गुरुवार, 19 मार्च 2020

मुरादाबाद के साहित्यकार डॉ कृष्ण कुमार नाज की नज़्म : ज़रूरत और मुहब्बत


मुहब्बत का यहां पर, अजब दस्तूर देखा
जिसे शिद्दत से चाहा, वही मग़रूर देखा

मचलती आरज़ूओ! ज़रा तो रहम खाओ
मेरे हालात पर यूं, ठहाके मत लगाओ
किसी से क्या करूं अब, कोई शिकवा-शिकायत
न छोड़ेगी कहीं का, मुझे मेरी शराफ़त
उफनती हसरतों को, बहुत मजबूर देखा
जिसे शिद्दत से चाहा, वही मग़रूर देखा

नज़ारा तो यहां का, बड़ा ही दिलनशीं है
खिले हैं फूल लाखों, मगर ख़ुशबू नहीं है
पता क्या था लबों से हंसी भी छीन लेगा
ये मौसम खुदग़रज़ है, ये रोने भी न देगा
सहारा था जो दिल का, उसी को दूर देखा
जिसे शिद्दत से चाहा, वही मग़रूर देखा

ख़यालों से मैं अपने, पुराना आदमी हूं
मुसलसल हूं सफ़र में, कोई बहती नदी हूं
कसे फ़िकरे किसी ने, किसी ने आज़माया
सफ़र की उलझनों ने, गले हंसकर लगाया
हर इक इंसां का चेहरा, यहां बेनूर देखा
जिसे शिद्दत से चाहा, वही मग़रूर देखा

तुम्हीं क्या इस जहां में, ग़ज़ब की है ये फ़ितरत
कि जब तक है ज़रूरत, तभी तक है मुहब्बत
रखे क्यों ध्यान कोई, किसी की तिश्नगी का
ये रेगिस्तान ठहरा, हुआ ये कब किसी का
खरोंचों में भी दिल की, छुपा नासूर देखा
जिसे शिद्दत से चाहा, वही मग़रूर देखा

**डॉ कृष्णकुमार 'नाज़'
मुरादाबाद  244001
उत्तर प्रदेश, भारत

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