -कराना
हम सबकी जिम्मेदारी है
हमने कहा - भाई साहब
चुनाव पर यह आपदा तो भारी है
मौतों का सिलसिला लगातार जारी है
अस्पतालों में बेड नहीं हैं
ऑक्सीजन की मारामारी है
चाय का घूंट पीते हुए
चेहरे पर मुस्कान लाते हुए
वह बोले
चुनाव का मामला
राष्ट्रहित से जुड़ा हुआ है
और राष्ट्र के हित में
अपने प्राणों की चिंता न करना
हम सबकी जिम्मेदारी है
रही बात इस वायरस की
यह कम इम्युनिटी वालों को ही
पकड़ता है
गंभीर रोग वालों को ही
जकड़ता है
यह शरीर तो नश्वर है
हमारी रक्षा करने वाला ईश्वर है
मौतों की खबरों से
बिल्कुल मत घबराइए
तनाव से पूरी तरह मुक्त हो जाइए
सकारात्मक सोच के साथ
राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाइये
जाते-जाते वह जता गए
धीरे-धीरे हम
सुनहरे कल की ओर बढ़ रहे हैं
सशक्त भारत , स्वस्थ भारत
का निर्माण कर रहे हैं

✍️ डॉ मनोज रस्तोगी,मुरादाबाद
Sahityikmoradabad.blogspot.com
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जब सुबह हुई तो चाय लिये,
         उसका चेहरा था मुसकाया।
फिर सजा नाश्ता था लजीज़,
          मैंने उसको हंसता पाया।।
खाने की टेबल पर देखा,
            उसके सब ढंग निराले थे।
व्यंजन थे सारे स्वाद भरे,
            खुशबू से भरे निवाले थे।‌।
फिर रात शाम के खाने पर,
           कुछ मीठा निश्चित रहता था।
जादू था उसके हाथों में,
           उसका हर व्यंजन कहता था।।

जब जाऊं मैं घर से बाहर,
           वह झट रुमाल दे देती थी।
उसकी हर अदा निराली थी,
       कितने कमाल कर लेती थी।।
वह अक्सर मुझे अभावों में,
         आश्चर्यचकित कर देती थी।
अपने उस गुप्त खजाने से,
        जब पैसे मुझको देती थी।।
,,मेरे हैं वापस कर देना !,सुन ,
        सच्चा मुझको लगता था।
खाली मुट्ठी यूं भर देना तब,
        अच्छा मुझको लगता था।।

मेरे अन्तर के सारे ग़म वो,
           पल भर में हर लेती थी।
नूतन ऊर्जा उत्साह जगा ,
       मन आनंदित कर देती थी।।
उसके संग हंसी ठिठोली में,
कुछ समय का पहिया तेज चला।
संग कितने ही मधुमास जिये,
     जीवन का भी न पता चला।।
खो जाना उसकी यादो में ,
          रंग भरने जैसा लगता है।
उसका हंसना ,बातें करना ,
      अब सपने जैसा लगता है।।

उसके संग ही अपना वजूद,
      मैं मोक्षधाम पर खो आया।
संग यादों की बारात चली,
   उसको अन्तिम पल रो आया।।
अब निशदिन ही बरसातें हैं,
         जीवन की काली रातें हैं।।
तुम रहो प्रभु संग स्वर्ग लोक,
           हम पीछे पीछे आते हैं।।
इस क्षण भंगुर सी दुनिया में,
        कोई सोता है या जगता है।
है अपना जग में कोई नहीं
        बस  अपने जैसा लगता है।।

उसकी यादों में अक्सर अब,
          मैं रातों को जग जाता हूं ।
नींदें गुम नैना नीर भरे,
          और भीग भीग मैं जाता हूं।
उसकी भलमनसाहत मन से मैं,
          कितना ही रोज भुलाता हूं।
उसका भोला सुंदर चेहरा,
       पर भूल नहीं मैं पाता हूं।।
प्रभु तेरा माया जाल मुझे,
          नाना रूपों से ठगता है।
मैं जितना भी सुलझाता हूं,
          उलझाने फिर से लगता है।।

