बुधवार, 17 जून 2020

मुरादाबाद के साहित्यकार नृपेंद्र शर्मा सागर की लघुकथा------ ट्रेन चल गई



"क्या करें!! काम बंद हो गया जेब में एक भी पैसा नहीं है।
सारा अनाज भी खत्म हो गया।
फ्री का राशन भी उन्ही को मिल रहा है जिनकी थोड़ी बहुत जान पहचान है।
अब तो झुग्गी का किराया भी दो महीने का हो गया है कैसे काम चलेगा??" सुखिया ने उदास होकर अपने पति सोहन से कहा।
दोनों की पिछले साल ही शादी हुई थी सोहन दो साल से फैक्टर में दरी बुनने का काम करता था। कुछ दिन से सुखिया भी वहीं काम करने आती थी। दोनों के दिल मिले और शादी कर ली।
दोनों ही बिहार के छपरा जिले के अलग अलग गांव के रहने वाले थे।
"क्या करें सुखिया, चल गांव वापस चलते  हैं वहीं पुराने कपड़ों की डरी बनाकर बेचेंगे कुछ खेत मजूरी कर लेंगे गुजरा हो जाएगा। किराए के पैसे तो हैं नहीं, चल बाकियों की तरह पटरी-पटरी चलते हैं कुछ दिन में पहुँच ही जायेंगे। इस भुखमरी से तो अच्छा ही है।" सोहन ने उदास होकर कहा।
"नहीं  बिल्कुल नहीं तुम्हे पता नहीं सरकार ने ट्रेन चला दी हैं", सुखिया चीख कर बोली।

✍️ नृपेन्द्र शर्मा "सागर"
ठाकुरद्वारा मुरादाबाद

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