शनिवार, 30 मई 2020

मुरादाबाद के साहित्यकार अंकित गुप्ता "अंक" की दस ग़ज़लें और उन पर मुरादाबाद लिटरेरी क्लब द्वारा ऑनलाइन साहित्यिक चर्चा ----


वाट्स एप पर संचालित साहित्यिक ग्रुप  'मुरादाबाद लिटरेरी क्लब' माध्यम से 28/29 मई 2020 को ऑनलाइन साहित्यिक चर्चा की गई जिसमें 'एक दिन एक साहित्यकार' की श्रृंखला के अन्तर्गत युवा साहित्यकार अंकित गुप्ता "अंक"  की गजलों पर स्थानीय साहित्यकारों ने  विचारों का आदान प्रदान किया। सबसे पहले अंकित गुप्ता "अंक" द्वारा निम्न दस ग़ज़लें पटल पर प्रस्तुत की गयीं
*(1)*
किसी को इश्क़ में हासिल हुआ है क्या
मगर इसके बिना जग में रखा है क्या

हक़ीक़त में तुम्हें पाना है नामुमकिन
तो सपने देखना भी अब ख़ता है क्या

हर इक शै में तो तुम भी हो नहीं सकते
मुझे इस बात का धोखा हुआ है क्या

सवेरे से बहुत बेजान सी है धूप
उदासी आपकी इसको पता है क्या

बहुत मुद्दत से ख़ुद को ढूँढता हूँ मैं
तुम्हें मुझसा कहीं कोई मिला है क्या

मिरे बारे में दुनिया कुछ कहे लेकिन
मिरा अच्छा-बुरा तुमसे छुपा है क्या

तनावों के हैं दिन, तन्हाइयों की रात
नई तहज़ीब में इसके सिवा है क्या

*(2)*
फूल,  ख़ुशबू, तितलियाँ,  बादे-सबा कुछ भी नहीं
आपके बिन ज़िंदगी में अब बचा कुछ भी नहीं