पर निश्चित ही यह तो होगा,
          यह आज नहीं तो कल होगा।
हम नहीं तो अपने बच्चों का,
         निश्चित प्रयास सफल होगा।
भारत ही क्या पूरे जग से
         कोरोना    मार   भगाएंगे।।
प्रिय अपना बंधन एक नहीं,
         हम सातों जन्म निभायेंगे।
ये घोर निराशा का कोहरा,
        अब छंटने वाला लगता है।।
फिर से कौतुक उस ईश्वर का,
         हो जाने वाला लगता है।।

✍️ अशोक विद्रोही ,412 प्रकाश नगर, मुरादाबाद
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चीर कर धरती का सीना ,आता है अंकुर नया,
जीव जीवन पा नया ,बढ़ता नये पथ पर सदा।

मौत से हारे नहीं जो, नाम उसका ज़िंदगी
देख लेना!! मौत को भी मार कर देगी सुला।

रख भरोसा ईश पर,मुमकिन बना हर काज को,
बंजरो में आस का , पौधा कोई फिर से उगा।

हाथ पर हम हाथ धर ,हिम्मत नहीं यूँ हारते,
भारती के लाल हम,सीखा सदा ही जीतना।

आएगी उजली सहर ,हर ओर होगी रोशनी
दूर होगा हर अँधेरा, दीप तो दिल से जला।

✍️ मीनाक्षी ठाकुर, मिलन विहार, मुरादाबाद
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जब बिन देखे हम चलते हैं
तब ही यारों हम गिरते हैं  ।।1।।

ताज्जुब उठते है मुश्किल से
गलती फिर भी हम करते हैं ।।2।।

इस कारण से ही तो हम तुम
कितने दुख नित दिन सहते हैं ।।3।।

उस पीडा का ही जीवन भर
दिल पर बोझा हम रखते हैं ।।4।।

आओ विपदा जो सब हरते
पेड़ो से धरती भरते हैं  ।।5।।

✍️ प्रीति चौधरी, गजरौला,अमरोहा
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एक पहल मुझको है करनी।
एक पहल तुमको है करनी।।
अपने बेहतर कल की खातिर।
सुखमय सुंदर पल की खातिर।

शुद्धिकरण अब करना होगा,
हवन-यज्ञ भी करना होगा।
प्राणवायु की वृद्धि हेतु नित
पौधारोपण अब करना होगा।
तन-मन स्वस्थ रहे इस खातिर
योगासन, ध्यान करना होगा।
जुड़े रहें वेद परम्परा से हम,
ग्रंथों को पढ़ना-गुनना होगा।
गीतों में बसी प्राचीन परम्परा,
फिर से हमको जीवित करनी।
एक पहल मुझको है करनी,
एक पहल तुमको है करनी।

नीम-पीपल संरक्षण की खातिर,
फिर अभियान चलाना होगा।
रिश्तों में दादी-नानी, काकी को
फिर से शामिल करना होगा।
अपने प्यारे मीठे वचनों से,
उर जमी धूल धोनी होगी।
रिश्तों की टूटी बिखरी माला ,
शुभ 'रेखा' हमें पिरोनी होगी।
अब टूटी हुई कड़ी है भरनी।
एक पहल हमको है करनी।।
  
✍️ रेखा रानी, गजरौला, अमरोहा (उ.प्र.)
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पतझड़ बाद बसन्त की ,
है प्रकृति की रीत !
मन का हो बसन्त ,
तो कुछ बात बने !!
जिधर नज़र जाए ,
मुस्कायें रंग बिरंगे फ़ूल !
होठों पर भी हो मुस्कान ,
तो कुछ बात बने !!
पतझड़ •••••••••
फूलों पर तितली भँवरों को ,
देखके ज्यों हरसायें !
एक दूजे को देख हों हर्षित ,
तो कुछ बात बने !!
पतझड़ ••••••••••
चिड़ियाँ तोते मोर नाचते ,
जो सुकून दे जायें !
वो सुकून हर दिन टिक जाए ,
तो कुछ बात बने !!
पतझड़ ••••••••••
सूरज की स्वर्णिम किरणें !
जो नित्य सवेरा लायें ,
यूँ ही सब “कंचन” हो जाए ,
तो कुछ बात बने !!
पतझड़ •••••••••

