गुरुवार, 15 जुलाई 2021

मुरादाबाद की साहित्यकार डॉ शोभना कौशिक की लघुकथा ---सपने


मधु जब मात्र छह वर्ष की थी, उसके पिता तिलक गुजर गए थे । एक भाई जो उस समय चार वर्ष का था उसे मालूम नही था कि जिंदगी किसे कहते हैं ।माँ मेहनत मजदूरी करके पेट भरती रही ।कहने को मामा साथ रहते ,लेकिन उनकी तरफ से जरा सी भी मदद की उम्मीद न थी ।मामी को मामा का मिलना -जुलना भी पसंद न था ।खैर ,समय बीतता गया ।मधु और उसका भाई राजीव बड़े हो गए थे ।राजीव को मिर्गी के दौरे पड़ते थे ।सो वह ज्यादा न पढ़ पाया लेकिन मेहनत करती माँ को देख मधु का मन कुछ करके हासिल करने को आतुर हो जाता ।वह नहीं चाहती थी ,कि माँ अब इस उम्र में भी मेहनत करे ।वह अपनी माँ को वो तमाम खुशियाँ देना चाहती थी ,जिससे वह वंचित रह गई।मधु जानती थी ,सपने बंद आँखों से नही खुली आँखों से देखने वालों के ही पूरे होते है और  दिन -रात कड़ी मेहनत कर मधु ने अपनी मंजिल पा ही ली और उसका बैंक में चयन हो गया ।वह जानती थी ,मेहनत करने वालों की कभी हार नही होती ।जो सपना उसने देखा ,कि वह माँ, भाई को अपने साथ रखेगी आज वह पूरा हो गया ।

✍️  शोभना कौशिक, बुद्धिविहार, मुरादाबाद

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