कर लिया ऐसे मुक़य्यद ख़ुद को उसके प्यार में
सोचकर उसको मुझे अब सोचना कुछ भी नहीं

मौत आए तो ज़रा आज़ादियों की रह खुले
ज़िंदगी तो क़ैदख़ाने के सिवा कुछ भी नहीं

आपके जाने से दिल का गाँव वीरां हो गया
यों जला कुछ भी नहीं लेकिन बचा कुछ भी नहीं

इक हवा ज़ुल्फ़े-परीशां आपकी सुलझा गई
आप धोखे में हैं मैंने तो किया कुछ भी नहीं

आँख बंद करता हूँ तो दिखती नहीं नाकामियाँ
जाग जाने से बड़ी अब बददुआ कुछ भी नहीं

*(3)*
ये  जो  तुझसे  दूर  हूँ  मैं
थोड़ा-सा  मजबूर  हूँ  मैं

सुब्ह, ज़रा-सा सब्र तो कर
ख़ाब में उनके चूर हूँ मैं

तेरी नज़र में कुछ न सही
अपनी नज़र में तूर हूँ मैं

बज़्मे-रक़ीब में मेरा ज़िक्र
क्या इतना मशहूर हूँ मैं

मैं हालात का  मारा  हूँ
तुमको लगा मग़रूर हूँ मैं

रोज़ मिलूँ नींदों के पार
फिर तुझसे कब दूर हूँ मैं

अंदर आँसू का सैलाब
बाहर से मसरूर हूँ मैं

*(4)*
यूँ भी सफ़र का लुत्फ़ उठाया जा सकता है
हर मंज़िल को राह बनाया जा सकता है

तुमसे दिल का रोग लगाया जा सकता है
मन को ऐसे भी बहलाया जा सकता है

आओ, बैठें, बात करें, रिश्ते सुलझाएँ
चुप्पी से बस बैर बढ़ाया जा सकता है

माना हमसे खुलकर मिलना है अब मुश्किल
पलकोंं के उस पार तो आया जा सकता है

देखूँ हूँ जब तुमको अकसर सोचूँ हूँ मैं
क्या ऐसा गौहर भी बनाया जा सकता है

फिर से ये अरमां जागे हैं तुमसे मिलकर
फिर से कोई ख़ाब सजाया जा सकता है

जब हम ही आधी कोशिश करके हारे तो
क़िस्मत पर क्या दोष लगाया जा सकता है

*(5)*
मेरा बिगड़ा हुआ हर काम बना करता है
कोई तो है जो मेरे हक़ में दुआ करता है

झिड़कियाँ बाप की और माँ का दुलारा करना
ये वो सरमाया है जो कुछ को मिला करता है

मुझे तन्हाइयों की धूप का डर कुछ भी नहीं
तेरी यादों का शजर साथ चला करता है

कब टिकता है बुरा वक़्त ज़ियादा दिन तक
सूखे पेड़ों को कोई फिर से हरा करता है

ये तो है अश्क छुपाने का तरीक़ा वर्ना
कौन इस दौरे-परेशां में हँसा करता है

ज़िंदगी किसके चले जाने से रूकती है यहाँ
हर एक  रात ये बाज़ार सजा करता है

*(6)*
उन्हें हर बात मेरी भा रही है
ख़ुदाई नेअमतें बरसा रही है

वो अब जो देखता है मुस्कुरा कर
मुझे उम्मीद बँधती जा रही है

भरे बाज़ार के इन क़हक़हों में
'ख़मोशी उँगलियाँ चटख़ा रही है'

दिखे हुब्बुल-वतन पर भी सियासत
ये 'आज़ादी' कहाँ ले जा रही है

चला है ज़िक्र महफ़िल में मेरा और
तेरे चेहरे पे' रंगत आ रही है

तुझे नफ़रत है मुझसे मान तो लूँ
तेरी सूरत तुझे झुठला रही है

मैं वो हिन्दोस्तां हूँ ठीक से देख
रवादारी मेरा विरसा रही है

ज़रा पेचीदगी रख शख़्सियत में
ये आसानी मुझे उलझा रही है

*(7)*
दुख से यारी कर लो तुम
जीवन भारी कर लो तुम

मर्द से आगे वो निकली
फ़तवे जारी कर लो तुम

मन है चंचल, भटकेगा
पहरेदारी  कर लो तुम

सच से, वफ़ा से तुमको क्या
'दुनियादारी' कर  लो  तुम

होगा जल्द हिसाबे-ज़ुल्म
बस तैयारी कर लो तुम

'अंक' लगाके प्यार का रोग
रातें भारी कर लो तुम

*(8)*
रूह की तह को छुए,  दिल की ज़ुबां तक पहुँचे
ऐसा कोई तो हो जो दर्दे-निहां तक पहुँचे

बस ज़रा वक़्त ही में सुब्ह हुई जाती है
पंछी धूप के पैरों के निशां तक पहुँचे

मैं तो बैठा हूँ मज़ारों पे' वफ़ा की अब तक
ज़रा अपनी भी कहो आप कहाँ तक पहुँचे

तेरे जीवन में ख़ुदा इतनी मसर्रत भर दे
कभी उसमें न मेरी आहो-फ़ुग़ां  तक पहुँचे

अहले उल्फ़त तो इशारों को समझ लेते हैं
क्या ज़रूरी है जो दिल में है ज़ुबां तक पहुँचे

हमने भर दी है बहरहाल मुहब्बत में उड़ां
देखिए नन्हा परिन्दा ये कहाँ तक पहुँचे

सोचती रहती है हर दौर की ग़ज़लों की शुआअ
किस तरह 'मीर' के उस ऊँचे मकां तक पहुँचे

*(9)*
ख़ुद ही को इस तरह से सज़ा दे रहा हूँ मैं
दुश्मन को ज़िंदगी की दुआ  दे रहा हूँ मैं