✍️ कंचन लता पांडेय,आगरा
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सरस सलिल सा बहता जीवन
अवरोधों संग बढ़ता जीवन
निशा - दिवस है रहता गतिमय
हँसते - गाते चलता जीवन ।

दुख के पल भी सहता जीवन
सुख के क्षण भी जीता जीवन
जिन्दगी की नियत डगर पर
अगणित सपनें गढ़ता जीवन ।

कभी सदी सा बनता जीवन
कभी घड़ी में घटता जीवन
संग समय के अपने सारे
मानक निश्चित करता जीवन ।

आशा में है पलता जीवन
अहसासों में गहता जीवन
मोह - निर्मोह का भेद खोजता
बना धरा पर रहता जीवन ।

फूलों में है खिलता जीवन
कांटों को है सहता जीवन
महक - चुभन जो भी मिल जाये
संग सभी के निभता जीवन ।

कभी झूठ से लड़ता जीवन
कभी सत्य पर अड़ता जीवन
ऐसे जाने कितने रण में
जीत सदा है लिखता जीवन ।

✍️ डॉ रीता सिंह, मुरादाबाद
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जितना मैंने पढ़ा,
जितना मैंने सुना,
डर फैलता गया,
आँखों के कोने कोने में,....
मुझे साक्षात दिखने लगी
पड़ोस में रहने आयी मौत.....
उसके नाखून भयानक थे,
हर पल मंडराने लगे
उसके नाखून
मेरे सिर पर......।
मौत के लक्षण
उतर आये
मेरे शरीर में।
प्राणवायु सूखने लगी....
और मैं जुट गयी इंसान होने के नाते
अपनी जान बचाने की होड़ में...
इसी होड़ा होड़ी के दरमियान
मैंने अचानक ध्यान दिया....
बेजुबानों पर.......
हमारा पालतू 'जैरी' निडर था
और मस्त भी....
छत पर आने वाली चिड़िया भी
दहशत में नहीं दिखी....
दाना लेने आयी गिल्लू भी
बेफिक्र थी....
उसने देखा मुझे मुड़कर
बार बार हमेशा की तरह....
जितना मैंने देखा...….
अपने आस पास....
ज़िन्दगी गुनगुनाती मिली....
चढ़ते सूरज की किरणों में,
सरसराते पत्तों में
मम्मी जी की आरती में।
दूध वाले,अखबार वाले,
सब्जी वाले,कूड़े वाले,
और ये गली में खेलते बच्चे,
सब ही तो ज़िन्दगी से भरे हुए थे।
अब नहीं दिख रही थी
मुझे मौत पड़ोसन सी...
और अब वे नाखून भी
गायब हो रहे हैं यकायक....
क्योंकि मैंने बंद कर दिया है
आभासी पढ़ना और सुनना
मैं अब पास पड़ोस का
सच देखने लगी हूँ...
जानने लगी हूँ....
मौत तो एक चारपाई है
जब कोई थक जाता है,
उस पर जाकर लेट जाता है।
लेकिन ज़िन्दगी मेहमान है,
उसे होंसलों के सोफे पर बैठाना होगा,
उम्मीद की मीठी चाय पिलानी होगी।
मेहमान का स्वागत सत्कार करना होगा,
क्योंकि 'अतिथि देवो भव' के
संस्कार है हमारे...
तब तक मौत की खटिया
खड़ी करनी ही होगी,
क्यों न शुरुआत हम सब
अपने दिमाग के दालान से करें....

✍️ हेमा तिवारी भट्ट, मुरादाबाद
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आ गया दहशत भरा कैसा ज़माना ।
लोग भूले जा रहे हैं मुस्कराना  ।।

कोई  जीवन में यहां विष भर रहा है ,
कोई जीते जी यहां पर मर रहा है ,
हो रही अनहोनियों की बात सुनकर
हर मनुज अब दिल के अंदर डर रहा है ।

कल की चिंता से दुखी होकर सभी अब
दर्द  का ही    गा  रहे  हैं    सब   तराना ।।

हर तरफ़   फैली      विषैली हैं    हवाएं ,
किस तरह हम गीत मन का गुनगुनाएं ,
वेदनाओं से  भरा   हर आदमी अब
फिर किसे जाकर व्यथा अपनी सुनाएं ।
वेदनाओं के समुंदर की सुनामी
जाने कितनों को बनाएंगी निशाना ।।

