शनिवार, 22 अगस्त 2020

मुरादाबाद के साहित्यकार अशोक विश्नोई की लघुकथा---समय

 
        "" मारो ! इनको पता नहीं, कहाँ- कहाँ से से चले आते हैं परेशान करने----। मगर हजूर यह तो आप की प्रजा है रामू ने कहा।"
        " वो क्या होती है रे-----?"
   " हजूर वहीं जिसके बल पर आप राज कर रहे हैं---।"
       एक कटु मुस्कान के साथ " हूँ ------राज  कर रहे हैं। सुनो हम राज इनके बल पर नहीं, चाटुकारिता के बल पर कर रहे हैं, समझे।"

अशोक विश्नोई
मुरादाबाद

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें