गुरुवार, 30 अप्रैल 2020

मुरादाबाद की साहित्यकार राशि सिंह की कहानी ----बहुत याद आते हैं '



​पूरे बाइस साल बाद आलोक आज अपने गाँव में पहुंचा उसके दोनों बेटे भी उससे लंबे निकल चुके थे , और पत्नी शुभि के चेहरा भी अब भर गया था कभी कांटे सी दिखने वाली शुभि थुलथुल तो नहीं मगर शरीर भर गया था .
​आलोक की फ्रेंच कट दाढ़ी भी उसकी मैचुअरटी  को दर्शा रही थी साथ ही आँखों पर चढ़ा चश्मा गंभीरता को बढ़ाने में सक्षम था .
​गाँव में घुसते ही उसको लगा जैसे वह किसी दूसरे कस्बे में घुस गया हो सब कुछ बदल चुका था .
​कभी गाँव की कच्ची सड़क और उसके किनारे दूर तक फैले खेत और बाग बगीचे थे अब बे सब शायद आबादी की भेंट चढ़ चुके थे l
​सड़क किनारे बहुत सारी दुकानें बन चुकीं थीं l
​जो लोग उसके विदेश जाने के समय अच्छी कद काठी के थे बूढ़े हो चुके थे l
​बड़ी मुश्किल से वह अपने घर तक पहुंचा वहाँ जीर्ण हुए घर पर ताला लटक रहा था जोकि पिछली बार यानि कहा जाए बाइस साल पहले पिताजी के निधन के वक्त लगाया गया था , हाथ लगाते ही लटक गया .
​घर के भीतर  बड़े बड़े पेड़ डेरा डाल चुके थे जामुन और बेरी के पेड़ अभी भी खड़े थे जोकि बड़े प्यार से पिताजी ने लगाए थे शायद इसलिए भी अभी हरे थे क्योंकि उनको ज्यादा पानी की आवश्यकता नहीं थी .
​पेड़ पर पक्षियों के घौसले थे जिनमें से उनके बोलने और फड़फड़ाने की आवाज आ रही थी .
​"डैड ...यह है आपका घर ?"बड़े बेटे ने मुंह बनाते हुए कहा l
​"बेटा ऐसे नहीं बोलते यह इनका ही नहीं हम सबका घर है l"शुभि ने बेटे को समझाया क्योंकि वह आलोक के चेहरे की दुख भरी उभरी लकीरों को पढ़ चुकी थी .
​"हाँ बेटा ...यही है हमारा घर जहाँ मेरा बचपन बीता और माँ बाबूजी का जीवन , आज भी ऐसा लग रहा है जैसे कि घर के हर कोने से माँ बाबूजी की आवाजें आ रही हों ।
​पड़ोसियों ने कई बार आलोक से बात की थी घर बेचने की मगर उसने मना कर दिया क्योंकि यह घर उसके माँ बाप के लिए बहुत अजीज था ।
​उसको याद है जब वह पहली दफा नौकरी के सिलसिले में विदेश गया तो माँ ने स्पष्ट लहजे में कहा था ,
​"बेटा चाहे कितने भी अमीर बन जाना मगर इस घर यानि अपनी जड़ का सौदा मत करना , इस घर में मेरी डोली आई है अर्थी तो निकलेगी ही मेरे मरने के बाद मेरी आत्मा भी इसी में बसेगी l
​तब आलोक हंस दिया था मगर अगले ही वर्ष माँ दुनियाँ को अलविदा कह गयीं , बाबूजी से बहुत कहा अपने पास आने को मगर वह नहीं आए , उसी घर के आंगन में कई पेड़ लगा लिए थे , और क्यारियों में फुलवारी । खाना खाने के बाद अपना ज्यादातर समय इन्ही की देखरेख में बिताते थे ।
​मगर दो साल बाद ही उनका भी निधन हो गया वह बहुत रोया मगर होनी को कौन टाल सकता है। वह क्रिया कर्म करने के बाद विदेश वापस चला गया और वहीं पर भारतीय मूल के परिवार की शुभि से विवाह कर लिया .
​सब कुछ भूल चुका था या यूँ कहिए कभी भूला ही नहीं बस दुनियाँ को कभी एहसास ही नहीं होने दिया कि आज भी उसके दिल में उसका वही घर बसता है कच्चा पक्का जहाँ माँ और पिताजी के साथ बचपन बीता , घर का कोना कोना उसके मन में पेंठ बनाए बैठा था l
​जब भी कहीं गाँव की बात चलती वह चहक उठता उसकी इस आदत को शुभि ने शिद्दत से महसूस किया था .
​"सुनो जी आज मिसेज भाटिया कह रहीं थीं कि वह अगले महीने पंजाब जाएंगी अपने गाँव l"शुभि ने प्यार से आलोक की आँखों में देखते हुए कहा चाय पीता हुआ अचानक शुभि की ओर देखने लगा उसके चेहरे पर कई भाव आकर चले गए .
​फिर दोनों बच्चों के साथ अपने गाँव आने की तैयारी शुरू कर दी .
​"सुनिए !"
​"कहिए !"
​"अब हम यहां जल्दी जल्दी आया करेंगे , पिताजी और माँ जी के लिए वही हमारी सच्ची सेवा होगी , और उनकी आत्मा के साथ हमारे मन को भी खुशी होगी l"शुभि ने आलोक का हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा , और सभी फिर से मिलकर सफाई में लग गए , क्यारियों को फिर से ठीक किया गया और उनमें हरे हरे पौधे रौपे गए l
​जाते समय आलोक गाँव के माली से अपने छोटे से आंगन की क्यारियों की देखभाल करने को भी कह गया , क्योंकि अब ज्यादा दिनों तक वह अपनी मिट्टी से दूर रहने में असमर्थ जो हो गया था l


​ ✍️  राशि सिंह
​मुरादाबाद 244001
 उत्तर प्रदेश

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