है भरोसा रोक लेंगे हम तबाही ,
दे रहा इतिहास भी हमको गवाही,
लौट कर आयेंगे फिर से दिन सुहाने
हैं निराशा को यहां आना मनाही ।
सब करें सम्मान यदि इंसानियत का
और सब सीखें यहां रिश्ते निभाना ।।

✍️ शिशुपाल "मधुकर ", C- 101, हनुमान नगर, लाइ पार, मुरादाबाद
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है नहीं कोई भवितव्य हमारा
हम हैं नदी की धार में तिरते दिये।

धर बाती अधिकार की जब
चाहे कोई हमें जला दे बुझा दे।
लहर कोई अंचल की ओट ले सहेजे
या जब चाहे धार हमें डुबा दे।
है नहीं कोई मंतव्य हमारा
हम हैं किसी मँझधार में बहते दिये।

माटी के इस दिवले में
तुम प्राण अपने डाल के।
जला दो कहीं मंदिर में
या धर दो देहरी पे बाल के
है नहीं कोई गंतव्य हमारा
हम हैं किसी के द्वार पे जलते दिये।

साँझ ढलते ही जलाये गये
हम भोर होने तक जलते हैं ।
मुसाफिर आते जाते हैं यहाँ
रास्ते भला कब चलते हैं।
कि प्रतीक्षा ही ध्येय हमारा
हम हैं जले बेकार में बुझते दिये।
है नहीं कोई भवितव्य हमारा
हम हैं नदी की धार में तिरते दिये।

✍️ रचना शास्त्री, जनपद बिजनौर
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नए रास्ते मैं बनाने चला हूँ ।
कि गिरते हुओं को उठाने चला हूँ ।।

जो भटके हुए हैं अंधेरी गली में ।
उजाला उन्हें मैं दिखाने चला हूँ ।।

नहीं कोई छोटा न कोई बड़ा है ।
हैं सब अंश प्रभु के बताने चला हूँ ।।

बिना बात तो मुझसे जो रूठे हुए हैं ।
मैं कर जोड़ उनको मनाने चला हूँ ।।

जिन्होंने सदा ही हैं कांटे चुभोये ।
सुमन उनको लेकिन सुंघाने चला हूँ ।।

जो डस लेते हैं मौका पाते ही सबको ।
मैं पय पान उनको कराने चला हूँ ।।

अवज्ञा जो करते हैं माता-पिता की ।
मैं उनके लिए ही कमाने चला हूँ ।।

रोशनी से जिसकी है रोशन जमाना ।
उसे ही मैं दीपक दिखाने चला हूँ ।।

सदा मुझसे साधा जिन्होंने है मतलब ।
स्वयं को मैं उन पर मिटाने चला हूँ।।

✍️ राम सिंह 'निशंक', मुरादाबाद
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पतझड़- सा माहौल बना है, देखे हैं कितने बसंत ।
इससे क्या घबराना हमको, कलयुग का निकट है अंत ।।

कलयुग का मतलब है जिसमें, होंय अधिक मशीनी काम ।
गलत बात के अधिक समर्थक, सच पुकारे बस हे ! राम ।।
दुष्ट लोग जब मौज मनायें, परेशान होते हों संत ।
पतझड़- सा माहौल बना है, देखे हैं कितने बसंत ।।

जीत सका नहिं जब वह हमको, कायर  हरकत कर डाली ।
कोरोना को छोड़ा जग में, सबका बनने को माली ।।
जैविक यह हथियार छोड़कर, खट्टे किये सबके दंत ।
पतझड़ -सा माहौल बना है,देखे हैं कितने बसंत ।।

अर्थ व्यवस्था चौपट है अब, जनता करती है त्राही ।
शिक्षा जैसे शून्य हो गयी, रोजगार है अब माही ।।
घर में सारे कैद हो गये, बाहर घूम रहा ज्यों हंत ।
पतझड़ -सा माहौल बना है, देखे हैं कितने बसंत ।।

