शुक्रवार, 16 जुलाई 2021

मुरादाबाद मंडल के जनपद रामपुर निवासी साहित्यकार रवि प्रकाश का व्यंग्य -हम दो हमारे एक

     


लोगों ने "हम दो हमारा एक" की नीति को गंभीरता से नहीं लिया । खुद सरकार ने जो ड्राफ्ट बनाया तो उसमें उसे गरीबी के साथ जोड़ दिया गया । जैसे "हम दो हमारा एक" योजना की आवश्यकता केवल गरीबों को हो ! 

       यह बात सही है कि गरीब लोग खुद एक से ज्यादा बच्चे कैसे पालेंगे ? उनका तो एक बच्चा भी सरकार की सब्सिडी पर पलेगा और सरकार अपनी सब्सिडी से किसी के दस बच्चे पाले ,इसमें घाटा सरकार का ही है । इसलिए गरीबों के मामले में "हम दो हमारा एक" की नीति लागू करने में सरकार का दीर्घकालिक फायदा है । यह दूरंदेशी से भरी हुई नीति है । पता नहीं क्यों कुछ लोग इसका विरोध कर रहे हैं ? 

        जहां तक समृद्ध वर्ग का प्रश्न है ,उसको तो आंख मीच कर "हम दो हमारा एक" की नीति स्वीकार कर लेनी चाहिए । जितनी ज्यादा संपन्नता होगी ,उतना ही इस नीति को अपनाने से परिवार को लाभ पहुंचेगा। ज्यादातर परिवारों में जहां जमीन-जायदाद है, सिर-फुटव्वल इसी बात पर हो रही है कि किस भाई को कितना मिले ,किस बहन को कितना दिया जाए ? बड़े संपन्न घराने जमीन-जायदाद के बंटवारे को लेकर कोर्ट-कचहरी में उलझे हुए हैं । अगर "हम दो हमारा एक" की नीति पर वह लोग चले होते ,तो आज घरों में दीवारें खड़ी होने तथा अदालतों में चक्कर काटने की नौबत नहीं आती । क्या किया जाए ? जो गलती हो गई तो हो गई । अब दस बच्चे अगर परदादा ने परंपरा के अनुसार पैदा किए हुए हैं तो वह तो समस्या भुगतनी ही पड़ेगी । मगर आगे के लिए तो सीख ली जा सकती है ।

        पुराने जमाने में राजा महाराजाओं ने "हम दो हमारा एक" की नीति को अप्रत्यक्ष रूप से अपनाया था । अप्रत्यक्ष रूप से इसलिए कह रहा हूं कि उन्होंने अपने बड़े बेटे को रियासत का उत्तराधिकारी मान लिया। अब उसके बाद दस,बारह,पंद्रह जितने भी बच्चे होंगे ,वह सब उत्तराधिकार की लाइन से हट कर खड़े रहेंगे । इससे फायदा यह हुआ कि राजमहल दस टुकड़ों में बँटने से बच गया । अब रियासतें खत्म हो गईं और भूतपूर्व राजा - महाराजाओं की संपत्तियों को लेकर मुकदमेबाजी चल रही है । इन मुकदमेबाजियों के मूल में "हम दो हमारे अनेक" की गलती ही है । न एक से ज्यादा बच्चे होते ,न आपस में झगड़ते ,न अदालत में मुकदमे जाते और न राजमहल के बंटवारे होते ! 

               अब बेचारा एक राजमहल है । सौ कमरे हैं । दस उत्तराधिकारी हैं । अदालतों में सब चक्कर काट रहे हैं । किसी को दस साल हो गए ,किसी को बीस साल ,कोई पचास साल से तारीखों पर जा रहा है । अब अगर बँटवारा हो भी जाता है तो दस उत्तराधिकारियों में से हर एक के हिस्से में दस-दस कमरे आएंगे । दस कमरे तो फिर भी ठीक रहेंगे। लेकिन अब आप उन दस कमरों वालों के दस-दस उत्तराधिकारियों के बारे में सोचिए । उन्हें तो अपने हिस्से के राजमहल में फ्लेट बनाने की नौबत आ जाएगी।  साठ-सत्तर साल बाद राजमहल में जो राजपरिवार रहेंगे ,उनके "राजतिलक"- संदेश का कुछ इस प्रकार लोगों के पास मैसेज जाएगा :-

       *" महोदय ,अत्यंत हर्ष के साथ सूचित किया जा रहा है कि भूतपूर्व रियासत के भूतपूर्व राजकुमार का राज्याभिषेक अमुक तिथि को राजमहल के फ्लैट संख्या पिचहत्तर ( नौवीं मंजिल )पर किया जाएगा। सूक्ष्म जलपान अर्थात चाय और समोसे का भी प्रबंध है ।"* 

          क्या किया जाए ? अगर "हम दो हमारा एक" की नीति पर लोग नहीं चले तो भूतपूर्व  राजा-महाराजा और बड़े खानदानों तक में हालत खस्ता होने वाली है । एक बड़े उद्योगपति की तीन फैक्ट्रियां थीं। बेटे चार थे। चालीस साल से मुकदमा चल रहा है। कैसे बँटे ? अगर बच्चे चार की बजाए तीन किए होते तो कम से कम एक-एक फैक्टरी तो बांट लेते ! संपन्न लोगों को "हम दो हमारे एक" पर अत्यंत गंभीरता पूर्वक विचार करना चाहिए । जमीन - जायदाद वाले संपन्न लोगों को एक बच्चा रखने की ज्यादा जरूरत है । उनका शांतिमय भविष्य इसी में निहित है।

✍️  रवि प्रकाश, बाजार सर्राफा, रामपुर (उत्तर प्रदेश) मोबाइल 99976 15451

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