अबकी न होगी चूक मेरे क़त्ल में कोई
क़ातिल को फिर से घर का पता दे रहा हूँ मैं

मिलने की चाह में तुम्हें रुसवाई का है डर
आओ के आफ़ताब बुझा दे रहा हूँ मैं

यादों की गर्द ओढ़ के राहों में इश्क़ की
तुझ संग बीते पल को सदा दे रहा हूँ मैं

पहलूए- मौत जिस्म ज़रा चैन से रहे
लो, ज़िंदगी की छाँव बिछा दे रहा हूँ मैं

तेरी अना की रात मिटाने के वास्ते
फिर-फिर वफ़ा के दीप जला दे रहा हूँ मैं

*(10)*
ज़रा ज़िंदगी का नज़रिया बदलिए
कभी तो किताबों से बाहर निकलिए

मज़ा लीजिए ज़िंदगी का मुसलसल
अना भूलकर बारिशों में टहलिए

मोहब्बत की राहें बड़ी आत्शी  हैं
सँभलिए, सँभलिए, सँभलिए, सँभलिए

ये दिल आपका शर्तिया होगा रौशन
कभी शम्अ की सम्त इक बार जलिए

रिवायत की बेड़ी न रस्मों के बंधन
मैं पगली पवन हूँ मेरे साथ चलिए

यहाँ अब भी रुककर अदब का चलन है
दयारे-ग़ज़ल से ठहर कर निकलिए

जवानी की रुत तो सँभलने की रुत है
ये किसने कहा है इसी में फिसलिए।
      अंकित की इन ग़ज़लों पर विचार व्यक्त करते हुए प्रख्यात साहित्यकार यशभारती माहेश्वर तिवारी ने कहा कि "अंकित ने गीत, दोहे, ग़ज़लें आदि सभी रूपों में लिखा है। उनमें अपने समकाल की आहटों को बुनने की कोशिश की है।"
     विख्यात व्यंग कवि डॉ मक्खन मुरादाबादी ने कहा कि "अंक की ग़ज़लों में कथ्य मज़बूत है। अंक में रचनात्मकता भरी हुई है तथा क्षमताओं की भी कोई कमी नहीं है"।
     वरिष्ठ कवि डॉ अजय अनुपम ने कहा कि "अंकित की ग़ज़लों में कहने का सलीका भी है और कहन के साथ प्रकृति से मनुष्य का भावात्मक रिश्ता जोड़ने की सफल कोशिश भी है।"
      मशहूर शायरा डॉ मीना नकवी ने कहा कि "अंकित ने कम उम्र में ही साहित्य के बड़े कैनवास पर शब्दों के मनभावन रंगों से ग़ज़ल के इंद्रधनुषी चित्र अंकित किए हैं"।
      वरिष्ठ कवि शिशुपाल मधुकर ने कहा कि "अंकित के कथ्य में जहां नयापन है वहीं उनका शिल्प भी काफी मजबूत है"।
      नवगीत कवि योगेंद्र वर्मा व्योम ने कहा कि "यहां प्रस्तुत अंकित की ग़ज़लें परंपरागत मिज़ाज की ग़ज़लें हैं। उनकी ग़ज़लों में इश्क़ और महबूब की बात बहुत सलीक़े से कही गई है।"
     वरिष्ठ कवि डॉ मनोज रस्तोगी ने कहा कि "प्रस्तुत ग़ज़लों से ऐसा लगता है कि अंकित गुप्ता अंक स्वयं को एक ग़ज़लकार के रूप में स्थापित करना चाहते हैं"।
      युवा शायर राहुल शर्मा ने कहा कि "प्रतीकों बिंबो उपमानों को नए तरीके से प्रस्तुत करना अंकित की वह खूबी है जो बड़े शायरों में भी ढलती उम्र में ही दिखाई देनी शुरू होती है"।
     युवा कवि राजीव प्रखर ने कहा कि "अंकित गुप्ता अंक की ग़ज़लें कहीं न कहीं अंतर्मन को स्पर्श अवश्य करती हैं और उनका उत्कृष्ट व्यक्तित्व उनकी रचनाओं में भी झलकता है।"
    युवा शायर फरहत अली खान ने कहा कि "अंकित में असीमित इमकानात मौजूद हैं खासकर इसलिए क्योंकि वह एक बढ़िया लर्नर और बहुत संजीदा क़ारी हैं"।
    युवा कवि मयंक शर्मा ने कहा कि "अंकित जी की ग़ज़लों में कहन प्रभावी है। कई शेर स्तरीय हैं और लगता है कि अंकित जी के कदम सही राह पर हैं"।
    युवा कवियत्री हेमा तिवारी भट्ट ने कहा कि "यहां प्रेषित सभी ग़ज़लें अंकित जी के अध्ययन को प्रमाणित करती हैं। कुल मिलाकर अंकित अंक एक संभावनाशील और प्रेरक रचनाकार हैं"।
     ग्रुप एडमिन और संचालक शायर ज़िया ज़मीर ने कहा कि "नौजवान शायर होने के बावजूद अंकित का इश्क़ बड़ा ठहराव लिए हुए है। यह उसकी शख्सियत का हिस्सा है। वो जिंदगी और शायरी दोनों में बहुत शालीन है।"

::::::::प्रस्तुति::::::

✍️  ज़िया ज़मीर
ग्रुप एडमिन
मुरादाबाद लिटरेरी क्लब
मोबाइल- 8755681225

10 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. अगर आपने अभी तक इस ब्लॉग को फॉलो नहीं किया है तो तुरंत इस ब्लॉग को फॉलो भी कीजिये । इसके लिए ब्लॉग के दाहिने ओर फॉलोवर्स में फोटोज के नीचे नीले रंग से लिखे फॉलो पर क्लिक कीजिए ,एक पेज खुलेगा इस पर नारंगी रंग से लिखे फॉलो पर क्लिक कर दीजिए ।

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  2. बहुत खूबसूरत़ । आपकी गजल में मसरूर हूँ मैं

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