बिखर गये थे जो भी रिश्ते, वह भी अब सब एक हुए ।
नदी-पवन सब शुद्ध हो गये, मन से मन का मिलन छुए ।।
मानव ने गलती स्वीकारी, क्षमा करो हमें हे! कंत ।
पतझड़-सा माहौल बना है, देखे हैं कितने बसंत ।।

विपदा हम पर बहुत बड़ी है, हमने हिम्मत नहिं हारी ।
*जीत जायेंगे हम* मान लो, वैक्सीन है संँग हमारी ।।
नवयुग का निर्माण करेंगे, सिंह, जेम्स,  जिया अरु पंत ।
पतझड़-सा माहौल बना है, देखे हैं कितने बसंत ।।

✍️ राम किशोर वर्मा, रामपुर (उ०प्र०)
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दुख के बादल छट
                जायेंगे!
ये विषाणु भी हट
                जायेंगे!!
धीरज रख तू हृदय
                   वावरे!
कष्ट सभी के मिट
                  जायेंगे !!
✍️के पी सिंह 'सरल',  मुरादाबाद
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खिलेंगी  आस  की  कलियां
अलि     फिर     गुनगुनायेंगे,
विश्वास रख हम जीत जायेंगे।

तय  अमावस   बाद  पूनम
का    उजाला,
सूर्य रश्मि मेट देती है सघन
अंधियारा काला,
मन के  मंदिर  दीप फिर
से जगमगाएंगे,
विश्वास रख........।

अंत    करना   है   विषाणु 
रोग   का,
हो  सुपथ  संयम नियम  व
योग  का,
आत्मशक्ति से जिजीविषा
को   बढ़ायेंगे ,
विश्वास  रख .........।

नीति प्रशासन वैद्य जन
की बात सुन,
हो भले किंचित कठिन, पर
लक्ष्य की धुन,
नव  सृजन  के   स्वप्न  सब
आकार पायेंगे,
विश्वास रख........।

हो  सुरक्षित  कर्म  चिंता
छोड़,  चिंतन,
कर  हृदय  में  ईश  का
विश्वास वर्धन,
आ  स्वयं   उंगली   पे
गोवर्धन उठायेंगे,
विश्वास रख........।

है सुनिश्चित हर अति का
अंत   होवे ,
संकेत प्रकृति का मनुज
अब संत  होवे ,
संशय नहीं कल्याण की
बस राह  पायेंगे
विश्वास रख ......।।
                
✍️ शुचि शर्मा ‌, शेरकोट, जनपद बिजनौर
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कैसी भी आपदा आये।
संभलना आता है हमको।
इन विषंम परिस्थितियों से।
निकलना आता है हमको।
क्योंकि भारत वासी हैं हम।
और जीत जायेगें हम।।

ये जो भारत हमारा है।
ये देवो की भूमि हैं।
अपनी संस्कृति को अपनायेंगे।
अपने वेद पुराणों को पढगे।
ईश्वर की दी हुई अमुल्य निधि।
प्रकृति को सुरक्षित रखेगें हम।
क्योंकि भारत वासी हैं हम।
और जीत जायेगे हम।।

भारत में एक से एक बिमारी आई।
प्रकृति से हमने अनेको औषधि पाई।
आयुर्वेद का सत्कार करेगें हम।
घरेलू उपचारों को अपनायेंगे हम।
क्योंकि भारत वासी हैं हम।
और जीत जायेगें हम।

✍️ चन्द्र कला भागीरथी, धामपुर ,जिला बिजनौर
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स्कूल में सभी के रंग एक थे
लंच में किसी के पराठे,
किसी में मैगी
किसी में रखे सेब थे
पर न जाने कौन
सिर पर टोपी और
माथे पर तिलक लगा जाता है
दोस्तों को हिन्दू
मुझे मुसलमान बता जाता है

✍️-प्रशान्त मिश्र
राम गंगा विहार, मुरादाबाद
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कोरोना की बीमारी में ये कैसी ईद आई है
गले मिलना तो बातें दूर की,दूरी बनाई है

लगा है लॉकडाउन कौन अब खाने को आएगा
सेवैया खीर से किसके लिए टेबल सजाई है

✍️प्रवीण राही, मुरादाबाद
संपर्क सूत्र 8860213526








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