मंगलवार, 16 जून 2020

मुरादाबाद की साहित्यकार हेमा तिवारी भक्त की कहानी-----चिड़िया रानी, चिड़िया रानी


         रेनू ने किचन की खिड़की से देखा।नाश्ते में फिर पापाजी ने थाली में रोटी सब्जी बचा दी थी।रात भी वह थाली में खाना बचा कर गेट पर डाल आये थे।वह मन ही मन झुंझला उठी,"पापा जी सठिया गए हैं,खुद ही कहते हैं।अन्न का एक भी दाना बर्बाद नहीं करना चाहिए।चाहे कितनी भी अच्छी सब्जी बना लूँ इन्हें थाली में खाना बचाना ही है।मालूम है यही जताना चाहते होंगे कि खाना स्वाद नहीं बनाती तो पूरा कैसे खायें?पर कह तो सकते हैं कि और रोटी नहीं चाहिए।"
   रेनू को खाना बर्बाद न जाने देने की एक सनक सी थी।वह गरमागरम रोटियांँ बनाती और सबको उनकी जरूरत के अनुसार पूछ पूछ कर उतनी ही रोटियाँ थाली में देती,जितनी जिसे खानी होती ताकि रोटियाँ बर्बाद न जायें या बासी न बचें। पापाजी अक्सर कहते, "बेटा गृहस्थ का घर है,एक दो रोटी फालतू बनी रखी रहें तो अच्छा होता है।कोई भूखा आ जाये तो उसे दे सकते हैं।नहीं तो गाय ,जानवर तो हैं ही।" रेनू कभी कभार तो संयोग से एक रोटी अधिक बना लेती थी।पर अपनी बर्बाद न जाने देने वाली सनक के चलते वह नियमित ऐसा करने से चूक जाती थी।
   रेनू इसी झुंझलाहट में किचन साफ कर रही थी कि उसे छत से कुछ आवाज आती सुनाई दी।वह जिज्ञासा वश छत पर पहुँचने ही वाली थी कि उसे एक गीत के शब्द साफ साफ सुनाई दिये,"चिड़िया रानी,चिड़िया रानी।चुग लो दाना,पी लो पानी।" पापा जी थाली में बची रोटी के टुकड़े टुकड़े कर के छत में फैलाते हुए यह गुनगुना रहे थे और बहुत सी छोटी छोटी गौरैया बेझिझक उन टुकड़ों को चाव से खा रहीं थीं।पापा जी के पाँवों के पास ही गली का वह कुत्ता जिसे कि मोहल्ले वालों ने बहादुर नाम दे रखा था,शान्त आज्ञाकारी शिष्य-सा बैठा था।शायद पापाजी की रात की रोटी का हकदार वही था।रेनू को यह दृश्य देखकर बहुत अच्छा सा लगा।साथ ही उसे अपनी गलती का एहसास भी हुआ।वह किचन में गयी और अपने लिए बना कर रखी रोटी उठा लायी।उसने दबे पांव जाकर वह रोटी बहादुर के आगे डाल दी।बहादुर ने जैसे ही रोटी लपकी,पापाजी के गौरेया से हो रहे संवाद में व्यवधान पड़ गया।पापाजी ने पीछे मुड़कर देखा तो रेनू खड़ी थी,वह मुस्कुरा दिये।अब रेनू भी मुस्कुरा रही थी।
 
✍️हेमा तिवारी भट्ट

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